परवाह

"कोमल ज़रा इधर आओ बिटिया।"

“जी दादी, आई, कुछ चाहिए दादी,आपको?”

“नहीं! तनिक बैठो हमारे पास, आजकल तुम हमारे पास बैठती ही नहीं हो, कुछ नाराज़ हो क्या?”

“नहीं दादी! कुछ चाहिए तो बोलो, मुझे वॉक पर जाना है “

“बिटिया! तुम ज़रूर हमसे नाराज़ हो बोलो क्या बात है, तुम्हारे पापा की माँ हैं,चेहरा पढ़ना जानते हैं”

 दादी! हाँ मैं आपसे नाराज़ हूँ, आप मेरे पापा को बात बात पर गुस्सा करती हो, ये मुझे अच्छा नहीं लगता। थोड़ा भी आराम नहीं करने देती उनको,आप सोचती भी नहीं कि उनके भी आराम करने के दिन हैं,कोई छोटे तो हैं नहीं वो,अगले महीने रिटायर हो जाएँगे वो। मुझे अच्छा नहीं लगता कोई भी मेरे पापा को डांटे

“अच्छा तो ये बात है...एक बात बताओ, तुम्हारी मम्मी तुमको और पवन को प्यार करती हैं ना, और कभी कभी गुस्सा भी करती हैं, तो क्या तुम अपनी मम्मी से भी गुस्सा हो  क्या?”

“उनसे गुस्सा क्या होना? हमारी माँ हैं वो, हमारी भलाई के लिए ही हमे डांटती होंगी।“

तो सोचो बिटिया! तुम्हारे पापा की भी तो मैं माँ ही हूं, तुम्हारे पापा को  अस्थमा है, और बचपन से  ही बाहर से आते ही वो ठंडा पानी पीता है,  अब उसकी उम्र हो गई है,और इस तरह की बदपरहेजी उसके लिए ठीक नहीं,  उसको ऑफिस से आने  पर  मैं अपने कमरे में इसलिए बुलाती हूँ ताकि वो फ्रिज का पानी न पीए....तुम्हारा पापा मेरा बेटा भी  तो है, समझी बिट्टो!

 

अनूपा हर्बोला

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