वो रात की हसीना या कुछ और.....

आज मै स्कूल से घर आया तो देखा मेरी चारो बहनें झगडे के अलावा कुछ गभींर बाते कर रही है। मैंने उत्साह के साथ पुछा। अरे मुझे भी तो बताओ क्या बात चल रही है कुछ हुआ क्या?
मेरी बातें सुन उन्होने कहा, क्या आपको नही पता कल रात क्या हुआ। आप भी तो यहीं सो रहे थे।
मैने कहा, मुझे कुछ नही पता मै तो बिस्तर पर पडते ही सो गया था। ठीक है हम बताते हैं पर हँसना नही। ठीक है बताओ मुझे मैं नही हसुगाँ। छोटी बहन ने कहा जब रात को हम सोने गए तो हम आपस मे बाते कर थे उसी समय ऐसा लगा बाहर कोई खडा है। कभी वह दाएँ जा रहा था कभी बाएँ। क्योंकि उसकी परछाईं दरवाजे से होकर अदंर की ओर आ रही थी। पहले तो हम घबराकर पीछे हो गए। हमें लगा कोई चोर है। पर जब हमने आवाज दी कौनहै यहाँ तो जोरो से पायल की आवाज और दौडने का एहसास हुआ ऐसा लगा कोई पायल पहने स्त्री यहाँ से दौडकर गई।
मै जोर से हँसा, और कहा मतलब वो चोर नही चोरनी थी।
जो पायल पहनकर सबको बताते हुऐ चोरी करती है।
मेरी बहनोने गुस्से से देखा और कहा आप पागल हो गए हो क्या? कोई पायल पहनकर चोरी क्योँ करेगा।
हमने तो सुना है कि रात को एक चुडेल पायल पहनकर घूमती है और कल रात यहाँ आई थी। मैंने हँसकर कहा क्यों नही तुमसे मिलने आई होगी। बहनो ने कहा हम सच कह रहे है ये बात हमने मम्मी पापा को भी बताया तो उन्होने कहा , की वो भाजी वाली पडोसन होगी रात को आई होगी यहां।
मैने भी कहा , हो सकता है। बहन ने कहा हम यह जाँच पडताल करने गए थे वहाँ पर उसने कहा वो कल रात जल्दी सो गई थी। हमने जब पुछा की क्या तुम पायल पहनती हो तो उसने अपने पैर आगे कर दिया। उसने कोई पायल नही पहना था। हमे यकीन हो गया है कि वो रात मे घुमने वाली चुडैल है।
मैंने कहा तुम डरो मत आज रात मैं जागूगाँ और देखुगाँ की कौ सी चुडैल है। मील गई तो अपने सारे काम उसी से करवाउंगा। संध्या हो चुकी थी। ररत का अधेंरा चारो ओर फैलने को बेताब दिखाई दे रहा था। हम भोजन करने गए। मेरे मन पसंद की सब्जी थी। मैने खाना सुरू कर दिया पर मेरी नजर ,मेरी बहनों पर गयी। वह बहुत धीरे धीरे खा रहे थे।
मैं समझ गया कि ये सभी बैचेन हैं और डर रहें हैं ।
मैने अपना भोजन समाप्त किया और रात होने का इंतजार करने लगा। रात अधीक हो चुकी थी।मै उस चोरनी को पकड कर यह साबित करना चाहता था कि डायन जैसी कोई चीज नही होती। भोजन अधिक करने की वजह से मुझे झपकी आने लगी थी। रात के एक बज चुके थे। कुछ देर के लिए मैने आंखें बंद हुई। उतने मे ही मेरी मम्मी की आवाज मेरे कान मे गुजंने लगी। वो मुझे नींद से उठाने कि कोशिश कर रही थी। मै उबता हुआ उठा। मम्मी मुझे कुछ डरी और सहमी हुई लगी। मै तुरंत उठ खडा हुआ। हात मे सलीया लिये बाहर आया पर मुझे ना कोई दिखाई दिया ना कुछ सुनाई दिया। मैने चारों ओर मुझे कोई नही दिख रहा था।सिर्फ कुत्ते भौक रहे थे उसीकी आवाज कहीं दूर से आ रही थीं। मैं घर के अदंर आया। मैने हसते हुए कहा कुछ नहीं है।यहां कोई नही तुम लोग खामखाह डर रहे हो। उसी समय सामने की इमारत के गेट के पीछे से हलकी सी पायल की आवाज आई। मै चौंक गया अब मुझे एहसास हो गया था। कोई तो जरूर हैपर मैंने नजरअंदाज किया क्योंकि मै चाहता कि मेरा परिवार ना डरे। मैने उन्हें बहका कर अदंर लाया। और उसी समय से मै उस चोरनी को पकडने की योजना बनाने लगा। पर रह रह कर मेरे मन मे सवाल उठता। अगर मेरी बहनों का कहना सच हुआ तो। फिर मेरा मन केहता कि वह कोइ औरत है, या फिर किसी की शरारत।
अगली रात मैं तैयार बैठा था। मेने हाथ मैं एक लोहे की छड ले ली तथा दरवाजा थोडा सा बंद रखा पर किवाड नही लगाया। अब उसी का इंतजार था।
रात लगभग दो बजे पायल की हलकी हलकी आवाज आने लगी। धीरे धीरे आवाज बढ़ने लगी।रात का समय और गहरी अधेंरी रात मेरा मन भय से भर गया परंतु थोडी हिम्मत के साथ मै आगे बढ़ा। वो आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी।जैसे की वह मेरे घर के बहुत करीब हो। मैने दबे पांव झटके से दरवाजा खोला और यह क्या कोई नही। पर भागने की आवाज छम छम छम छम आने लगी मै उसी दिशा मे दौड पडा। कुछ दुर पहुंचने पर वो आवाज अब रिंका पार्क के ओर से आने लगी और एक हल्की सी परछाई दिखाई दी। मैंने बिना कुछ सोचे समझे इमारत से लगे दिवार पर चढ गया। दुसरी तरफ कुद गया। अब वह आवाज शांत थी और चारो ओर सन्नाटा मे डरते हुए अपने कदम बढा रहा था।
इमारत के पीछे दुकानदारो के लिए दो शौचालय बनाए गए थे। मैने उन्हें खोल कर देखा। पर कोई ना था। फिर मैने शौचालय के पीछे देखा पर कोई नही। पर मुझे वहाँ किसी के होने का आभास हो रहा था। अचानक मेरी नजर शौचालय के छत पर गई और मानो मेरा सरीर काँप सा गया। ठीक मेरे उपर छत पर एक सुदंर लिवास मे सुदंरी खडी थी। जिसका यौवन उफान मार रहा था। शरीर मानो साँचे मे डालकर बनाया गया हो। चेहरे का गोरा रंग इस प्रकार चमक रहा था जैसे चद्रंमा की रोशनी छन छन कर अपना प्रकाश उस पर बिखेर रहा हो। उसकी आँखों मे चमक और आकर्षण इतना था कि मानो मै उसके चेहरे से नजर नही हटा पा रहा था। उसकी सुदंरता धीरे धीरे मेरे मन मे समा रही थी। मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था कि यह सुदंरी बिना सहारे छत पर कैसे चढ गई और मै उस तक मै कैसे पहुँचूं। उसी समय मेरे हाथ से लोहे की छड छुट गई और उसकी आवाज से मैर ध्यान भंग हो गया। मै छड उठाने नीचे झुका और उपर देखा तो वहां से सुदंरी नदारद हो गई थी। वहाँ रह गई थी सिर्फ धुंध।

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