क्या वास्तव में मैं दोषी हूँ

क्या वास्तव में मैं दोषी हूँ






पूनम आज टेलीविजन देखते देखते भावुक हो गई।बात कुछ भी नही हुई पर उस पर कृत्रिम गर्भ धारण के बारे में बता रहे थे। उसे सुन कर वह अपनी जवानी के दिनों में वापिस लौट गई जब सारे गॉव में उसके हुस्न, खूबसूरती के किस्से दूर दूर तक मशहूर थे।शायद ही कोई ऐसा हो जिसने उसे देख कर आह ना भरी हो और मन ही मन उसे अपना बनाने की चाहत ना रखी हो। लड़के तो लड़के बड़ी उम्र के आदमी भी बिना आह भरे नही रहते थे।घर मे कोई भी रिस्तेदार आते तो उसका हाथ अपने लड़के ,भाई या देवर आदि के लिए ना मांगा हो।पूनम को इनसे कभी फर्क नहीँ पड़ा वो तो अपनी मस्ती में मस्त जीती थी और अपनी धून की पक्की थी, ना किसी को गलत कहना ना सुनना और अपने काम की माहिर।हर चीज़ को बड़े ही सलीके से संभाल कर रखा हुआ था।आखिर वो दिन भी आ गया जब उसकी मँगनी पड़ोस के ही गांव में हरी राम से कर दी गयी और जल्दी ही दुल्हन बन वह बेटी से बहु बन गयी और एक नई दुंनिया में चली गयी। ससुराल में सास कर्मो तो बार बार ब्लाइये ले रही थी, उसकी हर हरकत बता रही थी कि उसके पैर ज़मीन पर नहीं हैं। हर किसी के मुँह से पूनम की खूबसूरती की बात सुन कर कर्मो के पैरों में बिजली सी फुर्ती आ रही थीं।सच भी था मेरा सूडोल जिस्म और पहली बार पूरी तरह से सिंगार किये खुद को देख कर मुझे ही खुद ऐसा लग रहा था मानो वास्तव में पूनम नहीँ हूं बल्कि पूनम का चांद ही जमीन पर उतर आया हैं। धीरे धीरे रात होने लगी और नंदो भाभियों ने मुझे ऊपर बने कमरे तक पहुंचा दिया और हँसते हुए हरी राम को कहा कि देखना देवर जी बहुत नाजुक हैं जरा संभाल लेना और प्यार से पेश आना।सुन कर मैं मन ही मन मुस्कुरा दी थी।
कमरा सजा हुआ था और कमरे की कुंडी लगा कर हरी राम जी बोले कि अब बर्दाश्त नहीँ हो रहा मुझे भी चाँद को देखना हैं। मैं बिस्तर से उठ कर उनके चरणों में झुक गयी कि तभी उन्होनें दोनों बाजुओं से पकड़ कर बीच में ही रोक लिया और मेरे घूंघट को उठा कर ऐसे खिल गए मानो दुंनिया की सारी ख्वाहिश पूरी हो गयी।बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर बिस्तर पर बिठा दिया, और दोनों हाथों को अपने हाथ में ले कर सारी उम्र साथ देने का वादा करते हुए मेरी तारीफ के पुल बांध दिए। रात बीत रही थीं और आले में रखे दीये की लौ कम होती जा रही थी। धीरे धीरे लौ बुझ गई और पता ही नहीं चला हम दो से एक हो गए । कब नींद ने अपने आगोश में लिया पता नहीँ चला ,पता तब चला जब भाभियों ने दरवाजा खटकाना शुरू किया। मैं जल्दी से उठी और कपड़े ठीक करते हुए दरवाज़ा खोल दिया। मजाक का दौर फिर शुरू हुआ और सब चटकारे ले कर सुहाग रात के किस्से सुनना चाह रही थीं। सास को देख उनके पैर छुए और सास ने भी आर्शीवाद देते जल्दी पोते का मुंह देखने की इच्छा रख दी। दिन बीतते गए और सब ठीक चल रहा था ,मेरा यौवन और मादकता अब और निखरती जा रही थी। किस्मत का खेल कहो या उसकी लीला कब क्या बदलने वाला कोई नहीं जानता तो मैं भी कैसे जान सकती थी।पड़ोस की औरतें सास को पूछती की कब पोते का मुँह दिखा रही हो और यही बात मेरी सास मुझ से। शादी को एक साल होने को आया पर बच्चे होने की कोई आस दिखाई नहीँ दी। अब मेरी खूबसूरती ही मेरी सौत बन गयी ,सास सीधे मुँह बात नहीँ करती थी, हर वक़्त यही ताना मिलता सुंदर तो हम भी थे पर बांझ नहीँ। ये सुन कर लगता भगवान कौन सी परीक्षा ले रहे, क्या में अकेली ही जिम्मेदार हूँ बच्चा नहीं पैदा करने के लिए। कई बार हवन पूजा पाठ करवाया गया पर जहाँ इंसान का काम हो वहाँ पूजा क्या करेगी। किसी ने सास को बताया कि हस्पताल में जांच करवा लो हो सकता दवा काम कर जाए। डॉक्टर ने पूरी जाँच कर के बता दिया कि मुझ में कोई कमी नहीँ हैं। सास सुन कर सकते में आ गयी। मेरे घर वाले कि जांच के बाद डाक्टरनी ने मेरी सास के कान में कुछ कहा जिसे सुन मेरी सास यू उछली मानो बिछू का डंक लगा हो।।।।डॉक्टर को ऎसे देख रही थी मानो कुछ डॉक्टरनी से ही गलत हुआ हो। वहाँ से निकल हम घर आ गए, पर सारे रास्ते सास कुछ नहीं बोली पर लग रहा था कि अन्दर तक टूटी पडी। चारपाई पर बैठते ही बोली कि जरा सी चाय पिला दे।मैं बहुत कुछ पूछना चाहती थी पर शायद वक़्त की नजाकत और अपने हालात को देख कर चुप चाप चाय बना लाई। श्याम को हरी राम जी आए और बिना बोले कमरे में जा कर लेट गए, जब मैं पानी लेकर गई तो इस तरह पूछा मानो कोई गुनाह कर के आयी हूं। आज डाक्टरनी ने कुछ बताया कि बंजर धरती पर कभी कोई कांटा तक भी ऊग सकता या नहीँ। बात अंदर तक चीर गयी और दिल किया कि चीख चीख कर बोलू की मैं तो ठीक हूं बाकी क्या कहा उसने अपनी माँ से पूछो। औरत जात को मर्दो के समाज मे बोलने की इजाजत मिली कब थी जो मैं बोलती। अपनी जिंदगी का कड़वा जहर पी कर रह गयी कि काश भगवान ने करूप बनाया होता पर बांझ ना बनाता।सास का रवैया बदल गया था ,अब वो बोलती तो नहीँ थी पर रोज कहीं निकल जाती और दोपहर बाद ही लौटती।एक दिन सास ने पूछा बहु सिर धो लिया ना, तो सुन कर हैरान हुई कि ये क्यो ऐसा पूछ रही पर हां में सिर हिला दिया। सुनते ही एक मुस्कुराहट सास के चेहरे पर फैल गयी। मेरे पास आ कर बोली कल तैयार रहना हरी के जाते ही हमें भी जाना है और हां इस बारे में हरी से कोई बात नहीं करनी। अगले दिन सास मुझे ले कर एक सूनसान बने छोटे से मकान में ले गई। प्यार से बोली बहुत बड़े महात्मा हैं बस ये अपना आशीर्वाद और प्यार दे देंगे तो समझो मेरा पूरा खानदान गंगा नहा गया। जाकर देखा एक ३५/५० साल का आदमी जिसकी दाढ़ी बड़ी हुई और नाक कान में बाली ,दांत पीले और मुँह से बदबू इतनी की वहां बैठना भी मुश्किल। जहर तो पीना ही था तो पैरो को हाथ लगा कर बैठ गयी। तभी वो बोला सब समझा दिया कोई गलती तो नहीँ करेगी ये मूर्ख । मेरी सास ने पैर पकड़ते हुए कहा नहीं स्वामी जी बस आप वरदान पूरा करो।उसने भी चिलम से लंबा कस मारा औऱ मुझे नीचे से ऊपर तक पूरा निहारा जैसे वो बस निगलने वाला हो। लाल आँखो से जो मेरे बदन को झेद रही थी निहारता हुआ उठा और पर्दे के पीछे आने को कहा की पूरी रस्म वहीं होगी। मेरी सास ने पूरा साथ देते हुए मुझे बड़े प्यार से उसके साथ भेज दिया।बस बीच में नाम मात्र पर्दा था और उसने मेरा हाथ पकड़ कर चुम लिया और नीचे गिराने की कोशिश की। पता नहीँ कब हाथ उठा और मुँह पर उसके निशान छोड़ गया। तिलमिला कर कुछ मंतर पढ़े और मुझे ता उम्र बांझ होने का अभिशाप दे कर बोला कि तेरी गोद भरनी थी अब वो नहीँ होगी जब तक मैं नाक रगड़ती ना आऊँ उसके पास।मैं चुपचाप बाहर आ गयी और सास मेरे पीछे पीछे बहुत ही गुस्से में निकली।दांत रगड़ते हुए बोली थी ऐसी क्या मौत पड़ गयी थी जो 10 मिनट अंदर ना रूक पाई, खानदान का नाम चलाना हैं।अपने हुस्न के नखरों में रहेगी तो मेरे वंश का नाश करवा के छोड़ेगी।अभी भो महूर्त चल रहा ,जाकर क्षमा मांग ले और महात्मा जी का प्यार ग्रहण कर। मेरे सब्र की सारी सीमा पार हो गयी और चिला कर बोली थीं कि ऐसे इंसान से गर्भवती होने से तो मर जाना अच्छा, वंश के नाम पर एक चरसी और विकृत बच्चा नहीं पैदा करना चाहती। मैं हरी जी से बात कर लुंगी की बच्चा नहीँ होता ना हो,बिना माँ बने भी जिंदा रह सकती।मुझे कोई शौक नहीँ पूरण होने का,रहने दो समाज की बाते की औरत माँ बने बिना पूरी नहीं होती और मुक्ति नहीं मिलती। बोलते बोलते मैं रोते हुए कब जमीन पर गिर गयी पता ही नहीँ चला। सास मेरे पास बैठ गयी और समाज की दूहाई देने लगी कि हरी को लोग किस तरह से नामर्द की निगाह से देख रहे। दोनों घर आ गयी और एक तनाव पूरण मौहोल में वक़्त बीतने लगा।मेरी तबियत खराब रहने लगी और जीवन से मोह भंग होने लगा।एक दिन पडोस की भाभी मुझे हॉस्पिटल ले गई ताकि मेरी जांच हो कि क्यो मेरा रंग पीला पड़ता जा रहा।वहाँ नया डॉक्टर आ चुका था ,  देखने में प्रभावशाली। लंबा कद ,चौड़ा सीना और चाल में एक विश्वास। बड़े प्यार से  जांच करने के बाद वह बोलो कोई बीमारी नहीं हैं बस कोई बोझ दिमाग मे पाल रखा हैं। कुछ दवाइयां दी उसने और हम घर लौट आये, रास्ते मे भाभी ने कोहनी मारते बोला था कि डॉक्टर को बहुत बांका हैं। पता नहीं क्यों बार बार दिमाग वही भागता और कई बार दिखाने गयी वहाँ। हर बार में एक नया विश्वास जागता रहा और शायद भाभी भी इस बात को भांप गयी थीं।एक दिन उन्होंने ही बात शुरू की डॉक्टर से, की इसके पास सब होते हुए भी कुछ नहीँ हैं।जिस औरत के पास बच्चा ना हो उसकी जिंदगी भी बद से बतर, जिंदगी जीने नहीं देती और मौत आती नहीँ।भाभी की बात सुनकर डॉक्टर ने रिपोर्ट लाने को कहा ताकि पता चल सके कि दिक्कत कहाँ और किसमे।अगले दिन सारी रिपोर्ट ले कर मैं अकेली ही मिलने गयी और सारी रिपोर्ट दिखा कर पूछा ,क्या मुमकिन हैं कि मैं माँ बन सकूँ। रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने साफ कहा कि आप तो बिल्कुल स्वस्थ हैं, कमी शायद आपके पति में होगी उनकी भी जांच करवा लेते हैं। डॉक्टर से मैं काफी बार मिल चूकि थी इस लिए काफी खूली हुई थी। जब डॉक्टर ने हरी जी मे कमी की बात की तो मेरी सास का वो डॉक्टरनी की बात सुन कर ऐसे उछलना जैसे बिच्छू डंक मार गया हो आँखों के सामने आगया।मैने डॉक्टर को सारी बात बता दी जो भी मेरे साथ हुई यहाँ तक कि बाबा वाली बात भी। ये सब बताते बताते जाने कब मुँह से निकल गया कि अगर बच्चा पैदा करना ही हैं तो उस जैसे विकृत इंसान से क्यो आप जैसे भले और पढेलिखे इंसान से क्यो नहीँ। मेरी बात सुन कर डॉक्टर के होश फ़ाख्ता हो गए, फिर खुद को संभालते हुए बोले कि ये आप क्या बोल रही हो। जानती हो इसका मतलब या सिर्फ अपने मन को हल्का और मेरे होश उड़ाने को बोल रही हो। जाने क्यों मैं डॉक्टर की आँखों में अपने लिए अजीब भाव देख रही थी और मेरा दामन उसके सामने भीख के लिए फैला हुआ था। डॉक्टर ने सब ठीक होगा कह कर मुझे जाने के लिए बोला,पर मेरा दिल तो अब फैसला ले चूका था। जाते जाते मैने कहा डॉक्टर साबजी सोचना अगर मैं कही भी गलत हूं तो मुझे माफ़ करना, पर जो लावा दिल में उबल रहा था वो बोल दिया।डॉक्टर मौन खड़ा मेरी तरफ देख रहा था और बोला कि ये सब दिल से होता हैं मुझे सोचने का मौका दो। मैं वहाँ से आ गई। कुछ दिन बाद भाभी ने बताया कि डॉक्टर का तबादला हो गया हैं और लोग कह रहे कि उसने करवाया हैं। आज मैं गई थी हॉस्पिटल तो तेरे बारे में पूछ रहे थे कि कैसी हैं कहा हैं, और बुलाया भी हैं। मुझे लगा कि मैं हर मोड़ पर बदकिस्मत ,यहाँ ये डॉक्टर आया था तो कम से कम कोई मिल गया था जो दर्द समझता था पर मेरी हरकत की वजह से वो भी जा रहा। मै दोपहर बाद हॉस्पिटल पहुँची और पूछा कि तबादला हो गया क्या ,उसने हाँ में सिर हिलाते बोला था हो गया। मुझे बैठने के बोल कर, उसने कहना शुरू किया कि उसने मेरी बात पर बहुत सोचा और जितना सोचा उतना ही वो मुझ से जूडता गया। वह उसके साथ हैं पर हां वो एक बार ही साथ देगा आगे जो भगवान की इच्छा।कुछ दवाइयों का पैकेट मुझे देते हुए कहा कि रोज मैं हरी जी को खिलाती रहू और बता भी दू की इसके सेवन करने से शायद तुम गर्भ धारण कर लो।मुझे भी खाने को कुछ पाउडर सा दिया, मैने पूछा था ये सब किस लिए । बड़ी शांति से बोले थे पूनम तुझ पर कोई आंच ना आये और लोग उल्टा न बोले इसलिए। तुम नहीं जानती पर तुम्हारी सास जानती हैं कि कमी हरी में हैं।वरना तुम्हारे गर्भवती होते ही  तुम्हे ये धक्के मार कर बाहर निकाल देंगे,उन्हें विश्वास दिलाना होगा हरी राम ठीक है।महीने बाद दोनों मिले औऱ दोनों का मिलन पूरी निष्ठा भाव से हुआ और मैं पूरा ब्रह्मांड अपने मे समटने को तैयार थी क्योंकि जानती थी कि दूबारा ऐसा नहीं हो पाएगा। करीब घण्टे भर की नजदीकी के बाद हम बिदा होने को खड़े थे। मुझे शुभकामना देते हुए डॉक्टर ने अपना बैग उठाया और कभी ना लौट कर आने के लिए अपनी राह पर चल दिया। मैं अपनी जिंदगी में फिर खो गयी कि एक दिन जी मचलने लगा और उल्टी लग गयी। रसोईघर से सास ने देखा तो अचंभित सी देखते हुए बोली कुछ है क्या। शायद लगता हैं भगवान ने आपके वंश चलाने को किसी को भेजा हैं। सास की बांछे खिल गयी और जब डॉक्टर ने भी गर्भ ठहरने की बात की पूष्टि की तो जाने किन किन देवी देवता की धोक मारने की प्रतिज्ञा कर ली। वक़्त पूरा हुआ तो बेटा पैदा हुआ। हर तरफ खुशियों का मौहोल था और मैने भी पूरा जीवन उस बच्चे के साथ लगा दिया जो आज बहुत बड़े ओहदे पर हैं। आज उसके और बहू के साथ किसी की शादी में ना आई होती तो शायद डॉक्टर से आमना सामना ना होता जो अपनी पत्नीऔर बेटे के साथ आये थे।दूर से ही नमस्ते कर औऱ उनके बेटे को दिल से दुआ दे कर मैं बाहर आएगी और महसूस किया कि मेरा एक नहीं दो बेटे हैं, क्यो की दोनों बच्चों में आधा अंश तो डॉक्टर साब का ही था। विचारों की अच्छी या बुरी और दर्दनाक सृंखला चलती ही रहती अगर चेतना बहू ने शाल मेरे ऊपर ना डाली होती और बहुत ही मीठी आवाज में ना बोला होता माँ जी ठंड हो गयी हैं बाहर भीतर चलिए। पता नहीं मैं और डॉक्टर गलत या सही पर जिंदगी को जीने का शायद ये भी एक रास्ता हो। मैं खुश हूं कि जब पैदा स्त्री ने करना तो हक भी उसे ही होना चाहिए कि वो किसे चुने या ना चुने। एक गलती जिंदगी में करनी ही हैं तो सृजनात्मक करो ना कि आंख बंद कर के दुनियां को गंदगी से भर दो।

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