मेरे पति का हत्यारा-1

"मम्मी.....पापा...मम्मी ...पापा" मेरा 5 साल का बेटा उस भीड़ भरे बाज़ार में एक शख्श की तरफ ऊँगली उठाकर पापा पापा चिल्ला रहा था।जब मेरी नजर उस शख्श पर पड़ी तो मै बेइंतेहा चौंक गयी। मेरे सामने जो शख्श था वो बिलकुल हूबहू कमल  लग रहे थे। लग क्या रहे थे ? वो शायद कमल ही थे। कमल मेरे पति ! मेरे अर्जुन के पिता!लेकिन ये कैसे संभव था? मेरे पति तो आज से 6 महीने पहले ही परलोक सिधार चुके थे। अचानक अर्जुन ने मेरे हाथ को झटका देकर अपना हाथ छुड़ाया और दौड़ कर उस शख्श से लिपट गया जो हुबुह कमल सरीखे लग रहे थे।

"पापा,पापा तुम कहा चले गए थे"मासूम अर्जुन उसके पापा जैसे लगने वाले उस शख्श से लिपट कर बोला।

उस शख्श ने अजनबी निगाहों से अर्जुन की तरफ देखा,और उसी क्षण उसकी निगाहें मुझ पर पड़ी,मै अभी भी हैरत से उन्ही को देख रही थी।

"बेटा कौन हो तुम!मै तुम्हारा पापा नहीं हूँ" उस शख्श ने भर्राए हुए स्वर में कहा।

वो सच में अर्जुन के कुछ नही लगते थे ? क्योकि उसके मुंह से निकलने वाली आवाज ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि वो शख्श कमल नही है। उस शख्श की आवाज और मेरे दिवंगत पति की आवाज में जमीन आसमान का अंतर था।

"नहीं, नहीं  आप मेरे पापा हो,आप कहा चले गए थे मुझे छोड़कर" अर्जुन अभी भी उस शख्श को छोड़ नहीं रहा था।

मै दौड़कर उस शख्श के पास गयी,और अर्जुन को उस शख्श से अलग करने का प्रयास किया। लेकिन अर्जुन बुरी तरह उससे चिपका हुआ था।

"अर्जुन छोडो इन्हें, ये क्या बदतमीजी है,ये तुम्हारे पापा नहीं है"मैंने अर्जुन को समझाने का प्रयास किया।

"नहीं ये मेरे ही पापा है !क्या मै अपने पापा को नहीं पहचानूगा मम्मी? " मासूम अर्जुन के इस सवाल का जवाब में उस भीड़ भरी सड़क पर नही दे सकती थी।

"देखो बेटा!तुम्हे कोई ग़लतफहमी हुई है! मै आपका पापा नही हूँ"उस शख्श ने फिर से अर्जुन को कहा।

"पापा आप मुझे भूल गए मै अर्जुन हूँ जिसके लिए आप रोज चॉकलेट लाते थे" अर्जुन उस शख्श को याद दिलाने की कोशिश करते हुए बोला।

अब उस शख्श ने असहाय नजरो से मेरी और देखा। मैंने आँखों ही आँखों में उन्हें सांत्वना दी की मै समझाती हूँ,अर्जुन को।

मैंने  अर्जुन को इस बार जबर्दस्ती उस शख्श से अलग किया।जैसे ही मैंने अर्जुन को अलग किया अर्जुन जोर जोर से रोने लगा। उसके रोने की आवाज सुनकर वहां भीड़ का मजमा लगने लगा। मुझे अब अर्जुन से कोफ़्त होने लगी थी। लेकिन इसमें उस मासूम से बच्चे का भी क्या कसूर था ? उस के नादान दिल में जो उसके पिता की छवि अंकित थी वो उस शख्श की ही तो थी,जिसे देखकर मै भी एक बार चक्कर खा गई थी।

"अरे भाई अपने मिया बीबी के झगड़े में इस बच्चे को क्यू हलकान कर रहे हो,जाओ घर जाओ,घर जाकर अपना झगड़ा सुलझा लो" भीड़ में से एक बुजुर्ग ने कहा।

"देखिये मै इसका पापा नहीं हूं,इस बच्चे को कोई ग़लतफहमी हो गयी है" उस शख्श ने भीड़ से मुखातिब होकर कहा।

"अरे वाह! ये तो हम पहली बार सुन रहे की किसी बच्चे को अपने बाप को ही पहचानने में गलती हो रही है" भीड़ में से किसी ने व्यंग्य कसा।

मेरे मुंह से उस वक़्त कोई बोल नही निकल रहा था,न जाने क्यू मै उस  वक़्त किंकर्तव्यविमूढ़ सी वहां खड़ी रह गई।

"देखिये मै बोल रहा हूँ न की मै इस बच्चे को जानता भी नही हूँ, चाहे तो इसकी मम्मी से पूछ लीजिये" अब उस शख्श ने झल्ला कर कहा।

"क्यों मैडम ये आपके पति नहीं है क्या?  भीड़ अब हमारा तमाशा बना रही थी और मुझे अर्जुन पर हद से ज्यादा गुस्सा आ रहा था इस समय।

"जी नहीं ये मेरे पति नहीं है" मैंने मरी सी आवाज में कहा।

"मम्मी आप झूठ क्यों बोल रही हो,यही तो मेरे पापा है" अर्जुन ने फिर मुझे उस भीड़ के समक्ष लज्जित सा कर दिया था।

"बेटा मै तुम्हारा पापा नहीं हूँ,तुम समझते क्यू नही हो" अब उस शख्श ने भी अर्जुन को समझाने की कोशिश की।

अचानक अर्जुन उस शख्श से और भी जोर से चिपक गया।

"पापा आप भी अब झूठ बोलने लगे" अर्जुन ने भीगी आखो से उस शख्श की और देखा।

अचानक उस शख्श ने अर्जुन को गोद में उठा लिया,और मेरी तरफ देख कर बोला।

"प्लीज यहाँ से तो चलिए कही एकांत में इस बच्चे को समझाने की कोशिश करते है" वो शख्श पहली बार मुझ से मुखातिब हुआ।

मैंने भी वहां से चुपचाप निकलने में ही भलाई समझी क्योकि भीड़ का हुजूम बढ़ता ही जा रहा था। जितने मुंह उतनी बातें शुरू हो चुकी थी। मै चुपचाप उस शख्श के पीछे पीछे चलनी लगी। अर्जुन उस शख्श की गोद में ऐसे चिपका हुआ था,जैसे कभी उस गोद से उतरेगा नहीं। भीड़ अब पीछे छूट चुकी थी।

मै प्रिया जो आज से 6 महीने पहले विधवा हो चुकी थी।अचानक से उसकी जिंदगी में ये एक अनजाना सा तूफ़ान आ गया था। मैंने सुना था कि दुनिया में एक ही शक्ल के सात आदमी होते है, लेकिन एकदम हूबहू ऐसे ही होते है और एक ही शहर में दो दो होते है ये कभी नहीं सुना था।

उस शख्श की गोद में चिपके चिपके अर्जुन सो चूका था। मैंने राहत की साँस ली। कम से कम अर्जुन अब सड़क पर तो हंगामा नही करेगा।

"लाइए अर्जुन को मुझे दे दीजिए,आप थक गए होंगे,वैसे भी ये अब सो चूका है" मैंने उस शख्श से कहा।

उस आदमी ने चुपचाप अर्जुन को मेरे हवाले कर दिया।

"सॉरी आपको इस बच्चे की वजह से इतनी बातें लोगो की सुननी पड़ी।

"जी कोई बात नहीं,बच्चो और भगवान के आगे किसी का जोर नहीं चलता"

"जी सही कहा आपने!इसीलिये बच्चो को भगवान् का रूप कहा गया है" मैंने उस अजनबी की बात का समर्थन किया।

"वैसे ये मुझे  अपना पापा क्यों समझ रहा था" उस शख्श ने जिज्ञासावश पुछा।

"जी आपकी शक्ल मेरे पति की शक्ल से हुबुह मिलती है और  मेरे पति का एक रोड एक्सीडेंट में आज से छः महीने पहले देहांत हो गया था,तभी से अर्जुन अपने पापा को बहुत मिस करता है" मैंने उस शख्श को बस्तुस्थिति बताई।

"ओहह फिर तो इसमें इस बच्चे की कोई गलती नहीं है"उस शख्श ने अर्जुन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

" जी मै अब चलती हूँ,अगर अर्जुन फिर से उठ गया तो कही फिर से सड़क पर हंगामा न कर दे?"  ये बोलकर मै तेज कदमो से आगे बढ़ गई। वो शख्श मुझे तब तक देखता रहा जब तक मै उसकी नजरो से ओझल नहीं हो गयी।

क्रमश:

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