नागमणी : एक खोज - भाग 8

                           अध्याय - आठ
                          मूसा की आज़ादी

भँवरलाल और नामदेव शाज़म के भेंजे हुए उस मूसा नाम की आफत से अब परेशान हो चुके थे।इधर भँवरलाल और नामदेव एक कोने में बैठकर शाराब के प्यालों पे प्याले खाली करते जा रहे थे उधर मूसा आराम से सोफे पर बैठा हुआ हुक्का गुड़गुडा़ रहा था।
"नामदेव भाया देख तो सही म्हारे ही बँगले पे बैठा म्हारा ही हुक्का कैसे गुड़गुडा़ रहा है यो हरामजादा ऊपर से साला हम पर ही रौब झाड़ता है।"
भँवरलाल ने रोनी सूरत बनाते हुए कहा और एक साँस में ही प्याले में भरा सारा द्रव खींच लिया।
"तू ठहर तो आज या तो यो मूसा रहेगा या हम रहेंगे।"
कहने के साथ ही गुर्राता हुआ नामदेव एक बार फिर मूसा पर झपटने के लिए खड़ा हो गया।
"यो के कर रहा है नामदेव भाया खाली हाथ जावेगा तो वो तन्ने चीर के थारे खाल में भुस्स भरे देगा।"
भँवरलाल ने नामदेव को रोकते हुए कहा और खुद भी खड़ा हो गया।
"तन्ने सही बोला भँवरे खाली हाथ जाना ठीक न होवेगा!"
नामदेव ने कहा और कोई हथियार ढूंढने के लिए इधर-उधर देखने लगा और आखिरकार बँगले के एक कोने में पुराना लोहे का राॅड रखा हुआ दिख गया उसे और फौरन नामदेव उसकी ओर लपक पडा़।
"मिल गया म्हारे को हथियार अब देखता हूँ इस हराम के पिल्लै मूसा को।"
और हाथ में लोहे का भारी राॅड लिये दबे पाँव नामदेव मूसा की तरफ बढ़ने लगा जो टीवी की ओर चेहरा किये कोई अजीब सा कार्टून देख रहा था और बीच-बीच में हुक्का भी गुड़गुडा़ये जा रहा था।
मूसा को जरा़ भी अंदाजा नहीं था कि धीरे-धीरे नामदेव मौत बनकर उसकी ओर बढ़ा चला आ रहा था जबकि अपनी उँगलियाँ दातों तले दबाये भँवरलाल चुपचाप बस नामदेव को ही देखे जा रहा था और कुछ पल बाद नामदेव ठीक मूसा के पीछे था जिसकी मुश्कें उस लोहे की रॉड पर मजबूती के साथ कस गईं।
एक पल के सौंवे हिस्से भर के समय में मूसा को खतरे का जबर्दस्त एहसास हुआ और इससे पहले वह खतरे को ठीक से भाँप पाता नामदेव का हाथ लहरा चुका था और मूसा पर वज्रपात हो चुका था।लोहे की रॉड मूसा की खोपड़ी पर पड़ी और होंठों से जबर्दस्त कराह निकालता हुआ वह बुरी तरल लहरा गया।
शायद नामदेव का वार काफी तगड़ा था जो एक ही झटके में गुलाटियाँ खाता हुआ मूसा कई फुट आगे जा गिरा।
"यो तो तन्नै कमाल कर दिया भाया धोत्ती नु फाड़ के रुमाल कर दिया।"
चहकता हुआ भँवरलाल नामदेव के ऊपर कूद पड़ा और नामदेव भी अपनी कारस्तानी पे इतराते हुए मूँछों पर ताव दे रहा था उधर मूसा किसी कटे पेड़ की तरह जमीन पर पड़ा हुआ था।
"जरा़ देख तो भाया यो जिंदा बचो है या गयो!"
भँवरलाल ने शंकित स्वर में चित पड़े मूसा की ओर इशारा करते हुए पूछा और फौरन नामदेव के दिमाग में भी यही शंका उबरी सो मूसा की सांसों को जाँचने के लिए बेहद आराम से कदम बढ़ाते हुए नामदेव फर्श पर औंधे मुँह पड़े मूसा के करीब उसकी ओर बढ़ने लगा हालांकि मूसा को इस कदर पड़ा देखकर नामदेव निश्चिंत था पर उसकी ओर बढ़ते हुए वह पूरी तरह सतर्क था और उसके हाथ उस राॅड पर और भी तेजी से कसे हुए थे क्या पता किसी गुड्डे की तरह अभी खड़ा हो जाये इसलिए नामदेव कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था।
खैर खतरे जैसी कोई बात नहीं थी मूसा बेहोशी की दुनिया में गोते लगा रहा था पर आश्चर्य की बात तो ये थी कि वहाँ खून का एक भी कतरा नजर नहीं आ रहा था यानी मूसा का सिर फटने से बच गया था अलबत्ता उसके सिर पर एक बड़ा सा पीला गूमड़ जरूर निकल आया था।
"नामदेव भाया तन्नै तो इसका एक ही शाॅट में बेडा़ पार लगा दिया।"
भँवरलाल ने किलकारियाँ भरते हुए कहा पर नामदेव पूरी तरह खामोश नजर आ रहा था।
"ये मरा नहीं सिर्फ बेहोश हुआ है।"
और एक ही पल में नामदेव ने सेठ भँवरलाल को आसमान से सीधा जमीं पर लाकर पटक दिया बहरहाल इससे पहले कि भँवरलाल नामदेव से कुछ कहता या नामदेव कुछ बोल पाता मूसा के होंठों से एक हल्की सी कराह निकली और पलक झपकते ही फौरन वह किसी रबर के बबुए की तरह उछलकर खड़ा हो गया और एक पल पहले जहाँ भँवरलाल और नामदेव के चेहरे पर खुशी चमक रही थी वहां इस वक्त भय और आश्चर्य का मिला-जुला भाव दिखाई पड़ रहा था।
"यो छोरा पक्का शैतान है नामदेव भाया म्हारी तो धोती गीली हो गई।"
भँवरलाल ने पीछे हटते हुए कहा जबकि नामदेव का हाथ एक बार फिर उसी लोहे के राॅड पर कस गया।
इधर मूसा लाल अँगारों जैसी आँखों से अपने हमलावरों को घूर रहा था।उसके गुस्से से साफ जाहिर था कि किसी भी पल उन दोनों के गर्दनों पर मूसा की उँगलियाँ कसने वाली थीं और फिर पल भर में वो उन दोनों का टेंटवा दबा देता।
इधर नामदेव ने एक बार फिर अपने हाथ में फँसा लोहे का राॅड लहराया और मूसा के सिर पर निशाना लगाया पर मूसा ने बिजली की सी फुर्ती से अपनी बाजुएँ लहराई और वह राॅड छिटक कर दूर एक कोने में जा गिरा जबकि मूसा ने तेजी से कदम उठाया और अगले ही पल उसकी उँगलियाँ नामदेव के गर्दन पर कस गईं।
भँवरलाल समझ चुका था कि यह पल उसके सबसे प्यारे दोस्त नामदेव का आखिरी पल था और शायद नामदेव को भी अपनी मौत का यकीन हो चुका था पर जो हुआ वो अनहोनी थी।अचानक मूसा ने नामदेव का गला छोडा़ और उसकी पीठ पकड़ कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
नामदेव बुरी तरह हैरान था और कुछ यही हाल भँवरलाल का भी था।
खैर कुछ मिनट बाद दोनों फार्महाउस के बाहरी हिस्से में मौजूद खूबसूरत और आलीशान ड्राइंगरूम में मौजूद बेहद कीमती सोफे पर बैठे हुए थे जबकि मूसा इधर-उधर चहलकदमी करता हुआ न जाने क्या-क्या बड़बड़ाये जा रहा था जिनमें से कुछ गिने-चुने शब्द ही उन दोनों के पल्ले पड़ रहे थे जैसे प्रिंस फँस चुका होगा और दुनिया खतरे में जैसे कुछ अजीब से वाक्य जिनका मतलब वे दोनों जरा भी नहीं समझ पाए थे।
"भाया म्हारे को तो लागे है यो छोरे की याददाश्त गुम हो गई भाया थरे फटके ने तो कमाल कर दियो।"
भँवरलाल ने जूस पीछे हुए नामदेव की तारीफ की जबकि नामदेव के चेहरे पर सोंच के भाव उभर रहे थे।
"ना भँवरे मामला कुछ और है थारे को सुनाई न दिया पर यो छोरा प्रिंस का नाम ले रहा था मतलब यो प्रिंस को जानता है और प्रिंस जहाँ भी है इस वक्त उसकी जान खतरे में है।"
नामदेव ने समझदारी भरी बातें कहीं जबकि भँवरलाल हैरानी से मुँह फाडे़ कभी मूसा को तो कभी नामदेव को देख रहा था।
"तुम दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया अगर तुम दोनों न होते वाकई मैं कभी आजाद नहीं हो पाता।"
अचानक मूसा ने नामदेव और भँवरलाल की ओर पलटते हुए कहा जो बुरी तरह हैरान थे।
"हम दोनों ने के किया भाया.. अर.. मालिक!"
भँवरलाल ने अपनी गलती सुधारते हुए कहा पर उसकी बात मूसा ने बीच में ही काट दी।
"मालिक नहीं आज से हम सभी दोस्त हैं तुम दोनों मेरे सबसे खास दोस्त हो जिन्होंने जाने-अनजाने ही सही पर मुझे उस शैतान शाज़म के चंगुल से मुक्त करवा दिया और इसके लिए मैं हमेशा तुम दोनों का शुक्रगुज़ार रहूँगा।"
मूसा ने नम आँखों से देखते हुए कहा और मजे कि बात तो ये थी कि उसकी बातें सुनकर उन दोनों  का दिमाग और बुरी तरह चकरा रहा था।
"नामदेव भाया ये हम क्या देख रहे हैं इस दुर्दांत के मुँह से तो फूल झड़ रहे हैं और कल तक जहाँ ये हमारा टेंटवा दबाने को तैयार था आज दोस्ती करने पर अडा़ हुआ है यो बात म्हारे समझ में ना आ रही।"
भँवरलाल ने गर्दन हिलाते हुए कहा जबकि नामदेव गौर से मूसा को देख रहा था।
"देख मूसा भाया तू कह रहा है थारे को हमने आजाद करवाया पर म्हारे को याद क्यों न आ रहा कि मन्नै थारे को आजाद कब करवायो?"
नामदेव ने मूसा से सवाल किया और ये देखकर उसकी हैरानी और भी बढ़ गई कि मूसा मुस्कुरा रहा था पर ये पहले वाली शातिर मुस्कुराहट नहीं थी बल्कि मासूमियत से भरी थी जैसे कोई बच्चा मुस्कुरा रहा हो।
"अभी थोड़ी देर पहले तुमने ही मेरे सिर पर उस भारी डंडे से से वार किया था न!"
मूसा ने कोने में पड़े लोहे की राॅड की ओर इशारा करते हुए कहा जैसे उन्हें याद दिला रहा हो उधर भँवरलाल और नामदेव बुरी तरह हैरान नजर आ रहे थे।
"देखो इसे इस तरह समझो कई हज़ारों साल पहले मेरी दुनिया यानी अघोरा की नगरी में शाज़म ने मुझ पर कब्जा कर लिया था और उसने मेरे सिर में एक ऐसा यंत्र फिट कर दिया था जिससे मैं उसके इशारे पर काम करने को मजबूर हो गया था यानी उसने मुझे गुलाम बना रखा था हजारों सालों से और तुमने.... "
"और मैंनें थारे को शाज़म कि गुलामी से आजाद कर दिया थारे सिर पे डंडा मार के।"
मूसा की बात बीच में काटते हुए नामदेव ने कहा और उसके चेहरे पर एकसाथ कई भाव बने और मिट गए।
"हाँ दोस्त तुमने मेरे सिर पर वार करके मुझे शैतान शाज़म की गुलामी से आजाद कर दिया शायद तुम्हारे वार से वह यंत्र निष्क्रिय हो गया।"
मूसा ने किलकारियाँ मारते हुए कहा और खुशी से अपने स्थान पर उछलने लगा।
"कमाल है अगर ऐसा यंत्र अपने पास आ जावे तो यो सारी दुनिया अपनी गुलाम बन जावेगी क्यों नामदेव भाया।"
भँवरलाल ने सपनों की उड़ान भरते हुए कहा।
"ऐसा मुमकिन नहीं क्योंकि एक दो वर्ष पहले वो सारे यंत्र तबाह हो गए!अर्.... नागराज ने उन्हें तबाह कर दिया था।"
मूसा ने दाँतों तले उँगलियाँ दबाते हुए कहा।
"यो नागराज छोरो कौन है मूसा भाया थारे जुबान पर चौबीस घंटे बस उसी की जिक्र रहती है अब जब अपन सब दोस्त बन ही गये हैं तो अब तो बता दे यो नागराज छोरा कौन है!"
भँवरलाल ने चापलूसी भरे स्वर में मूसा से पूछा जो इस बात पर इतरा रहा था कि उन्होंने उसे दोस्त मान लिया था।
"तो तुम लोगों ने मुझे अपना दोस्त मान लिया और मुझे माफ कर दिया उस सलूक के लिए जो शाज़म के कब्जे में रह कर मैंनें तुम लोगों के साथ किया?"
मूसा ने बचकाने अंदाज में उनसे सवाल किया।
"देख भाया इस बारे में बाद में बात करेंगे अभी तो तू यो बता कि यो नागराज कौन है छोरा नाम से ही बड़ा खतरनाक लागे है और यो शाज़म और अघोरा का इसने क्या बिगाड़ो है?"
नामदेव और भँवरलाल ने एकसाथ कोरस में पूछा और मूसा भी सब बताने को राजी हो गया और मूसा ने उन दोनों को लगभग वही कहानी सुनाई जो शाज़म ने प्रिंस और उसके साथियों को सुनाया था।
"हर वर्ष की स्वाति नक्षत्र की पूर्णिमा के दोनों कबीले मिलकर दोवता गरुड़ध्वज(श्रीविष्णु) की पूजा करते थे और एक बलि का आयोजन होता था जिसके लिए सबसे पहले दोनों कबीलों के नायक आपस में कुश्ती लड़ते और जीतने वाला नायक ही बलि देता था।हर वर्ष की तरह उस वर्ष भी कुश्ती प्रतियोगिता में नागवंशियों की जीत हुई।इस बात से अघोरा बुरी तरह झुंझला उठा और उसने अपने सबसे दुष्ट महामंत्री शाज़म के साथ मिलकर बलि का प्रस्द बदल दिया और पूर्ण बलि के प्रसाद की जगह एक खंडित प्रसाद रखवा दिया जिसकी भनक नागवंशियों को नहीं लगी और नागवंशियों के राजा नागसम्राट तक्षकराज ने खंडित प्रसाद की बलि दे दी जिससे दता नाराज़ हो गये और इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते उन्होंने नागवंशियों को श्राप दे दिया और वे सभी आधे सर्परूप में बदल गये पर जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो उन्होंने अपने श्राप को आशीर्वाद में बदल दिया और नागवंशियों को इच्छाधारी शक्ति प्रदान कर दी जिससे वे जब चाहे रूप बदल सकते थे और यही नहीं वे दुनिया के किसी भी जीव या इंसान का रूप ले सकते थे पर उन्हें प्रायश्चित के लिए वह स्थान छोड़कर पाताललोक जाना पड़ा और वहीं दूसरी ओर देवता ने नेवले अर्थात अघोरी शक्तियों के साधकों यानी अघोरा और उसके कबीले को श्राप देकर दूसरे आयाम में मौजूद एक कालछिद्र अर्थात् ब्लैकहोल में कैद कर दिया और अब श्राप की वजह से वे पृथ्वी पर नहीं आ सके थे जब तक कि जब तक कि कुछ पृथ्वीवासियों ने उनके आयाम का द्वार नहीं खोल दिया और अब वे पृथ्वी पर आने-जाने के लिए स्वतंत्र थे पर सिर्फ उसी स्थान पर जिस जगह कभी उनका कबीला रहता था बाकि तुम्हारी धरती के किसी भी भूभाग पर नहीं जा सकते थे खैर उस दुष्ट शाज़म के लिए इतना ही काफी था।"
इतना बोलकर मूसा साँस लेने के लिए रुक गया और जोर-जोर से साँसें अन्दर-बाहर करता हुआ वह सामने खड़े भँवरलाल और नामदेव के हैरान-परेशान चेहरों को देखने लगा।
"भाया म्हारे को यो शाज़म पक्का हरामी चीज मालूम हौवे है जिस दिन यो म्हारे को मिल गया न मैं उसका टेंटवो दबा दूँगा।"
भँवरलाल ने जोर से साँसें अंदर खींची और छाती फुलाते हुए कहा हालांकि इस कोशिश में उसे बुरी तरह खाँसी आ गई।
"ये सब तो समझ में आयो मूसा भायो लेकिन इस पूरे ड्रामें में नागराज को नाम म्हारे को न सुनाई दियो फिर यो शाज़म की दुश्मनी नागराज छोरो से किस वास्ते हौवे है?"
नामदेव ने चेहरे पर समझ का भाव लाते हुए मूसा से सवाल किया।
"इस बारे मैं ज्यादा नहीं जानता बस मुझे इतना पता है कि नागराज नागलोक का सबसे शक्तिशाली इच्छाधारी नाग है और वहाँ के सम्राट तक्षकराज का इकलौता पुत्र है पर पिछले दो सौ सालों से उसका कोई पता नहीं अधिकतर लोगों ने मान लिया है कि वह मर चुका है हालांकि शाज़म का मानना है कि वह जीवित है और इसीलिए वह किसी भी हालत में उसे खोज कर खत्म करना चाहता है क्योंकि अघोरा नागराज की कैद में है करीब दो सौ सालों से और शाज़म का यही मकसद है उसे रिहा करवाना ताकि अघोरा के साथ मिलकर  नागलोक के साथ-साथ पृथ्वीलोक पर भी कब्जा कर सके।"
मूसा ने उन्हें समझाते हुए कहा और इसबार दोनों के चेहरे पर समझ के भाव दिखाई दे रहे थे।
"दोस्तों अब मैं शाज़म को रोकना चाहता हूँ और उसे मारकर अपना बदला लेना चाहता हूँ क्योंकि उसने मेरे पूरे ग्रह को खत्म कर दिया और हजारों वर्षों तक मुझे गुलाम बनाए रखा और इसमें तुम्हें मेरी मदद करनी होगी।"
मूसा ने भावुक स्वर में उन दोनों से कहा और तत्काल दोनों एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
"भाया यो लोक-परलोक के चक्करों से म्हारे को दूर ही रख थारा के है थारे पास तो जादू वाली शक्तियाँ हैं और हम ठहरे सीधे-सीधे सेठ हमको इस झमेले में नहीं पड़ना।"
भँवरलाल ने अपने हाथ पहले ही ऊपर कर लिए और नामदेव चुपचाप खड़ा सोंच रहा था।
"ऐसा मत कहो दोस्तों हजारों साल बाद मुझे तुम जैसे दो अच्छे दोस्त मिले हैं और अगर तुमने इंकार कर दिया तो मैं अकेला पड़ जाऊँगा।"
मूसा ने विनती करते हुए कहा जबकि भँवरलाल टस से मस नहीं होने वाला था।
"दोस्तों तुम समझ नहीं रहे हो अगर मैं नाकामयाब हो गया और अघोरा लौट आया तो सबसे पहले वो तुम्हारी धरती पर ही हमला करेगा और तुम सबको भी मेरी तरह गुलाम बना लेगा और यकीन मानों उसकी गुलामी में जीना जीते जी नर्क में रहने के बराबर होगा तो दोस्तों मेरा साथ दो और हम मिलकर उसे रोक लेंगे।"
मूसा अपनी ही धुने जा रहा था जबकि भँवरलाल उसकी बात सुनने को तैयार भी नहीं था।
"ठीक है हम मदद करने के लिए तैयार हैं... "
नामदेव के बोलते वक्त भँवरलाल ने बीच में कुछ बोलने की कोशिश की पर नामदेव ने इशारे से उसे खामोश कर दिया और आगे बोलता रहा।
"... रुको नामदेव...! हाँ मूसा हम तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हैं और तुम जहाँ कहोगे हम दोनों तुम्हारे साथ चलेंगे पर पहले तुम ये बताओ कि इन सभी घटनाओं में प्रिंस कैसे इन्वॉल्व है?"
नामदेव ने भौंहे उठाते हुए पूछा।
"अर... इस बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता शाज़म ने बस इतना बताया था कि वो बच्चा कुछ खास है और शाज़म सिर्फ उसी की मदद से नागमणी हासिल कर सकता है।"
मूसा ने अपनी टूटी-फूटी जानकारी उन दोनों को दे दी।
"अब यो नागमणी के बला है?"
भँवरलाल के चेहरे पर हैरानी एक बार फिर दिखाई देने लगी और नामदेव भी कम हैरान नहीं था।
"अर... वो बस एक मणि है दुनिया की सबसे शक्तिशाली और जादुई रत्न जो नागलोक में मौजूद है और शाज़म उसी को हासिल करना चाहता है।"
मूसा ने बताया।
"क्या वह रत्न इतना कीमती है?"
"अर... देखो इसे इस तरह से सोंचों अगर तुम्हारे पास नागमणी आ जाये तो तुम तीनों कालों पर राज कर सकते हो मतलब भूत, भविष्य और वर्तमान ये तीनों तुम्हारी मुठ्ठी में होंगे और इतना ही नहीं इसकी मदद से शाज़म सभी ग्रहों और सभी आयामों पर राज करना चाहता है इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है।"
"ओह!"
दोनों के चेहरे पर आये समझ के भाव को देखकर आखिरकार मूसा को राहत महसूस हुई।
"ठीक है हम तुम्हारी मदद जरूर करेंगे पर इसके लिए हमें कुछ तैयारी करनी होगी।"
नामदेव ने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा और सुनकर एक तरफ जहाँ भँवूबुरी तरह निराश लग रहा था वहीं मूसा बेहद खुश नजर आने लगा।
"दोस्तों तुम अगर मेरे साथ हो तो मुझे पूरा यकीन है कि हम मिलकर उस दुष्ट शाज़म को उसके इरादों में नाकाम कर देंगे तो अब अघोरा की नगरी चलने की तैयारी करलो।"
कहने के साथ ही मुस्कुराता हुआ मूसा अपने नये दोस्तों को गर्व भरी नजरों से देखने लगा...To be continued
                                                 Written By
                                      Manish Pandey 'Rudra'
©manish/pandey/21-18-2018


"Dear दोस्तों,
                    सभी मित्रों को मेरा नमस्कार 🙏 उम्मीद है आप सभी को इस सीरीज में मजा आ दहा होगा हालांकि एक मित्र "अनिमेष जी" ने मुझे बताया कि यह रचना मैंने किसी कालचक्र नामक नाॅवेल से काॅपी की है तो इसके बारे में मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि यह महज एक संयोग है की मेरी इस रचना में लिखी गई अघोरा की नगरी का हल्का-फुल्का डिस्क्रिप्शन अनिल मोहन जी की एक बेहतरीन नाॅवेल मे बताये गये एक काल्पनिक नगर "जथूरा के शहर" के डिस्क्रिप्शन से मिलता-जुलता लिखा है जैसे नगरी की दीवारों का लाल ईंटों से बना होना और लाल वर्दी वाले सैनिकों का नगरी में पहरा देना यकीन मानिए इससे रत्ती भर ज्यादा भी आपको काॅमन नहीं मिलेगा क्योंकि यह रचना नागमणी पूरी तरह से मेरी कल्पना है और यकीनन स्वरचित भी क्योंकि इस भाग के आगे क्या होगा ये ठीक से मैं भी नहीं जानता हूँ और ये इसलिए कि मैं किसी भी कहानी के बारे में जेहनी तौर पर सिर्फ तभी सोंचता हूँ जब उसके आगे का कुछ लिख रहा होता है और जो मन में आता है लिखता जाता हूँ शायद ये कुदरती तोहफा मिला है मुझे तो आप में से यदि किसी को जरा़ भी लगे कि यह रचना किसी अन्य लेखक की रचना से काॅपी की गई है एक बार और विचार कर लीजिएगा खैर अब आते हैं हमारी इस कहानी पर करीब दो और बड़े अध्यायों के बाद कहानी का फर्स्ट हाफ खत्म हो जाएगा और सेकेंड हाफ स्टार्ट होगा और यकीन मानिए कि जितना मजा अब तक आया है उससे भी कई गुना ज्यादा रोमांच अब बढ़ने वाला है तो उम्मीद है आप सभी ऐसे ही रेगुलर पढ़ते रहेंगे और अपना प्यार और आशीर्वाद मेरे और मेरे रचनाओं के साथ यूँ ही बनाए रखेंगे बहरहाल आप सब से बस यही इल्तिजा है कि मेरी रचनाएं अपने ज्यादा से ज्यादा मित्रों के साथ शेयर करें और जिसे पसंद आये उसे फाॅलो करने के लिए कहें ताकि मैं अपना लेखन एक लेवल और आगे ले जा सकूँ।
                                           आपका प्रिय लेखक
                                       Manish Pandey 'Rudra'

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