उलझन

मेरी पिछली कहानियों पर आप लोगों ने जो प्यार और स्नेह दिया, उसके लिए सादर धन्यवाद। उन लोगों का भी बहुत बहुत धन्यवाद, जिन्होंने फ़ेसबुक, व्हाट्सएप्प पर मुझे संदेश भेजा और अपना कीमती वक़्त निकालकर मुझे शुभकामनाएँ दी। इस बार आप सब लोगों के लिए एक और नई कहानी लेकर आया हूँ। तो चलिए शुरू करते हैं............

घड़ी में 2 बज चुके थे और मैं बार-बार खिड़की की तरफ देख रहा था कि कब आकाश सर का लेक्चर खत्म हो। एक तो फिजिक्स, ऊपर से आकाश सर, दोनों ही मुझे कभी ज्यादा समझ नहीं आये। कमबख्त ये कॉलेज का सायरन बज क्यों नहीं रहा, जैसे ही 2:05 हुए कॉलेज का सायरन बज उठा। मैं क्लासरूम से ऐसे भागा जैसे जेल में से कोई कैदी भागता है।  मैं दौड़कर बायोलॉजी सेक्शन में पहुँचा, वैसे मुझे बायोलॉजी सेक्शन में जाने की कभी जरूरत न पड़ती, अगर मेरी स्कूल की दोस्त, मेरा पहला प्यार राधिका ने बायोलॉजी विषय ना लिया होता। राधिका डॉक्टर बनना चाहती थी, और मैं, मैंने कोई लक्ष्य तय करके नहीं रखा था। मुझे तो बस किसी भी तरह सरकारी नौकरी लगानी थी। आज की इस जद्दोजहद में खुद को स्थापित करना तो बहुत बड़ी बात है, मगर पहले खुद को रेस में बनाये रखना भी जरूरी है। आज 23 मार्च है, राधिका का जन्मदिन है आज। आज वो 21 साल की हो गई है।
जैसे किसी जादूगर ने ख़यालों से जगा दिया हो ठीक राधिका ने वैसे ही मुझे मेरे ख़यालों से बाहर ला दिया। राधिका ने मेरी तरफ शक्की आँखों से देखा फिर मुझसे मुस्कुराते हुए बोली, "मेरे होने वाले पति, कहाँ चलना है।"
मैंने कसके राधिका का हाथ अपने हाथ में थामा और उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "राधिका, अपने लिए बहुत सारी खुशी लेने जा रहा हूँ।"
राधिका ने बाइक पे पीछे बैठकर मुझे पीछे से कसके पकड़ लिया और अपना सर मेरे कंधे पर रखके बोली, "जान, बहुत बहुत बहुत प्यार करती हूँ तुमसे, मेरी ज़िंदगी में खुशियाँ बिखेरने के लिए शुक्रिया, तुम हो तो राधिका का अस्तित्व है, तुमसे मिलने के बाद इस राधिका को भी वही अनुभूति होती है जो द्वापरयुग की राधिका को उनके आराध्य श्रीकृष्ण से मिलकर होती थी।"
मैंने हौले से राधिका का माथा चुम लिया।
कुछ पलों में मैं राधिका के साथ बाजार पहुँच गया। राधिका बेहद खूबसूरत थी, वो बिना सजे-सँवरे ही सादगी की मूरत लगती थी, और जब कभी सज-सँवर के कभी मेरे सामने आ जाती, तो राधिका सच में कान्हा की राधा लगती। मैं शब्दों में बयाँ करके राधिका की खूबसूरती कम नहीं करना चाहता। वो शब्दों की बयानगी से असल में कहीं ज्यादा खूबसूरत थी। राधिका असल में किसी पाक़ीज़ा मूरत की तरह थी। और फिर पहली मोहब्ब्त मुकम्मल हुई थी, मैं कुछ उन गिने चुने लोगों में था, जिन्हें मोहब्बत में फतेह हासिल हुई थी।
राधिका को साड़ी पहनना बहुत भाता था, आज उसके जन्मदिन पर मैंने सबसे अच्छी साड़ी खरीदी, हल्के गुलाबी रंग की साड़ी। आज सिर्फ साड़ी ही नहीं, साड़ी से मेल खाती चूड़ियाँ, कँगन, और जो जो मैं उसके लिए खरीद सकता था उसके लिए आज उतना सब खरीद लिया।
इस लडक़ी की सच्ची मोहब्बत ने मेरी दुनिया को गुलज़ार बना दिया था, हर रोज़ मेरी ज़िंदगी में प्यार और अपनेपन का एक नया इतर लगा जाती थी।
असल में, मैं, बचपन से ही राधिका के साथ रहा, शायद ये भी एक वजह थी कि वो मेरे दिलोदिमाग पर घर करती चली गई। राधिका से मिलने के बाद मैंने ज़िंदगी के मायने समझे, समझदार तो उम्र के साथ होता रहा मगर समझदारी का मतलब क्या होता है, राधिका ने मुझे सिखाया और आज भी वक़्त दर वक़्त वो मुझे रोज़ कुछ नया सिखाती ही रहती है।
राधिका कोई खामोश जादूगरनी थी, जो इशारों-इशारों में ही हर रोज़ मुझपे चाहत का कोई खूबसूरत जादू कर देती थी।
आज दोपहर के 2:05 से लेकर शाम के 8:30 या पौने नौ बजे तक मैं और राधिका साथ में ही रहे।
इस साल भी अपनी जिंदगी में मैंने सबसे हसीन वक़्त बिताया जैसा कि पिछले कई सालों से राधिका से मिलने के बाद हो जाता था।
20 मई को हमारी शादी होने वाली थी, मैं बहुत खुश था उस 20 मई को लेके। क्योंकि, उस दिन राधिका और मेरे रिश्ते पे एक मोहर लगने वाली थी।
पहली मोहब्बत का कामयाब होना दुनिया की सबसे बड़ी खुशी में से एक है, मोहब्बत और आशिक़ी दोनों को मकाम मिलने वाला था।
राधिका और मेरी सोच कुछ हद तक बहुत मिलती जुलती थी, लेकिन मेरे घरवालों के हिसाब से राधिका मुझसे कहीं ज्यादा समझदार थी।
हर दिन के साथ मुझे इस लड़की से और प्यार होता जाता था, न जाने कौन सी कशिश थी इस लड़की में जो इसे और ज्यादा चाहने पे विवश करती थी। बचपन से ही राधिका हमेशा मेरी खुशी में खुश होती, मेरी कामयाबी को अपनी कामयाबी समझती, और जब हक़ जताती तो पूरे हक़ से जताती।

अब मैं हर रोज़ राधिका को और ज्यादा वक्त देता, उसकी खनखनाती हँसी को अपने दिल में कैद कर लेता। ऐसे ही हँसते-खेलते मार्च से कब मई के महीना आ गया पता ही नहीं चला, हमारी शादी का दिन आने वाला था, इस बात का अहसास मुझे तब हुआ जब मेरी सफेद शर्ट हल्दी से पीली हो गई। हल्दी लगने के बाद मेरा हाल ऐसा था जैसे मैं कोई नकली पारसमणि लेकर चीज़ों को छू रहा था, मगर सोने की बजाय वो चीज़ें पीली हो रहीं थीं।

आज के वर्तमान से मैं बहुत खुश था मगर आने वाले कल को लेकर एक उलझन थी...............................

(अगले अध्याय का इंतज़ार करें....... कहानी अभी बहुत लंबी है..
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