उन्होंने आवाज दी...कौन है...कौन है वहाँ।
पर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया।
उन्होंने टोर्च ऑन करके जैसे ही रसोई में डाली।
तो उनको एक  का साया नजर आया जिसकी पीठ उनकी थी ।
उन्होंने आवाज दी..कौन हो तुम... यहाँ क्या कर रहे हो।
साया उनकी ओर पलटा...
टोर्च की रोशनी साये के चेहरे पर पड़ते ही उनकी आंखें एक दम से खुली रहगई...!!!

नेहा तुम...यहाँ कैसे...!!! अचानक से..!!!

उस साये के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान आगयी... !!!
जैसे कोई बहुत बड़ा राज छुपा रखा हो।
अचानक से उनके हाथ की टॉर्च बुझ गयी...
औऱ रसोई में एक बार फिर से घुप्प अंधेरा हो गया।
उन्होने बहुत कोशिश की जलाने की पर जली ही नहीं।

ग़ुस्से में एक जोर का हाथ टॉर्च पर मारा तो टॉर्च फिर से जल गयी।पर उस रोशनी का अब कोई फायदा नहीं था।
रसोई में मौजूद साया अब गायब हो चुका था।

थोड़ी देर पहले उनके सामने खड़ी उनकी बचपन की सहेली अब वहाँ नहीं थी।
वो असमंजस में आगयी...जो उन्होंने देखा उनका भ्रम तो नहीं था...हाँ भ्रम नहीं था...वो नेहा ही थी।

सोचते हुए...वो बाहर आगयी... बाहर गैलरी में देखा तो रिया औऱ चिन्टू खेल रहे थे।
अचानक से रिया मम्मी को देख कर चिल्लायी देखो मम्मी ये चिन्टू मान नहीं रहा है।
रिया की मम्मी ने जैसे ही डांटने के लिये चिन्टू की ओर कदम बढ़ाया।
ये क्या अचानक से चिन्टू गायब होगया।
चिन्टू को अचानक से गायब हुआ देख उनकी तंद्रा टूटी..अरे...ये तो मर चुका है ये यहाँ कैसे। नेहा भी तो मर चुकी है।
वो तुरंत भाग कर...जोर से रिया.....चिल्लाती हुई रिया की ओर भागी... औऱ कस कर रिया को पकडलिया।

रिया मम्मी को जोर से हिलाने लगी क्या हुआ मम्मी...
चिल्ला क्यूँ रही हो।
औऱ मुझे कस कर क्यूँ पकड़ लिया है।
रिया की मम्मी पसीने से नहायी हुई थी।
ये क्या मतलब में सपना देख रही थी।
थैंक गॉड ये सपना था...में तो डर ही गयी थी।
वो अपने आप से ही बात करने लगी।

मम्मी को ख़ुद से बात करता देख...रिया बोली क्या हुआ मम्मी.. क्या सपना देख रही थी।

मम्मी ने रिया को देखा औऱ कहा...
कुछ नहीं बेटा बस ऐसे ही डर गई थी।
तू यहाँ कैसे आगयी..!!!
तू तो अपने रूम में सो रही थी।

हाँ मम्मी मुझको भी डर लग रहा था ।
इसलिये में आपके पास  आकर सोगयी।
ठीक है यहीं सोजा। कहकर दोनों लेट गयी।

पर उसकी
मम्मी की आँखों में नींद नहीं थी,पर वो आँख बंद करके लेट गई।
सुबह सुबह का सपना...औऱ अचानक से उनकी मृत सहेली का सपने में आना उनको चैन से नहीं बैठने दे रहा था।
कुछ तो अजीब था।



रात का अंधेरा था अब रोहित बाइक धीरे धीरे चला जा रहा था,अब उसको अंदाजा लग चुका था।
वो खतरे वाले एरिया में एंट्री कर चुका है।

घना जंगल था दोनो साइड पेड़ थे, बीच मे कची पगडंडी जैसा रास्ता था। रोहित बस चले जा रहा था।
फिर अचानक से बोला पिंकी और कितना चलना है अब।

मुझे क्या पता अब औऱ कितना जाना है।
मैं तो ख़ुद पहली बार आयी हूँ,पिंकी ने गैर जिम्मेदारी से कहा।
मतलब... तुम भी हद्द ही हो...!!!
मैं जा रहा हूँ वापस...रोहित ने गुस्से से कहा।

तुम अपनी मर्ज़ी से आये हो पर जाओगे मेरी मर्ज़ी से पिंकी ने कुछ सोचते हुए कहा।
क्या मतलब..? तुम मुझे डरा रही हो...रोहित ने गुस्से से कहा।
पिंकी बस मूस्कुराकर रह गई।

चलते चलते... अचानक से रोहित ने बाइक के ब्रेक लगाए।
सामने एक बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था जैसे किसी बड़ी कोठी के बाहर लगा होता हैं।

गेट देखने मे बहुत पुराना लग रहा था।
उस पर तरह तरह की बेल चढ़ी हुई थी।
रोहित ने देखा कि अचानक से गेट अपने आप खुल गया।
उस गेट पर अंदर की तरफ एक बूढ़ा सा चौकीदार बेठा था गेट उसने ही खोला, जो पिंकी को तो दिखाई दे रहा था पर रोहित को नजर नहीं आरहा था।

उस चौकीदार भूत ने पिंकी की ओर देखा औऱ मूस्कुराकर रोहित की ओर इशारा कर दिया।
जवाब में पिंकी ने भी मुस्कुरादिया।
अपने आप गेट खुलने की घटना से रोहित अचंभित था।
वो गेट की ओर घुसने में थोड़ा हिचकिचा रहा था ।
पिंकी ने हँसकर कहा क्यूँ क्या हुआ,घबरा गये..
अभी तो ये शुरुवात है।
रोहित ने कहा में क्यूँ घबराउंगा... में तो सोच रहा था ये अपने आप कैसे खुल गया।
इसमें कौनसा ऑटोमैटिक सेंसर लगा हुआ है।

उसकी बात सुनकर पिंकी को हँसी आगयी ,उसने कहा वो गेट के पास अंदर की तरफ देखो जो चबूतरा बना हुआ है ना दिख रहा हैं???

हा दिख रहा है,रोहित ने चबूतरे की ओर देखते हुए हाँ मैं गर्दन हिलाई।
अब ध्यान से देखो उस चबूतरे पर कोई चौकीदार बैठा हुआ है।
वहाँ तो कोई भी नहीं है,रोहित ने ध्यान से देखते हुए कहा।
अरे ढ़ंग से देखो... पिंकी ने हँसते हुए कहा...औऱ चुपके से एक पल के लिये रोहित को छू लिया।

उसी पल रोहित को वो चौकिदार नजर आगया...वो बूढ़ा सा चौकीदार था और उस चबूतरे पर लेट हुआ था।

अगले ही पल वो वहाँ से गायब होगया।
रोहित ये देखकर शॉक्ड होगया।

पिंकी ने हँसकर कहा...शॉक्ड होने की ज़रूरत नहीं हैं।
ये भूतनगर हैं।
यहां कदम कदम पर भूत हैं।
बस नजर नहीं आयेंगे तुम्हें ।

रोहित ने कुछ सोचते हुए बाइक अंदर कर दी,औऱ उसके अंदर घुसते ही गेट अपने आप बंद होगया।

पिंकी ने हँसते हुए कहा...बूढे होगये है,पर ईमानदारी से काम करने का जज्बा नहीं गया।

रोहित बाइक को सरपट दौड़ाता हुआ,अंदर ले जारहा था।
और दोनों साइड में बने पेड़ो पर हल चल बढ़ती जारही थी।

जहाँ जहाँ से रोहित की बाइक निकलती वहाँ वहाँ उसकी इंसानी खुशबू फैलती जा रही थी,और पेड़ो पर बैठे अलग अलग तरह के भूत इंसान को देखकर एक्टिव मोड़ में आगये थे।
सभी भूतों की एक्टिविटी पिंकी ने नोटिस कर ली थी।
पर वो इधर उधर की बात करके रोहित का माइंड डाइवर्ट कर रही थी।

बाइक चलते चलते सफेद रंग की एक पुरानी हवेली के सामने रुक गयी।
हवेली देखने में ऐसे लग रही थी जैसे कई सालों से उसकी सफाई नहीं हुई है।
मकड़ी के जालों ने हवेली को चारों ओर से घेर रखा था।
रोहित ने बाइक को स्टेण्ड पर लगाया,औऱ खड़ा होकर । हवेली को घूरने लगा।
पिंकी ने कहा तुम यहीं रुको...में बस 5मिनट में आती हूँ।
कहकर पिंकी ने कॉल कट कर दिया।
रोहित कुछ कह नही पाया...उसने मोबाइल देखा तो सूबह के 3.45am हो रहे थे।


हवेली के अंदर का द्रश्य।

एक भयानक सा चेहरा... पूरा जला हुआ... कोई अचानक से देखले तो डर के मारे उसकी जान निकल जाये।
उस साये के सामने पिंकी खड़ी हुई थी।
दोनो एक दूसरे को देख रहे थे,फिर दोनों एक दूसरे की ओर आगे बढ़े औऱ एक दूसरे को गले लगा लिया।

बड़ी मुश्किल से आपायी हूँ.. मैंने तो सोचा भी नहीं था तुमसे कभी मिल पाऊँगी।
उस भयानक चेहरे पर एक खतरनाक सी मुस्कुराहट आगयी।
उसने कहाँ... कहाँ है..वो..???
पिंकी ने कहा नीचे....वो साया खिड़की से नीचे झांकने लगा।
और थोड़ी देर तक रोहित की ओर देखा फिर जोर का अट्टहास किया।
औऱ बोला...इसको विश्वास में तो ले लिया है ना।
कहीँ ये कोई चालाकी ना कर जाए।
नहीं... मैंने उस से अभी कोई बात नहीं की है।
उसको अपने विश्वास में लेने में थोड़ा वक्त लगेगा पिंकी ने मूस्कुराकर कहा।
उस साये ने गहरी साँस लेने का अभिनय किया औऱ कहा वक़्त ही तो नहीं है मेरे पास...!!!


खैर ....आज नहीं... तुमने आने में देर कर दी...सूरज निकलने वाला है...तुम इसको वापस लेकर लौट जाओ।
जल्दी निकल जाओ।

उसकी बात सुनकर पिंकी ने उस भयानक चेहरे वाले साये को फिर से गले लगाया औऱ हवेली से नीचे उतर गयी।

जैसे ही वो रोहित की ओर पहुचीं... उसने देखा रोहित को चारों ओर से कई सारे भूतों ने घेर रखा है।
पर रोहित को कोई भी भूत  नज़र नहीं आरहे थे।

अचानक से रोहित का फोन फिर से बजने लगा... उसने कॉल रिसीव किया...औऱ जोर से बोला..क्या यार पिंकी ये क्या बात हुई.. ख़ुद नजर नहीं आती औऱ मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर कहाँ चली गयी।

पिंकी ने कहा...सब बताती हूँ.. तुम बिना इधर उधर देखे चुपचाप से बाइक स्टार्ट करके बस बाहर की ओर दौड़ाओ कहीँ भी रोकना मत चाहे कुछ भी हो जाये।

रोहित ने अचानक से बाइक स्टार्ट की ओर हवा की स्पीड़ से दौड़ाना शुरू करदिया।
बाइक उस रोड पर भी बहुत तेज़ी से दौड़ रही थी।
अचानक से बाइक के आगे 2 बच्चे आगये... पिंकी चिल्लायी रोकना मत।
रोहित ने स्पीड बढ़ा दी। बाइक उस जगह से गुजर गई
ओर अब उस जगह कुछ नहीं था।

तभी अचानक से एक बुढ़िया रोहित की बाइक के साथ साथ भागने लगी।रोहित ने स्पीड बढ़ा दी तो वो बुढ़िया अचानक से गायब होगई। वो छलावे थे जो रूप बदलकर आगये थे औऱ डराने की कोशिश कर रहे थे।

रोहित अब पिंकी की बात पर भी ध्यान नहीं दे रहा था,वो अपनी पूरी स्पीड से बाइक को दौड़ा कर वहाँ से निकलने की कोशिश में था।
वो लोहे का गेट जहाँ से एंट्री करी थी,सामने था रोहित बहुत तेज़ स्पीड में था वो उस लोहे के गेट में बाइक समेत टकराने वाला था,उसने ब्रेक लगाने की कोशिश की
पर ये क्या बाइक गेट को पार कर गयी...
टकराने से पहले ही  गेट खुल गया।
रोहित की बाइक आगे जाकर रुक गयी।
उसने बाइक किनारे करके गहरी साँस ली...उसका दिल अब भी जोर से धडक रहा था।

क्या यार कहाँ ले आयी... तुमने तो मरवा ही दिया होता।
उसकी बात सुनकर पिंकी के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आगयी थी।
उसने कहा गेट के उस पार देखो ..रोहित जैसे ही देखने लगा तो चुपके से रोहित के कंधे को टच किया।
रोहित ने जो देखा तो उसकी आंखें खुली रह गई।
उस गेट पर कई सारे भूत जो उसकी ही उम्र के थे उसको ही घूर रहे थे।
और कह रहे थे।
हमारे इलाके की लड़की को तू कैसे घुमा रहा है।
तेरी ये हिम्मत.. अंदर आ तुझे हम बताएंगे,वो रोहित को उकसा रहे थे।
फिर अचानक से गायब होगये।

रोहित ये सब देखकर शॉक्ड होगया था।
उसने एक चीज़ महसूस की जब भी उसको भूत दिखायी देते उसको अपने शरीर मे एक अजीब सी सिरहन महसूस होती।
औऱ ठंड सी लगने लगती।

पिंकी ने हँसकर कहा... क्यूँ महाशय.. चले घर।
रोहित ने बिना कुछ कहे बाइक स्टार्ट की औऱ घर की ओर चल दिया।

वापस लौटने में कम समय लगा...घर के पास के जहाँ पर पिंकी मिली थी,वहाँ पहुँचकर पिंकी ने कहा.. मुझे यहीं ड्रॉप करदो...अब में बाद में मिलती हु...बाय...बोलकर उसने कॉल कट कर दिया।
रोहित ने फोन देखा तो फोन तो ऑफ हो चुका था।
उसने बाइक घर की ओर दौड़ाई औऱ घर के सामने पहुँचकर बाइक पहले ही बंद कर दी औऱ चुपचाप अपने कमरे में जाकर सोगया।

रोहित की मम्मी करवटे बदल रहीं थी,पर उनको नीँद नही आरही थी।
बार बार आंखों के सामने नेहा औऱ चिंटू का वो सपना सामने आ रहा था।
वो लेटे लेटे सोचती रहीं.. फिर अचानक से पास रखा मोबाइल उठाया तो देखा टाइम सुबह के 4.25हो रहे थे। उन्होंने रिया की ओर देखा, उसको अपने से अलग किया और बेड से उठकर कमरे से बाहर चली गयी। सूरज अभी निकला नहीं था।पर कुछ ही समय मे निकलने वाला था। उन्होंने कुछ सोचा और ऊपर के पोर्शन की चाभी उठाई औऱ जीने की ओर बढ़ने लगी।
धीरे धीरे कदमों से ऊपर की ओर बढ़ने लगी..बहुत सावधानी से कदम रख रही थी,पर फिर भी सुबह सुबह इतना सन्नाटा था कि उनके कदमों की पदचाप सुनायी देरही थी।

जीने की आख़िरी सीढ़ी पर पंहुचते ही,उन्होंने चाभी निकाली और दरवाजे का ताला खोला तो उनके हाथ धूल से भर गए।
चररर की आवाज़ के साथ गेट खुल गया। वो गैलरी की ओर बढ़ने लगी...।
उन्होंने कुछ सोचा औऱ सामने बनी रसोई की ओर सावधानी से बढ़ने लगी।
रसोई के दरवाजे को धकेला औऱ मोबाइल की टोर्च से रौशनी डाली। औऱ धीरे से कहा...कौन है वहाँ...।
रसोई में कोई भी नहीं था,फिर भी उन्होंने सावधानी से मोबाईल की टॉर्च से पूरी रसोई का जायज़ा ले लिया।
औऱ वो वाहर गैलरी की ओर पलटी।
औऱ गैलेरी के आसपास के पूरे एरिया में लाइट मारी... पृरा एरिया धूल से भरा हुआ था,छत पर पंखा लटका हुआ था।कमरों में ताले लगे हुए थे।पहले कमरे के बाहर एक प्लास्टिक की छोटी टेबल रखी हुई थी।
टेबल भी धूल से सनी हुई थी ,टेबल में चार पहिये लगे हुए थे,जिनकी सहायता से टेबल को सरकाया जा सकता था।
गेलरी में एक खिड़की बनी हुई थी
जिस से बाहर का व्यू दिख रहा था।
उन्होंने वहाँ लगे स्विच बोर्ड़ के बटन कको दबाया पर लाइट नहीं जली,धीरे धीरे उन्होंने सारे बटन दबा दिये।
पर किसी भी बटन से ना लाइट जली ना पंखा।

वो कुछ सोचने लगी औऱ फिर अचानक से बोली...
कौन है यहाँ..!!!
वहाँ अब भी पहले जैसी शांति थी।
उन्होंने दुबारा आवाज़ लगाई... कोई है यहाँ तो सामने आये।
तभी अचानक से एक चमकादड़ फड़ फड़ की आवाज करते हुए उनके सर से टकराकर बाहर चला गया।
चमकादड़ की अचानक हुई इस हरकत से वो एक पल के लिए डर गई।
चमकादड़ अब वापस आकर खिड़की पर  बैठ गया था।

उन्होंने  गहरी सांस ली औऱ अपनी धडकनों को सयंत क्या और अपने आपको संभाला।
और फिर बोली...अगर कोई यहाँ है ,तो मुझे अपनी उपस्थिति का एहसास कराये... मेरे सामने आये।
काफी देर तक कोई हलचल नहीं हुई।
उन्होंने वापस नीचे जाने का फ़ैसला किया।
औऱ जैसे ही वो जीने की ओर मुड़ी तभी।
कुछ आवाज सी आयी... उन्होंने पलटकर देखा तो..वहाँ कुछ भी नहीं था।
उन्होंने मोबाइल टोर्च की लाइट आवाज की दिशा में डाली तो उनकी आँखें फैल गई।
वो टेबल सरक कर पहले कमरे के सामने से रसोई के सामने आगई थी।




कहानी(भूतियॉपंन्ती)जारी रहेगी.....


सभी को मेरा नमस्कार,

          हर बार की तरह मेरी वक़्त की कमी का रोना जारी है।क्या करूँ मज़बूर हूँ। इस कहानी का अगला भाग आपके सामने पेश है।
जिन पाठकों को अंतिम भाग का इंतजार है,
उनसे में प्रतिक्रिया चाहूँगा। कि कहानी में मज़ा नहीं आरहा है तो कहानी को समाप्त करदिया जाये।
अगर आरहा है तो क्यूँ ना समाप्त होने तक हर पार्ट में फ्रेश सस्पेन्स एन्जॉय किया जाए।
मुझे लगता है...सस्पेन्स कभी खत्म ना हो और कहानी बस यूहीं चलती रहे।
खेर में  आपका हूँ औऱ आपकी समीक्षाए मेरी है।
जैसा आप सभी कहँगे... वही किया जायेगा।
   मिलते फिर अगले भाग में

                    ।। धन्यवाद।।

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