नागमणी : एक खोज - भाग 4

                           अध्याय - चार
                      अघोरा का चक्रव्यूह

शहर के बाहर वीराने में स्थित गोदाम के बाहर सेठ भँवरलाल और नामदेव अपनी बेंज कार के पास खड़े थे जबकि कुछ आदमी ट्रक से भारी सामान उठाकर गोदाम के भीतर पहुँचा रहे थे और लगभग काम खत्म हो चुका था।
"ले सेठ सारा माल गोदाम में रख दिया है अब अपने को अपुन का माल दे ताकि अपुन जल्दी से भी तेज दारू का बोतल खोल सके।"
एक आवारा से दिखते आदमी ने सेठ भँवरलाल की चाबियों का एक गुच्छा बढा़ते हुए कहा।
"बढ़िया काम किया तन्ने।"
कहने के साथ ही भँवरलाल ने अपने कुर्ते की जेब से दो हजार के नोटों की एक गड्डी उसकी ओर उछाल दी और वो फौरन अपने साथियों सहित अपनी ट्रक पर चढ़कर वहाँ से निकल गया।
"भँवरे तन्ने उसको इतनी दमडी़ देने की के जरूरत थी?"
नामदेव ने गुस्से भरे स्वर में पूछा।
"नामदेव भाया मन्ने जो कियो है सोंच समझ कर कियो है आग्गे चाल के यो लौंडा बहुत काम आवेगा भरोसा रख म्हारे पे और अब चल यहाँ से वरना ठुल्लों ने देख लिया तो उनको जवाब देते-देते थक जायेंगे।"
भँवरलाल ने उसे समझाते हुए कहा और नामदेव के अंदर बैठने के बाद उसने गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढा़ दी।आधी रात के पसरे सन्नाटे को चीरती हुई उनकी गाड़ी की आवाज़ काफी कर्कश लग रही पर यहाँ सवाल-जवाब करने वाला कोई नहीं था।
दोनों ही शहर के नामी और रईस सेठ थे जो दिखाने के लिए तो इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस चलाते थे पर असलियत में अपने बिजनेस की आड़ लेकर दोनों हर तरह के गैर कानूनी काम करते थे।मुम्बई अंडरवर्ल्ड में उन दोनों की काफी धाक थी।
खैर दोनों सुट्टा फूँकते हुए अपनी कार दौडा़ये जा रहे थे कि अचानक भँवरलाल ने जबर्दस्त ब्रेक्स लगा दी जैसे ब्रेक पर खडा़ हो गया हो और नतीजा यह हुआ कि दोनों का सिर सामने की विंड स्क्रीन से टकराते-टकराते बचा।
"के हुआ भँवरे तन्ने गड्डी क्यों रोक दी?"
नामदेव ने अपना माथा सहलाते हुए गुस्से भरे स्वर में भँवरलाल से सवाल किया।
"नामदेव बाया म्हारी ओर यों गुस्से से न देख सामने कौन खडा़ है यो देख।"
भँवरलाल ने सामने की ओर इशारा करते हुए उसे बताया जबकि नामदेव की गर्दन कार की हैडलाइट्स में चमक रहे उस छः फुट के आदमी की ओर मुड़ गई जो अजीबो-गरीब लिबास पहने हुए था।
"अब यो कार्टून कौन है?"
नामदेव ने भँवरलाल से पूछा।
"मन्ने के पता भाया कि यो कौन हौवे।"
भँवरलाल ने जवाब दिया और सामने कार का रास्ता रोककर खड़े उस शख्स को देखने लगा जो सचमुच कार्टून जैस दिख रहा था।
उसने शरीर पर बिना बाँह का और बिना बटन वाले काली जैकेट जैसा कोई कपडा़ पहन रखा था और नीचे चूड़ीदार पजामा साथ ही उसके सिर पर बालों की लम्बी चोटी भी थी।
खैर उसे घूरते हुए दोनों कार से बाहर निकले हालांकि इस बीच वे दोनों पूरी तरह चौकन्ने हो चुके थे और नामदेव के हाथ में तो उसका रिवाल्वर भी चमकने लगा था।
"भँवरे मन्ने तो यो कोई लुटेरा लागे है जो हमारा मल लूटना चाहता है।"
नामदेव ने दाँत पीसते हुए कहा और धीरे-धीरे मगर बेहद सतर्कता से उसकी ओर कदम बढा़ने लगा।
"नामदेव भाया मन्ने तो यो कोई मस़खरा लागे जो किसी ड्रामा कम्पनी का कपड़ो लेके भाग आयो है।"
खैर उसकी बात को नजरअंदाज करता हुआ नामदेव पूरी तरह से सतर्क होकर उसकी ओर बढ़ रहा था।
"कौन है बे तू नौटंकी छोरे और म्हारा रास्ता क्यों रोक रख्यो है?"
नामदेव ने गुर्राकर उससे सवाल किया जबकि वह अपनी स्थिति पर जस का तस डटा रहा हिला तक नहीं।
"नामदेव भाया उसके ज्यादा पास मत जा म्हारे को लौंडे के इरादे ठीको ना लाग्यो है।"
"तू फिकर मत कर इसको तो मैं ठीक करता हूँ।"
कहने के साथ ही नामदेव के गले से गुर्राहट भरी जोरदार आवाज़ निकली और अगले ही पल उसके हाथ में थमी रिवाल्वर ने गर्मागर्म लोहा उगल दिया पर वो अजीब आदमी इतनी तेजी से अपनी जगह पर खड़े-खड़े लहराया कि उन दोनों को अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं आया और नामदेव की चलायी हुई गोली उसके करीब से गुजर गयी।
बहरहाल अभी नामदेव को हैरान होने का मौका भी नहीं मिला था कि उस अजीब आदमी ने अपना दायां हाथ हवा में ऊपर उठाया जिसकी बीच वाली अँगुली में एक पुरानी अँगूठी फँसी हुई थी और इससे पहले कि उन दोनों को कुछ भी समझ में आता उस अजीब आदमी की अँगूठी से एक सुर्ख लाल किरण निकली जो सीधे नामदेव के हाथ में कैद रिवाल्वर से टकराई और पल भर में उस रिवाल्वर के टुकड़े-टुकड़े हो गये।
"नामदेव भाया मन्ने तो यो लौंडा कोई जादूगर लागे है।"
भँवरलाल ने भयाक्रांत स्वर में कहा और तोते तो नामदेव के भी उड़ चुके थे पर वो हैरानी से आँखें फाड़कर उसे देखता रहा हालांकि उसने अभी हार नहीं मानी थी और देखते ही देखते अचानक उसने उस अजीब आदमी पर छलांग लगा दी पर उस आदमी ने नामदेव को यूँ हवा में उछाल दिया मानों वो कोई रबर का बबुआ हो।
सेठ नामदेव इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं था सो पसीने से तर वह दोबारा उठ खड़ा हुआ और एक बार फिर उसने उस आदमी पर छलांग लगा दी पर परिणाम वही हुआ और इस बार भी उसने किसी रबर के खिलौने की तरह नामदेव को हवा में उछाल दिया और इस बार तो उसके होंठों से खून भी बहने लगा।
"छोड़ भाया नामदेव म्हारे को तो यो कोई शैतान की दुम लाग्यो है।"
भँवरलाल ने नामदेव को सम्हालते हुए कहा जो शायद उस आदमी पर एक बार और छलांग लगाने वाला था।
"सेठ नामदेव और सेठ भँवरलाल तुम दोनों को अब तक इतना तो समझ ही चुके होगे कि मूसा से पार पाना तुम दोनों के बस का नहीं।"
अचानक उन दोनों के कानों में धीमी मगर रौबदार फुसफुसाहट गूँजी और वे दोनों बुरी तरह चिंहुक गये।
भँवरलाल और नामदेव चारों ओर नजरें दौडा़ने लगे पर वहां उस अजनबी के अलावा चौथा और कोई भी नहीं था।
"मुझे ढूँढ़ रहे हो भँवरलाल और नामदेव तो बस इतना समझ लो कि अभी मैं अदृश्य हूँ और सही समय आने तक तुम्हारे सामने नहीं आऊँगा बल्कि यूँ ही आकर तुमसे मिलता-जुलता रहूँगा पर तब तक मूसा तुम दोनों को सम्हाल लेगा।"
उस अदृश्य आवाज़ ने दोबारा कहा।
"पर भाया तन्ने हम गरीब पे यो मेहरबानी क्यों कर रिया है हम तो थारे को जानते भी नहीं।"
भँवरलाल ने घुरघुराती सी आवाज में सवाल किया।
"भँवरलाल मुझे तुम दोनों से अपने कई काम निकलवाने हैं पर चूंकि मेरा वक्त बहुत कीमती है मेरे लिए सो अब मैं तुम दोनों से विदा लेता हूँ और आगे की बात मूसा तुम्हें समझा देगा।"
और इसके साथ ही वह अदृश्य आवाज़ आनी बंद हो गई और तब पहली बार मूसा उनकी ओर बढ़ा पर इससे पहले कि उन्हें कुछ समझ में आता उनको पार करते हुए जल्दी से मूसा उनकी कार की पिछली सीट पर सवार हो गया।
"अब गाड़ी स्टार्ट करो और फौरन निकलो यहाँ से।"
मूसा ने सख्त आवाज में उन्हें आदेश दिया और भँवरलाल नामदेव की ओर देखने लगा जिसने सहमति में सिर हिला दिया।इसके बाद दोनों अगली सीट पर बैठ गए और भँवरलाल ने गाड़ी आगे बढा़ दी।
"अघोरा की जय।"
पीछे बैठे मूसा ने अचानक से कहा जिससे वे दोनों चिंहुक उठे।
"अब तो बता दे भाया तू कौन है और थारा वो गायब भूत कौन था?"
भँवरलाल ने मिरर में मूसा पर नजर डालते हुए पूछा और उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि मूसा मुस्कुरा रहा था।
"वो अदृश्य आवाज मेरे मालिक शा़जम की थी और मैं उनका एक अदना सा गुलाम हूँ मेरा नाम मूसा है।"
मूसा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
"भाया म्हारे को यो तो बता दे तू और तेरा मालिक हम दोनों से चाहते क्या हैं?"
भँवरलाल ने एक बार फिर मूसा से सवाल किया।
"तुम दोनों से हमें बहुत काम निकलवाने हैं क्योंकि हमारे राजा अघोरा ने नागराज के खिलाफ अपना चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है और आगे चलके तुम दोनों हमारे बहुत काम आओगे।"
मूसा ने अजीब ढंग से जवाब दिया।
"और अगर हम थारा काम करने से इंकार कर देवें तो?"
नामदेव ने मूसा को देखते हुए पूछा।
"तो मैं तुम दोनों की जान ले लुँगा और यकीन मानो इसमें मुझे एक पल का भी समय नहीं लगेगा क्योंकि तुम्हारी धरती पर मेरा मुकाबला कोई नहीं कर सकता।"
मूसा ने खुलकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
"क्या मतलब हमारी धरती पर?तुम यहाँ के नहीं हो क्या?"
भँवने उससे पूछा।
"हाँ मैं तुम्हारी दुनिया का नहीं हूँ हमारी दुनिया तुम्हारी दुनिया से काफी अलग है।"
मूसा ने सीधे शब्दों में जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर एक पल के दोनों की नजरें आपस में टकराईं और फिर दोनों बाहर देखने लगे।
"मूसा भाया ये नागराज और अघोरा कौन हैं ये तो बता दो?"
भँवरलाल ने एक बार फिर उससे सवाल किया।
"खबरदार जो तुम लोगों ने मुझे भाई कहा तो मैं तुम दोनों का मालिक हूँ और तुम दोनों मेरे गुलाम तो अब अगर तुमने कोई और सवाल किया तो मैं तुम दोनों की गर्दन मरोड़ दूँगा इसलिए चुपचाप गाडी़ तुम्हारे फार्म हाउस पर ले चलो आज की रात हम वहीं आराम फरमाएंगे और कल से हम अपना काम शुरू करेंगे।"
मूसा के स्वर में भरी सख्ती देखकर भँवरलाल की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई और उसने चुपचाप गाडी़ फार्म हाउस की ओर घुमा ली।
"अघोरा की जय!"
मूसा ने पिछली सीट पर अपने पैर पसारते हुए कहा और आँखें मूंदकर लेट गया।
"म्हारे को तो यो कोई घणो जिन्नाद़ मालूम हौवे है अगर इसकी बात न मानी तो सच में यो हमारी गर्दन मरोड़ देगा।"
भँवरलाल ने फुसफुसाहट भरे स्वर में नामदेव से कहा।
"मन्नै जो पहला मौका मिला तो मन्नै तो इसका टेंटवा टाइट कर दूँगा।"
नामदेव ने दाँत पीसते हुए कहा और उधर मूसा के अधरों पर मुस्कान रेंगने लगी जैसे वह उनकी बातें सुन रहा हो।
"पर भाया मन्नै तो इसकी अँगूठी बहुत खतरनाक लागे है तमे देख्यो न इसने एक झटक में रिवाल्वर का चूरो बना दिया।"
भँवरलाल ने दहशत से दिल पर हाथ रखते हुए कहा जबकि नामदेव ने भी सहमति में सिर हिला दिया और एकदम गम्भीर होकर कुछ सोंचने लगा।
अगली सुबह जब आलीशान फार्म-हाउस पर भँवरलाल की नींद खुली तो उसने सबसे पहला काम नामदेव को जगाने का किया।
"उठ भाया उठ!कल रात मन्नै तो बहुत खतरनाक सपना आया था।"
"मन्ने भी।"
नामदेव ने उठते हुए कहा पर इससे पहले कि वे एक दूसरे के सपने के बारे में पूछते मूसा उनके कमरे में हाजिर हो गया।
"धत्त तेरे कि यो सपना नहीं सच्चाई थी म्हारे तो करम ही फूटो हैं।"
मूसा को अपने कमरे में देखकर भँवरलाल ने अपना माथा पकड़ते हुए कहा।
"तुम दोनों उठ गये तो अब जल्दी से चलों हमें एक काम करना है।"
मूसा ने उनकी ओर खुशी से किलकारी भरकर देखते हुए कहा जैसे उन्हें पिकनिक पर इनवाइट कर रहा हो और उन दोनों को देखकर ऐसा लग रहा जैसे उन्होंने कोई कड़वी दवा निगल ली हो।
"पर काम के है भाया?"
भँवरलाल ने उसकी ओर शक़ भरी नजरों से देखते हुए पूछा जबकि अगले ही पल गुस्से से हुँकार भरते हुए मूसा उनकी ओर बढा़।
"तुम दोनों मेरे गुलाम हो और मैं तुम दोनों का मालिक इसलिए तुम दोनों मुझे आका कहोगे वरना मैं तुम दोनों का गला रेत दूँगा।"
मूसा ने धमकी भरे लहजे में उन दोनों को चेतावनी दी।
"जो हुकम आका!"
भँवरलाल ने अपनी गर्दन सहलाते हुए कहा जबकि नामदेव उसे गुस्से में घूरता रहा।
"तुम दोनों को ये चिट्ठी कादर तक पहुँचानी है इसमें एक नया कांट्रेक्ट है जो तुम उसे दोगे।"
मूसा ने धौंस जमाते हुए कहा और दोनों ने अपना सिर हिला दिया।
"अघोरा की जय!"
मूसा ने मुड़ते हुए कहा और बाकी दोनों उसके पीछे-पीछे चल पड़े।
"अच्छा मूसा भाया.... अर्.. मूसा जी नागराज कौन है अब तो बता दीजिए।"
भँवरलाल ने चलते-चलते मूसा से पूछा और फौरन मूसा उसे गुस्से भरी निगाहों से घूरने लगा।
"नागराज मेरे और मेरी दुनिया वालों का जानी दुश्मन है और हमारे गुरुदेव उसको मारने की योजना बरसों से बना रहे थे और आखिरकार अब जाकर हमारी योजनाएं कार्य करने वाली हैं महान अघोरा ने अपना चक्रव्यूह फैलाना शुरू कर दिया है और अब नागराज का बचना नामुमकिन है।"
मूसा ने किलकारियाँ भरते हुए कहा जबकि उसकी बातें सुनकर नामदेव और भँवरलाल सोंच में पड़ गये थे।
"भाया म्हारे को तो यो मूसा बहुत खतरनाक लाग्यो है और यो नागराज नाम को लौंडा भी घणा धूर्त लागे है न जाणे हम किस मुसीबत में फँस गए हैं।"
भँवरलाल ने आह भरते हुए कहा और नामदेव ने समझदारी से सिर भर हिला दिया।
"तुम दोनों क्यों रुक गए जल्दी से गाड़ी स्टार्ट करो और जितनी जल्दी हो सके मेरा काम पूरा कर दो ताकि मैं तुम दोनों को आजाद कर सकूँ।"
मूसा ने चापलूसी भरे अंदाज में कहा।
"यो बात तन्ने खूब कही मूसा भाया... अर्... मूसा जी।"
मूसा को अपनी ओर घूरता पाकर उसने जल्दी से अपनी बात बदल दी और ड्राइविंग सीट पर जमते हुए उसने गाडी़ आगे बढ़ा दी।
"अघोरा महान है।"
मूसा ने पिछली सीट पर धँसते हुए कहा और तीनों अपनी मंजिल की ओर चल पड़े और उनकी मंजिल थी कादर का मकान.... To be continued
                                                Written By
                                     Manish Pandey ’Rudra'
©manish/pandey/08-10-2018

प्रिय मित्रों काफी लोगों से मुझे शिकायत मिल रही है कि पूरी कहानी एकसाथ लिखकर पोस्ट करूँ बहरहाल चूंकि अपने इस लेखन के कार्य के साथ-साथ मुझे अपनी पार्ट टाइम जाॅब, घर-परिवार और अपनी पढा़ई को भी देखना होता है इसलिए मैं कहानियाँ अध्यायवार ही प्रकाशित कर पाता हूँ बहरहाल यदि आप सब चाहें तो पूरी कहानी लिखकर एक महीने के अंदर एक साथ प्रकाशित करूँ कृपया आप सभी इस बारे में भी अपनी राय अवश्य दें।

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