।। मै कमजोर नही हूँ ।।

        मेरे हाँथो पे मेहदी लगने वाली है।पैरों पे पायल बंधेंगे।माथे पे सिंदूर सजेगा और गले मे मंगल सूत्र भी होगा। लाल साड़ी पे लिपटी एक लडक़ी,कुछ फेरों के बाद, एक औरत बन जाएगी। एक बेटी किसी की बहू बन जाएगी। और एक बहेन किसी की पत्नी बन जाएगी।
आईने मे खुद को देख रही हूँ।अपने बदलते कितने रूपों को,जिसे ठीक से बाल सबारना भी नही आता।अब उसे एक घर,और एक परिवार को  सँभालना होगा। 17 की हूँ मैं।कहाँ से घर वालों को बड़ी दिखती हूँ।थोड़ा  कद ही तो बढ़ा है। अभी तो मै खुद उलझी हुई हूँ कि इन्दौर जाकर पढ़ाई करूं की भोपाल। बारबीं का परीक्षा दिया है मैने।आज ही तो आखरी पेपर था।कितनी ख़ुश थी मै,की चलो अब तो जी भरके सोने को मिलेगा और मैंने तो डू नॉट डिस्टर्ब का बोर्ड भी बना रखा था।ताकि कोई मुझे सोने के समय मे परेसान न करें।

कितने रातों से जग कर पढ़ाई किया था।और इस बार तो दबाब और भी ज्यादा था ।अगर अच्छे नंबर नही आएंगे तो फिर बाहर जाकर पढ़ाई करने का तो चान्स ही नही है। इस लिये खुद को पढ़ाई में एक दम से झोंक दिया था।ताकि कम से कम 85 मार्क्स तो आ ही सके,वैसे पेपर तो अच्छे गए हैं, उम्मीद तो 85 से भी ज्यादा आने के हैं।

आखरी पेपर देकर क्लास रूम से निकली,तो कितना हल्का और अच्छा महशूस हो रहा था।जैसे सर से कोई भारी बोझ उठ गया हो।रास्ते भर दोस्तों के साथ हंसी मजाक करती रही,और मैंने तो अपने सारे प्लान भी बता दिए थे,की कुछ दिनों बाद इंग्लिश की क्लास जॉइन करूँगी और इंग्लिश पे अच्छे से प्रैक्टिस करूँगी।कितनी खुश थी मै। बेपरवाह,दुनियां दारी से बेखबर,और कितना बचपना पन है मुझमे।जरा जरा सी बात ठहाके मार कर हँस देती हूँ।बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देती हूँ।अपने जिंदगी में कई सारे रंग भरना चाहती हूँ।किसी पंची की तरह  बादलों के संग उड़ना चाहती हूँ।पर किस्मत को मेरी छोटी सी खुशी भी देखी नही गई।अच्छा था कि कोई बहूत बड़ा सपना नही देखा था मैने।

घर पहुँचते ही मम्मी ने बताया की 'जा जरा चहरे पे हल्दी चंदन लगा ले,तुझे कल लड़के बाले देखने आ रहे हैं' मै सक बक सी रह गई।ये मम्मी ने कौन सा फरमान जारी कर दिया था।जिसे सुनते ही मै सुन्न सी रह गई।मेरा दिमाक काम करना बंद कर दिया।कुछ समझ मे नही आ रहा था कि ये मम्मी ने क्या कह दिया।
घंटो कमरे में बंद रोती रही।मुझे तो अब भी यकीन नही हो रहा था कि मेरी शादी होने जा रही है।अब इस घर पे मेरे लिए कोई जगह नही बची है।और सायद किसी के दिल मे भी न होगी।
क्या क्या प्लान बनाया था मैने? क्या क्या सपने सजा रखे थे मैने? और इतने कौन से बड़े ख्वाब देखे थे।छोटे से ही तो है मेरे ख्वाब,जिंदगी ही तो जीना चाहती हूं।एक बार ,अपनी तरह से,आजाद होकर,जिसपे शिर्फ मेरा हक हो।

सोचा था की 12th का रिजल्ट अच्छा आयेगा, तो पापा के सामने हाँथ पैर जोड़ कर,मैं भी विनीत भैया की तरह इंदौर से सॉफ्टवेयर का कोर्स करूँगी और फिर एक अच्छी से कंपनी पे जॉब। मै सब को दिखा देना चाहती थी कि मै आज की लड़की हूँ।जो शिर्फ घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए नही,बल्कि उससे हट कर भी कुछ और कर सकती हैं।सॉफ्टवेयर के बारे में ज्यादा कुछ पता तो नही है, लेकिन एक अच्छा फील्ड है और नोकरी भी जल्दी मिल जाती है।
चार दिन बाद मैं 17 साल से अठारबे साल मे चली जाउंगी।कभी नही सोचा था कि मेरे अपने ही मेरे पर काट देंगे। मेरे उड़ने से पहले ही मुझे एक दूसरे पिंजड़े में कैद कर देंगे।वैसे ये जिंदगी भी कौन सी आजाद है।एक छोटी सी छोटी चीज के लिए भी कितनी मिन्नते करनी पड़ती है।एक रुपये भी चाहिए हो तो हाँथ फैला कर,जबाब देना होता है कि कॉपी, पेन के लिए चाहिए।जबकि वहीं घर पर भईया से कोई सबाल जबाब नही किये जाते और न ही उन्हें कहीं आने जाने पर टोंका जाता है।

विनीत भईया मुझसे तीन साल के बड़े हैं लेकिन उनकी शादी की कोई बात नही करता और करेंगे भी कैसे,वो तो लड़के हैं।घर के वारिश हैं और मै तो पराया धन हूँ।जो कभी माँ बाप के हिस्से की होती है और फिर ता उम्र के लिये, ससुराल की हो जाती है।हमारे अपने जिंदगी के हिस्से तो होते ही नही।पता नही इस दुनियां के नियम किसने बनाये और किस आधार पे बनाएं हैं।

कितनी अजीब दुनिया हैं ना ये।किसी को किसी की कोई परवाह नही है,सब अपने मान सम्मान के बनाये झूंठे शान में जीते हैं।नही तो मेरी शादी की इतनी भी क्या जल्दी थी।आज नही तो कल होनी ही है।लेकिन नही, सब को डर है कि कहीं मै ऐसा वैसा काम न कर दूँ, की बेचारों को शर्मिंदा न होना पड़े और ऐसे वैसे से मतलब है कि  कहीं उम्र के इस मोड़ पे मेरे कदम बहक न जायें।मै किसी ऐसे रास्ते पे न चल दूँ की सब की नजरें न झुक जाएं।कितने स्वार्थी विचार हैं लोगों के।

मम्मी कहती है। बहूत अच्छे घर का रिश्ता है।बहूत बड़ा घर है उनका।गाड़ी ,मोटर सब है उनके पास।जबकि सच्चाई ये है की मुझे शादी नही करनी है।मेरे सपनों में शादी का तो कोई ऑप्शन ही नही था और आज के समय मे कौन सी लड़की की शादी इतने कम उम्र में होती है।दुनियां के तमाम सुख शुभिधायें होंगी,चाहे मुझे किसी राज कुमारी की तरह ही क्यूँ न रखें? लेकिन मेरे सपनों का क्या? क्या उनका कोई मूल्य नही है? जिनके के लिए मै कितने दिनो से प्लानिंग करती आ रही हूँ की कम से कम एक दिन मैं मेरे पैरों पे खड़ी होकर दिखाउंगी।क्या सब कुछ भूल भाल कर,एक ऐसी जिंदगी पे चल पडूँ ,जिसे मैं नही बल्कि कोई और चाहता है।

शाम हो चली है।कमरे से निकल कर मै छत पे आ गई हूं।ये वही जगह है,जहां मैने सपने बुनना सीखा था।उसे पूरा करने की जिज्ञासा मेरे मन मे जगी थी।वो दिन आज भी याद है मुझे,जब दसवीं का रिजल्ट आया था।80 परसेंट मुझे मिले थे।मैं बहूत खुश थी।और सायद मेरे सिवा कोई और उतना खुश नही दिखा।जितना होना चाहिए था।फिर भी हिम्मत करके जब मैने पापा से पूँछा की मुझे मैथ सब्जेक्ट लेना है।जिसके लिए कोचिंग भी करनी पड़ेगी। मुझे जरा सी भी उम्मीद नही थी कि पापा साफ मना कर देंगे।कहते है, क्या जरूरत है मैथ लेने की फालतू खर्चा बढ़ेगा। लड़कियों के लिए आर्ट विषय ही सबसे अच्छा होता है।
मै तो उन्हें चकित भाव से देखे जा रही थी।और सोच रही थी जब भइया का रिजल्ट आया था।उन्हें तो 65 मार्क्स ही मिले थे।फिर भी पापा ने ऐसे लड्डू बाँटे थे जैसे उसने गोल्ड मैडल जीता हो।और भैया के बिना किसी पूँछ तांछ के ही उसे इंदौर के बड़े से कॉलेज में पढ़ने का अवसर भी मिल गया।
ऐसा नही है कि मैं मेरे भाई से जलन महशूस करती हूँ,या उसे पसंद नही करती हूँ। बात तो शिर्फ भेद भाव की है। एक लड़के और एक लड़की की है।हमे हमारे घर पे ही दो हिस्सों में बांट दिया जाता है कि लड़के के अच्छे भविष्य के लिए उसे बेहतर से बेहतर शिक्षा दिक्षा दी जाए और लड़की को शिर्फ दुनियां को दिखाने के लिए पतला लेप लगाया जाता है।क्योंकि उसे कौन सा घर की दहलीज लाँघना होता है, उसे तो सारी जिंदगी मर्दों की जी हुजूरी करना होता है।

पापा के इनकार ने मुझे पहली बार ,कुछ अपनी उमर से अलग सोचने पर मजबूर कर दिया और तभी से मैने ठान लिया था कि एक दिन इन सब को मै लड़की होने का मतलब जरूर बताउंगी।
पापा के मना करने के वाबजूद भी मैने मैथ विषय ही लिया और बिना किसी कोचिंग के ही पढ़ाई जारी रखा।जब कोई चैप्टर समझ मे ना आता तो कभी दोस्तो की मदत ले लेती, तो कभी सुनीता मैडम के घर चली जाती। सुनीता मैडम एक समझदार औरत हैं, और उन्ही के कहने पर ही तो मैने मैथ सब्जेक्ट लिया था।वो कहती हैं, हर इंसान में कोई न कोई काबिलियत जरूर होती है।मैं नही जानती उन्हें मुझमे क्या दिखा? मैं पढ़ाई में ठीक थी तो उनसे एक लगाव सा भी बन गया था।उनका एक छोटा बेटा है। जिससे मेरी अच्छी खासी दोस्ती थी।वो मेरी पढ़ाई में मदत करती थी तो मैं भी उनके घर का काम कर देती थी। हाला की सुनीता मैडम मना करती रहती और मैं झट पट सारे काम कर देती।

सूरज डूब रहा है।ठीक मेरे सपनों की तरह,मेरे जिंदगी की तरह।आज पहली बार मायूसी भारी शाम को इतने करीब से देख पा रही हूँ मैं।कितना दर्द होता है ना कभी कभी।अपने ही लोग कैसे हमपे बार करते हैं,और हम चुप चाप सह लेते हैं।आज एक शहेली मंजू की याद आ रही है।कैसे उसके शादी बाले दिन मैने बेझिझक कह दिया था कि'एक बार मना तो कर देती,कह देती की नही करनी मुझे शादी वादी' जबाब में मंजू ने कुछ नही कहा लेकिन उसकी गीली आंखें सब हाल बयां कर रही थीं।तब सायब मैं समझ नही सकती थी लेकिन आज महशूस कर सकती हूँ कि इतना आसान भी नही होता है कि एक लड़की माँ बाप के सामने कह सके कि वह अभी शादी नही करना चाहती है या उसे कुछ और करना है।

दरअसल बात हिम्मत की नही है कि हम अपनी बात समाज के सामने रखने का साहस नही कर पातें है।मुद्दा तो ये है कि हम कमजोर होते हैं।हमे जन्म से ही कमजोरों वाले स्थान पे रखा जाता है और बताया जाता कि हमारी जिंदगी की नाव किसी और के हाँथो में होनी है।पहले माँ बाप के फिर पति परमेश्वर के और सायद इसी लिए हम लड़कियाँ हमेसा से दूसरे पे निर्भर रहती हैं।कभी खुद के पैरों पे खड़े होना का सोचते तक नही है।
गलती हमारी भी कहाँ होती है।हमारा घर, समाज ही तो हमे कमजोर बना देता है।हमे जीवन भर के लिए गुलाम बना देता है।नही तो जो आये दिन अखबारों, चैनलो पे औरतों पे हो रहे अत्याचार के किस्से छापे होते हैं और हमारा समाज मजे पड़ता है, चार बातें करके अपनी राय रखता है लेकिन अमल नही करता है।घर जाता है, बेटी ,बहेन,पत्नी को देखता है कि किस तरह ये सब शिर्फ मेरे कंधे पे निर्भर हैं फिर भी वह कुछ नही करता। पता नही क्या सोच लेता है,और  क्या समझ लेता है।

अगर आज मै इतने गंभीर विषय पे सोच पा रही हूँ तो उसकी वजय सुनीता मैडम ही हैं।मैने उन्हें बहुत करीब से देखा है।,उन्हें जाना है। वो तलाकशुदा थीं।उनके पति का किसी और लड़की से सम्बंध था।जब मैडम को उनके पति के बारे मे पता चला तो ,उन्होंने ने तुरंत तलाक लेने का फैसला किया।बिना किसी की परवाह किये की कौन क्या कहेगा और कैसी बातें करेंगे?सुनीता मैडम आत्मनिर्भर थीं।वो कमजोर औरतों में से नही थीं।जबकि उनकी जगह हम आप मे से कोई होता तो क्या करता? सारी जिंदगी दर्द और गुठन के साथ बिताना पड़ता।क्योंकि हमारे घर,समाज ने हमे कमजोर बनाया है और उससे बड़ी गलती तो ये है कि हम स्वयं अपने आप को बदलना नही चाहते।अगर एक औरत सफाई  कर्ता की तरह घर का काम कर सकती है।खेतो पे फसल काट कर ,बोझ ढो सकती है।पति के लात घूसें खा कर,उसके साथ रह सकती है।और दुनियाँ का सबसे बड़ी पीड़ा सह कर,एक बच्चे को जन्म दे सकती है तो फिर वो खुद के कमाई की रोटी क्यूँ नही खा सकती?

'दीदी दीदी बड़े पापा बुला रहे हैं' नीलू मेरे चाचा की लड़की हांफते हुए मुझसे कहा,तो मेरा ध्यान टूटा और मैं उसे आश्चर्य देखने लगी।'जल्दी चलिए,सब कह रहे कि आपकी  शादी होने बाली है' नीलू ने लगभग अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा और फिर चहकते हुए उसी रफतार से चली गई जैसे आई हुई थी।
कल तक इस लड़की को पढ़ाई करने के लिए मैं प्रोस्साहित करती थी। उसे सपने देखना सिखाती थी।लेकिन आज मै अपने आप की ही लड़ाई नही लड़ पा रही हूँ।नही कह पा रही हूँ कि मुझे अभी शादी नही करनी है।

कुछ ही देर में,मैं सबके सामने गुमशुम खड़ी थी।पापा, दादा जी,चाचा जी सोफे पे बैठे थे।मम्मी,चाची,बुआ कोने पे खड़े,बच्चे एक लाइन से चुप चाप खड़े हैं।'

"देखो बेटा, बहूत बड़े लोग हैं, उनसे तुम अच्छे से बरताव करना,और कोई सबाल करें, तो बहूत सहजता से जबाब देना'
पापा मुझे सभ्यता का पाठ पढ़ा रहे थे जबकि मेरे दिमाक मे चल रहा था कि अगर आज तू अपने सपने के लिए आवाज नही उठा पाई तो फिर सारी जिंदगी बेजुबान बन के बितानी पड़ेगी।

'अगर रिस्ता तय हो गया तो तुम्हारी जिंदगी बन जायेगी'
पापा की बात सुन कर मैं झल्ला पड़ी
"'किस जिंदगी की बात कर रहे हैं आप और क्या जानते हैं मेरे बारे मे' 

सब मुझे आश्चर्य से देखने लगे और कम्पकपाते,सिसकते हुए कहे जा रही थी।

'17 साल की हूँ मै, और आप मेरी शादी कर देना चाहते हैं।इस लिए की कहीं मै किसी लड़के से प्यार व्यार न कर बैठूं। लेकिन नही ,मैं शादी नही करूँगी,अभी मुझे पढ़ना है अपने पैरों पे खड़ा होना है।मैं मम्मी,चाची और बुआ की तरह कमजोर औरत बनके ,दूसरों पे निर्भर नही रहना चाहती'।

पापा मुझे तमतमाते हुए देखे जा रहे थे।दादा जी मुश्काये जा रहे थे।और मैं सिसकते हुए वो सब बाहर निकाले जा रही थी,जो न जाने कब से मेरे मन पे भरा पड़ा था।।मेरे घर से निकलने से लेकर आने तक
मेरे पास होने से लेकर भाई के इंदौर जाने तक और मेरे लड़की होने से लेकर भाई के लड़के होने तक।
बुआ मुझे चुप कराने आ गईं।मम्मी तो रोने लगी थीं।चाचा जी चुप चाप खड़े देख रहे थे।और मै रुकने का नाम नही ले रही थी।

'पापा मै लड़की हूँ,लेकिन मैं कमजोर नही हूँ।आज मेरा आखरी पेपर था,किसी ने मुझसे पूँछा तक नही।जिस घर पे मेरा जन्म हुआ,उस घर ने मुझे अपना नही  माना तो फिर कोई और कैसे अपना सकता हैं'

मैं एक दम से रो पड़ी और सीधे हॉल से दौड़ते हुए चली गई।मेरा मन भर आया था।मैं दुःखी हो गई थी।
मुझे नही पता था कि मैंने पापा से क्या और किस लहजे से कहा।जिंदगी में पहली बार कुछ कह पाने की हिम्मत जुटा पाई थी।मन थोड़ा हल्का हो गया था,जैसे कितने दिनों से दबी बातें निकल कर,मेरे मन को खाली कर दिया हो।
मैं बेड पे लेटी घंटो से सिसक रही थी।घर पे भी कोई शोर सराबा सुनाई नही दिया।पापा कमरे में आयें, पापा की आहट पा कर ,मैं झट से बिस्तर छोड़ ,उठ पड़ी।।मैने पापा का चेहरा नही देखा।मैने सर झुका रखा था।मै थरथरा रही थी। मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था।पता नही पापा क्या कहने बाले हैं?कहीं मेरा घर से निकलना न बन्द कर दें।कहीं मुझे डांटे न।लेकिन पापा तो रो रहे थें।उनके आँख भीगी हुई थी।उन्होंने ने मुझे गले से लगा लिया,और माफी मांगने लगें।बेटा नही करूँगा तुम्हारी शादी,तुम खूब पढ़ो,भइया की तरह इंदौर जा कर और जब नोकरी लग जायेगी तो मेरे कुर्ता पैजामा लाना।मै हँस भी पड़ी और रोये भी जा रही थी।


बस यही तक है कहानी।पढ़ने के लिए धन्यवाद।
कोई बात कहनी हो तो अपनी समीक्षा जरूर दे।
pankaj chaturvedi
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