बेटी

अस्पताल के प्रसूती वार्ड के बाहर मोहन बेचैनी से चहल कदमी कर रहा था, साथ में उसकी माँ भी प्रसूती वार्ड के बाहर ही बैठी थी और मोहन को ढाढ़स बढ़ा रही थी,क्यू इतना बेचैन हो रहा है, लड़का ही होगा।
"माँ अगर बेटा पैदा नहीँ हुआ तो?"
"अरे तू चिंता क्यू कर रहा है,बेटा ही होगा।"
अन्दर उसकी पत्नी राधा को बच्चा होने वाला था।
मोहन से रहा नहीं गया वह अस्पताल के बाहर चाय पीने निकल आया।
आधे घन्टे कब बीत गए पता ही नही चला ।
वह बुझे मन से निकला और अस्पताल के अन्दर दाखिल हुआ,उसकी माँ उसपर बरस पड़ी।
" कहाँ चला गया था,कब से डाक्टर बुला रहे हैं और तू कहा गया था, जा जल्दी से मिलकर आ बहू से देख क्या हुआ है।"
" हाँ हाँ जाता हूँ ।"
कह कर कर वह वार्ड मे चला गया।

राधा के पास पहुचकर
"बेटी हुयी है ?"
राधा को उससे इसी सवाल की उम्मीद थी, उसने उम्मीद भी नहीं किया था कि मोहन पहले उसका हाल चाल पूछेगा।
राधा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस पलके झुका लिया।
"बता न बेटी हुयी है न!"
बस मूक सहमति मे दृढता से सर हिला दिया।
जैसे वह कहना चाहती हो वह इसे पालेगी, पढायेगी लिखायेगी।
"अब क्या करेगी तू?"
"पालुँगी और क्या करूंगी,"
"और शादी कैसे करेगी?"
अचानक से मोहन बोलने लगा

"ऐ जी आप क्यू चिंता करते हैं, अभी तो पैदा हुयी है,अभी तो पालेंगे,पढायेंगे लिखाएंगे, अभी से शादी को लेकर क्यू सूखने लगे आप।"

"तू तो ऐसे बोल रही है जैसे कुछ जानती ही नहीं,अरे अब तो तीन तीन बेटियाँ हो गयी हैं,हाथ तो बहुत पहले से तंग है, शादी ऐसे थोड़े ही होता है,
कहा था टेस्ट करा लेते हैं,लेकिन सरकार भी पता नहीं कैसे कानून बना रखी है कि, साला कुछ समझ नहीं आता।"

"अजी आप चिंता क्यूँ करते हो भगवान ने भेजा है तो वोही इन्तेजाम करेगा आप मन छोटा मत करो।" राधा ने दिलाशा दिया।

"भगवान हा हा हा हा हा हा भगवान, भगवान हम गरीबो की सुनता कहाँ है,अगर उसे कुछ करना ही होता तो एक बेटा नही दे देता, कुछ तो जीने का मकसद होता, साला काम धन्धे मे भी ऐसी पनौती हो गयी है की दो टाईम की रोटी का भी इन्तज़ाम नहीं हो पाता, ऊपर से तीन बेटियाँ और ए नंगा समाज, जी करता है की आत्महत्या ही कर लूँ,।"

राधा अपनी प्रसव पीड़ा भूलकर पति की पीड़ा को महसूस करने लगी,उसे उसकी पीड़ा बड़ी लगने लगी।
अचानक से उसने नवजात बेटी को मोहन के गोद मे डाल दिया, और पति के पीठ से चिपक कर रून्धे गले से बोली,
"गला घोंट देते हैं इसका,"
"अभी किसी को बाहर पता नहीं है कि जिन्दा पैदा हुई है या मरी हुई, डाक्टर को मैं संभाल लूंगी।"

मोहन का बदन एकदम से सुन्न पड़ गया, मानो काटो तो खून नहीं,वह कभी पत्नी के कठोर चेहरे को देखता कभी नवजात बच्ची को।
अचानक से उसने बच्ची को सीने से लगा लिया, उसके भीतर प्रकाश की नयी किरण फूट पड़ी हो, जैसे बेटी ने उसके कान मे कहा हो,पापा आप क्यू चिंता करते हो, मैं आयी ही हूँ आपके परेशानियों को दूर करने के लिये।
पिता के सीने से लगी बेटी को देखकर राधा की आँखे आंसुओ से टिमटिमाने लगीं ।
मोहन ने आगे बढ़कर उसके आँसू पोछ्कर अपने सीने से लगा लिया,और लम्बी सांस लेकर बोला ,
"हम इसे पालेंगे राधा, हम पालेंगे।"

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