शहर दर शहर बदलते हुए सुधा अय्यर अपनी नौकरी को सहेजे हुए कर्नल पति श्रीराम की कदम ताल से बरसों अपनी ताल मिलाती रही है । पिछले बीस साल में सात शहर बदलती सुधा आर्मी क़्वाटर की देहरी पर लगी “ सुधा श्रीराम अय्यर ”की पीतल के अक्षरों की बने नेम प्लेट पर इतराती रही है । हर शहर में उसकी सिविलियन सखियों ने उस पर रश्क करते हुए कहा है –“ बड़ा नाम है रे तेरा श्रीराम के दिल में !! ”

“ यू नो .....यत्र नार्यस्तु पूज्यंते.....” ....और हर बार यह कह सुधा ठहाका मारती है ।

पदोन्नति की चाह उसके सीने में कईं बरस पहले ही दफन हो चुकी है । श्रीराम की आर्मी की नौकरी ,सेजल और समर्थ की सेंट्रल स्कूल की पढाई के चलते वो आग सुलगती ज़रूर रही पर कभी भड़की नहीं । आठवें शहर की पोस्टिंग तक सेजल और समर्थ पंख लगा कर अपनी उच्च पढाई के लिए उड़े और श्रीराम को भी फैमिली स्टेशन नही मिला तो सुधा भी अपनी पदोन्नति के खीरे को बाहर रख बैठी । जब श्रीराम और बच्चों से दूर ही रहना है तो पदोन्नति लेकर कहीं भी रहा जा सकता है । पंख जैसी यह सोच सुधा को दिन प्रतिदिन दिन आसमान की ओर लेती चली गई । जब श्रीराम लेह के दूर दराज इलाके में गए तो सुधा भी पदोन्नत होकर झारखंड की तराई में आ गई ।

पीतल के अक्षरों की नेम-प्लेट “सुधा श्रीराम अय्यर ” जो पिछले बीस बरस से उनके आर्मी क्वाटर पर सुशोभित रही उसे श्रीराम अपने साथ नहीं ले जा पाए । सुधा भी उस खूबसूरत नेम प्लेट को अपने लीज़ के मकान पर लगा नहीं पाई । अलबता वो नेम प्लेट आर्मी के काले सन्दूक में इतिहास बना कर संजो दी गई ।

अर्द्धशहरी इलाके में बीमा कार्यालय की मैनेजर बन कर आई है सुधा । पैसा निवेश करने के तौर तरीके बताती है । यूँ भी अपने बीस साल की नौकरी में उसने अपने हर कस्टमर को निवेश करने के रुचिकर तरीके बताये है । औरतों के साथ उसकी खास सहानुभूति रही है । वो हमेशा अपनी बातचीत में कहती रही –“...अपने धन को अलग-अलग मद में निवेश करें...एक ही तरह का निवेश ना करें..अपने पैसे की सुरक्षा इसी में है कि उसे अलग-अलग स्थान पर रखा जाए...”

सुधा को अपनी माँ याद आती है । हर कोने में पर्स..पाउच...गांठ बन्धे रुमाल....पलंग के गद्दे के नीचे...तकिये के नीचे....रसोई की ऊपरी शेल्फ...चावल के डिब्बे में....ड्रेसिंग टेबल के डिब्बों की कतार में पिछले कोने पर टेलकम पाउडर का डिब्बा तक नहीं छोड़ती । वो यह भी जानती थी कि कौनसा पैसा कहाँ खर्च करना है । जब बाबा ने सुधा को पैसे का हवाला देते हुए कॉलेज भेजने से मना किया था तब माँ ने उस टेलकम पाउडर के डिब्बे से ही रुपये निकाल कर ही उसकी तली पर रख कर कहा था-“ जा फीस जमा कर और पढाई शुरू कर ” माँ की निवेश की थीम आज समझ आती है जब आँखें नम करने के सिवाय कुछ नहीं बचा ।

सुधा अपनी नानी को भी याद करती है जब गर्मी की छुट्टियों में माँ चार बच्चों सहित ननिहाल जा धमकती तो नानी किस तरह से नानाजी से चिरौरी करते हुए पैसे माँगती । नाना साइकिल लेकर दुकान की तरफ रवाना होने लगते और नानी की हथेली सामने भिखारी की तरह सामने आ जाती “ सुनो जी ! एक रुपैया तो देते जाओ ! बच्चे नानी के घर आये हैं । ” नानाजी कौनसा इतनी आसानी से एक रुपया देने वाले होते थे । वो भी अठन्नी तो कभी चवन्नी ही नानी की तल्ली पर रख देते । नानी जी के मुँह से निकल ही उठता “ कंजूसस्स्स ! ” माँ सहित हम सारे बच्चे खी खी करके हँस देते । अब वो अठन्नी या चवन्नी में से हमें पाँच पैसे भी कभी से मिलते बाकी पैसे ना जाने नानी किस मद में खर्च कर डालती । पर आज समझ आता है सुधा को कि नानी वो रोज़ की चवन्नी-अठन्नी को भी हमारी विदाई के समय दी जाने वाली सामग्री पर खर्च कर देती थी । सुधा को नानी के माध्यम से और भी बातें समझ आई हैं कि औरत की आर्थिक स्वतंत्रता कितनी बड़ी सौगात हो सकती है ।

सुधा माँ के ज़माने में आती है तो कुछ राहत मिली औरत को । माँ बच्चों की पढाई के साथ रसोईघर की चौकी पर ही किताब पढ लेती । बच्चों को बड़ा करने के बाद उसने किसी प्राइवेट स्कूल की नौकरी भी कर ली थी । माँ बित्ता भर आर्थिक स्वतंत्र ज़रूर हुई थी पर बाबा से माँगने की आदत नहीं छूटी थी –“ जरा दो रुपये देते जाओ ...सब्ज़ी नहीं है घर में...”पर माँ की ये ईमानदारी थी कि सब्ज़ी की जगह सब्ज़ी ही आती थी नेलपॉलिश नहीं ।

सुधा महसूस करती थी कि बाबा के पैसे से आटा दाल तेल सब्ज़ी जैसी ज़रूरत का सामान आता था और माँ के पैसे से पाउडर शैम्पू नेल पॉलिश साड़ी क्रॉकरी जैसे लग्ज़री सामान आता था । आज सुधा सोचती है कि वो समय था कि औरत की आर्थिक स्वतंत्रता का बिगुल बज चुका था।

सुधा को आज वो सब याद आ रहा है जब कॉलेज के अर्थशास्त्र के योजना मंच पर वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया था । वाद-विवाद का विषय था –“आज के परिप्रेक्ष्य में औरत की आर्थिक स्वतंत्रता आवश्यक है ” सुधा ने अपने नानी और माँ के किस्सों के माध्यम से अपने भाषण में धुँआधार बॉलिंग करके विपक्षी वक्ताओं के तर्कों के विकेटों को गिरा दिया था। पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था । सुधा ने महसूस किया कि सामने की पंक्ति में बैठी तीनों जज महोदया मन्द मन्द मुस्कुराते हुए सिर हिला रही थी । श्रोताओं की प्रथम पंक्ति में बैठी कुछ प्रोफेसर एक दूसरे के कान में फुसफुसा कर हँस रही थी । आज सुधा समझ सकती है कि वो किस तरह की बातें कर हँस रही होंगी । जब कलम निर्णय की शीट पर चली तो प्रथम स्थान आना तय ही था । सुधा ट्रोफी के साथ विजयी भाव के साथ हाल से बाहर निकली तो बधाइयों का तांता था । अगली पंक्ति के प्रोफेसर उसे बधाई देते हुए कह रहे थे वाद-विवाद करना अलग चीज़ है और स्वतंत्रता पाना अलग ....क्यों मिसेज राव ? और खि खि करके प्रोफेसर का हुजूम आगे चल दिया था। सुधा नहीं समझ पाई उनके व्यंग्यों को ।

भले ही सुधा युग दर युग नारी की आर्थिक स्वतंत्रता का आकलन कर ले...भले ही कितने कच्चे चिट्ठे खोल दे लेकिन औरत को कहाँ...कितनी....स्वतंत्रता चाहिये उसको नाप नहीं सकी । खुद के मामले मे भी सुधा इस नये युग की आज़ादी को कम पा रही थी । श्रीराम से शादी हुई तो हैण्डसम व्यक्तित्व के साथ हैण्डसम तन्ख्वाह वाला पति पाकर सुधा फूली नहीं समाई । भले ही सुधा स्वयं बीमा कम्पनी में एग्ज़ीक्यूटिव की नौकरी से पर्याप्त तन्ख्वाह पाने वाली थी फिर भी महीने की पहली तारीख को श्रीराम की तन्ख्वाह का इंतज़ार करती थी । भला हो उसकी माँ और नानी के ज़माने की औरतों का जिन्होंने आर्थिक स्वतंत्रता का बिगुल बजा दिया था तभी तो सुधा की डुगडुगी इस क्रांति में इज़ाफा कर सकी थी ।

श्री राम भले ही वित्तीय मामलों में साफ रहे हों....आर्थिक स्वतंत्रता के नारे का गुणगान करते रहें “ तुम्हारा पैसा....मेरा पैसा....और हमारा पैसा...” की संकल्पना से असुरक्षा की भावना सुधा के आसपास भी ना फटकती थी फिर भी सुधा का अपनी माँ के टेलकम पाउडर के डिब्बे में पैसा छुपाने जैसी नारी प्रवृत्ति का लोभ संवरण नहीं छूटा । उसे अपनी माँ का ज़ुमला याद आता था-“ अरे मर्दों को पैसा दिखा नहीं कि बस दो-चार ईंटें जड़वा देंगे मकान में , गारा मिट्टी डलवा देंगे घर के सामने...अरे मकान भी भला कभी पूरी हुआ है ...कुछ बरसाती दिनों के लिये भी तो पैसा बचा कर रखना चाहिये.....मर्द क्या जानें कि किसी बहन बेटी को विदा करने में भी पैसा खर्च होवे है ....” सुधा आज के संदर्भ में उसे यूँ समझती है कि औरत और मर्द के खर्च करने मद अलग होते हैं ...बस यहीं मतभेद होता है.....और कोई कंजूस नहीं होता ना ही कोई खर्चीला होता है....

सुधा भी अपने सैलरी अकाउण्ट में दिखाने जितने पैसे रख कर कभी पोस्ट-ओफिस तो कभी बीमा योजना में ,कभी बैंक एफ.डी.तो कभी आर.डी.में निवेश करती रहती । पर आजकल ये बैंक वाले भी पैन कार्ड माँगने लगे हैं... कम्बख्त पैन कार्ड की ऑनलाइन तकनीक ने सुधा की सारी पोल खोल दी । पिछले वर्ष आयकर फाइल को पटकते हुए श्रीराम बोले-“ क्या सुधा ! ...तुम भी ....कहाँ-कहाँ पैसा रखती हो..अब नहीं छुपा सकोगी....सारे बैंकों की एफ.डी. सामने आ गई । अब भरो टैक्स...”

सुधा एक बारगी हक्की-बक्की रह गई...फिर हँस दी ठहाका मारकर.... “तो तुम सब बैंकों में पहुँच गए मेरे राम ! ”

“ओह नो ! ये पैन कार्ड के लिंक ने तुम्हारे सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया.....”श्रीराम के दांए हाथ की ताली पर सुधा ने बांए हाथ की ताली दी तो एक संयुक्त ठहाकों से घर गूँज उठा ।

पुरानी बातें आज सुधा के मस्तिष्क पटल पर सिनेमा की तरह चल रही थी जिन्हें याद करके सुधा मन ही मन मुस्कुरा उठी। इस खेती बाड़ी वाले इलाके में सुधा को दूर-दूर तक मजदूर औरतें दिखाई देती हैं । अपनी मैली कुचैली साड़ी के पल्लू में दो चार रुपये के सिक्के बाँध कर उसे कमर में खोंसे धान के खेत में रोपा लगाकर केवल 100 रुपये पाने वाली मजदूरनियों से बीमा में निवेश की भला कैसे बात करे । सुधा का कलेजा हलक तक आ जाता है । उसे अपनी नानी का ज़माना याद आता है ।

अपने लीज़ के ऊँचे मकान की अटारी से दूर-दूर तक झोंपडियाँ दिखाई देती है या खेत दिखाई देते हैं । चावल के खेत...मक्का के खेत...धरती पर फैली हरी चादर और उस हरी चादर को फैलाने वाली खेतिहर मजदूरनियों की मटमैली साडियाँ सुधा को आहत करते हैं । ‍

एक शाम बालकनी में सुधा चाय के प्याले के साथ खड़ी है । पास के मकान की निचली छत से एक महिला की आँखें दुपट्टे के पीछे से झाँकती है । चेहरा और माथा बड़े-बड़े लाल फूलों वाली साड़ी से ढका हुआ है । सुधा की बात करने की प्रवृत्ति ने उसकी आँखों में झाँका । “क्या नाम है तुम्हारा ? ”

“...फुलमनिया ...”

“क्या करती हो ? ”

“ खेती...मज़दूरी ”

शायद फुलमनिया को सुधा के खुले बालों और कानों में झूलते टेरकोयटा के हैंगिंग्स ने आकर्षित किया था इसलिए फुलमनिया की लाल फूलों वाली साड़ी का पल्लू नाक से सरक कर होठों तक आ गया था ।

“...तुम्हारा क्या काम है.? ” फुलमनिया ने प्रश्न दागा तो सुधा संभल नहीं पाई ।

...क्या बताए....? फुलमनिया क्या जाने भारतीय जीवन बीमा निगम को..... सुधा ने चाय का आखिरी घूँट खत्म करते हुए कहा-“...बीमा ऑफिस में...”

“एक कागद है मेरे पास बीमा का ...देख कर बताइये ना...” फुलमनिया बोली तो सुधा की सोच में अनपढ लोगों को झाँसे में लेने वाली कम्पनियों का खाका सामने आ गया । कितना दो चार होना पड़ता है उसे ऐसी बातों से । पिछले हफ्ते ही अखबार में सूचना दी थी अपने ग्राह्कों को झाँसे में ना आने की । सुधा ने कहा –“ लाओ वो कागज़ ”

“.कल....अभी घर मा सब लोगन के बीच कैसे लाऊँ ..बड़ी पेटी मा पड़ा है ....बड़ी मुश्किल से पइसा बचा कर एक ठौ बीमा करवाया...वरना सारा शराब मे....” आगे के शब्द सुधा बिना कहे ही समझ गई ।

पर दिन भर ऑफिस में सोचती रही- अरे फुलमनिया ! कहाँ छिपा पाएगी...कहाँ बचा पाएगी...अगर बचा भी लिया तो सही हाथों मे गया कि नही... बड़ी मुश्किल है रे तेरे लिए फुलमनिया...

अगली शाम फुलमनिया सुधा की अटारी से सटी अपनी टपरे वाली छत पर नीले बड़े छापे वाली साड़ी के आँचल में कागज़ छिपाए खड़ी थी । सुधा को देखकर उसने आँचल से मुस्तैदी से कागज़ निकाल सुधा के सामने रखा तो सुधा की चौंक गई । ...सिंगल प्रीमीयम युलिप योजना थी । ...फुल मनिया के पास बीमा था ....सुधा को विश्वास नहीं हो रहा था उसके निवेश पर ..कैसे छिपाया होगा पैसा...किस एजेंट से बात की होगी....घर में दो बड़े बेटे और पति से छिपाकर...?

“...क्या हुआ ज़िज़्ज़ी ? कागद सही है ना ...? ”

फुलमनिया की आवाज़ से सुधा लौटी तो उसके हाथ फुलमनिया के कन्धों पर थे ।

“ ...अच्छा काम किया है.. ये पैसा तुम्हारा है फुलमनिया...इसे कोई नही छीन सकता ......”

सुधा को लगा नहीं उसकी नानी के ज़माने वाले औरत नहीं है ...अब वो आज़ाद है बरसों की कैद से...उसके पंखों में जान आ गई और वो उड़ने तैयार है....

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