बच्चे की मुस्कुराहट जिन्दगी के सफर में जब मैं एक गाड़ी पर सवार हुआ तो कुछ समय बाद मुझे अपने हाथों पर एक कोमल स्पर्श का एहसास हुआ। प्रतिक्रिया स्वरूप मैंने तुरन्त अपनी आँखें अपनी बगल वाली सीट पर गड़ाई। और यकायक मैं मूक हो गया परन्तु मन के सारे तार जैसे एक साथ झंकार उठे, उस बच्चे के मन मोहिनी मुस्कुराहट देखकर। उस मुस्कुराहट में भूतकाल की वेदना और भविष्य की अनुपम छटा झलक रही थी जैसे बच्चे को मेरा भूत और भविष्य साफ दिखाई दे रहा है क्योंकि वर्तमान तो मुझे भी ज्ञात था। परन्तु इन सबसे सर्वोपरि था बच्चे का स्पर्श प्रेम स्पर्श कहे, निस्वार्थ कहे अथवा आलौकिक प्रेम? यह आप ही निश्चित करे परन्तु मैं इतना ही कह सकता हॅू ज्ञान, मर्म और कर्म की गू आज पता चला कि लोक बच्चों को भगवान का रूप क्यों कहते है? बच्चा मुझसे कुछ कहना चाहता था, मुझे कुछ बताना चाहता था परन्तु उसके बताने के लिए जो तरीका अपनाया शायद मुस्करा कर उसने अपनी सारी बात मुझसे कह दी। मैं कितना समझा? यह ओग की बात थी उसने जीवन की क्षण भगुरता और निस्सारता का भी अनुभव कराया। मेरा स्टोपेज आ गया मैं गाड़ी से नीचे उतरा मैंने 10 का नोट ड्राइवर को पकड़ाया और अपने भविष्य पथ पर अग्रसर हो गया। इस समय भी मैं ऐसा प्रेमानुरक्त था कि ड्राइवर से 4 रूप्ये वापस लेना ही भूल गया। शायद बच्चे ने मुझे परमार्थ में धोखा खाना भी सिखाया या यो कहे कि बच्चें ने मुझे अपने उस समय के “4” दोषों को छोड़ने के लिए प्रेरित किया क्या मैं उन दोषों को छोड़ पाऊँगा ?
(प्रतिलिपि कथा सम्मान हेतु)

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