रोज की तरह वह आज भी प्रण करता है कि बहुत पढ़ेगा, इतना पढ़ेगा कि खुद एक किताब बन जायेगा । वह अल्मारियों पर पड़ी किताबों के ढेर की तरफ बढ़ता है सोचता है कि वह कौन सी किताब पढ़े ? तभी उसे एक किताब टहलते हुई नजर आती है । वह किताब रोजाना टहलती है फिर भी उसका मोटापा जरा भी कम नहीं हुआ । वह उसी चहल कदमी करती किताब को उठा लेता है और पढ़ता है ।
‘क’ से ‘कबूतर', तभी उसे फिल्म वाले कबूतर की याद आई जिसका मालिक एक आदमी द्वारा मारा जाता है, अगर उसके हत्यारे को कोई जानता है तो बस यह कबूतर । कबूतर उसके मालिक के हत्यारे की तलाश कर रही पुलिस को सुराग तक पहुँचाता है । अन्तत: हत्यारा पकड़ा जाता है और उसके मालिक को न्याय मिलती है । सत्य की जीत होती है।
ठीक इसी कबूतर को वह अपने छात्रावास में देखता था, हाँ हाँ वही कबूतर । उसके साथ रहने वाले पी-एच.डी. के भईया भी उस कबूतर को उसे दिखाते रहते थे, अरे! वही भईया जिनका ईमानदारी, मेहनत और हाँ! कठिन परिश्रम पर दृढ विश्वास था । वे अपनी कक्षा के एक होनहार छात्र थे। आजकल भईया अपने वैवाहिक जीवन में बहुत खुश हैं । उन्होंने बहुत सी परिक्षायें दी, नौकरी के लिए साक्षात्कार दिया पर शिक्षा के इन भगवानों को न तो भईया का कठिन परिश्रम या बुद्धि ही खुश कर पायी नाही भईया का सर्वाधिक अंक पाने वाले अंकों से सजा अंकपत्र । भईया ने बहुत कोशिश की पर अन्तत: असफलता ही हाथ लगती । भईया ने कभी हार नहीं मानी । उन्हें कृष्ण की गीता में कही गई बातें हमेशा याद रहती — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” । शादी की उम्र निकल जाने के बाद उन्होंने शादी की । आज भईया व्यवस्था में पूरी तरह खप चुके हैं और खुश हैं । ओह! वह उस कबूतर को भूल ही गया । भईया अक्सर कहा करते अब उस कबूतर में तेज नहीं है ना ही अब उसमें गति बची है । रंग भी तो देखो उस कबूतर का उड़ चुका है पंख झड़ चुके हैं । पूरा मरियल कबूतर ।
उसने आगे पढ़ा ‘ख’ से ‘खरगोश' । उसे उन दिनों की याद आई जब वह अपने होने की प्रामाणिकता अर्थात वह एक योग्य व्यक्ति है इसको प्रमाणित करने के लिए विभिन्न नौकरियों का आवेदन पत्र भरता । बड़ी मेहनत से लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करता । दूर – दूर के जगहों व राज्यों में साक्षात्कार के लिए जाता । वह भी क्या साक्षात्कार का दिन था उसे अन्दर बुलाया गया, उसके कदम अन्दर रखते ही शायद उसका एक पैर अभी हवा में ही था उससे पूछा गया तुम कहाँ से आए हो? उसने जवाब दिया वह बलराम पुर से आया है । उसके बाद उसे कुर्सी पर बैठने को कहा गया वह अन्दर ही अन्दर यह समझ चुका था कि उन्होंने उसकी जाति पूछकर समय गँवाने से बेहतर उसके प्रमाण पत्रों से उसकी जाति पूछना जरूरी समझा । उसने साक्षात्कार लेने वाले व्यक्तियों पर सरसरी नजर दौड़ाई । साक्षात्कार लेनेवाले विद्वजनों में एक मैडम भी थी जो देश में नारी सशक्तिकरण और महिलाओं की हर क्षेत्र में सहभागिता का प्रत्यक्ष प्रमाण थीं । सभी विद्वजन के हाथों में एक - एक नोट पैड था उसमें प्रश्नों को बेमन से सजाया गया था । तभी अचानक एक विद्वजन ने अपने सामर्थ्य के ऊपर का एक भारी भरकम प्रश्न उछाला । वह तो उस प्रश्न से धाराशायी हो गया फिर एक के बाद एक प्रश्न उछाले गए और वह फँसता गया । अन्त में उससे कहा गया कि वह तो बलरामपुर जैसे छोटे जगह का रहने वाला है अगर यहाँ नौकरी लग गई तो कैसे रह पाएगा । वह समझाना चाहता था बल्कि उसका दृढ़ विश्वास था कि वह देश में किसी भी कोने में रहने लायक है बल्कि रह सकता है परन्तु विद्वजन की गूढ़, अनुभवी, पैनी दृष्टि ने उसके अन्दर घुसते ही यह जान लिया था कि वह कहीं भी अपने आपको समायोजित नहीं कर पाएगा । उसे इज्जत के साथ बाहर जाने को कहा गया। उसने जाते समय उनके चेहरों को देखा उन विद्वजनों के चेहरे पर ज्ञान की आभा थी । ज्ञान का प्रकाश पुञ्ज चारो तरफ छिटक रहा था और होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट थी , आँखे बोल रही थीं “ बेटा एक तुमही नहीं पड़े हो विद्वान । बहुतै विद्वान आए हैं इहा । हम तो भाग्यविधाता है तुम्हारे लिए जो लिख दिए ब्रह्मा की लकीर समझो । “वह भी बड़ा अड़ियल था किसी साक्षात्कार में जाता तो लड़के आता, किसी जगह हँसकर चुप रह जाता, तो कहीं का आवेदन ही नहीं करता । उसे अपना आत्म सम्मान ज्यादा प्यारा था इसके लिए वह किसी से भी लड़ने को तैयार था ।
अरे! खरगोश आखिरकार तुम दौड़ते – दौड़ते सो ही गए । रेस में आगे निकलने की होड़ में पीछे ही रह जाते हो । खरगोश भी न अजीब जानवर है जो सही समय पर, सही जगह पर सो जाता है । इस खरगोश के तो सींग भी नहीं होते ।
उसके मुँह से निकला ‘ग’ से ‘गवाह’ । सच में वह अपने समय का गवाह है । उसने सच को झूठ में, झूठ को सच में बदलते हुए देखा है । उसने देखा है कि कैसे सत्ता के आगे योग्यता, ईमानदारी, कड़ी मेहनत का रंग फीका पड़ जाता है । उसने भोगा है इस ईमानदार होने के दर्द को । वह जानता है कि उसके समय में केवल पैसा या नौकरी या पद या फिर सुन्दर चेहरा ही पर्याप्त नहीं बल्कि जरूरी है पॉवर । वह अधिकार जो पूरी व्यवस्था को अपने अनुसार बदल सके ।
उसे यह महसूस हुआ कि वह ‘अन्धायुग’ के उन दो प्रहरी की तरह है जिनका काम है केवल गिनती बढ़ाना । सत्ता में कोई आए या जाए उसके जैसे लोगों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आने वाला ।
वह फिर से अपने कॉलेज के दिनों में जा पहुँचा । एक – एक कर के उसे बहुत से चेहरे घूमते नजर आए । उसने देखा उसके बगल में अरविन्द बैठा है । अरविन्द उसकी कक्षा का सबसे होनहार छात्र था । उसमें वह हुनर था जो बहुत कम छात्रों में देखने को मिलता है । अरविन्द बहुत कम कक्षा में आता, कम पढ़ता पर उसके अंक सबसे ज्यादा आते । तभी अरविन्द ने उसके मुँह में मिठाई ठूँस दी । उसकी नौकरी लग गई थी बिना किसी मापदण्ड या प्रतिमान के । अरविन्द का कहना था कि नौकरी पाने के लिए पढ़ना जरूरी नहीं ना ही साक्षात्कार में सभी प्रश्नों के सही उत्तर देने से नौकरी मिलती है । नौकरी मिलती है अपने ताकत के प्रदर्शन से, शारीरिक ताकत से नहीं बल्कि सत्ता की ताकत । जितना सही सोर्स उतना बड़ा पद वो भी बिना एक पैसा दिए । अरविन्द का यह दृढ़ विश्वास है कि वह प्रोफेसर बनकर अपने जैसे अनेक विद्यार्थियों की फौज तैयार करेगा, जो कुर्सी पर बैठकर मेज पर पड़े पेपरवेट को घूमाने में सिद्धहस्त हो ।
तभी निम्मी ने उसे जोर का पंच मारा । वह हड़बड़ा गया । निम्मी ने कहा बुद्धु मुझे तुम भूल ही गए । निम्मी भी उसकी कक्षा की मेहनती लड़कियों में से थी । उसके माँ बाप उसको ऊँची शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थे क्योंकि ऊँची शिक्षा प्राप्त करने का मतलब उसके विवाह के लिए और ज्यादा दहेज देना । ऊपर से लड़की हाथ से निकल जाए सो अलग, लेकिन निम्मी ने घरवालों से जिदकर, आत्महत्या करने की धमकी दे कर किसी भी तरह घरवालों को मना ही लिया था । निम्मी खूब पढ़ती थी जब भी देखो पढ़ती ही थी । कई लड़कों ने उससे बात करनी चाही, उसे अपनी गर्लफ्रेन्ड बनाना चाहा पर वह तो इन सबसे दूर पढ़ती ही रहती । लड़कों ने जब देखा कि निम्मी उन्हें कोई भाव नहीं दे रही और पढ़ाई में भी उनसे आगे निकलती जा रही है तो उन्हें ईर्ष्या होने लगी । उन्होंने किसी भी तरह निम्मी को रोकना चाहा पर निम्मी हार मानने वाली लड़कियों में से नहीं थी तब उन्होंने एक अचूक बाण खोज निकाला । उन लड़कों ने तय किया वे निम्मी को चरित्र प्रमाण पत्र देंगे । उन्होंने ऐसा किया भी । निम्मी का कॉलेज जाना तक मुश्किल हो गया जो उसको जानते थे वो भी, जो नहीं जानते थे वो भी उसके चरित्र को सन्देह की दृष्टि से ही देखते, उसका मजाक उड़ाते । बहरहाल निम्मी आज अपनी मेहनत के बदौलत अच्छे जगह है । वह पी०सी०एस० की परीक्षा उत्तीर्ण कर आज अधिकारी है । पर निम्मी जैसे बुद्धिजीवी समाज में कम ही हैं । जो पी०सी०एस० की परीक्षा उत्तीर्ण करे । सबके सपने भी तो एक नहीं होते ।
वह तो गवाह है अपने कॉलेज का । जब उसने छात्रों को दो गुटों में बँटते देखा । विद्यार्थियों की दो फौजे । एक मेहनत व ईमानदारी से पढ़ाई कर कुछ पाने की ख्वाहिश रखते थे दूसरे पढ़ाई न कर सोर्स लगाने में, वे जी हुजूरी की परम्परा को बढ़ाने वाले विद्यार्थी थे । ये अलग बात है कि विद्या के अर्थी सब थे ।
वह पढ़ते – पढ़ते बार-बार कहीं फँस जाता है । वह ने सोचा ‘ग’ से ‘गवाह’ ही क्यूँ ? ‘ग’ से ‘गमला’ भी तो हो सकता है । हाँ ठीक ही है ‘ग’ से ‘गमला’ । गमले का काम घर की शोभा बढ़ाना है । वह चुप – चाप घर के अन्दर या बाहर पड़ा रहता है कोई आए कोई जाए , कुछ भी हो वह टस से मस नहीं होता, कोई हरकत नहीं करता जब तक कि कोई उसे उसके जगह से हटाकर दूसरी जगह न रख दे । दूसरी जगह जा कर भी वह वही गमला रहता है बिना हरकतों वाला । अगर थोड़ी भी हरकत उसने की तो उसके छत से गिरकर मरने की सम्भावना रहती है या फिर मालिक द्वारा उसकी छटनी कर दी जाती है।
‘घ’ से ‘घण्टा’, वह ने पढ़ा और उसे कुन्दन सरकार का घण्टा याद आया । एक कुशल राजनेता बनने के लिए घण्टा बनना और बनाना दोनों ही बहुत जरूरी है । वह ने सोचा आज समाज में तीन ही लोग ज्यादा प्रसिद्ध है राजनेता, फोटोग्राफर, और साहित्यकार । वह राजनेता बन नहीं सकता क्योंकि उसके अन्दर घण्टा बनने या बनाने के गुण नहीं, वह फोटोग्राफर भी नहीं बन सकता क्योंकि फोटोग्राफी के लिए मंहगे कैमरे और जगह – जगह भ्रमण कर दृश्यों को कैद करने की जरूरत पड़ती है वह की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं । तब वह ने तय किया कि वह एक साहित्यकार बनेगा । एक उच्चकोटि का साहित्यकार । साहित्यकार बनने के लिए एक कॉपी, एक कलम और कंधे पर झोले की जरूरत होती है । जहाँ – जहाँ गया, जो – जो देखा उसको कॉपी में कैदकर लो यही तो साहित्य है । वह रोज कविता, कहानी लिखने की कोशिश करता परन्तु उसका ध्यान भंग हो जाता । घर का काम – काज, कभी बाजार जाना, कभी मुहल्ले की दावत वह कुछ न लिख पाता । वह बहुत परेशान रहने लगा तब उसने निश्चय किया कि वह किसी कुशल साहित्यकार से सम्पर्क करेगा, साहित्य की बारीकियों को सिखेगा, मन को शान्त करके कुछ नया सृजन करने का गूढ़ रहस्य पूछेगा । वह को एक दिन एक साहित्यकार मिल ही गए उसने अपनी सारी समस्याएँ उनसे बताई तब उस साहित्यकार ने उसे अच्छा साहित्य लिखने के कुछ बिन्दु तथा मन को साधने का मूल मन्त्र दिया जो इस प्रकार है — साधो! रोज सुबह उठते, जागते – सोते तुम फेसबुक, इन्स्टाग्राम और भी जितने सोशलसाइट्स है उन पर साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ा करो, यह देखा करो कि किस रचना पर सबसे ज्यादा लाइक्स और कमेन्ट्सआए, किस रचना में लोगों को आकर्षित करने का मसाला ज्यादा है अब उन रचनाओं को इकट्ठा करो उनकी दो –चार पंक्तियाँ कॉपी –पेस्ट करते जाओ बन गई एक नई रचना । जिसका निर्माण तुमने किया कठिन साधना और परिश्रम के बल पर । अब इसे किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छपने को दे दो । और हाँ! केवल देने से काम न चलेगा मेरा नाम बता देना । तुम्हारी कृति पत्रिका छपने के सम्भावित दिनांक के पहले ही छपकर तुम्हारे पास आ जाएगी। फिर तो तुम्हारी रचना छपने, पुरस्कार मिलने का दौर शुरू हो जाएगा । उसके बाद तुम पुरस्कार रखो या वापस करो इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी अपनी है ।
वह घर आया । उसके पास एक अच्छा मोबाईल भी न था कि वह फेसबुक, इन्स्टाग्राम चला सके । वह ने तुरन्त मोबाईल खरीदा । फेसबुक, व्हाट्सएप अकाउन्ट बनाया । अब उसके साधना का दौर शुरू हुआ । यह काम तो उसके उम्मीद से ज्यादा कठिन निकला । वह को ढंग से मोबाईल भी चलानी नहीं आती थी फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सएप तो दूर की बात थी । वह ने गुस्से में अपना मोबाईल पटक दिया । मोबाईल तो चूर – चूर हुआ ही साथ में उसके सपने भी ।
‘ड़' मने ‘कुछनहीं' । वह ने देखा उसके अन्दर का कुछ नहीं बिस्तर पर पड़ा कराह रहा है और इस वह के पास उस कुछ नहीं को सात्वना देने के लिए एक भी शब्द नहीं थे ।
वह की नींद टूट गई । वह किताब लिए ही सो गया था और सपनों में खो गया था । किताब जो उसने अपने हाथ में पकड़ रखी थी अचानक वह कूदकर भाग निकली ईवनिंग वॉक पर ।



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