राजस्थान के एक गांव में मंगल अपनी पत्नी राधा और तीन बच्चो के साथ रहता था। मंगल की अपनी एक छोटी सी सरसों का तेल बेचने की दुकान थी। तीन बच्चों में उसकी दो पुत्री और एक पुत्र था। बड़ी बेटी हेमा 14 वर्ष की हो चुकी थी। क्योंकि उनके गांव में बाल विवाह की प्रथा विराजमान थी, तो मंगल ने भी हेमा का विवाह करने के लिए अच्छे वर की तलाश करना शुरु कर दिया। हांलाकि हेमा अभी आगे पढ़ना चाहती थी, परन्तु मंगल ने सोचा कि अगर हेमा को आगे पढ़ाऊँगा तो इसके विवाह के लिए रुकना पढ़ेगा और गांव वाले तरह-तरह की बाते बनायेगें। इसलिए अपने रिश्तेदारो से उसने हेमा के लिए अच्छा लड़का ढूंढने के लिए कहा।

हेमा के मामा ने हेमा के विवाह के लिए एक लड़का बताया। हेमा के मामा ने कहा कि लड़का और उसके घरवाले उसकी पहचान के ही हैं और दिल्ली में रहते हैं। लड़के की अभी सरकारी नौकरी लगी है और जल्द ही पक्की भी हो जायेगी। मंगल को रिश्ता पसंद आ गया, तो उसने लड़के का घर और उसे देखने के लिए कहा। लड़के का नाम सुरेश था और उसकी उम्र 20 साल थी। मंगल सुरेश और उसके घरवालों से मिलने के लिए उनके घर पहुँचा, उसने सुरेश और उसके घरवालों को हेमा की तस्वीर दिखाई तो वह उन्हें पसन्द आ गयी। हेमा बहुत संुदर थी।

दो महीने के बाद हेमा और सुरेश का विवाह पूरे रीति-रिवाज के साथ सम्पन्न हुआ। हेमा विदा होकर अपने ससुराल में आ गयी। हेमा अभी 14 साल की थी, विवाह जैसे बन्धन में बन्धने के लिए वह अभी तैयार नहीं थी। उसके लिए तो विवाह एक गुड्डे-गुड़िया के खेल की तरह सा था, जो वह अपनी सहेलियों के साथ खेला करती थी। उसे विवाह के बाद बनने वाले नये रिश्तों की भी समझ नहीं थी। उसके लिए तो विवाह का मतलब नये-नये कपड़े पहनना, घर में बहुत सारे रिश्तेदारों का आना, गाना-बजाना, मिठाइयाँ आदि खाने से था। उसे यह नहीं पता था कि विवाह के बाद कितने नये रिश्तों को अपनाना पड़ता है, एक लड़की को अपने मायके को सदा के लिए छोड़कर ऐसे लोगों के बीच जाना पड़ता है जिन्हें वह ठीक से जानती भी नहीं है और किस तरह से एक लड़की की पूरी जिन्दगी ही बदल जाती है।

ससुराल में पहुँचने के बाद 2-3 तीन दिन विवाह की सभी रस्मों आदि में बीत गये। सभी नयी बहू की आवभगत में लगे हुए थे। हेमा को यह सब बहुत अच्छा लग रहा था। यहां का माहौल उसके लिए बिल्कुल नया था। सभी रिश्तेदारों के चले जाने के बाद हेमा केा एक अलग कमरे में अच्छे से तैयार करके बिठाया गया। कमरा चारों तरफ से सजा हुआ था, हेमा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। फिर थोड़ी देर बाद सुरेश अन्दर आ गया। क्योंकि हेमा को विवाह के बाद अपने और सुरेश के बीच बनने वाले नये रिश्ते के बारे में कुछ भी नहीं पता था, कम उम्र की वजह से उसे एक पति-पत्नी के संबंधों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी, तो सुरेश को इस तरह कमरे में आकर उसके पास बैठने पर वह थोड़ा झिझक गई। सुरेश ने उसे छूने की कोशिश की तो वह बहुत डर गई। डर के मारे उससे कुछ बोला भी नहीं जा रहा था। सुरेश ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु हेमा की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था और वह डर के मारे सो गई। कुछ दिनों तक हेमा और सुरेश के बीच ऐसा ही चलता रहा। धीरे-धीरे यह बात सुरेश की घरवालों को भी पता चल गई।

कुछ दिन बाद मंगल पगफेरे की रस्म के लिए हेमा को लेने पहुँचा। तब सुरेश के पिता ने मंगल को सारी बात बताई। मंगल ने सुरेश के पिता को आश्वासन दिया कि हेमा की माँ उसको अच्छे से सब कुछ समझा देगी, आप किसी बात की चिन्ता न करें।

हेमा के घर पहुँचने पर मंगल ने राधा को सारी बात बताई और हेमा को समझाने के लिए कहा। हेमा ने अकेले में बिठाकर हेमा को समझाया कि विवाह के बाद हम लड़कियों को नये रिश्तों को समझना पड़ता है। सुरेश अब तुम्हारा पति है और तुम्हें उसकी हर बात को मानना है और घर के बाकी लोगों का भी ध्यान रखना है। किसी को भी शिकयत का मौका नहीं देना है।

कुछ दिनों बाद सुरेश को हेमा को लेने उनके घर गया और हेमा को अपने साथ ले आया। ससुराल आकर अपनी माँ के कहे अनुसार हेमा ने सुरेश से अच्छे से बात की, हेमा ने अपने आगे पढ़ने की इच्छा को जाहिर किया। सुरेश भी आगे की पढ़ाई कर रहा था तो उसने हेमा को भी अपनी पढ़ाई पूरी करने की सहमति दे दी। सुरेश ने यह भी कहा कि जब तुम अपनी पढ़ाई पूरी कर लोगी तभी हम अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करेंगे। हेमा बहुत खुश हुई क्योंकि सुरेश के रुप में उसे एक दोस्त मिल गया था जो उसके मन की भावनाओं को समझने लगा था। इस तरह हेमा और सुरेश ने एक नई जिन्दगी की शुरुआत की।

अंत में मैं यह कहना चाहती हूँ कि हमारे देश में आज भी ऐसी बहुत सारे स्थान हैं जहाँ पर अभी भी बाल विवाह नाम की प्रथा प्रचलित है। विवाह के नाम पर कम उम्र में भी बच्चों को विवाह कर दिया जाता है, जबकि उनकी पढ़ने-लिखने, खेलने-खाने की उम्र होती है। हमें अपने बच्चों का विवाह उनकी सही उम्र आने पर की करना चाहिए।

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