मुझे तुम जरूर मिलोगी

मुझे आज भी वो वैसी ही लगी थी। तीस वर्ष पूर्व की बिन्दु और आज की बिन्दु में कोई विशेष अंतर नहीं था। कनपटियों के पीछे के बालों और पहरावे पर गौर न करें तो कोई कह ही नहीं सकता था कि बिन्दु पचपन के आसपास होगी। जिसे बचपन में चाहा और जिंदगी के इस पड़ाव में आकर उससे भेंट हो जाए, तो समय लौट सा आता है। मन उसी प्रकार उछलने लगता है जैसा कभी बचपन में होता था। बिन्दु पहले तो मुझे देखती रही। शायद इस इंतजार में थी कि चुप्पी तोड़ूं परंतु मैं बात का सिरा ढूंढने में ही लगा था कि वह बोल पड़ी-

'इत्ते दिन बाद दिखाई दिए?

मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था। अगर वो यह न पूछती तो शायद मैं भी उससे यही सवाल पूछता। लेकिन उसने पहल कर डाली थी। सो, उत्तर भी मुझे ही देना था। मैं उससे बस यह कह पाया-

'तुम्हारा कुछ अता-पता होता, तो न?

अब उसके पास इसका कोई उत्तर नहीं था। उसने मेरी उंगलियों को देखा। मेरा हाथ पलटा और कहने लगी-

'राहुल, नाखून अभी भी चबाते हो।'

'कुछ आदतें जाते-जाते ही जाती हैं। लेकिन कुछ तो जाती ही नहीं।'

'ऐसी और कौन-सी आदतें हैं जो पहले भी थीं अब भी हैं।'

'अभी भी रात को देर रात तक जागता हूँ। कभी-कभी तो दो भी बज जाते हैं।'

'अब भी?' बिन्दु को आश्चर्य हुआ था।

'हाँ, पत्रकार हूं न। अखबार की नौकरी में तो यह सब चलता ही है। अकसर रात की ही ड्यूटी रहती है।'

'मैं समझी थी कि...'

'क्या समझी थी?'

'कुछ नहीं।'

'यह आदत तुम्हारी पहले भी थी। बात शुरू करके बीच में ही छोड़ देने की।'

'मुझे अच्छा लगता है इसमें।'

'ऐसा अच्छा तो तुम्हें पहले भी लगता था।'

'अभी भी इतनी रात तक जागते हो, उल्लू की तरह।'

और वह खिलखिला पड़ी थी। उसकी आंखों के कोर से आंसुओं की बूंदें छलछला आयी थीं। मैं यह अनुमान नहीं लगा पाया कि ये आंसू खुशी के हैं या ... मैं चाह रहा था कि आज बिन्दु से इस थोड़े समय में उसके इन तीस सालों का खुलासा पूछ लूं। लेकिन वह एक के बाद एक प्रश्न किये जा रही थी। जब मैंने उससे पूछा कि ' घर में और कौन-कौन हैं?' इस पर वह उठ खड़ी हुई। मेरा हाथ पकड़ कर कहने लगी-'आफिस में ज्यादा देर बैठना ठीक नहीं। चलते हैं।'
मैं भी यंत्रवत उसके साथ-साथ चलने लगा। चलते-चलते उसने ढेर सारी अपनी बातें कह डाली थीं। मुझे उसके साथ चलते हुए ऐसा लग रहा था मानो मैं थकने लगा हूं। मुझे अपने पैर बोझिल लगने लगे थे। एक-एक कदम उठाते हुए मुझे बहुत कष्ट हो रहा था। कालेज के दिनों में जब हम दोनों इसी प्रकार निकलते तो मैं आहिस्ता ही चलता था। बिन्दु की तेज चलने की वो आदत आज भी वैसी ही थी। तब भी वह मुझसे पूछती कि तेज क्यों नहीं चलते। मैं कह देता कि तुम्हारा साथ अच्छा लगता है। मैं नहीं चाहता कि रास्ता जल्दी कट जाए। फिर वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे घसीटती हुई चलती थी। कभी-कभी अपने पर्स में से मूंगफली निकालकर उन्हें छील कर दाने अपनी हथेली पर रखकर कहती थी कि, 'उठाओ।' मैं अगर आहिस्ता से उठाता तो अपनी मुट्ठी में मेरी दो उंगलियां कैद कर लेती और मानो एक कविता ही कह डालती-

'अगर तुम्हें कोई अच्छा लगता है तो क्या उसे छूने का मन नहीं करता?'

मैं उसकी ऐसी बातों का उत्तर कम ही दे पाता था। यह बात नहीं कि मैं उत्तर देना नहीं जानता था। समस्या यह होती थी कि प्रश्न पूछने के बाद वह इतना समय ही नहीं देती थी कि उत्तर दे पाऊं। वह तुरंत उत्तर भी स्वयं ही दे डालती थी या फिर दूसरा प्रश्न उछाल देती थी। मेरे मन में सैकड़ों प्रश्न कुलबुला रहे थे। लेकिन वह बारी की प्रतीक्षा में थे। आज भी उसने जब मेरा हाथ पकड़ा, तो मुझे अच्छा लगा। लेकिन न जाने क्यों मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया था। शायद इस बात का उसने कोई नोटिस नहीं लिया और कहने लगी-

'तुम्हारे हाथ अभी भी गुनगुने रहते हैं।'

मैं नहीं चाहता था कि आज कोई भी प्रश्न निरुत्तर रहे। इसलिए इससे पहले कि वह अन्य कोई प्रश्न करे या उत्तर दे, मैं बोल पड़ा था। मैंने उसी का बरसों पुराना उत्तर दे डाला था-
'विश्वास करने वाले हर व्यक्ति के हाथ गर्म होतेहैं।

मेरी बात खत्म होते ही उसने पूछ लिया।

'मेरे हाथ कैसे लगे?'

मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि वो यह प्रश्न भी पूछ सकेगी। यह जरूरी नहीं कि इनसान की उम्र बढऩे के साथ उसकी सोच भी बदल जाए। मैं तो यह महसूस ही नहीं कर सका था कि उसके हाथ कैसे हैं। उसे कहता भी कैसे कि पता ही नहीं चला कि उसके हाथ गर्म हैं या ठंडे। इस बार भी मैं निरुत्तर हो गया था और मात्र मुस्करा दिया। वह कहां चूकने वाली थी। 'तुम्हारी आदतें अब भी वैसी ही हैं। हर बात का जवाब नहीं देते। अच्छा बताओ इन तीस सालों में मुझे कभी याद किया?'

'तुम्हारा साथ जिया एक-एक लम्हा मैंने संजोकर रखा हुआ है। तुम्हारे खत अभी भी मेरी किताबों में महक रहे हैं।'

'खत?' सुनकर उसका चेहरा लाल हो गया। मुझे लगा कि अब उसका जिस्म तपने लगा होगा। मैं उसके चेहरे के बदलते भावों को देखने लगा। अब वह आहिस्ता चलने लगी थी। मैंने उसका हाथ पकड़ कर तेज चलने को कहा। मुझे लगा कि उसके हाथ वाकई तप रहे थे। अब हम दोनों साथ-साथ चल रहे थे। मैं कुछ अधिक हांफ रहा था। वह कई बार पूछ चुकी थी कि हम कहां चल रहे हैं। मैंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। वह यह तो सोच रही होगी कि मैं उसकी किसी भी बात का उत्तर जल्दी नहीं देता हूं। इस बार भी चुप रहा। यह बात नहीं कि मैं तय नहीं कर पाया था कि कहां जाना है। मैंने उससे कह ही दिया कि घर चलेंगे।

'किसके?

'किसी के भी। तुम्हारे भी चल सकते हैं। जिसका घर नजदीक होगा, उसी के यहां चलेंगे। तुम आयी कैसे हो?'

'गाड़ी है मेरे पास। ए ब्लाक में एक मैकेनिक के पास दी थी सुबह। आओ इकट्ठे चलते हैं।'

'गाड़ी तो मैंने भी ए ब्लाक पार्किंग में खड़ी की हुई है। ऐसा नहीं हो सकता कि हममें से एक अपनी गाड़ी यहीं छोड़ जाएं।'

'होने को तो कुछ भी हो सकता है। परंतु मैं अपनी गाड़ी नहीं छोड़ पाऊंगी। वैसे भी तुम शहर में ज्यादा पुराने नहीं हो। मुझे रास्ते ज्यादा मालूम हैं। तुम अपनी गाड़ी निकालो, मैं यहीं आकर मिलती हूं। मेरी गाड़ी के पीछे-पीछे चलना। बहुत दूर नहीं है मेरा घर।'

इस बार भी उसकी बात को काट नहीं सका था, हर बार की तरह। उसकी कार के पीछे-पीछे चलने से मुझे कई फायदे हुए। शहर भी घूम लिया और कार से बाहर सिर निकाल कर जगह-जगह रास्ता नहीं पूछना पड़ा। आधा घंटा बाद हम एक बड़ी-सी हवेली के बाहर थे। एक नेमप्लेट पर हर्ष कुमार लिखा था। उसने पर्स में से चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर चली गयी। मैं भी उसके पीछे चल रहा था। एक बड़े से ड्राइंग रूम में जाकर वह एक बड़े सोफे पर पसर गयी। मुझे भी इशारे से सामने ही बैठने को कहा। हम दोनों आमने-सामने बैठे थे। थोड़ी देर में वह उठी और फ्रिज से पानी की एक बोतल निकाल लायी।

मैंने उसे गिलास लाने को कहा। वह अंदर जाने लगी। साथ ही यह भी कहती गयी कि बस यह आदत बदल गयी है तुम्हारी। पहले तो फ्रिज से बोतल निकाल कर बोतल से ही पानी पी लेते थे।

'हां, अब उतना ठंडा पानी भी कहां पिया जाता है?'

'सो तो है।'

'घर में कोई नहीं है?'

'नहीं।'

'सच'

'हां, उनको गुजरे दो साल हो गये हैं। मैं यहीं बीमा कंपनी में मैनेजर हूं। अब आफिस जाने को मन नहीं करता। किसके लिए जाऊं? उनकी भी पेंशन मुझे ही मिलती है।'

'दीवार पर ये जो तस्वीर टंगी है।'

'हां हर्ष की है, हार्ट फेल हो गया था इन्हें कलकत्ता रेलवे स्टेशन पर।'

मैंने देखा कि आज भी बिन्दु के चेहरे पर वही गंभीरता थी जो पहले भी विकट परिस्थितियों में दिखायी देती थी। मैं इतना ही कह पाया-

'बहुत बुरा हुआ।'

'अच्छा-बुरा तो व्यक्ति के दृष्टिकोण में होता है। तुम्हें बुरा लगा यह जानकर मुझे संतोष हुआ।'

'अकेली रहती हो इतने बड़े मकान में?'

'हां, उन्होंने बड़े शौक से बनवाया था यह। जिस महीने उनकी मृत्यु हुई उसी महीने इसके लोन की किस्तें भी पूरी हुई थीं। मानो इसे चुकता करने के लिए ही वह जिंदा थे। जिस रात कलकत्ता गये थे, कह रहे थे लौट आऊं फिर मनाएंगे जश्न घर में। कहते हैं कि रिटायर होने से पहले ही जिनके मकान की पूरी किस्तें हो जाती हैं, वे बड़े भाग्यशाली होते हैं। ऐसी फिजूल की परिभाषाएं न जाने कौन लोग बना डालते हैं। अब बताओ हम दोनों में कौन भाग्यशाली है। वे चले गये या फिर मैं जो अकेली रह गयी?'

'बच्चे वगैरह...मैंने सकुचाकर पूछा।'

'तीनों अपनी-अपनी जिंदगी जी रहे हैं। बड़ी लड़की की शादी दिल्ली कर दी थी। दोनों बेटे इंजीनियर हैं। एक कलकत्ता में तो दूसरा मुम्बई में। कलकत्ता वाले के बेटे का जन्मदिन मनाने ही तो गये थे।'

'मेरी मानो तो तुम भी रिटायरमेंट लेकर किसी बेटे के पास चली जाओ।'

'सलाह तुम अब भी पहले की ही तरह देते हो।'

मैं केवल मुस्करा दिया था। लेकिन बिन्दु की स्थिति देखकर मैं बेचैन था। यह तो पता चल ही गया था कि उसकी बेटी व एक बेटे की शादी हो चुकी है। मुम्बई वाले बेटे की शादी हुई है या नहीं इस बारे में उसने कुछ नहीं कहा था। मैंने ही पूछ लिया-'मुम्बई वाले की शादी हुई या नहीं?'

'हां, उसने भी पिछले महीने अपनी मर्जी से शादी कर ली।'

'अच्छा?'

'तुम्हारा यह अच्छा कहना सवालिया है या कि आश्चर्यजनक?'

'न सवालिया और न ही आश्चर्य वाला।'

'उसने न तो किसी को बुलाया और न ही कोई रीति-रिवाज ही निभाए। कहता था कि अग्नि को साक्षी मानकर कसमें वादे भले ही कितने किये जाते हों, उन्हें निभाता कौन है।'
मैं बिन्दु को केवल सुने जा रहा था। उसका एक-एक शब्द पीड़ा से सना हुआ था। वह बोले जा रही थी ।

'और हर्ष ने भी अग्नि के समक्ष कसमें खायी थीं कि हर सुख-दुख में साथ दूंगा। सुख में तो उन्होंने पूरा साथ दिया। अब उन्हें क्या पता कि क्या बीत रही है मुझ पर। बच्चों की जिंदगी अपनी है। उसमें तो हस्तक्षेप नहीं कर सकती न। जब इनसान को पता ही है कि कसमें-वादे निभाने वाली डोर उसके हाथ में ही नहीं है तो वह वादे करता ही क्यों है?' ऐसा कह कर वह चुप हो गयी। मैं भी मौन न तोड़ सका। वह फिर आहिस्ता से बोली-

'तुमने भी मेरे साथ एक वादा किया था। निभाया था?'

मुझे लगा कि अब रात ज्यादा काली होने वाली है। मैं अधिक देर रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मैंने उससे कहा-

'मुझे अब चलना चाहिए। तुम्हारा घर तो देख ही लिया है कभी कभार आ जाया करूंगा।'

'चाय नहीं पियोगे। बातों में ही ऐसी उलझ गयी कि चाय पूछना ही भूल गयी।'

'अगली बार दो कप पिऊंगा।'

'तुमने कहां जाना है?'

'डी ब्लाक में।'

'चलो मैं भी चलती हूं। तुम्हें वहां तक छोड़ दूंगी। लेकिन अब तुम अपनी गाड़ी आगे रखोगे और मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आऊंगी गाड़ी लेकर।'

'मैं तो यही सोच रहा था कि तुम मेरे साथ चलो। तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा।'

'अब वृत्ति कुछ इस तरह की हो गयी है कि अच्छा तो कुछ लगता ही नहीं।

'चलो तो सही।'ठ

मैं गाड़ी ड्राइव करता हुआ जा रहा था। शीशे में बिन्दु का चेहरा दिखाई दे जाता था। मुझे कालेज समय की बिन्दु याद आ जाती है जो मेरे साथ गृहस्थी बसाना चाहती थी। आज इस मोड़ पर उसे देखकर लगा कि कुछ लोग खुशियां बांट सकते हैं। उनके हिस्से में खुशियां अधिक देर साथ नहीं चलतीं। डी ब्लाक आते ही पहले कार्नर पर मैंने गाड़ी रोक दी। बिंदु ने भी थोड़ा आगे बढ़ाकर गाड़ी पार्क कर दी। जब हम दोनों सड़क पर आ गये, वह पूछने लगी-

'यहां से कितनी दूर पैदल चलना होगा?'

मैंने उसे इशारे से बताया कि वो सामने दुमंजिला भवन है, उसी में जाना है।' इस पर वह बोल पड़ी।

'वो तो वृद्धाश्रम है।'

'हां, क्या वहां नहीं जाया जा सकता?'और हम दोनों उस वृद्धाश्रम में पहुंच गये थे। मैंने अपना कमरा खोला और अंदर चला गया। बिंदु कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। वह एक कुर्सी पर बैठ गयी।

'तुम यहां रहते हो?'

'हां'

'लेकिन तुमने तो मुझे बताया ही नहीं।'

'अब तुम मेरे घर आयी हो, अपने बारे में सब कुछ बताऊंगा।'

इतने में एक व्यक्ति दो गिलास पानी लेकर आ गया था। वह दोनों गिलास टेबल पर रख कर चला गया। मैंने बिन्दु से कहा-

'आज खाना यहीं खाकर जाना। तुम्हें एक सरप्राइज दूंगा।'

'पहले यह बताओ कि तुम यहां अकेले रहते हो।'

'अकेला कहां , मेरे जैसे कई हैं यहां। जब घर में था तो अकेला जरूर था। दो बेटे हैं। उनका परिवार है। मेरी पत्नी पांच साल पहले गुजर गयी थी। एक बाप अपने दो बेटों को तो पाल सकता है पर दो बेटे और उसके परिवार एक बाप को नहीं रख सकते। अब रिटायर्ड हूं न। बोझ बन गया था उन पर। यहां के वृद्धाश्रम का इश्तिहार निकला था अखबार में। बस जगह मिल गयी और आ गया। दो कमरे मिले गये हैं। खाना भी मिल जाता है। सब सुविधाएं हैं।'

'कभी घर जाते हो?'

'अब तो यही घर है। वैसे अभी एक महीना ही हुआ है मुझे यहां आए हुए।'

वृद्धाश्रम का नौकर खाना पूछने आ गया था। मैंने तीन लोगों के लिए खाना लाने के लिए कह दिया था। साथ ही उसे यह भी कह दिया था कि कमरा नंबर आठ से मैडम को भी भेज देना। बिन्दु के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे। वह पूछ बैठी-

'यह मैडम कौन है?'

'इस मामले में तुम अब भी पहले जैसी ही हो।'

'वह है कौन।'

'अभी आती ही होगी। तुम उसे देखकर बहुत खुश होगी।'

इतने में दस्तक हुई और महिला ने प्रवेश किया। वह बिन्दु को देखकर भौंचक्क रह गयी। उसका हाथ पकड़कर उसके साथ वाली कुर्सी पर बैठ गयी।

'अरे बिन्दु, कमाल हो गया। तुम भी यहां आ गयी।'

'मंजू तू। तू यहीं रहती है। क्या संयोग है। हम तीनों कालेज में भी इकट्ठे ही थे। जीवन के इस पड़ाव में भी इकट्ठे हो गये हैं।'

'हां बिन्दु, मैं कभी कह नहीं पायी थी कि मैं राहुल से प्यार करती हूं।

'मुझे यह आज ही पता चला कि मंजू भी मुझे प्यार करती थी। लेकिन उसने ऐसा आभास नहीं होने दिया। मैं तो यही जानता था कि मंजू हमारी अच्छी मित्र है। मैंने उससे कहा-

'वो तुमने कभी कहा ही नहीं।'

'मैं जानती थी कि तुम और बिन्दु दोनों एक दूसरे को बेहद चाहते हो। मैं यह तो नहीं जानती कि तुम दोनों की आपस में शादी न होने की क्या वजह रही। लेकिन मुझे यह पता जरूर लग गया था कि तुम दोनों की शादी अलग-अलग जगह हो गयी है। मैं कहीं और शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। केवल शादी करना ही मेरे जीवन का मकसद नहीं था। मैं समाज सेवा में जुट गयी। लेकिन राहुल मैं तुम्हें भुला नहीं पायी। पापा की इकलौती बेटी होने की वजह से उनका सारा पैसा मुझे ही मिला। इस वृद्धाश्रम की शुरुआत मैंने ही की थी। अब तो यह काफी बड़ा बन गया है।'

मैं असमंजस की स्थिति में था। मंजू मुझसे इतना प्यार करती थी कि जिंदगी भर उसने शादी नहीं की।

'तुमने क्या सच में प्यार किया था मुझसे। अगर मुझे पता होता कि...'

बिन्दु बीच में ही बोल पड़ी।

'तो क्या कर लेते। मेरा तो पता था न कि मैं तुमसे शादी करना चाहती थी। लेकिन तुमने कब सीरियस लिया?'

मंजू इस समय को बातों में उलझाना नहीं चाहती थी। वह चाह रही थी कि जान सके बिन्दु की गृहस्थी कैसी चल रही है। लेकिन जब उसे यह पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और तीन-तीन बच्चों के होते हुए भी एकाकी जीवन जी रही है तो वह उदास हो गयी। उसने आहिस्ता से बिन्दु के कंधे पर हाथ रखा।

'मैं तेरी स्थिति का अहसास जरूर कर सकती हूं बिन्दु । इनसान जब किसी को अपना बनाना चाहता है और बना नहीं पाता, उसका संताप मैं जानती हूं। परंतु किसी अपने का चला जाना कैसा हो सकता है यह भी मैं महसूस कर सकती हूं। जिंदगी का चक्र घूमता रहता है। उम्र के इस पड़ाव पर आकर ऐसा लगता है कि हम जहां से चले थे वहां आकर ठहर गये हैं। तीस साल पूर्व हम तीनों इकट्ठे होते हुए भी तो अकेले थे। तुम्हारे दोनों के बच्चे हैं लेकिन कौन साथ देता है। मनुष्य को अपनी लड़ाई खुद ही लडऩी पड़ती है।'

इतने में दस्तक होती है और नौकर खाना लाकर मेज पर रखने लगता है।

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