इत्तेफाक ए इश्क..

आज हम अपनी शादी की तीसरी सफल वर्षगाँठ मना रहे है .. पर इस कहानी की नींव राखी जाती है आज के ८ साल पहले जब मैं बारहवीं में पढता था ....आइये चलते हैं ८ साल पहले की दुनिया में ....

27 जून 2010

मम्मी की लगभग चीखती हुई आवाज़ ने मुझे सपनो की दुनिया से बहार निकाला हालाँकि वो पिछले २० मिनट से रह रह कर चिल्ला तो रहीं थी पर सुबह के वक्त की नींद माशाल्लाह इसके सामने तो जन्नत की हर एक चीज का नशा फीका पड जाये तो सुन के भी अनसुना कर दिया | पर अब पानी सर से ऊपर निकल चूका था और हमें भी याद आया की आज तो शिमला के लिए निकलना है... कितनी मुश्किल से बड़ी मान मनौव्वत के बाद तो पापा राजी हुए थे अकेले जाने देने को | वो बात दरअसल ऐसी थी पिछले दो सालो से बारहवीं के बोर्ड परीक्षा के चलते हम न तो हॉस्टल से घर आये थे न ही किसी रिश्तेदार की शादी देखी थी न ही कभी कोई खेल खेला था ... बस इन्ही सारी बातों के जज्बातों का सहारा लेकर दोस्तों के साथ शिमला जाने का प्लान बनाया था ... पर मम्मी ने जरुर मेरे बच्चे होने.. अकेले जाने.. खाने पीने को होने वाली.. दिक्कतों का मजबूत आधार बना कर पिताजी की कोर्ट में न जाने देनें के लिए काफी दलीले पेश की पर पिताजी के ऊपर मेरी पढाई के प्रति अपार श्रद्धा और मेरा ०२ साल का सन्यासी जीवन भर पड़ गया और जाने के कुछ दिन पहले ही अंतिम समय में हाँ कर दी |

इसिलिये आज वही ऐतहासिक दिन था ...ऐतहासिक इसलिए क्योंकि इससे पहले मैंने अपनी सब्जी मंडी तक का सफ़र अकेले तय नहीं किया था .. इसके पीछे एक लम्बी कहानी है वो फिर कभी .... अभी फ़िलहाल हमें निकलने की तैयारी करनी है | हम स्टूडेंट्स को अंतिम वक्त पर सारे काम करने की बहुत बुरी बीमारी होती है चाहे वो पेपर के वक्त लास्ट मोमेंट स्टडी हो या ... कोई स्कूल का छूटा हुआ काम ..या कहीं जाने के लिए पैकिंग... पर वो तो भला हो मम्मी का जिन्होंने कपड़ों से लेकर टिकेट खाने पीने का सारा सामान लिस्ट बना के पहले ही पैक करके रख दिया था |

हमे इलाहबाद से दिल्ली तक ट्रेन का सफ़र तय करना था ..और दिल्ली में सारे दोस्तों को इकट्ठा होकर शिमला के लिये फ्लाइट लेनी थी ..पर पापा के लास्ट टाइम में मानने के कारन दिल्ली के लिये ट्रेन में RAC ही बमुश्किल कन्फर्म हो पाई थी | पापा ने बताया था की साइड की लोअर बर्थ पर दो लोग एक साथ यात्रा करते हैं उसे RAC कहते हैं सोचा रात का सफ़र है सोते हुए कैसे भी निकल जायेगा ...ऊपर से घर से अकेले घूमने जाने की ख़ुशी अलग से |

स्टेशन जल्दी पहुँच गए तो ऐसे ही उत्सुकतावश अपना नाम देखने के लिए चार्ट पर नजर डाली तो देखा अरे ये क्या ...मेरे नाम के नीचे एक और नाम लिखा है .... रिद्धिमा शर्मा F18 (S6- 39) ..यानी दिल्ली तक जो दूसरा व्यक्ति था मेरे साथ RAC में वो लड़की थी |

ट्रेन के आने का अनाउंस हो चला था ...सभी लोग अपने अपने कोच के सामने सामान लेकर खड़े थे हम भी S6 के सामने अपना ट्रोली बैग लेकर खड़े हो गए ... ट्रेन में चढ़कर थोडा सुकून मिला ... 9:15 हो चले थे ट्रेन धीमे धीमे अपना स्टेशन छोड़ रही थी.. और मेरे दिल में ख़ुशी छोड़कर मायूशी थी... वो लड़की कहीं भी दिखायी नहीं दे रही थी ...दिल जोरो से धक् धक् करे जा रहा था ... धीमे धीमे स्टेशन के उजाले से निकल कर ट्रेन अब रात की ख़ामोशी से होकर वातावरण में छाये अँधेरे में प्रवेश कर चुकी थी ..कोई मोबाइल कोई लैपटॉप ..कोई राजननिति पर टिपण्णी तो कोई सोने की तैयारी कर रहा था ... तभी एक हाथ में चिप्स ...पीठ पर अमेरिकन टूरिस्टर का बैग और दुसरे हाथ में ट्रोली बैग को खींचते हुए काली टी शर्ट नीली जीन्स और लाल चेक की शर्ट को कमर पर बांधे एक लड़की मेरे सामने खडी थी… एक्सयूज़मी दिस इस S6 39 नो. सीट |

मैने मन ही मनमुस्कराते हुए हाँ कर दिया। उसने अपना बैग वहां धम्म से पटक दिया और लंबी गहरी सांस लेकर …. ये शानू की बच्ची भी न जब देखो तब लास्ट टाइम पर प्लान बनाएगी अब होना पड़ा मुझे परेशान ….. आप कहाँ तक जाएंगे … (मैने मन ही मन काश चाँद तक जाना होता ) तभी फिर से ..ओह हेल्लो आप कहाँ तक जायेंगे ....मैं .. वो.. वो.. दिल्ली तक |

ओह माई गॉड मतलब पूरी रात ही खराब होनी है ओर फिर उठकर पूरे डिब्बे का निरीक्षण किया पर उसे ऐसा कोइ नहीं मिला जो उसको अपनी सीट देकर खुद RAC में मेरे साथ सोये...या RAC सीट पर लड़की हो .. तो वापस आके थककर एक फीकी मुस्कान के साथ मेरे ही साथ बैठ गयी। टीटी के आने के बाद एक बार फिर नाकाम कोशिश की शायद कोई सीट मिल जाये पर फिर से असफलता ही हाथ लगी।

ट्रैन अपने पूरे रफ्तार में थी और हम दोनों में से नींद किसी को नहीं तो किसी छोटी बात से लेकर शुरू हुई बातचीत अब नाम पते तक पहुंच गई थी । उसने बताया मेरा नाम रिद्धिमा शर्मा और वो लखनऊ की रहने वाली है यहाँ ग्रेजुएशन के साथ साथ एसएससी की कोचिंग के लिए इलाहाबाद में रुकी हुई है । अपने सारे कॉलेज फ्रेंड्स के साथ अमृतसर वाघा बॉर्डर ओर लेह लद्दाख घूमने का अर्जेंट प्लान बनाया है तो यहीं दिल्ली से मुझे भी फ्लाइट लेनी है.. से लेकर पढाई तक की ढेर सारी बातों के बीच कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला सुबह होने को थी आसपास चहल पहल बढ़ गयी थी नींद खुली तो देखा मैडम मेरे सीने पर पैर रख के आराम से सो रही हैं । अब तक शिवाजी ब्रिज निकल चुका था मैंने उसको ऊठाकर बताया दिल्ली आने वाली है उसने भी हड़बड़ी में उठकर सारा सामान उठा के मुह धुल के तैयार होने लगी ..(इन लड़कियों का मेकअप न छूट जाये चाहे दिन हो या रात) स्टेशन आने पर हम दोनों उतर गए ||

अब आगे का क्या प्लान है मिस्टर उसने पूछा मैन कहा कुछ नही अब टैक्सी लेकर एयरपोर्ट जाना है वहां मेरे फ्रेंड्स भी पहुंच रहे होंगे 7:20 कि फ्लाइट है उसने कहा चलना तो हमे भी है चलो जब इतना एडजस्ट किया तो थोड़ा और सही और इसी के साथ हम लोग एक ही टैक्सी से एयरपोर्ट पहुंच गए चूंकि मेरी फ्लाइट पहले थी और हमें बोर्डिंग पास बगैरह बनवाना था तो हमने उसको बाय कहके अंदर एंट्री ले ली और वो अपने फ्रेंड्स के आने का इंतज़ार करने लगी।

जब ये सारी रात की कहानी दोस्तों को सुनाई तो मेरा मज़ाक उड़ाने लगे ऐसा भी कहीं होता है कि लड़की इतनी देर साथ रहे ओर तेरे जैसा चम्पू सिर्फ नाम जानकर ही वापस लौट आये न नंबर लिया नए ऍफ़बी एड्रेस और ना ही इलाहाबाद में किस पी०जी० में है ये पूछा । दुःख तो बहुत हुआ उनकी बातें सुनकर की कितनी बड़ी गलती कर दी पर धीरे धीरे ये बात आई गई सी हो गयी शिमला के उन 7 दिनों में हमने पूरी जिंदगी जी ली खूब घूमा खूब मस्ती की और लौट के घर आ गए।

इसके कुछ दिनों बाद स्कूल के दोस्तो के साथ हमने मूवी देखने का प्लान बनाया तभी दूसरी बार इत्तेफ़ाक़ से पीवीआर सिनेमा में मेरे से आगे वाली सीट पर हाथों में पॉपकॉर्न लेकर बैठी फिर से वो दिख गयी …वाह री मेरी किस्मत... मैंने पीछे से उसका नाम लेकर अपना हाथ वेव किया वो भी शॉक्ड हो गयी... अरे तुम ... मूवी के बाद हम लोग एक बार फिर से मिले पर इस बार मैंने पुरानी गलती नहीं दोहराई अब की बार उसका फ़ोन नो ओर पी० जी० का एड्रेस दोनों पूछ लिए ...थोड़ी बहुत दिक्कत के बाद उसने आराम दोनों बता दिए |

मेरी आगे की ग्रेजुएशन की पढाई यहीं घर रह के पूरी हुई तो हर रोज़ उससे मुलाक़ात हो जाया करती थी …धीरे धीरे उसके साथ घूमने फिरने से शुरू हुआ सिलसिला कब रात रात भर जाग के फ़ोन की बातो....... और... बातें कब एक दुसरे की जरुरत बन गयीं हमें पता ही नहीं चला ... मुझे उसका तो पता नहीं पर मुझे उससे प्यार हो गया था शायद ... पर हिम्मत नहीं कर पाया कभी इज़हार करने की | हम हफ्ते भर में शायद हीओ कोई दिन ऐसा हो जब मिलते न हो कभी शोपिंग के के लिए तो कभी मूवी के लिए |

उसके सारे फ्रेंड्स से लेकर वार्डन तक सब मुझे जान गए थे | सब कुछ अच्छा चल रहा हमारे बीच की तभी एक दिन एक दिन उसकी मेहनत रंग लायी उसका स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में पी ओ के पद पर सिलेक्शन हो गया उसे इलाहबाद छोड़ कर अब हमेशा के लिए जाना था | इतना आसान नहीं था जिसके साथ बीते कुछ एक साल के हर एक लम्हे गुजारे हों हर अच्छे और बुरे पल को साथ में बिताया हो उस इंसान को अपने से अलग कर देना ....पर इतनी हिम्मत भी नहीं थी की उसका हाथ मांग लूँ .... उसको बता दूं की मैं उससे प्यार करने लगा हूँ ..... डरता था कहिं उसने मना कर दिया तो ? और अभी हम भी तो कहीं सेट नहीं हुए थे आखिर भला कोई स्टूडेंट से कौन शादी करेगा या कौन बाप अपनी लड़की का हाथ किसी बेरोजगार के हाथ में देगा |

तो भविष्य को भाग्य पर छोड़ कर हम अपने करियर पर ध्यान देने लगे थे | पर उसके बिना एक पल भी लगना बड़ा मुश्किल था .. धीरे धीरे 3 साल गुज़र गए इधर मैंने भी गवर्नमेंट जॉब कर क्वालीफाई करके जॉब करने लगा था .... मम्मी की खराब रहती सेहत... और जॉब लग जाने के बाद घरवालों का शादी के लिए दवाब दिन व दिन बढ़ रहा था ..... पापा ने एक दिन शाम को एक लिफाफा पकडाते हुए जिसमे उस लड़की की तस्वीर थी ... लड़की देखने जाने का अपना तुगलकी फरमान सुना दिया ... मैंने मम्मी से रिद्धिमा के बारे में हिम्मत करके बताया तो उन्होंने पापा के खिलाफ जाने से मना कर दिया बोली की अब लेट हो चूका है पापा तुम्हारे रिश्ते की बात कर चुके हैं ..मैंने रिद्धिमा से बात करनी चाही पर उससे बात नहीं हो सकी ...मैंने गुस्से में बिना देखे ही वो लिफाफा वहीँ टेबल पर पटक दिया |

मैंने इन बीते सालों में ऐसा नहीं था की रिद्धिमा से बात न की हो ... हफ्ते भर में तो महीने भर में बाते हो जाया करती थी और 2 बार तो कानपूर जहाँ उसकी पोस्टिंग थी मिल भी चूका था ... सारे प्रयत्न करके एहसास जरुर करा दिया था की मैं उससे प्यार करता हूँ पर कह आजतक नहीं पाया था .. उसी का ये नतीजा था की ये दिन देखना पड़ा .....

पापा के खिलाफ जाना मेरे लिए भी बहुत मुश्किल था तो बस सिर्फ लड़की देखने के लिए अगली सुबह न चाहते हुए भी तैयार होकर लखनऊ के लिए निकल लिए ...... वहां पहुँच कर वड़ा सादर सत्कार मिला ....देखते ही देखते नाश्ते की ट्रे से पूरा कमरा भर गया ..पर मेरा मन तो कहीं और टिका था ..सब कोई लड़की की तारीफ करते नहीं थक रहे थे ... चरों और चहल पसरी हुई थी घर में बहुत सारे रिश्तेदार भी दिख रहे थे .. मन तो पसीजा जा रहा था ..इनकी तैयारी देख कर तो लग रहा था की ये आज हिन् कहीं शादी न करा दे |

फिर किसी ने लड़की के आने की सूचना दी ... अपनी धडकनों को काबू में रखकर मैं बनावती मुस्कान लिए सीडियों की और निहारने लगा ... की तभी हाथ में चाय की ट्रे लिए लाल साड़ी में मेहँदी लगाये बालों का जूडा बनाकर सारे श्रृंगार किये हुए ..नज़रे नीची करके चलते हुए जैसे ही लड़की दिखाई दी मेरे तो होश उड़ गए ...ये क्या ये तो रिद्धिमा थी ... मैंने खुद को सम्हाल कर एक बार फिर से आँखे बंद करके खोली ... हाँ ये तो सचमुच रिद्धिमा ही थी |

अब जाके गौर दिया अरे ये तो रिद्धिमा का घर था ...... दीवालों उसकी बनाई पेंटिंग्स में उसका नाम ... उसकी उसके परिवार के साथ फोटो ...कॉलेज के इनों की एनुअल फंक्शन में जीती गयी ट्राफी ....अब जाके सब नोटिस कर पाया था |

मेरे साथ ये मेरी जिंदगी का उससे यूँ अचानक से मिलना तीसरा और मेरी जिंदगी सबसे हसीन लम्हों वाला इत्तेफाक था ... पर उसके लिए ये मेरे प्रति गज़ब का इश्क था .....क्यूंकि शादी के बाद में पता चला ये सब रिद्धिमा का ही प्लान था उसने ही अपने पापा से न जाने कितनी मन्नते करके मेरे कभी न जता पाने वाले प्यार के लिए अपनी ख़ुशी का वास्ता देकर ..अपने पापा को मेरे यहाँ रिश्ता ले कर भेजा था ......

और इसी के साथ ये हम दोनों के लिए ये हमारा इत्तेफाक ए इश्क था ||


hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.