हवेली वाली अम्माँ भाग -1



माँ आज भी उसने मुझ पर हाथ उठाया ,मैं थक गई हूँ अब नहीं सह सकती ,मेरी हर छोटी बड़ी गल्ती पर ये पूरे परिवार के सामने बेज्जती करने लगते हैं मैं भी इंसान हूँ । मेरी कोई हैसियत ही नहीं है वो रो पड़ी बोलते- बोलते !

रो मत बेटा तू घर चली आ बहुत देखे हैं ऐसे ,तू पढ़ी लिखी है किसी की भी चिंता करने की जरूरत नही है दो चार दिन में ही इन लोगों की अक्ल ठिकाने लग जायेगी देखना फिर औऱ अगर न भी लगी तो तलाक का रास्ता तो खुला है ना बहुत सह लिया तूने अब नहीं । माँ उसे दिलासा दे रही थीं वो हिचिकिया लेकर रोती रही और फिर अपना सामान समेटने लगी ।

नीरज उसे समान पैक करते हुए देख कर बोला, कहाँ की तैयारी है ?

आप से मतलब ,आप ने मुझे कभी बताया कि आप कब औऱ कहाँ जाते हैं ?अपनी फैमली के सामने मुझे बेज्जत करते समय सोचते हो कि मैं तुम्हारी वीबी हूँ कोई नौकरानी नहीं ,बस करो नीरज बहुत हो चुका अब मैं एक पल के लिए यहाँ नहीं रहूंगी ।

वो हमारा परिवार है नीरा औऱ तुम्हे तुम्हारी ग़लतियो के लिये डांट रहा था तुम ने बाबूजी से बहस न की होती तो मुझे गुस्सा नहीं आता तुम मुझे उकसा रही थीं ।

वो बहुत देर तक उसे मनाने की कोशिश में लगा रहा पर निधि तो जैसे कसम खा कर बैठी थी ,कब ऑटो किया कब बाहर निकली कब ट्रैन में बैठी उसे कुछ होश नहीं बस इतना याद है कि नीरज बहुत देर तक उसे खड़ा देखता रहा जाते हुए ,गुस्से ने उसके सोचने समझने की शक्ति जैसे छीन सी ली थी।मां के कहे शव्द उसके कानों में गूंज रहे थे" तू चली आ बहुत सह चुकी "

नीरज से उसकी शादी हुए 2 साल हो चुके थे , नीरज अपने माता -पिता का एकमात्र बेटा था एक ही बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी ,नीरा  अपने घर में तीन भाईयो की इकलौती बहन थी और बेहद लाडली भी ,शुरू -शुरु में ससुराल में सब ने उसे हाथों हाथ लिया पर वो तो केवल नीरज को ही अपना मानती बाकी लोगों से उसे कोई मतलब ही नहीं था ,नीरज उसे जितना समझाता वो उतना ही उल्टा करती और दो की चार लगा कर अपनी माँ को फोन पर बताती वो भी उसे ।मुँह तोड़ ज़बाब देने की सलाह देती जिसका असर ये हुआ कि नीरा  अपने को कभी जोड़ ही नहीं पाई ।उसे सब दुश्मन से लगते । धीरे -धीरे सास ससुर ने तो जैसे चुप्पी साध ली वो कोशिश करते कि नीरा  से कम से कम बात करे ।

आज भी वो कहीं जा रही थी तो बाबूजी ने अकेले जाने से मना किया ,बेटा तुम उस इलाके से परिचित नहीं हो एक बार नीरज आजाये फिर चली जाना बस फिर क्या था उसके मुंह मे जो आया बोलती गयी ,आप मुझे जाने से मना कर रहे हैं आपको क्या लगता है कि मैं कुछ गलत काम करने जा रही हूँ कोई दूध पीती बच्ची हूँ कि अब हर जगह मैं नीरज का हाथ पकड़ कर चलूंगी ,आप मेरे व्यकितगत जीवन में मत घुसिए ।

नीरज से भी उसने दो की चार लगाई पर वो उसकी रोज की हरकतों से बाकिफ था तो उसने उसे बाबूजी से तमीज से पेश आने को बोला ये बात उसे नागवार गुजरी वो भड़क उठी इस पर नीरज का हाथ उठ गया ,उसे लाख समझाने पर भी वो नही मानी और घर छोड़ दिया ।

माँ पापा का प्यार और भाई भाभियो की मनुहार ने उसे बहुत जिद्दी बना दिया था ,अब वो खुश थी कि अपनी ससुराल से पीछा छूटा ,ट्रैन तेज़ी से दौड़ी जा रही थी और उसके और नीरज के बीच की दूरियों को बड़ा रही थी दो तीन बार नीरज की कॉल को उसने रिजेक्ट कर दिया पर माँ उन्होंने उसे कॉल क्यों नहीं कि जबकि वो जानती हैं कि वो आरही है । गुस्सा शांत होने पर उसे अब उसकी(नीरज )  याद भी आने लगी थी पर वो नही जाएगी वापस !

देखते देखते वो अपने मायके की जमीन पर थी जहां उसे लेने कोई नहीं आया था ,जो उसके लिए बहुत आश्चर्य की बात थी ,स्टेशन से घर तक जाने के लिए उसने ऑटो लिया ,बीच में बड़ी हवेली के पास से गुजरते समय उसे बड़ीअम्माँ की याद आगयी ,आज शायद कुछ है हवेली में बड़ी रौनक़ दिख रही है घर जा कर माँ से पूछेगी ।

ये बड़ी अम्माँ कौन हैं और इस हवेली से उनका क्या रिश्ता है ,नीरा को उनकी याद क्यों आयी ?क्या नीरा को उसकी गलतियों का अहसास हुआ ये जानने के लिए पढ़िये इस कहानी का दूसरा भाग ।

कॉपीराइट सुप्रिया सिंह ।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.