धुंध/ कहानी

गहरे नीले बार्डर वाली आसमानी रंग की सिल्क की साड़ी को सहलाते हुए मन भी आजपूरा नीले आसमान की तरह खिला सा था।आज बहुत साल बाद पहनूँगी फिर इस साड़ी को।अपने मन ही मन कहते हुए वक़्त के पुराने दराज़ में चली गई थी माया...

"एयर होस्टेज गले का ब्लाउज और इस साड़ी में कयामत की खूबसूरत लग रही हो तुम और सुनों ये छोटी काली बिंदी नहीं तुम लाल बड़ी सी बिंदी ही लगाया करो जैसे कभीकभी लगाती हो। जानती हो तुम्हारी लाल बिंदी में कोई जादू सा है डूब जाता हूँ तुम्हीं में ।"साकेत की बातें याद करते हुए इतनी खो सी गई थी कि फोन की घंटी सुनाई ही नहीं दी उठाते उठाते कट ही गया।चलते फिरते अक्सर लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को उठा कर कान में लगाने की आदत सीपड़ गई थी।बार बार चेक करती थी फोन बंद तो नहीं हो गया।
फोन की तरफ एक आस भरी नज़र से देखकर आँखें गीली होना कोई नई बात नहीं रह गई थी।नम आँखों से उम्मीदें धूँधली सी नज़र आती थी।पिछले कितने ही सालो से ये सिलसिला चला रहा था एक इनकमिंग कॉल के इंतजार में।
उसे यक़ीन था की एक उम्मीद भरा कॉल आएगा जरुर ......
लेकिन आज माया को कॉल के छूट जाने का कोई फर्क़ नहीं पड़ा था।
क्या बनेगा आज ? 'तुमने कहा था आज घर में कोई आ रहा है, तभी धोती माँ ने पूछा।धोती माँ तब से घर में काम करती है जब मैं तीन महीने की थी। वो अपनी साड़ी को धोती कहती थी तभी से उनको मैं धोती माँ कहकर ही बुलाने लगी थी ।
तुम रहने दो आज खाना मैं खुद बनाऊँगी तुम मेरे साथ ही रहना तैयारी में मदद करदेना बस । क्यों? आज ऐसा कौन खास आ रहा है कि तुम खाना अपने हाथ से बनाओगी।तुम तो साल में एक ही बार खाना बनाती हो माँ की बरसी में गरीबों को खिलाने केलिए। कौन आ रहा है ? क्या मैं पहचानती हूँ? हाँ तुम जानती भी हो और पहचानती भी हो कहते हुए मेरी आँखों की चमक धोती माँ की आँखों से छुप नहीं सकी थी।
माँ के जाने के बाद धोती माँ ही सब कुछ थी मेरे लिएअपनी संतान से भी ज्यादा प्यार करती थी मुझे। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी बहुत छोटी थी तभी विधवा हो गई थीं । उनके पिताजी ने ही उन्हें हमारे यहाँ काम पर रखा था । रहते रहते घर की एक अहम सदस्य सी हो गई थी। कुछ सालो बाद उनके पिताजी का देहांत हो गया फिर माँ ने उन्हें हमेशा के लिए घर पर ही रख लिया। माँ को भी बहुत सहारा हो गया था धोती माँ के आने से। कुछ समय पहले लकवा लगनेसे माँ के शरिर के दायें हिस्से में थोड़ी कमजोरी सी आ गई थी।चलने फिरने में भी तकलीफ होती थी। पिताजी के जाने के बाद माँ और धोती माँ एकदूसरे का बहुत बड़ा सहारा से हो गए थे । पिताजी की पेंशन और साथ में माँ केसंगीत स्कूल से ही मेरी पढ़ाई और घर का खर्च चलता था।
माँ के संगीत से गहरे लगाव और उनके संगीत स्कूल के कारण ही घर में भी हमेशा एक संगीतमय वातावरण सा रहता था। सुबह शाम माँ की सुरीली आवाज और साथ में उनके शिष्यों की सरगम से मन खुश हो जाता था।
माँ का सबसे प्रिय शिष्य था केतन।केतन से माँ को बहुत लगाव हो गया था और वो भी बहुत ख्याल रखता था माँ का हमेशा ही।उसके माँ बाप नहीं थे वो अपने एक चाचा के पास रहकर बड़ा हो रहा था । बहुत ही होनहार और नेक दिल का केतन संगीत को ही अपना जीवन समर्पित कर देना चाहता था।
'क्या सोच रही हो माया, धोती माँ ने पुछा। जैसे किसी ने उसे नींद से उठाया हो ऐसे अचकचाते हुए माया ने कहा, न कुछ भी तोनहीं । और ऐसा कहते हुए माया ने अपने कमरे की खिड़की पूरी खोल दी। जिससे दूर तक कापहाड़ों वाला खूबसूरत नजारा और एक छोटी झील नजर आती थी ।पूरे घर में ये खिड़की वाली जगह से माया को अत्यधिक लगाव था।
तुम मेरे लिए एक कप चाय बना दो मैं थोड़ी देर में नीचे आती हूँ।हुँ! कहते हुए धोती माँ अपनी दोनो हथेली को हवा में कुछ सवालों की तरह घुमाती हुई नीचे रसोई की तरफ चली गई।ऊपर दो कमरे बरामदा और नीचे तीन कमरे ,एक बैठक और रसोई थी । हरी वादियों औरपहाड़ों के खूबसूरत नजारों से घिरे इस पूरे बड़े से घर में माया और धोती माँके अलावा यादों की एक दुनियाँ बसी थी जिसमें माया खुद भी पूरी तरह बस गई थी। खुली हुई खिड़की से आती हवा से गहरी साँस लेते हुए, उसने अपने दोनों हाथों को खिड़की के दोनों तरफ फैलाकर अपनी आँखें बंद कर लीं।दूर पहाड़ों के बाँहों को छूकर आने वाली नर्म ठंडी हवा जैसे उसके रोम रोम में संगीत भर रही थी। धीरे धीरे मचल ए दिल बेकऱार कोई आता है .....गाने की हल्की सी आवाज पहाड़ों के पास की नीचे वाली बस्ती से आ रही थी।
माया फिर पुरानी यादों में खो गई..साकेत देखो ऐसा मत करो ओ, साकेत खोलो न मुझे दर्द हो रहा है... आहह साकेत...खोलो न, साकेत मैं बोल रही हूँ न, सर में लग रहा है। तुम हो कि हँस रहे हो। पहले बोलो मेरी बात मानोगी साकेत नें ठहाका मारते हुए कहा। हाँ बाबा मानूँगी, मानूँगी, मानूँगी अब तो खोलो, सोच लो नहीं मानोगी तो फिर तुम्हारी ये लंबी लंबी चोटियां बंधी रहेंगी इसी रेलिंग से चलो इस बार खोल देता हूँ। छत पर बनी रेलिंग से पीठ टिका के बैठकर साकेत और माया ज़िन्दगी के कई सपने बुना करते थे .. और शरारती सकेत को माया की लम्बी चोटियों से खेलते खेलते उसके पूरे लम्बे घने बालों को खोल देने में बहुत मजा आता था ।
रेलिंग से बंधी दोनों चोटी खोलकर पूरे बालों को खोलते ही साकेत ने माया कोअपनी बाहों में भर लियादेखो मैं न हमेशा तुम्हें खुले बालों में देखना चाहता हूँ और जब तुम साड़ी मेंतैयार होती हो तब तुम बस जूड़ा बनाया करो और जब मेरे साथ रहो तो अपने इन घनेलम्बे बालों को आवारा बादलों की तरह खोल दिया करो । तुम सिर्फ मेरी माया हो औरमैं तुम्हारी माया में पड़ा एक फ़कीर।धत्त! फ़कीर नहीं, तुम बस मेरे साकेत ही रहो मुझे किसी फ़कीर वकीर से प्रेम नहींकरना समझे और सुन..... उंउं... माया कुछ और कह पाती इससे पहले ही साकेत नेउसके होंठो पर अपने होंठो से विराम लगा दिया।

ज़िन्दगी के कितने अरसे पीले पन्ने हो गए थे आज उन पन्नों को खोलते हुए डर लगरहा था कि वो अपने तह की गयी हर लकीर से टूट न जाये।किसी किताब में दबे पुराने फूल की पंखुड़ियों की तरह बिखर न जाए ....।
बीते दिनों की बातों के मेघ आज बार बार घिर आ रहे थे माया के मन में .....'उस दिन माँ केतन का बहुत इंतजार कर रही थी माया, जाकर देख दरवाजे पर केतन आया कि नहींआज पूरा एक सप्ताह हो गया था । केतन घर नहीं आया था। माँ बार बार केतन को याद कर रही थी। बाहर से बादलों के जोर जोर से गरजने की आवाजें आ रही थीं। चार ही बजे थे अभीजबकि मगर लग रहा था की बहुत शाम हो गई।बाहर से आती हुई तेज हवा से कंपकपी सी हो रही थी ।मौसम कुछ ज्यादा ही ठंडा होगया था। दीवार पर लगा केलेण्डर हवा के कारण जमीन पर आ गिरा । मैं केलेण्डर नीचे से उठाकर जैसे ही पलटी तो चौंक गई ! सामने केतन खड़ा था ।केतन तुम ? माँ तुम्हें ... केतन ने बीच में ही टोकते हुए पूछा रमा काकी कैसी हैं?
परन्तु मैं कुछ जवाब दे पाती तभी केतन माँ के कमरे की तरफ बढ़ गया।
केतन माँ के पलंग के पास वाली कुर्सी पर ही बैठ गया। वो माँ को एकटक देख रहाथा ।तभी माँ बोली, केतन आ गया ।केतन ने आगे बढ़कर माँ का हाथ पकड़ते हुए कहा हाँ , रमा काकी मैं आ गया।
कहाँ रह गए थे एक सप्ताह ?माया से तो बचपन से तुम्हारा झगड़ा होता आया है लेकिन इससे पहले तो तुम इतनेनाराज नहीं हुए ।
नहीं रमा काकी , ऐसी कोई बात नहीं है ऐसा कभी मत सोचना फिर कभी ।संगीत के एक कार्यक्रम में बच्चों के साथ शहर से बाहर गया था आज ही लौटा हूँ। घर पर सामान रखकर सीधा तुमसे मिलने आ गया।अब कैसी हो तुम?
अब ठीक हो गई हूँ तुम जो आ गए हो ।
माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा । बस बेटा जब तक हूँ तुम सबको अपनी आँखों के सामने ही देखना चाहती हूँ । न जानेकब आँख बंद हो जाये।
रमा काकी ऐसा कुछ नहीं होगा .. 'तुम सदैव हमारे साथ रहोगी ।'
कहते हुए केतन की आँखें भीग गयी थी।
मैं कुछ चाय नाश्ता लेने के लिए रसोई की तरफ जाने लगी, तभी मेरी नज़र दरवाजेके पास रखे टेबल पर गई वहाँ कागज में लिपटा हुआ कुछ रखा था। मैनें बढ़कर उसे खोला तो बेली फूल की खुशबू से घर भर गया।
इतने सालो में ऐसा पहली बार हुआ था कि केतन ने अपने हाथों से बेणी नहीं दी।मैंने उसे वहीं रख दिया और रसोई में चली गई।
माँ के सोने के बाद केतन लौट गया। जाते जाते कह गया ।माया कल आऊँगा रमा काकी से कह देना ।केतन कुछ दिनों से गुमसुम सा था पता नहीं क्यों। पूछने पर टाल देता था।
केतन एक दिन भी नहीं भूलता। कितना भी काम हो लेकिन वो माँ से रोज मिलने आताथा।माँ साकेत के बारे में कई बार पूछती केतन से , परन्तु केतन को भी नहीं पता थाकी साकेत है कहाँ है।
उस दिन माँ केतन से बोली कि तुम और साकेत अपना वचन निभाओगे न ।कौन सा वचन माँ मैंने कमरे में दाखिल होते होते पूछाकुछ नहीं तेरे काम की बात नहीं है अभी ।
ठीक है न बताओ मैं भी नहीं पूछती जाओ हूँऊ..कहकर मैं अपने कमरे में चली गयी।
इधर साकेत की भी कुछ खबर नहीं थी। जाने से पहले कहकर गये थे अपना ख़याल रखना।ऐसा क्यों कहा साकेत ने जाने से पहले..ये सवाल नासूर बनता जा रहा था।
माँ सो चुकी थी इधर धोती माँ भी रसोई बंद करके माँ के कमरे में सोने चली गयी । जबसे माँ की तबियत अधिक ख़राब रहने लगी धोती माँ ने अपना बिस्तर माँ के कमरे में ही लगा लिया .. ताकि माँ के पास ही रह सके ..'।
रात काफी हो चुकी थी ठण्ड भी बढ़ गई थी। चारो तरफ सन्नाटा पसरा था और एक सन्नाटा मेरे अंदर भी ठहरा था।गहरे अँधेरे में खुद को ही ढूंढ रही थी कहीं।ज़िन्दगी के सारे ख़्वाब हर रोज डायरी में कैद हो रहे थे।जैसे उन्हें भी मेरी तरह खुद की तलाश थी कहीं।
कई महीने बीत गये थे साकेत को गए हुएकोई खत न कोई टेलीफोन ..अब इंतजार हर शाम को और भी उदास करती हुई, रोज की जैसे एक आदत बनती जा रही थी।

प्रिय साकेत,

जानते हो आज मैने अपने बालों में रीठा लगाया है ।तुम्हें तो रीठे की खुशबूबहुत पसंद है न .. छत की खुली हवा में जाकर बालों को सुखाया भी है । तुम देखना छूकर , कितने नर्म रेशमी से हो गए हैं। हाथों से ढाई पेंच घुमाकर बाँधा हुआ जूड़ा भी बार बार फिसलकर खुल जाता है।
जानती हूँ तुम कहोगे ओ मेरी माया मुझे अपने रेशमी बालों के घने मेघों में छुपाकर प्यार की बरसात कर दो न ।सुनो न माया देखो मेरा कंठ सूख गया है। अपने प्रेम के भीगे स्पर्श इसे तर करदो।
तुम्हारे अंदर बहुत ताप है मुझे तुममें पिघल जाने दो इसमें माया ।
उफ्फ!! 'साकेत, तुम तो ठहरते ही नहीं ,जाने कहाँ तक बहाकर ले जाना चाहते होमुझे ।
हाँ मैं बहना चाहती हूँ जहाँ तक मेरी साँसों की ढलान है तुमसे मिलकर बह जाना चाहती हूँ। साकेत बस तुम लौट आओ । अब तो खुद की साँसे भी शोर करती लगने लगी है।ये शोर कहीं मुझे पागल न कर दे। फिर मत कहना कि मैं तो तुम्हें प्यार से पगली कहता था और तुम सच में पागल होगई।
नहीं, साकेत नहीं मैं पागल नहीं होना चाहती बस तुम लौट आओ।

तुम्हारी माया ..

चिठियों की गिनती बढती जा रही थी मगर कोई ठिकाना नहीं था जहाँ इन्हें पोस्ट करती ।
साकेत की शरारत मसखरी दिन ब दिन मुझे उसके और भी करीब कर रही थी। अब तो उसके बिना जीवन जीना स्वप्न में भी सम्भव नहीं था । वो हमेंशा कहता माया तुम्हारीझरने सी खिलती हँसी मेरे साँसो की लय है इसे कभी टूटने न देना ..।साकेत इस लय को कैसे बांधे रखूँ तुम्हारे बगैर, बोलो साकेत ..।
मगर सन्नाटा था की टूटता ही नहीं था ।इन्हीं सन्नाटों में कई रात और कई दिन अपने हर मौसम के साथ साल दर साल बनतेचले गए ..। केतन हर माह के आखिरी शनिवार को घर आता था ।
माँ के जाने के कुछ समय बाद ही केतन का तबादला दूसरे शहर हो गया था । बहुत दूर तो नहीं परन्तु एक दोपहर और आधी शाम का वक़्त लग जाता था आने में । उसने माँ को दिया वचन कभी नहीं तोड़ा हमारी खैर खबर बराबर लेता था ।उसके घर आने से लगता था जैसे माँ भी घर आई है।ये आभास केतन से माँ के अत्यधिक जुड़ाव के कारण ही होता था।
'अरे अपना नाम तो बताते जाओ सुबह सुबह धोती माँ दरवाजे पर खड़ी किसी से कह रही थी '
कौन है ? किससे पूछ रही हो नाम ? मैंने धोती माँ से पूछा।
अरे वो आदमी ये लिफाफा दे गया बोला रेस्ट हाउस से बड़े साब ने भेजा है पर कौन बड़े साब ये भी नहीं बताया और न ही अपना नाम ।
लाओ मुझे दो, कहते हुए मैंने लिफाफा धोती माँ के हाथ से ले लिया।लिफाफे के ऊपर अपना नाम देखकर देखती ही रह गयी ये तो साकेत की लिखावट है ।लेकिन साकेत बड़े साब! कुछ समझ नहीं आ रहा था।जाने फिर भी क्यों एकदम से मेरे हाथ पाँव काँपने लगे थे।
मैंने जल्दी ही काँपते हुए हाथों से लिफाफा खोला और अब जो कागज मेरे हाथ में था उसमें सबसेऊपर अपना नाम देखकर मैंने सीधे आखिर में देखा नीचे लिखा था ।'साकेत ये पढ़ते ही मेरी आँखों के सामने सब कुछ धुंधला हो गया आँखें आँसूओं से भर गयी थी मैंने आँखे पोंछते हुए उसे पढना शुरू किया , कैसी हो? मैं घर आ रहा हूँ कल । कुछ काम जो अधुरे छूट गए थे उन्हें पूरा करने।
ये कल पूरे पंद्रह साल बाद आ रहा था ।मुझे यूँ लगा जैसे मै अपने वश में नहींहूँ .. आँसू थे की थम ही नहीं रहे थे ।
साकेत इतने साल कहाँ थे तुम ? क्या तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आया एक बार भी ।किस तरह जी रही होगी तुम्हारी माया।
मैं उस बेजान कागज से सवाल पर सवाल करती जा रही थी।
माँ , देखो माँ साकेत लौट आया मैं माँ की तस्वीर के पास दौड़ती हुई गयी।
और बोलते बोलते फूट फूट कर रो पड़ी।कुछ देर बाद खुद को सँभालते हुए मैंने अपने आँसू पोछे और वापस ख़त को पढने लगी।
"मैं कल सुबह घर आ रहा हूँ" ख़त की यही एक लाईन मेरी आँखों में मेरे दिमाग में रुक गई थी। मुझे खुद याद नहीं कि मैं उस लाईन को कितनी ही बार पढ चुकी थी।
बस इतना ही मेरे लिए उन सारे ख़तों के जवाब से लग रहे थे जिन्हें पिछले कई सालों से मैं लिख रही थी।

चाय बन गयी माया ठंडी हो जाएगी जल्दी नीचे आ जाओ।
ये लो आ गयी मैं धोती माँ ।
कहते हुए मैंने घडी की तरफ देखा ओह ! कितना समय हो गया कितनी तैयारी करनी।
धोती माँ ने अपने आँखों में आए आँसुओं को छुपाते हुए कहा, मैंने रसोई में सारी तैयारी कर दी है अब तुम अपना खाना बनाना शुरू कर सकती हो ।
मुझे आज आश्रम भी जाना है कहो तो मैं आज नहीं जाती हूँ।
तुम चली जाओ अब मैं सब कर लूँगी मैंने धोती माँ से कहा।
ठीक है तब मैं निकलती हूँ, कहकर धोती माँ चली गयी ।वो सप्ताह में एक बार आश्रम जाती थी वहां के राम कृष्ण कीर्तन में ।
आज की ठण्ड बहुत साल की पहचानी सी ठण्ड लग रही थी बाहर शीत लहर चल रही थी ।
दोपहर की खिली धूप को भी ठण्ड सहला रही थी ।
तभी अचानक दरवाजे पर कोई दस्तक हुई और उसे सुनते ही मेरी धड़कनों की गति अचानक तेज हो गई। मैं दरवाजे की तरफ बढ़ी, मगर मैं दरवाजा खोलती उससे पहले ही एक परछाई कमरे में दाखिल हुई। दरवाजे से आती हुई धूप को ढांकते हुए। मैं अपनी जगहपर ठिठक गयी। मेरे सामने कुरता पजामा पहने और कंधे पर शाल लिए साकेत खड़े थे।बालों में से कहीं कहीं सफेदी झाँक रही थी।
उसे देख मैं अपरिचित सी जड़वत हो गयी। बैठने को नहीं कहोगी माया। साकेत की आवाज मेरे अंदर उतर आयी। हाँ, अंदर आओ कहते हुए मैंने उन्हें सोफे पर बैठने को कहा।
कैसी हो ?साकेत ने बड़ी विनम्रता से पूछा ।

मेरे सारे ख़त मेरे सवाल जाने कहाँ छुप गए थे ।मैं चाहकर भी कुछ पूछ नहीं पा रही थी ।मन अन्दर से चित्कार कर रहा था साकेत कहाँ चले गए थे तुम ?क्या तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आया कभी ।मैं जिंदा हूँ या मर गयी कभी तुमने जानने की कोशिश की क्या ? बोलो साकेत बोलो मेरे किस गुनाह की सजा दी तुमने मुझे?
क्या हुआ तुम चुप हो साकेत की आवाज़ ने झंझोड़ा मुझे
मैं, हाँ मैं ठीक हूँ ।और तुम ? साकेत ने जवाब दिए बिना बोले ।काकी माँ के मित्र राय चौधरी काका के बेटे से भेंट हुई थी उसी ने बताया की काकी माँ ...कहते हुए साकेत चुप हो गए।
हाँ तुम्हारे जाने के कुछ छह साल बाद ही माँ हमें छोड़कर चली गयी।
साकेत माँ की तस्वीर की तरफ इतने तन्मय से देख रहे थे जैसे उनसे कुछ बात कर रहे हैं।

हाँथ मुँह धो लो । खाना लगा देती हूँ।
ये मुझे क्या हो गया, मैं साकेत पर अपने अधिकार से सवाल क्यों नहीं कर पा रही ।मैं पहले कि तरह सहज क्यों नहीं हो पा रही थी।कल ख़त मिलते ही मैंने ख़त से ही कितने सवाल किए थे । साकेत को देखकर मैं मौन कैसे हो गयी।क्या समय का फासला चाहत की प्यास को स्पर्श हीन कर देता है।
घर बिलकुल नहीं बदला सब कुछ वैसा ही जैसा सालों पहले था । टावेल से मुँह पोछते हुए साकेत ने कहा ।

हाँ साकेत कुछ नहीं बदला मगर तुम्हें सिर्फ घर नज़र आ रहा है मैं नहीं।मैं भी तो नहीं बदली आज भी वही हूँ तुम्हारी ही माया । परन्तु तुम्हारी आँखों में मुझे अपने लिए कोई आस क्यों नज़र नहीं आ रही है साकेत ? मैं अपने मन ही मन में साकेत से बातें किए जा रही थी। लगा दहाड़े मरकर रो दूँ ।

क्या बनाया है खाने में ? तभी उसने पूछा। वही सब जो तुम्हें पसंद है। कहते हुए मैंने खाना टेबल पर लगाया ।
साकेत ने पत्र में ही लिख दिया था कि दोपहर का भोजन तुम्हारे साथ करूँगा।

तुम्हारे हाथ में काकी माँ के हाथ के खाने का स्वाद आ गया है।खाना खत्म करके हुए साकेत ने कहा।
मैं टूट्ती जा रही थी। समय तेजी से बीत रहा था। शाम होने को थी ।
मेरी शाम को ही ट्रेन है एक दिन के लिए ही आया था साकेत ने कहा ।'एक दिन के लिए , यह सुनते ही मुझे लगा जैसे एक झटके में उसने मेरी साँसों की नसों को काट दिया।
तुम चले जाओगे ? किसी तरह खुद को समेटते हुए मैंने पूछा।
चला तो मैं बहुत साल पहले ही गया था माया।आज आकर यहाँ से लौट रहा हूँ ।
काकी माँ ने वचन लिया था कि मैं तुम्हारा हाथ केतन के हाथों में देने की जिम्मेदारी लूँ । मैंने वचन तो दे दिया था लेकिन उस जिम्मेदारी को निभाने की ताकत मुझमें नहीं थी माया। मैं बहुत स्वार्थी हो गया था। मैं अपनी जिम्मेदारी से, इस घर से अपने रिश्ते के सच से भागना चाहता था।
मगर मैं अपने जमीर से नहीं भाग पाया। काकी माँ को दिया वचन मेरी आत्मा को कचोटता रहा।मैं आज काकी माँ के सामने बहुत शर्मिंदा हूँ। उन्होंने मुझे अपने बेटे से बढ़कर प्यार दिया। मुझ पर विश्वास किया और मैं उनको दिये वचन को निभा न सका।
मैं साकेत की बात सुनते सुनते पत्थर की होती जा रही थी।शारीर का ख़ून लगातार आँखों से बह रहा था ।मेरे होंठ सूख गए, साँस भी गले में फाँस की तरह अटक अटक कर आ जा रही थी।
साकेत ने अपने बैग से एक शादी का जोड़ा निकाल कर मेरे हाथो में देते हुए कहा ये अन्तरा ने दिया है। अन्तरा ? मैंने टूटती आवाज में पूछा
हाँ अंतरा, जो गीत के बीच के खालीपन को भरकर उसे पूरा करती है जिसके बिना कोई गीत पूरा नहीं होता।
माया, काकी माँ की दी हुई जिम्मेदारी से मुझे मुक्त कर दो ।मेरी आत्मा पर पड़े बोझ से मुझे मुक्त कर दो। काकी माँ की प्रथम और अंतिम इच्छा यही थी कि केतन ही तुम्हारा जीवन साथी बने।
और हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।कहकर वो तेजी से दरवाजे से निकल गया।
मैं दौड़कर दरवाजे की तरफ भागी, "साकेत, पर आवज़ गले में ही दबी रह गयी और मैं बर्फ की तरह वहीं जम गयी साकेत को दूर तक जाते हुए देखती रही वो धुंध में कहीं खो गया । मैं थक कर निढाल हो चुकी थी । जाने कब मेरी आँखें बंद हो गयी एक मजबूत बाँहों में। लगा माँ लोरी सुना रही है।माह का आखिरी शनिवार था उस दिन और बेली फूल की खुशबू मुझे सहला रही थी।

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