"दीपा ,बहू जल्दी -जल्दी हाथ चलाओ,मेहमान आते ही होंगे और ये मिठाईयां अभी तक यहीं है,कैसे काम कर रही हो...अरे इकलौते देवर की शादी है फटाफट हाथ चलने चाहिए" दीपा की सास रमा ने कहा.
"हां ,मांजी आप काहे चिन्ता कर रही है,रमेश हमार बिटवा जैसा ही तो है...आज भी याद है जब हम ई घर मैं आये थे, तब 12 बरस का छोटा सा था ,हर पल हमारे आगे -पीछे रहता था भाभी की जगह ,'भुई मां -भुई मां 'कहकर पूरा घर में हमको फिराता था" दीपा ने चाय पीते हुए कहा।
"भुई मां ये तोहफे गाड़ी में डाल दूँ" कमली (काम वाली)ने पूछा।
"अरी !कमली कितना धीरे काम कर रही है ,जल्दी हाथ चला ,अभी तक हल्दी भी पीसनी है" दीपा ने कहा.
'अरी दीपा ,वो गणेश जी को आज चूरमें का भोग चढाना होता है,चढा़ दिया की नहीं'..पडो़स की महिलाओं ने कहा.
"जी मुझे तो मां जी ने कुछ बताया हीं नहीं ,अब तो सांझ होने वाली है....मैं जल्दी से चूरमा बनाती हूं"दीपा हडबडाहट में रसोई की तरफ दौडी।
पडो़सन सविता कहने लगी 'इस बेचारी का क्या दोष ,इतने साल में कोई खुद का बच्चा तो ना हुआ ,इसे क्या पता रीत -रिवाज शादी ब्याह की ....खुद की औलाद होती तो पता लगता'.
पडो़स की औरतों की कानाफूसी दीपा को सुनाई दे रही थी,उसका मन छलनी हो गया और आंखों से रूलाई फूट पड़ी, और सोचने लगी कि आखिर भगवान ने उसे औलाद क्यों नहीं दी ..,आज तक उसने इस बात की शिकायत नहीं की ऊपर वाले से...जब से ब्याह कर आई उसके पति ने 10 बरस की रीटा और 12 बरस के राकेश का हाथ उसे दे दिया और कहा,"दीपा ,पिताजी के जाने के बाद इनकी जिम्मेदारी हमारी है ,हम इन्हें अपने बच्चों जैसा प्यार करेंगे".
शादी के 22 साल हो गए अभी तक उसकी गोद में नन्हीं किलकारी नहीं गूंजी ,हर जगह इलाज कराया पर कोई फायदा नहीं हुआ ....दीपा ने मन ही मन राकेश और रीटा को ही अपना बच्चा मान लिया था...बच्चे भी भुई मां पुकारने लगे,दीपा को लगा जैसे उसके ही बच्चें है, घर का हर काम भुई मां से पूछकर ही होता.
दीपा की जरा सी तबीयत खराब होती ,तो दोनों उसकी सेवा में ही लग जाते,जब तक दीपा ठीक ना हो जाए ,उसके सिरहाने ही बैठे रहते थे।
"भुई मां ,चूरमा हो गया" ....कमली ने पूछा।
दीपा कमली की आवाज सुनकर वर्तमान में लौट आई।
"हां ,बन गया सुन मेहमानों को ठंडा और दे और फटाफट नाशता लगा" दीपा ने कमली से कहा।
दीपा ने अपने देवर की शादी में कोई कसर नहीं छोडी हर रिश्तेदार को चांदी का सिक्का भेंट के रूप में दिया।
"भुई मां भाभी के स्वागत की सारी तैयारी मैंने कर ली है " रीटा ने दीपा से कहा।
"बहुत अच्छा किया ,लाडो ...जा अब जल्दी से आरती की थाल ले आ " दीपा ने कहा।
"आओ, मेनका ...अपने हाथ इस हल्दी की थाल में डाल दो और दीवार पर छाप दो" दीपा ने आरती करने के बाद कहा।
"मां जी,आप अब आराम करिए शादी के चक्कर में बिल्कुल ध्यान न रखा अपना...चलिये"... दीपा मां जी को कमरे में ले गई।
कुछ ही दिनों मेनका ने समझ लिया कि घर में सब लोग भुई मां के कहे अनुसार ही काम करते है,उसका पति राकेश उनकी बातों को सबसे ज्यादा मानता है और मां जी भी उनके कहे अनुसार काम करती है।
कुछ महीनों में ही दीपा को पता चला कि मेनका मां बनने वाली है ,वो मेनका का पूरा ध्यान रखती .
जैसे ही सातवां महीना लगा दीपा ने मेनका की गोद भराई का आयोजन किया .सभी रिश्तेदारों-,पड़ोसियों को बुलाया।
"कैसी हो मेनका",पडो़स की सविता ने पूछा।
"ठीक हूँ ,भुई मां बहुत ध्यान रखती है मेरा"-मेनका ने कहा।
"बेटा ,अच्छी बात है ..पर उससे दूरी बनाए रखना ,उसका साया बच्चें पर मत आने देना ,खुद तो मां बन ना पाई ....समझ रही हो ना मैं क्या कहना चाह रही हूं"....सविता ने कहा।
मेनका के मन में ये बात बैठ सी गई,अब वह दीपा से कटी सी रहने लगी ....उसे लगा कि कहीं उसके बच्चें पर कोई असर ना हो.
दीपा कोई भी चीज उसे खाने को देती तो मेनका मना कर देती थी.
एक दिन मेनका ने राकेश से कहा ,"राकेश ,कुछ दिनों के लिए हम दूसरे मकान में शिफ्ट हो जाए ,यहां मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा. "
राकेश ने हैरानी से पूछा "क्यों क्या हुआ"...कोई परेशानी हैं?
"राकेश,दरअसल बात ये है कि वो भुई मां बांझ है ,उनका साया हमारे बच्चें के लिए ठीक नहीं है "मेनका ने कहा।
दीपा जो मेनका के लिए दरवाजे पर केसर का दूध लिए खड़ी थी ,उसने सब सुन लिया और कांच का गिलास उनके हाथ से छूट गया ।
"क्या हुआ भुई मां ,कहीं चोट तो नहीं लगी " राकेश दौड़ते हुए दरवाजे के पास जाता है.
भुई मां के हाथ पर कांच के टुकड़े से चोट लग गई और उससे भी ज्यादा उनके " मन पर"।
"कुछ नहीं हुआ मुझे "ऐसा कहकर दीपा अपने कमरे की तरफ दौड़ गई।
"मेनका ,तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ,ऐसी उलूल जूलल बातें कर रही हो..... "भुई मां मेरी मां से भी बढ़कर है,बेहतर यहीं होगा कि अपने दिमाग से ये कचरा निकाल दो" राकेश ने गुस्से से कहा।
दीपा के कानों में उन दोनों की बातें सुनाई दे रही थी,आँखो से आँसू थम नहीं रहे थे।
अगले दिन दीपा अपना सुटकेस लिए जाने लगी तभी राकेश पूछने लगा,"भुई माँ आप कहाँ जा रही है,नाराज हो क्या ?कल रात की बात के लिए मैं आपसे माफी मांगता हूं"..।
"चुप कर ,मैं कोई नाराज नहीं हूं ,अपने बेटे से कौन नाराज होता है ,मैं तो अपनी बहन के यहां जा रही हूं ,कुछ दिनों में लौट आऊंगी...पर तब तक तुमकों मेनका का ध्यान रखना है, ........उसे कोई परेशानी ना हो...वरना...... तेरे कान खींचूगी "दीपा ने झूठी हंसी में कहा।
कुछ दिनों बाद मेनका ने एक सुंदर से बेटे को जन्म दिया.मेनका की हालत बहुत नाजुक हो गई थी.ऑपरेशन करना पडा़ ,वरना उसकी जान को खतरा था।डॉक्टर ने बताया कि मेनका के स्तन में गांठ है ,बच्चें को ऐसा दूध पिलाना सही नहीं है।बच्चा भूख से रोए जा रहा था।
दीपा को जब पता चला तब वह दौड़ी-दौड़ी अस्पताल पहुंची।
राकेश बहुत परेशान सा बैठा था, अपनी भुई मां को देखकर जोर से गले लगकर बच्चों की तरह रोने लगा ।
"शांत हो जा बेटा,धैर्य रख ,सब ठीक होगा,मेनका और बच्चा कहाँ है" चल...चलते है...और रोना बिलकुल बंद कर "दीपा ने कहा।
दीपा ने देखा बच्चा भूख से रोए जा रहा था, और मेनका बेबस थी उसे दूध न पिलाने के लिए.
दीपा ने डबडबाई आंखों से बच्चें को अपनी गोद में उठाया और सीने से लगाया.
बच्चा एकदम चुप हो गया और दीपा की कोटी ममता के दूध से भर आई.मेनका अंचभित हो गई,और उसे आत्मग्लानि होने लगी.
"भुई मां,मुझे माफ कर दो, मैंनै बिना कुछ सोचे समझे आपको बहुत बुरा-भला कहा ,असल में आपके अंदर जो ममत्व भाव है,प्रेम है ..वो किसी में भी नहीं हो सकता .आपने नि:स्वार्थ होकर सब पर प्यार बरसाया है,मैं ही नादान हूं ,मुझे माफ कर दो, और आपकी ममता का रस इस बच्चें पर भी न्योछावर कर दो"-मेनका ने रोते हुए कहा।
दीपा ,मेनका की बात सुनकर भाव-विभोर हो गई और बच्चें को एकटक देखने लगी।
"मेनका मैं इसे स्तनपान कराऊँ,नहीं नहीं ये तो.....तुम्हारा..."
"मेरा क्या.......क्यों आप इसकी "भुई मां" नहीं है......,अरे ये तो बहुत भाग्यशाली है कि इसे आप जैसी भुई मां का ममत्व- पान करने का सौभाग्य मिला है"मेनका ने कहा।
मेनका की बात सुनकर दीपा के सीने से अमृत धारा निकल पड़ी ,और उस अमृत का रस नन्हें बालक के होठों को छूने लगा.उसे लगा कि आज वह हकीकत में "भुई मां" बन गई है

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