द लास्ट मेसेज.…..भाग 1

आज वो फिर आयी लेकिन पिछले कुछ दिनों की तरह घर के बाहर से ही चली गयी । अजीब बात है! मीनाक्षी ऐसे तो नही करती थी, हमेशा कोई ना कोई नया किस्सा कहानी उसके पास जरूर होता था जिसे लेकर वो एकाध घंटे तो मेरा दिमाग चाट ही डालती थी । हँसती मुस्कुराती वो लड़की अचानक से इतनी शांत उदास हो गयी, अजीब तो है ही यही सोच रहा था उसके जाने के बाद, कि अचानक मेरे फ़ोन की बेल बजी। वर्मा जी का कॉल था...

बस आया वर्मा जी फ़ोन रिसीव करके में बोला।

मीनाक्षी के बारे में सोचते मैंने ध्यान ही नही दिया कि आफिस जाने का वक़्त हो गया, और रोज़ की तरह वर्मा जी मुझसे लिफ्ट लेने भी आ पहुँचे हैं।

क्या हुआ कुमार जी कहाँ खोये हुए हो। चुटकी लेते हुए वर्मा जी ने कहा...
अरे कुछ नही ऐसे ही । मैं बोला
अरे भाई आपकी डोर बेल भी आज आपकी तरह ही शांत थी क्या? तभी तो हमको फ़ोन करना पड़ा बात क्या है?
नही तो डोर बेल तो सही है, मै बोला । और सोचने लगा कि सुबह मीनाक्षी के आने तक तो डोर बैल सही थी, ये वर्मा जी भी ना केवल दूसरे की कमी निकालना या छेड़ना बस।

वैसे वर्मा जी की बात में सच्चाई तो थी, कि मैं कुछ खोया हुआ तो था, वास्तव में मैं अभी तक मीनाक्षी  के बारे में ही सोच रहा था ।।

स्कूल के दिनों से ही वो मेरी दोस्त थी, मेरे आगे वाली बेंच पर बैठती थी, काफी हँसमुख मिज़ाज़ था और बहुत सारे दोस्त थे उसके, लेकिन अब दोस्तो के नाम पर बस एक या दो ही दोस्त होंगे उसके, उनमे से एक मैं भी था। अरे हाँ रचना के बारे में तो मैं भूल ही गया ...

अरे !अरे !अरे ! हम तो पहले ही बोले थे कोई लफड़ा है आज कुमार बाबू। वर्मा जी चिल्लाये !! ऑफिस का बिल्डिंग तो पीछे ही  रह गया कहाँ ध्यान है ।
कुछ ना कुछ अजीब होना ही होता है जब जब ये मीनाक्षी मिलने आती है मुझसे। पता नही क्या हो गया है , मैं झेंप गया। वर्मा जी सॉरी यार।।
अरे रे रे कोई ना इट्स ओके इस बार तो सिर्फ आफिस की बिल्डिंग ही मिस किया है, याद है अभी तीन दिन पहले तो आपने ऐसी व्यवस्था की थी कि लोग हमको मिस करते । सामने से आता ट्रक नही देखा था आपने, ये तो कहिये हम चिल्ला पड़े थे। अजीब हो कुमार बाबू आप भी।।

ओह हाँ उस दिन भी तो आयी थी वो , ये मीनाक्षी भी ना इससे पूछना ही पड़ेगा कि बात क्या है । क्यों ऐसे बिहेव कर रही है? नही तो इसके बारे में सोच सोच के मेरा बिहेवियर बिगड़ जाएगा।

काम की व्यस्तता में मुझे मौका ही नही मिला कि मैं उसे कॉल कर पाऊँ। कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि जब जब मैने सोचा उसे कॉल करके पूंछू तभी कोई न कोई आ धमकता ।

और अब ये!  शाम हुई नही की आ धमके।

वर्मा जी : क्यों कुमार बाबू क्या इरादा है?

चलिए चलते हैं बोलकर मैंने अपना बैग उठाया और ऑफिस से निकल लिया, घर जाने के लिए। रास्ते मे मैं मिनाक्षी के बारे में ही सोच रहा था पर उसको कॉल नही कर सकता था, क्योंकि  वर्मा जी के पास कोई ना कोई कहानी हमेशा तैयार रहती है पकाने के लिए। सुबह वाली और तीन दिन पहले वाली मेरी लापरवाही के लिए वो किसी तांत्रिक से मिलने की सलाह दे रहे थे मुझे, कह रहे थे कि अचानक आपके साथ ऐसे बदलाव होना शुभ संकेत नहीं हैं, कोई आपसे ऐसा करवा रहा है, सच मानिये एक बार मिल लीजिये बाबा से । वर्मा जी आप भी ज्यादा सोचते हैं मै बोला ।

घर पहुंचकर मैंने सोचा कि आज कॉल करता हूँ मीनाक्षी को, थोड़ा ऑफिस की थकान मिटा लूँ पहले, ये सोचकर में बिस्तर पर पसर गया।

पता नही कब मुझे नींद आ गयी और जब जगा तब तक शाम का  8 बज चुका था । मेरी नज़र मेरे फ़ोन की सक्रीन पर पड़ी, किसी की मिस कॉल पड़ी थी , देखने पर मैं थोड़ा चौंक सा गया । मीनाक्षी की कॉल आज फिर मिस हो गयी, पर शाम 6 बजे तो मैं आफिस से लौट कर ही आया था , ये वर्मा जी के चक्कर में ना सब काम छूट जाते हैं , हुह फ़ूहड़ इंसान।

मैंने तुरंत मीनाक्षी को कॉल बैक किया...

हेलो हाँ मीनाक्षी सॉरी यार तेरा कॉल आया था, आज भी थोड़ा बिजी था इसलिए पिक नही कर पाया सॉरी यार।

हेलो बेटा ... कौन?? ( मीनाक्षी की मम्मी बोलीं)

आंटी मैं कुमार बोल रहा हूँ, मीनाक्षी नही है क्या ?

बेटा...  ( रुआंसी आवाज़ में )

हाँ आंटी ।। मैंने रोने की आवाज सुनी तो थोड़ा घबरा सा गया
क्या हुआ आंटी आपकी आवाज क्लियर नही आ रही । हेलो हेलो हेलो....फोन कट गया । मैन फिर कॉल करने की कोशिश की पर नंबर नॉट रीचेबल हो गया।

आखिर हुआ क्या है,मीनाक्षी भी उदास सी रहती है और आंटी जी भी ऐसे.., बात क्या है आखिर ।मैं समझ नही पा रहा था, पर ये तो पक्का था कि कोई तो बात है, जो गलत है । मुझे लगा कि मीनाक्षी के घर जाकर ही पूछना पड़ेगा। कल ऑफिस के बाद जाता हूं सोचकर मैं अपने बाकी के काम निपटाने में लग गया।

अगले दिन शाम को आफिस से लौटते वक्त मैने वर्मा जी को साथ नही लिया क्योंकि मुझे मीनाक्षी के घर जाना था, आज ट्रैफिक भी कुछ कम था, मीनाक्षी जिस बिल्डिंग में रहती है वहां तक पहुंचने में मुझे ज्यादा वक़्त नही लगा , ठीक 5 बजकर 55 मिनट पर मैं उसकी बिल्डिंग के नीचे पहुँच  गया।

मीनाक्षी के घर पहुंचकर मैंने डोर बेल बजायी

आंटी ने दरवाजा खोला।

अरे बेटा आओ अंदर आओ ,

नमस्ते आंटी मैंने अभिवादन किया और अंदर जाकर ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बैठ गया । आंटी कुछ और पूछे बिना अंदर किचन में पानी लाने चली गईं।

सोफे पर बैठे बैठे में सोच रहा था कि आंटी अभी तो ठीक लग रहीं हैं पता नही कल क्यूँ?? खैर मीनाक्षी से पूँछ ही लूंगा अभी।

इधर उधर देखने और सोचने के बीच ही अचानक मेरी नज़र सामने की दीवाल पर पड़ी और एक कील की तरह वहीं गड गयी, मैं पसीने से भीग सा गया , पैर थरथराने लगे, स्तब्ध सा मैं उठ के खड़ा हो गया, आंखें अभी भी वहीं पर टिकी हुई थीं , बोलना क्या चीखना चाहा पर मुह से शब्द नही निकल रहे थे!!!! वो मीनाक्षी की फ़ोटो थी जिस पर हार चढ़ा था।।

क्या ? कब ? कैसे? कहीं आंटी इसीलिए तो ? पर अभी तो मिलने आए थी ? अचानक इतने सारे सवाल और आंटी की कल रोने की आवाज़, मैं बेचैन हो गया और इतनी हिम्मत नही जुटा पा रहा था कि वहां रुक कर आंटी को फेस कर सकूं।

मैं तुरंत ही वहां से निकल आया। मीनाक्षी की बिल्डिंग के नीचे थोड़ा बदहवास सी हालात में मैन उनके पड़ोस के एक अंकल से उसके बारे में पूंछा तो उन्होंने बताया कि हाँ बहुत बड़ा संकट आन पड़ा है, उसके माँ बाप का इकलौता सहारा थी वो।

ओ नो कैसा दोस्त हूं मैं, बिना रूके मैं सीधा अपने घर आकर रुका, अभी जो कुछ भी हुआ उसपर मुझे यकीन नही हो रहा था। बहुत सारी उधेड़ बुन लिए मैं चुपचाप अंदर के कमरे में जाकर बैठ गया , काफी गहरी सोच में मैं मीनाक्षी के हादसे को लेकर उदास बैठा था, और ऐसे ही काफी वक्त बीत गया, तभी मेरी गहरी सोच को दरवाज़े पर उठती दस्तक ने भंग किया।

ठक ठक....

कौन हो सकता है , वर्मा जी इतना लेट? मैं सोच ही रहा था

मैंने पूंछा कौन है...??

मैं मीनाक्षी!!!
..................क़्या!!!!!


                                                 शेष अगले अंक में......

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