उफ्फ़ क्या हुआ, ये लड़की टॉयलेट में कितना वक्त लगाती है।"जल्दी करो नेहा, हम स्कूल के लिए लेट हो रहे हैं। पूरा आधा घण्टा हो गया हैतुम्हें अंदर। कर क्या रही हो ?"इधर से उधर इंतज़ार करते जब दस मिनट और बीते तो सुमेधा ने बाथरूम के दरवाज़े कोझंझोड़ा। लेकिन ये क्या ! दरवाज़ा तो खुला था। हैरान सुमेधा ने अंदर देखा तोनेहा फ़र्श पर बैठी रो रही थी। सुमेधा को देखते ही उसकी सुबकियां ज़ोर की रुलाईमें बदल गईं।"नेहा, क्या हुआ ? किसी ने कुछ कहा क्या तुमसें ? मुझसे कहो तो", सुमेधा नेउसे गले से लगाकर कंधा थपथपाया।नेहा और सुमेधा गर्ल्स हॉस्टल में रूम पार्टनर थीं।नेहा नवीं कक्षा में पढ़तीथी तो सुमेधा ग्यारहवीं की मेडिकल की छात्रा थी। वैसे तो सुमेधा नेहा से सिर्फ़दो साल बड़ी थी लेकिन स्वभाव से ही वह एक बोल्ड और आत्मविश्वासी लड़की थी औरनेहा का किसी गार्जियन की तरह ख्याल रखती थी।बोलो नेहा, घबराओ नहीं, मुझे बताओ क्या बात है ?",सुमेधा ने नेहा के बालों में हाथ फिराते हुए फिर पूछा तो नेहा की रुलाई फूटपड़ी ।"सुमि दी, कल मार्किट से आते हुए ऑटो में साथ बैठे हुए लड़के ने मेरा हाथ ज़ोरसे दबाया था। इसीलिए मुझे अंदर बहुत ज़ोर की चोट लगी है और मैं मां बनने वालीहूँ।"इतना कहते कहते नेहा फिर रो पड़ी।सुमेधा उसकी बात सुन और बाथरूम का नज़ारा देखसारा किस्सा समझ गयी थी कि नेहा पहली बार " डाउन" हुई है।"ओहो नेहा, ऐसा कुछ नहीं है। घबराओ मत। चलो पहले तो बाहर चलो। स्कूल नहीं जातेआज। ओ०के०सुमेधा अंदर से कुछ लायी और नेहा को देते हुए बोली,"लो पहले तो तुम अपनी चोटका इंतज़ाम करो। ये सेनेटरी पैड है।"सुमेधा ने उसे इस्तेमाल करने का तरीका बताया और मुस्कुराकर उसके लिए चाय बनानेलगी।"सुमि दी , मैं इतनी बड़ी मुसीबत में हूँ और आप मुस्कुरा रही हो।""नेहा , मेरी दोस्त , ये कोई प्रॉब्लम वाली बात नहीं है। सबसे पहले तो ये समझलो कि किसी लड़के के छूने भर से कोई लड़की मां नहीं बन जाती। ये सब तुम्हें फिरकभी समझाती हूँ।और रही चोट की बात तो सुनो........"नेहा को ये समझाते हुए सुमेधा को चार साल पहले की वो शाम याद आने लगी जबमम्मी, पापा और वो ,डिनर के लिए बाहर गए थे। वैसे तो डिनर के लिए वो अक्सर हीबाहर जाते थे मगर न जाने क्यूं उस दिन का डिनर सुमेधा को कुछ खास ही लग रहाथा। वो और माँ जब लॉन में टहल रहे थे तो माँ ने उससे पूछा था, " बेटा, तुम्हेमम्मी अच्छी लगती है?'"ममा, ये आप कैसी बात पूछ रही हो। आप दुनिया की सबसे प्यारी माँ हो।""नहीं बेटा, मैं अपनी बात नहीं कर रही। इन जनरल। क्या तुम जानती हो माँ होनाकितने फ़ख़्र की बात है। कहते हैं भगवान दुनिया में सब जगह नहीं हो सकते थेइसलिए उन्होंने माँ को बनाया। मगर बेटा कुदरत ने बेबी को पैदा करने की नेमतसिर्फ़ औरत को ही दी है। और इसकी तैयारी वो बहुत पहले से ही शुरू कर देती है।"बहुत ही ध्यान लगा के सुमेधा सुन तो सब रही थी।लेकिन समझ कुछ कुछ ही रही थी।"जब लड़की थोड़ी बड़ी होती है तो कुदरत उसे इशारा देती है कि तुम पूरी तरह सेस्वस्थ हो और मां बनने में सक्षम हो। जैसे किसी पौधे के बड़े होने पर उसमे फूलखिलते हैं तो हम जान जाते हैं कि पौधा ठीक से पनप रहा है। ये इशारा शरीर मेकुछ बाहर और कुछ अंदरूनी बदलावों से मिलता है। बाहरी बदलाव तो तुम समझती ही होमगर हमारे अंदर कुछ अंडे वयस्क होते हैं जो कि मां बनने के लिए काम आते हैंलेकिन जब तक लड़की मां न बनना चाहे तो वो एक वेस्ट प्रॉडक्ट बन कर खून के रूपमें शरीर से बाहर निकल जाते हैं।यही बात बताती है कि आप पूरी तरह से नार्मल हैं। इसी तरह ये प्रक्रिया हरमहीने खुद को दोहराती है जिसे बायोलॉजी की भाषा में 'मेंस्ट्रुअल साईकल' और आमभाषा में पीरियड, डेट या डाउन होना कहते हैं।"सुमेधा ने हैरानी से पूछा,"क्या आपको भी हर महीने आती है ये 'डेट' ?""हां बेटा, हर महीने, तबसे , जब मैं तुम्हारे जितनी थी।""लेकिन, मुझे तो कभी पता नहीं चला। आपको प्रॉब्लम नहीं होती?""इसमे कुछ प्रॉब्लम वाली बात नहीं। ये तो ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन जाती है।वैसे भी आजकल तो बहुत ही आसान और हाइजीनिक तरीके आ गए हैं इससे निपटने के।वोतुम्हें टी०वी० विज्ञापन नहीं याद ?""ओह हां", अब सुमेधा को वो खास विज्ञापन समझ आये।"मां , ये मुझे कब होगा ? ""आने वाले कुछ दिनों, महीनों, या एक दो साल तक कभी भी।""लेकिन मां, ये सब लड़कियों को ही क्यों होता है , पापा लोगों को क्यों नहीं ?""बेटा, इस बारे में तो मैं यही कह सकती हूँ कि भगवान को किसी एक को चुनना थाइस एहसास के लिए तो ये 'प्रिवेलेज' हमको मिला। शायद लड़के ये सोचते हों कि गॉडने ये मौका उनको क्यों नहीं दिया। क्या तुम जानती हो कि दुनिया के बहुत सेहिस्सों में तो डेट आने पर लड़की की पूजा की जाती है कि अब वो एक नया सृजन करनेके लिए तैयार है इसलिए पूजा योग्य है।"सुमेधा की आंखों में विस्मय और शांति के मिले जुले भाव थे।मां ने सच ही कहा था , दो महीने बाद ही उसे डेट आ गयी। पहले पहल तो उसेमुश्किल लगा मगर जल्द ही वह इसकी अभ्यस्त हो गई थी। बल्कि अब तो डेट आने परउसे राहत मिलती थी कि उसके शरीर के अंदर सब कुछ संतुलित चल रहा है। यही सबनेहा को बताते बताते वह वर्तमान में आ गयी। नेहा उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनरही थी। वह रोना भूल कर बड़ी बड़ी गोल आंखों से उसे एकटक देखे जा रही थी।"हां नेहा, अब और कोई उलझन या सवाल ? "नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसकी मुस्कान ही उसका जवाब थी। ये बिल्कुलवैसी ही मुस्कान थी जो उस डिनर की रात सुमेधा के होंठों पर आयी थी।आज सुमेधा को लग रहा था कि औरत होने के गर्व और आत्मविश्वास के अहसास की जिसमशाल को उसकी मां ने उसके अंदर रोशन किया था, उससे उसने एक और चिराग जला करअपना एक अनजाना फ़र्ज़ पूरा किया था

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