1. लव ब्रेक






विश्वसुन्दरी पुल पर गाड़ियाँ आ जा रही थीं। रामनगर से चलने वाले इसी हाइवे की पटरियों पर दोनों खड़े थे। शायद कूदने की सोच रहे थे।
"क्या लगता है ज्यादा गहरा होगा?"
"नहीं, आराम से तैर के किनारे लग जायेंगे"
"लेकिन अगर मर गयें तो"
"तो फिर ऊपरवाला जाने..."
और दोनों ने हाथ में पकड़े मेढ़क के बच्चों को गंगा में फेंक दिया।
"चिरकुटों क्या कर रहे तुम लोग, मर जाओगे ससुरे तो नाचेंगे किसके शादी में" पीछे से तीसरे ने कहा और दोनो की तरफ एक एक कोक की बाॅटल उछाल दी।
"अबे मेढ़क के बच्चे थे पानी में छोड़ दिये" पहले ने कहा, जो अलकतरे से ज्यादा काला और कोक की बाॅटल से बस थोड़ा ही लम्बा था।
"अरे वाह, पद्म भूषण दिलवा दें इस समाज सेवा के लिये" तीसरा जो अभी अभी आया था और लम्बाई के मामले में खम्बे से कम्पटीशन में था, बोला।
"अरे यार तुम लोग क्या बोला करते हो, चलो लेट हो रहा है" दूसरा, बीच वाला.... शकल से कार्टून और अकल से बस एडिशन बनते बनते रह गया।
"अरे हाँ बे तुम ससुरों के चक्कर में गाड़ी ऑन छोड़ दिये हैं, चल अब, वैसे भी बाहर बहुत धूल है"
कोक की बाॅटल को भी गंगा में बहा तीनों फटफटी हो चुकी पैशन प्लस पर बैठकर BHU की ओर बढ़ चले।

तीनों साथ ही ग्रैजूएशन में आये थे BHU, दोस्ती कैसे हुये इसे याद करने की तीनों को जरूरत नहीं थी। आर.वी., पंडित और श्री... लम्बू, कार्टून और छोटू...
तीनों का ग्रैजूएशन पूरा हुये लगभग दो महीने हो गये थे। फिलहाल तीनों में सिर्फ पंडित एकमात्र ऐसा विकल्प था जो हाॅस्टल में था, यानि की BHU में पी.जी. कर रहा था। क्योंकि बड़े ज्ञानी बाबा अकेला ने कहा है 'परीक्षानुसार पढ़ाई पर L लगते हैं, प्रतियोगितानुसार पढ़ाई पर स्टार लगते हैं और आवश्यकतानुसार पढ़ाई पर ग्रेस लगते हैं...' तो स्टार वाली पढ़ाई पंडित की थी।

तीनों रामनगर से हाॅस्टल पहुंचे। राजाराम हाॅस्टल में कमरा नम्बर 71 जिसका विधिक अधिग्रहण पंडित ने कर रखा था, उसमें तीनों एक साथ पहुंचे। एक आम स्टूडेंट के कमरे में या तो पीरियाॅडिक टेबल लगा होता है दीवारों पर, या फिर हाॅट तस्वीरें या फिर भगवान की तस्वीरें , लेकिन पंडित के दीवारों पर खूंटियाँ और खूंटियों पर लटकते-सूखते फटे पुराने बिग बाॅस के कच्छे, रूपा की बनियान और कई तरह के फेयरनेस क्रीम पंडित के सिंगल जीवन की तंगहाली भरे दौर की गवाह थी। देखकर कोई भी फफक फफककर रोये। 😢😢😢
वैसे भी पंडित अपने अखण्ड कुंवारे जीवन के लिये हाॅस्टल भर में प्रसिद्ध था।
श्री तुरन्त ही बेड पर लम्बा हो गया और पंडित को आदेश दिया "ऐ जाओ बे, कैंटीन से कुछ लेकर आओ"
"भाई, पैसा नहीं है। समझा करो, 3000 है सिर्फ और महीना निकालना है इसमें"
"हाँ तू तो इतना गरीब है साले कि 1.5 जीबी का नेट भराये बिना पिछले कुछ रात तो नींद ही न आयी" इस बार आर.वी. ने लपेटा।

शाम गुजर गयी और रात आ गयी।
सुबह पंडित की आँख खुली तो देखा नौ बज गये थे। जल्दी जल्दी नहा धो कर क्लास के लिये भाग ही रहा था कि भागकर वापस आया और नया एक्स सिग्नेचर छिड़ककर सूंघा 'मस्त है भाई' कहकर चहकर उठा।
राजनीति विज्ञान की परास्नातक क्लास चल रही थी। पंडित क्लास में दाखिल हुआ। मिश्रा, यादव बंधुओं की नजर पंडित पर गयी।
"का बात है मिश्रा आज पंडित बड़ा चमक रहा" बड़े यादव ने कहा।
"हाँ भाई, लेकिन का करोगे ग्रैजूएशन के वो दुख भरे दिन याद है न" 😢
"अरे यार मत याद दिलाओ। गुलाब छोड़ो कांटे तक न थे अपने चमन में उन दिनों" 😭 छोटे यादव ने आँखों को साफ किया।
"लेकिन अब तो पूरी की पूरी गुलाब की नर्सरी आ लगी है" मिश्रा ने सामने की ओर इशारा किया जहाँ करीब 10 की संख्या में लड़कियाँ थीं।
इतने में पंडित बगल वाली रो में आकर बैठ गया। कार्टून सी शकल पर गोंद से चिपका बाल जिसपर रूसी (हाँ वही डैंड्रफ) दिख रही थी।
उसने तीनों की तरफ देखकर बत्तीसी चमकायी। तीनों में बदले में हैलोजन वाली मुस्कुराहट बिखेरी। दोस्ती में इतनी मुस्कुराहट अक्सर ही सेहत के लिये हानिकारक साबित हुई है।
खैर, पहली क्लास खत्म ही हुई थी कि पंडित का फोन वाइब्रेट करने लगा।
"हलो"
"कहाँ है पंडित"
"भाई क्लास में हूं, तुम?"
"फैकल्टी के बाहर आ"
आर.वी. आया हुआ था। सर के आने में कुछ वक्त था। पंडित भागकर बाहर आया।
"हाँ भाई कैसे आना हुआ?"
"का बे। आजकल पूछने लगे हो कैसे आना हुआ?" 😒
"अरे मतलब भाई कि...." पंडित बोल ही रहा था कि आर.वी. ने बात काट दी।
"छोड़ सब, अभी चल हमरे साथ"
"अरे भाई, अभी नहीं जा सकते क्लास है" पंडित वापस मुड़ने को हुआ।
"ऐ पंडित 😑 सुन, ससुरा कैसा भाव खाने लगे हो बे" आर.वी. को बुरा लगा।
"भाई समझा करो ग्रैजूएशन की बात और थी, अब वक्त बदल गया है" पंडित ने गम्भीर होते हुये कहा।
"साले, चुडुंग, वक्त बदला कि तू बदल गया बे, चिंदीचोर। जरूरी काम है, चलेगा या नहीं"
"साॅरी भाई, बुरा मत मानना लेकिन"
"बुरा काहे न मानेंगे, चल निकल यहाँ से" और पंडित वापस क्लास की ओर मुड़ गया।
आर.वी. ज्यादातर गुस्से में रहता था। उसे कभी पसन्द न था कि कोई उसे ना कहे वो भी जरुरत के वक्त पर। उसने अपनी पैशन प्लस को गुस्से में ऐसे मोड़ा जैसा हायाबूसा हो और चिलवाते उसका कान घुमाते ले गया... शायद फ्रस्टेट था।

वीटी पर भीम की चाय उबाल पर थी। कम्पटीशन के लिये बगल में ढ़ेले वाले चचा लोग भी थे। आर.वी. ने भीम की दुकान पर भीड़ देखकर कदम ठेले की ओर मोड़ लिये।
"चचा चाय दिहा" भोजपूरी रिमिक्स में बोला।
"बस भिया देहे" चचा ने भी कहा।
केतली से चाय कुल्हड़ में गिर रहे थे और साथ में आर.वी. के चेहरे पर भाव भी।
"हलो" उसने नम्बर डायल किया।
"हाँ बे" दूसरी तरफ से श्री की आवाज आयी।
"अबे तुमको लगता है कि पंडितवा बदल गया है या खाली हमहीं को" आर.वी. उदास था।
"कुछ हुआ क्या" श्री ने पूछा।
"नहीं बस.... तू रख" आर.वी. ने टाल दिया।
"बताओ न बे"
"अबे रख न झोपड़ी वाले, उधर पंडितवा दिमाग खराब किया है, ससुरा तुमसे एक सवाल पूछे और तुम बदले में चार सवाल पेल दिये।" फोन कट गया।

वैसे तो पंडित को कवनो फर्क नहीं पड़ता था, बड़ा ही न्यूट्रल और लंठ किस्म का इंसान था, लेकिन आर.वी. को लेकर थोड़ा सोचता था, काहे कि दोनों बनारस में एक ही साइड से थे।
उसने क्लास से खाली होते ही काॅल किया "हाँ मित्र, कहाँ हो"
"पटक के मारेंगे ससुर दुहर जाओगे" आर.वी. गुस्से में अब भी था।
"अरे मित्र तुम समझते नहीं, देखो... क्लास बहुत जरूरी था.."
"और हम रे, हम जरूरी नहीं हैं"
"अरे यार तुम"
"रख फोन बे" आर.वी. ने पंडित का भी फोन काट दिया और चाय का कुल्हड़ फेंकते हुये ठेले वाले चचा को कचौड़ी छोला देने को बोला।

पंडित हाॅस्टल के रास्ते में था। पीछे से किसी कन्या ने आवाज दी। पंडित बेहद सख्ती दिखाते आगे बढ़ ही रहा था कि कन्या बगल में आ लगी।
"अरे उपधिया जी आप कल पहली क्लास में थे?"
"अ...अ... हाँ" पंडित के लिये चश्में से झांकती आँखे थोड़ी नशीली थीं।
"अरे मैं न कल आयी नहीं थी तो क्या आप कल का नोट्स देंगे"
पंडित उन कुछेक बालकों में था जिनके भीतर वृहद टैलेंट था। "अरे वो हम तो लाये नहीं हैं?"
"पर काॅपी पर तो आप लिख रहे थे"
"हाँ ये दूसरी थी"
"अरे तब मुझे नोट्स कैसे?"
"ह्वाट्सएस! ह्वाट्सएप कर देंगे हम" पंडित का टैलेंट छलक गया बाहर।
"हाँ ये ठीक है" और नंबरों का आदान प्रदान हो गया। डिपार्टमेंट के संदेश वाहक कबूतर यादव बंधु इस घटना पर पैनी नजर बनाये हुये थें।
पंडित के हाॅस्टल पहुंचने से पहले घटना पहुंच चुकी थी। हाॅस्टल के एक खास हिस्से में सुगबुगाहट थी। पंडित हाॅस्टल पहुंचा। उस हिस्से की नजर पंडित के कार्टून चेहरे पर जमीं थी। कहीं न कहीं हाॅस्टल में अखण्ड सख्ती और रंडत्व के पुरोधा पंडित के इस व्यवहार से सब अचंभित थे। पंडित धीरे से 25 ₹ वाला ताला खोलकर कमरे में हो लिया।
उस रात राजनीति विज्ञान को आवंटित हाॅस्टल के तमाम कमरों में सभी लड़के करवटें बदलते रह गये।

सुबह पंडित के दरवाजे पर मुंहअधेंरे ही कोई लिख गया था "दगाबाज रे" माहौल को देखते ये लाइन सटीक थी। पंडित थोड़ा लेट उठा और इतवार होने की वजह से खास जल्दी भी नहीं।
पंडित का दरवाजा खुलते ही गलियारें में आती जाती नजरें पंडित पर टिक गयीं। चूंकि रात को रोटियाँ थोड़ी दबाकर खायी गयीं थी तो सुबह में प्रेशर भी दबा कर था। नजरों पर ध्यान न देते हुये पंडित खाली शौचालय पर ध्यान देने बढ़ गया।
शौचालय में बैठे अभी दस ही मिनट हुये थे कि बगल वाले शौचालय से आवाज आयी "यार उपधिया ठीक नहीं किये तुम"
"कवन हव रे" कहते हुये पंडित ने फटाक से उठ गया।
माहौल को देखते हुये पंडित ने चाय पीने हेतू बाहर जाना उचित समझा और तेजी से श्रीवास्तव के कैंटीन पर निकल गया।

श्रीवास्तव कैन्टीन की खास बात यह थी कि बस 50 मीटर की दूरी पर दो - दो गर्ल्स हाॅस्टल था। पंडित जैसे को टैलेंट दिखाने का इससे बेहतर जगह कहाँ मिलता। 🤔
पसीने की सफेदी टीशर्ट पर लेकर चिपकी जींस पहने पंडित तेजी से श्रीवास्तव के यहाँ पहुंचा। विभिन्न प्रकार के फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल करने के बाद चमकाया हुआ चेहरा आज कुछ परेशान था।
एक चाय लेकर बाहर लगे पत्थर पर बैठ गया। किसी गहन चिन्तन में डूबा था पंडित।
तभी बगल से आवाज आयी, "उपधिया ठीक नहीं किये तुम"
पंडित ने इस जानी पहचानी लाइन पर नजर उठायी। सामने हाथ में कुल्हड़ पकड़े राय साहेब खड़े थे।
"तो तुम ही थे जिसने हमें हगने तक नहीं दिया" पंडित ने चाय सुड़कते हुये बोला।
"अरे बोलो मत तुम यार, मतलब अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष हुआ करते थे तुम हाॅस्टल लेवल पर। मारे हो लुटिया डुबा दिये" राय साहेब भड़क गये।
"देखो यार, तुम गलत समझ रहे। वो तो बस...."
"चुप रहो तुम अच्छा" कुल्हड़ फेंकते राय साहेब आगे बढ़ गये।

11 बजे नहा धो लेने के बाद पंडित क्लास करने पहुंचा। कबूतर यादव बंधुओ के अथक परिश्रम से पूरी क्लास बौरायी थी। घुसते ही सबकी नजरें पंडित की तरफ थी। पंडित ने गौर किया कि वो लड़की आज नहीं आयी थी।
न जाने काहे पंडित का मन क्लास में न लग रहा था। पहली क्लास गुजरते ही वह बाहर निकल कर वीटी की तरफ हो लिया। काॅमर्स फैकल्टी के सामने ही पहुंचा था कि वो लड़की आगे जाती दिखी।
'जय हो बाबा "ठोका वाले"  मनाते हुये पंडित ने कदम तेज कर लिये।
पंडित तेजी से उस लड़की के बगल में पहुंच कर उसके साथ चलने लगा, इस तरह जैसे उसे देख न रहा। कमाल रहा कि वह भी नहीं देख रही थी। पंडित उससे आगे निकल कर धीरे हो गया कि शायद अब वो देखे, पर वो मोबाइल में घुसी पड़ी थी। खुद लड़की से बात करना पंडितवा की तौहीन थी। अचानक पंडित का टैलेंट छलका। उसने मोबाइल निकाला और मैसेज किया है। "हाय"
"हलो" लड़की ने जवाब दिया।
"कहाँ हैं आप"
"आप कहाँ है क्लास न कर रहे क्या?"
"काॅमर्स फैकल्टी के सामने हैं, लाइब्रेरी जा रहे" पंडित का टैलेंट उछल रहा था।
"अरे हम भी वहीं हैं"
"सच्ची!  हम तो बस अभी भी गेट क्राॅस किये हैं" कहकर पंडित ने अपनी गति रोक दी।
लड़की ने इधर उधर नजरें दौड़ायी। पंडित सामने ही था। उसे कनखियों से आता देख पंडित ने फोन कान पर लगाया 'हाँ,
"अच्छा वीटी आ रहे"
"बस दस मिनट रहेंगे"
"ठीक है आओ"
तभी पीछे से आवाज आयी। "उपधिया जी"
"अरे आप! ये तो सच में कमाल है न। हेंहेंहें 😄 हम आपको क्रास करके आ गये शायद और आपको देखा भी नहीं" पंडित का टैलेंट उफान पर था।
वीटी पहुंचकर पंडित रूक गया।
"क्या हुआ आप तो लाइब्रेरी चल रहे न" लड़की ने पूछा।
"नहीं वो आर.वी. आने वाला है तो उसी से दस मिनट मिल लें। बेचारा बहुत दिनों पर आ रहा"
"ओह"
"आप भी रूकिये, बस दस मिनट में चलते हैं" पंडित ने अपना आखिरी दाँव खेला।

भाग भागकर चचा के यहाँ से चाय और गर्मागर्म कचौड़ी लड़की खातिर ले आया ही था कि पीछे से किसी ने कनथोपड़ी लगाय दी।
"का बे, का कर रहे हो?"
"तुम... तुम यहाँ कैसे..." आर.वी. को देख पंडिऔ चौंक गया।
"सोमपापड़ी के, हम तो यहीं हैं सुबह से तू का कर रहा, क्लास ना है?"
"ये कौन हैं उपधिया जी." लड़की हाथ में कचौड़ी थामे चश्मे के पीछे से आर.वी को देख रही थी।
"हम आर.वी. हैं, इसके हाफ पैंट वाले यार" आर.वी फटाक् से बोला।
"उपधिया जी, आपने ही तो इनको मिलने को बुलाया था न, ई तो सुबह से यही हैं, आप कह रह थे बहुत दिन पर आ रहें" लड़की की आँखे पंडित पर थी।
"हैं! 😖 हाँ, हाँ हम ही बुलाये थे। है न आर.वी., तुम .... तुम बताओ न" पंडित को अपने पेट में कुछ गुड़गुड़ महसूस हुआ। शायद टैलेंट ज्यादा होने से हाजमा बिगड़ गया था। 😯

"अबे हम का बतायें बे। ई सब ठीक नहीं कर रहे तुम पंडित" आर.वी. ने जानबूझकर धीरे बोला।
"क....क...क्या! हम क्या किये" पंडित हकबका गया।
"यही की भौजाई को बाहर खाने के लिये ले जाना चाहते हो और हमको फंसा रहे, भच्च से मारेंगे" आर.वी. लड़की की ओर इशारा कर मुस्कुराया।
"अरे यार..." पंडित कुछ कहता कि लड़की की नजर पंडित पर आ जमीं।
"उपधिया जी। ये सब क्या है? आप ये सोचते हैं!" 😠 लड़की की आँख चश्मे के भीतर से और नाक बाहर से लाल हो गयी।
"व..वो...वो... ये.. नहीं.." पंडित की फट पड़ी थी। उसने आर.वी. को रूंआसे नजरों से देखा।
"अरे घबराइये मत, मैं मजाक कर रही। साथ में खाना है न, चलिये, मुझे भी भूख लगी है। बस ये भौजाई मत बोलिये आप लोग...." उसने आर.वी. की ओर देखा "चार बच्चों की अम्मा वाली फीलिंग आती है 😒" लड़की कहकर ऑटो की तरफ बढ़ने लगी।
"हैं!" 😨 पंडित और आर.वी. दोनो एक दूसरे को देखने लगे।

आर.वी. ने तुरन्त श्री को फोन लगाया और पंडित से कहा 'तू क्लासिक चल हम आते हैं।' पंडित जानता था कि शायद साथ रहना जरूरी है। वह चुपचार सिर हिलाकर आगे बढ़ गया। मन ही मन खुश हो रहा था, उसे टी.वी. वाला एड याद आ रहा था "बेटा... मन में लड्डू फूटा" 🤡
"हलो, कहाँ मर रहा बे" आर.वी. ने फोन उठते ही बोला।
"अबे क्लास में हैं" धीरे से आवाज आती श्री की।
"फटाक् से निकल और क्लासिक पहुंच"
"अबे क्लास है बे"
"भक खोपड़ी के, पंडितवा डेट पर गया है, चल चरस बोते हैं और ससुरा तुझे सुन्दरपुर से आने मे कितना टाइम ही लगेगा। जल्दी आ" 😬 😈
"ई बात है, रूक बस पहुंचते हैं" आर.वी. ने फटाका अपनी पैसन प्लस को स्टार्ट किया पर वह बंद हो गयी। 'लगता है, अब सर्विस करवानी ही पड़ेगी" 😓
"चचा, जरा धक्का लगावा हो" एक प्राॅक्टर वाले से धक्का लगवा कर जैसे तैसे क्लासिक कैफे पहुंचा। जहाँ पंडित और भावी पंडिताइन गुटर गूं कर रहे थे। बगल वाले टेबल पर खुले आसमान के नीचे आर.वी. भी विराजमान हुआ। बीच बीच में पानी पीते हुये पंडितवा का ठरकीपन देख रहा था। वह कैसे लड़की का हाथ छू रहा था। तब तक श्री भी आ गया। वह भी बगल से निकलकर आर.वी. की टेबल पर आ बैठा।
भोजन कार्यक्रम शुरू हुआ। पंडित बेचारा सूखड़ा खाने वाला शाकाहारी पर लड़की शायद माँस ही खाती थी, मिला नहीं तो ढ़ेर सारा आइटम मँगाया।
आर.वी. और श्री अपना छोला भटूरा भूलकर उसकी थाली को देख रहे थे और पंडित मूतने के बहाने अपना पर्स देख आया।
'सिर्फ 300₹' 😞😢
उसने इशारा किया आर.वी. को और आर.वी. श्री को शायरी सुनाने लगा -
"बड़े बड़ों के कटे इशक में, अबकी लंगोट की बारी है
दूर शहर की है वो, दुबली पतली एक लौंडिया पंडित पर भारी है" 😄

पंडित ने मुंह बनाया तो श्री ने कहा "अबे दे दो साले को, नहीं तो रोने लगेगा"
"अबे झोपड़ी के, तू भी पैसा नहीं लाया है 😳" आर. वी. चौंक गया।
"तू भी का मतलब, अबे बर्तन मंजवायेगा का" श्री के माथे पर शिकन आ गयी।
"तू खाली खाने आया कुत्ते" आर.वी. ने श्री को आँख मारी।
श्री समझ गया था, और दोनो बहस करने लगे।
इधर पंडित की हालत पतली हो चुकी थी। दोस्त कमीने बनाओ, ठीक है, पर कंगाल कभियो न बनाओ। यह बात उसके भेजे में घुस गयी।
वह उठ कर गया दोनो के पास। "अरे यार देखो अगर मजाक कर रहे तो यह मजाक बहुत बुरा है। पैसे दो यार, बेइज्जती हो जायेगी"
"पैसे, कैसे होते हैं बे। क्या बे श्री तूने देखे हैं क्या कभी" कहकर आर.वी. हँसने लगा और श्री भी...

शायद लड़की पंडित की हालत समझ चुकी थी। वह बोली "अरे उपधिया जी, सुनिये न"
"ह... हाँ कहिये" पंडित भागकर आया।
"हमने बिल दे दिया है, चलिये"
"अरे ऐसे कैसे हम दे रहे थे; आप क्यूं दीं। ये तो गलत है..." पंडित ने माहौल को सम्भाला।
"अरे नहीं, कोई रुल थोड़े है कि लड़का ही दे पैसा" लड़की की आँखो में शरम आ गयी। 😶
"अरे पर, हमें बहुत बुरा लगा रहा" पंडित का टैलेंट छलक ही रहा था कि..
"अबे पंडित ज्यादा फील न कर। हमारा बिल दे दे, मात्र 120₹ है। शायद इससे तेरा बुरापन कुछ हो" 😜 आर.वी. कहते हुये निकल गया और पीछे श्री ने कंधा थपथपाया "दोस्त, तुम्हारे इस योगदान को स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा" और बाहर निकल गया।
पंडित अब तक ये समझने की कोशिश कर रहा था कि वह पहले से ही इतना चूतिया था, या अभी अभी ये दोनो उसे बना गये थे। 😒

क्लासिक कैफे पीछे छूट गया और पंडित हाॅस्टल लौट आया। आर.वी और श्री भी घर हो लिये। काफी दिनों तक पंडित की खबर न लगी क्योंकि सब अपनी अपनी व्यस्तता में थे।
पहला समेस्टर तेजी से बीत रहा था और दिसम्बर में परीक्षा से पहले श्री हाॅस्टल पहुंचा।
"का बे, कैसे हो" रूम 71 खोलते ही सामने पंडित चीथड़े हुये मुर्गे जैसे पड़ा था।
"अरे मित्र आओ आओ" पंडित की शायद तबियत खराब थी।
"का हुआ, ऐसे काहे पड़े हो" श्री थोड़ा चिंतित हुआ। तब तक उसका ध्यान चाइना बूफर में छनन छनन बज रहे गाने पर गया।
"पियवा से पहिले हमार रहलू" 🤤🤤
श्री को माहौल समझते देर न लगी, उसने तुरन्त आर.वी. को फोन किया।
"बोल बे"
"कहाँ मर रहे"
"अभी तो कबर खोद रहे, मरे नहीं हैं"
"हाॅस्टल आओ बे, पंडितवा का LKD लग गया" 😝
"तू देख कि मर न जाये, हम आ रहे"

करीब आधे घंटे में आर.वी. हाॅस्टल पहुंचा। दरवाजा खोल कर अंदर घुसा ही था कि देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गये।
पंडित फूट फूटकर रो रहा था। छनन छनन गाना बज रहा था "सांस भी चले ना जेतना याद तोहार आवेला अईसन हलातिया हो गईल गुजरल जमाना हमके बहुते सतावेला"
वह भीतर तक काँप गया। पंडित के पास पहुंचा और एक झापड़ खींच के दिया।
"भैंस के बच्चा जैसा चिल्ला काहे रहे ससुर, कान में दर्द हो गया हमरे" 😬

थप्पड़ जोरदार था शायद। पंडित चुप हो गया। आर.वी. ने बाॅटल में रखा बासी पानी गटका, टेबल पर पड़ी दालमोठ की 57₹ वाली नमकीन को फांका और बैठ गया।
पंडित चुपचाप टेसूएं बहा रहा था। जाहिर था कि यह दर्द थप्पड़ का है।
श्री ने आर.वी. को इशारा किया। आर.वी. ने मुंह बनाया फिर....
"ऐ पंडित, बोलो न बे का हुआ"
"कुछ नहीं" भर्राये गले से बोलने में पंडित की नाक बह गयी।
"भक ससुरा, इसी से खून जल जाता है; कितना गंदा है बे" आर.वी. तुनक गया।
"सुनो तुम उसको छोड़ो पंडित, बताओ हुआ क्या।" श्री ने मरहम सा लगाया।
"हाँ और पहले इनके सुहागरात के गाने तो बंद करो" चाइना बूफर की ओर इशारा किया आर.वी ने।

मान मनौवल के बाद आखिरकार मधुबन में जाकर दो काॅफी पेट में उड़ेलने के बाद पंडित बताने को तैयार हुआ।
"यार, हम दोनो के बीच सब सही था। इतना खूबसूरत रिश्ता था पर फिर दूरियाँ बढ़ गयीं और...."
"पंडितवा सीधे सीधे बोल की कट गया। ज्यादा रामकथा मत सुना" आर.वी फिर बिगड़ा।
"तुम दो मिनट चुप बैठोगे" पंडित की पीठ पर थपथपाते हुये आर.वी को श्री ने झिड़की दी।

"सब सही था। उस दिन कैफे से आने के बाद और उसके हफ्ते भर तक। फिर हफ्ते भर बाद वो क्लास के बाहर मिली हमसे" पंडित ने गहरी सांस ली।
"जरूर भूख लगी होगी भूख्खड़ी को" श्री ने आँखे फैलायी।
"तुम लोग तो यार, सुनोगे हमारी भी" पंडित फिर रूआसा होने लगा।
"एक काम करो तुम रो लो, मैं बता रहा हूं" पंडित के पीछे से संदेशवाहक कबूतरों में बड़े कबूतर धीरज यादव की आवाज आयी।
उसने बीच में अपनी जगह बनायी और शुरू हो गया..
हुआ दरअसल ये था कि ;
लड़की पंडित का बाहर इंतजार कर रही थी और जैसे ही पंडित बाहर निकला धरा गया।
"उपधिया जी, आपसे बहुत जरूरी बात करनी थी" लड़की ने पंडित से कहा।
"जी कहिये न" पंडित ने आसक्त होते हुये कहा।
"यहाँ नहीं, अकेले में..." लड़की ने निगाह झुका ली।
"अकेले में! अ..अ... एक मिनट मे आते हैं हम" पंडित भागकर राजनीति विभाग के पीछे मराठी विभाग वाले वाशरूम में घुसा। छपाछप्प मुंह धोकर जेब से फेयर एण्ड हैण्डसम की छोटी वाली पाऊच निकालकर क्रीम मुंह पर रगड़ा और भागकर आया।
"जी चलिये"

और दोनो अकेला बाबा के सानिध्य में पहुंचे। लड़की काफी देर तक चुप थी। पंडित का दिल बल्लियों उछल रहा था। 'पट गयी बाबा'😌
"कुछ कहना था न आपको" पंडित ने उसपर निगाह डाली।
"जी, पर समझ न आ रहा कि कैसे कहूं" 😶
"कैसे भी कहिये हम समझ लेंगे" पंडित ने छाती चौड़ी की अपनी।
"व..व...वो न, उस दिन जो क्लासिक में हमने बिल दिया था न,... जबकि खाना आप खिलाने ले गये थे। वो पैसा हमें चाहिये"  😒 लड़की ने निगाह नीचे की।
'हैं! ये कहना था! शरमा ऐसे रही जैसे बच्चे की माँ बनने वाली है😡😠' पंडित ने मन ही न कहा और फिर लड़की से मुख़ातिब हुआ
"अभी तो महीना खतम हो रहा, अभी पैसा कैसे?"
"मैं वो सब नहीं जानती" पिछले वाले ने जो रिचार्ज कराया अब उसका पैसा माँग रहा। आप तो बस मेरा पैसा दो, नहीं तो वो मेरे घर तक पहुंच जायेगा"
"पर... 5-6 दिन रूकिये तो फिर"  पंडित लाचार था, उसके पास सच में पैसे न थे।
"ऐ सुनो बे, कल तक पैसा चाहिये नहीं तो समझ लेना। मुझे ज्यादा नौटंकी नहीं सुननी" कहते हुये लड़की चली गयी।
जैसे तैसे पंडित ने उसका पैसा दिया और सच्चे प्यार से धोखा मिलने पर देवदास बन गया है।

यादव ने एक बार में पूरी जीवनी लिख डाली। श्री और आर.वी  ने एक दूसरे को देखा, फिर पंडित को और हँस हँस के लोट पोट होने लगे। "अबे कट गया रे पंडित का" 😝😝

"अरे यार तुम लोग मजाक बना रहे हो। तुम कंगलो को का पता प्यार का होता है, आजतक एक भी देख कर हँसी है तुम कमीनो को" पंडित भड़क गया और यादव निकल लिया वहाँ से।
"अबे कंगला किसे बोला पंडित। कभी एक समोसा तक के पैसा दिये हो तुम। मैत्री तक में जल और पान का पैसा हमी दोनो देते हैं साले, बता रहे एक लाफा मार देंगे खींच के" 😏 श्री ने धम्म से एक मुक्का पंडित के पीठ पर जमाया।
"हाँ हमारी तरफ से एक और लगा" आर.वी. ने भी हाँ में हाँ मिलायी।
"अरे मतलब, लड़की के मामले मामले में कंगले हो तुम दोनो"पंडित पीठ सहलाते हुये बोला।
"😐 ओह, तब ठीक कहे बे तुम" दोनो ने एक साथ सहमति दी।
"हाँ तो हम कह रहे थे कि...." पीछे से फिर यादव की आवाज आयी।
"तू फिर आ गया खबरी चूहे.. 😡" पंडित लाल पीला हो गया।
"जैसा कि मैं कह रहा था, उपधिया जी 😝 उसकी लाइफ में तुम ही नहीं थे। न जाने कितने ही कनौजिया जी, सुनो जी, अरे ठाकुर जी, मुश्ताक जी और 😌 यादव जी भी थे।"
"😨😨😨😬" तीनो शायद सदमें में थे।
"ऐ भाई, इस लड़की का कवनो जात-पात, दीन धरम है की नहीं? जो मिला सफर में उसी हो ली" 🤤 आर.वी. खौफजदा था।
"ऐ पंडित नाम का था उसका" श्री ने पूछा।
"कियारा" पंडित ने आहें भरी।
"पूरा नाम बोल बे...." आर.वी. ने गुस्से से कहा।
"इतना ही पता है यार, सब यही जानते हैं" पंडित ने अफसोस जाहिर किया।
"उफ्फ... सुनो, पंडित का ऐसी लड़की से कटा जो सबका काटती है, ये किसने फैलायी रे" आर.वी. गुस्से में था। इस बात पर सभी ने यादव की ओर देखा।
"क्या! मैं, मैं तो यहाँ हूं ही नहीं.... तुम लोगों को जानता ही नहीं 😒😬 अरे यार देखो, अब क्या है कि आदत से मजबूर हूं न" कहते हुये यादव फटाक से मधुबन से बाहर की ओर निकल गया।
"पंडित, दुपट्टा रखे हो का बे" आर.वी. ने पंडित को देखा।
"नहीं। काहे"
"रख लो ससुर, नाक कटा दिये हो पूरा, अब शकल ढक के चला करो" आर.वी. ने कहा और सबको चलने का इशारा किया।
यादव के चुगलखोरी से गुपचुप सबको पता चल गया था। पंडित को कोई हमदर्दी की निगाह से देखता और लड़कियाँ हँस पड़ती देखते ही। क्लास जाना दूभर हो गया था और पंडित देवदास बना फिर रहा था।

खैर, वक्त बीत रहा था और फर्स्ट समेस्टर पेपर बीत चुका था। इनटर्नल रिजल्ट देखने पंडित फैकल्टी पहुंचा।

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