हाय माँ.. ठोकर लगते ही मनकू को दर्द की वो तेज लहर उठी के माँ याद आ गई, अपने ही मुँह से माँ शब्द निकलता सुन मनकू खुद से ही शर्मिंदा हो गया, अभी महीने भर की ही तो बात है, जैसे ही थके हारे मनकू घर के पास पहुंचा तो घर से उसकी बीवी सुरमई के चिल्लाने की आवाज़ें आईं, आस-पास के लोग घरों से बाहर निकल उसके घर की और ही कान लगाए थे, अब आज कौन सा बखेड़ा हो गया, यही सोचते हुए उसने घर मे कदम रखा...

सुनो जी... मैं आज कहे देती हूँ, या तो तुम्हारी माँ रहेगी घर में या मैं रहूंगी..
अब क्या हो गया सुरमई..क्यों कानों के पर्दे फाड़े डाल रही है..
ये पूछो क्या नहीं हुआ.. तुम्हारी माँ तो घर लुटाने को बैठी है, मैं थोड़ी देर को बाज़ार क्या गई, अपनी मुँह झोसी सहेली को बुला ली, खूब ढूध डाल के चाय बना के पिलाई उसे, और तो और मुन्ना के दो चॉक्लेट वाले बिस्किट भी खिलाई, अरे कोई हराम का पड़ा है क्या हमारे यहाँ, दिन-रात कौड़ी कौड़ी जोड़ते हैं और ये है के लुटाने पे तुली है..
अरे बस कर.. पूछता हूँ माँ से, तू शांत हो जा, सब तमाशा देख रहै हैं..
अभी कहाँ हुआ तमाशा.. अगर ये यहाँ से नहीं गई , तो मैं चली, फिर होगा तमाशा, मेरे बापू के घर कमी नहीं किसी चीज़ की..

मनकू कुछ ना बोल के माँ के पास जा पहुंचा.. घर के पिछवाड़े गायें के बाड़े के पास कुछ खरपचियाँ डाल ईंट की दो दीवार खड़ी कर दी गईं थीं, उसी में माँ की चारपाई थी जिसपे वो बैठी रहती, उकता जाती तो घर के बाहर नीम तले जा बैठती, घर के सारे ही काम माँ की जिम्मे थे, एक रसोई छोड़ के, रसोई में तो बस सुरमई का ही राज चलता था, माँ कभी कुछ ना कहती, कभी कभी आंखे बरस पड़तीं तो साड़ी के पल्लू से यूँ पोंछ लेती जैसे आँसू गलती से आ गए, दो बच्चों की माँ रामकली आज अपने ही घर में बोझ थी, पति तो भरी जवानी में छोटे छोटे बच्चों को छोड़ चल बसे, सबने दूसरे ब्याह पे कितना ज़ोर दिया पर वो ना मानी, पति के जाने का दुःख मन मे समा उसने खेती बाड़ी करने के लिए कमर बांध ली, दिन रात की मेहनत से उसने दोनो बच्चों को पाला, बेटी पुष्पा का ब्याह कर फिर दो साल बाद मनकू का ब्याह भी शान से किया, यूँ तो मनकू का नाम माणिकलाल था, पर सभी उसे मनकू ही कहा करते, मनकू को गाँव के ही किसान किशनलाल की लड़की सुरमई से प्रेम हो गया, आठवीं फेल सुरमई देखने मे ठीक ही थी, जबकि रामकली ने बहु के रूप में अपनी सहेली गौरी को पसंद कर रखा था, पर मनकू की जिद्द के आगे वो कुछ ना बोल सकी...

सुरमई जब से घर में आई घर क्लेश का मैदान बन गया, कोई पड़ोसी ऐसा ना बचा जिससे सुरमई ने झगड़ा ना किया हो, झगड़ती भी यूँ के सामने वाले को उसके मुँह से निकली गालियाँ सुन के शर्म आ जाए, दिन रात उसका हाल चाल पूछने वाले पड़ोसी अब उनके घर झांकते तक ना थे, रामकली को इतना सदमा था के वो धीरे धीरे बीमार रहने लगी, पर उस बीमारी में भी वो घर के काम करती रहती, खाने को वही मिलता जो सुरमई थाली में दे जाती, शुरू शुरू में तो उसने मनकू से दो चार बार शिकायत भी की, पर कोई असर होता ना देख उसने अपने मुँह पर ताला लगा लिया, अब वो किसी से कोई बात ना करती, पर अंदर ही अंदर घुलती जा रही थी, पुष्पा तो अब आती ही नहीं थी, उससे माँ की ये हालत देखी नहीं जाती थी....

माँ ओ माँ... क्या हुआ आज फिर, ये सुरमई क्या कह रही है, कौन सहेली ऐसी थी तेरी...
गौरी की माँ... रामकली ने धीरे से ऐसे जवाब दिया जैसे उसने कोई चोरी कर ली हो...
क्यों..
वो बेटा गौरी की शादी तय हो गई है .. निमंत्रण देने आए थी, तो मैंने चाय बना दी, पर कसम से एक चम्मच दूध ही डाला था, अब खाली चाय देना अच्छा नही लगता तो मुन्ना के दो बिस्किट भी आगे रख दिये थे...
क्या ज़रूरत है सबसे रिश्ते रखने की... तुम्हें भी ना चैन नहीं है माँ, थका हारा घर आता हूँ तो तुम दोनों चैन नहीं लेने देती हो, देखो माँ, अगर तुम्हारी बहु को ये सब नहीं पसन्द तो मत करो ना ये सब, घर में मुन्ना है ना उसका ध्यान रखो, वक़्त कट जाएगा, वरना साथ रहना मुश्किल है, सोच लो...

रामकली के मुँह से कोई शब्द ना निकला वो बस आंखें फाड़े अपने सपूत को देखती रह गई....

छह दिन बाद सुबह घर में रामकली कहीं दिखाई नहीं दी, मनकू ढूंढ़ने निकला तो सुरमई ने उसे मना कर दिया..
कोई ज़रूरत नहीं है ..गई होगी अपनी सहेलियों के यहाँ..
पर देख तो आऊँ..
मैंने कहा ना के नहीं...
चाहते हुए भी मनकू माँ को ढूंढने नहीं गया... रात हो गई पर रामकली का कहीं कोई पता नहीं था, दूसरे दिन ढूंढने पर भी वो सारे गाँव मे ना मिली...

आज उसे गए हुए एक महीना होने का आया..मनकू और सुरमई तो जैसे उसे भूल ही गए, कभी मुन्ना याद करता तो उसे बहला दिया जाता, आज मनकू को फसल कटाई करनी थी, दो मजदुर साथ के वो खेतों पर पहुंचा, अभी कटाई शुरू किए उसे एक घण्टा भी ना हुआ था के एक आवाज़ ने उसके हाथों को रोक दिया...

माणिकलाल ..माणिकलाल... अपना नाम सुन वो चोंक गया, गाँव मैं तो उसे सभी मनकू कहते थे, उसने देखा तो एक काले कोट वाला आदमी हॉथ में कुछ कागज़ लिए उसे पुकार रहा था, साथ में पुलिस वर्दी में एक हवलदार भी था, वो जल्दी से गमछे से हाथ पोंछता हुआ उनके पास पहुंचा...
जी.. मैं हूँ माणिकलाल..
हूँ... पिता का नाम मदनलाल..?
हाँजी..
माँ का नाम रामकली..?
हाँजी..क्या बात है..
तुम्हारे नाम कोर्ट का नोटिस है...ये खेत और तुम्हारा घर जहां तुम रहते हो श्रीमती रामकली के नाम हैं, तुम खेत में नहीं आ सकते और वो घर भी चार दिन में खाली करना होगा, उस घर से तुम बस वही ले जा सकते हो जिसका बिल तुम्हारे नाम है... ये कोर्ट का आदेश है, अवमानना करने पर गिरफ्तार हो सकते हो, रोको कटाई..
साहब ये आप क्या कह रहे हैं...मैं रामकली का बेटा हूँ..
अरे वाह रे बेटे...जिसे ये नहीं पता के उसकी माँ एक महीने से आश्रम में पड़ी थी ..हवलदार के चेहरे वे तंज वाली हंसीं आ गई..
साहब मैं तो ढूंढ रहा था...
अबे बस कर... कानून से बंधा हूँ, वरना तेरे जैसे बेटे की तो मैं.... चल भाग यहाँ से...

मनकू के होश उड़ गए..अब क्या करेगा वो, कैसे अपना परिवार चलाए..घर की और बढ़ते हुए ठोकर लगने पर माँ ही याद आई, आज अपने आप पर वो बहुत शर्मिंदा था, पर अब क्या हो सकता है, सच ही कहते हैं के माँ धरती है, उसकी सहने की क्षमता बहुत है पर अगर गुस्से में आ जाए तो दुनिया हिला दे, आज मनकू की दुनिया भी हिल चुकी थी..

दो दिन बाद रामकली अपनी बेटी पुष्पा और दामाद के साथ दरवाज़े पर खड़ी थी,, उनके साथ पुष्पा का देवर धीरज भी था, जो अब वकील बन चुका था.. माँ को दरवाज़े पर देखते ही मनकू ने लपक कर माँ के पैर छुए, पर रामकली ने उसकी और देखा तक नहीं...

माँ..मुझे माफ कर दो, ऐसे मुँह मत मोड़ो..
मुझे तुझसे कोई बात नहीं करनी..
ऐसा मत कहो माँ..चाहे तो मुझे मार डालो.. मनकू माँ के पैरों पे सर पटकते हुए बोला..

सुरमई की तो कुछ बोलने की हिम्मत ही नहीं थी, बस हाथ जोड़े सास के सामने खड़ी हो गई, रामकली ने फिर भी उसकी और नहीं देखा तो उसने मुन्ना को उसके आगे खड़ा कर दिया, और मुन्ना के दादी कहते ही बर्फ बनी रासमकली पिघल उठी, उसने मुन्ना को उठा के सीने से लगा लिया तो सुरमई की कुछ हिम्मत बंधी ...

माँ... मुझे माफ कर दो, गलती तो मेरी है, उसमें आपके बेटे और मुन्ना का कोई दोष नही है, मैं चली जाती हूँ, पर अपने पोते को उसकी जड़ों से अलग ना करो, उसे अपने पास रहने दो, मेरे साथ रह कर कहीं मुझ जैसा ना बन जाये...

तेरी जगह अब मेरे घर में भी नहीं है सुरमई... तभी सुरमई की माँ ने भीतर आते हुए कहा..
मां.. ये क्या कह रही हो, कहाँ जाउंगी मैं..
वो तू जान...तुझे शादी से पहले भी कितना समझती थी के अपनी आदतें बदल, दिल बड़ा रख, झगड़े मत किया कर, पर तूने कभी मेरी बात नहीं सुनी, यहां तक के अपनी दोनों भाभियों का जीना दूभर कर दिया था तूने, तेरी शादी के बाद मेरे घर में अमन चैन है, मगर दुख ये है के रामकली बहन का घर तूने उजाड़ दिया...
माँ.. ऐसा मत कहो, सुरमई फफक पड़ी..
ये रोना ही अब तेरी किस्मत है.. मैं बस इतना कहने आई थी के मेरे घर की और मत आना, तेरे लिए वो दरवाज़ा अब बन्द है...इतना कह सुरमई की माँ ने रामकली को हाथ जोड़े और निकल गई...
माँ.. माँ ..सुरमई पुकारती रही पर उसने मुड़ के नहीं देखा..

उधर मनकू अभी तक माँ के पैरों के पास ही बैठा था..और मुन्ना दादी की ठोड़ी पकड़ उसे बार बार अपनी और घुमाने की कोशिश में लगा था, रामकली ने इशारे से पुष्पा को बुला के मुन्ना को उसे पकड़ाया और खड़ी हो गई...

सुरमई...
हाँ माँ...
दालान के तख्त पे गद्दा बिछा के चादर लगा दे, आज सर्दी बहुत है रजाई निकाल दे, मैं दालान में ही रहूंगी अब, शाम हो गई चाय बना सबके लिए, और खाने में तेरी ननद क्या खायेगी पूछ ले, धीरज की पसन्द भी उसी से पूछ ले, दोनो खाना खा के ही जायेंगे...
हाँ माँ.. मैं अभी लाती हूँ, बस थोड़ी देर..सुरमई को जैसे मौत की सज़ा होते होते रह गई हो, वो जाती जाती पलट कर रामकली के पैरो में सर कर ज़ोर ज़ोर से रो पड़ी...
अब बस कर.. रामकली ने उसके सर पे हाथ रखते हुए कहा, और तू भी उठ मनकू, पेटी में से रजाई निकाल मुझे ठंड लग रही है...
अभी निकालता हूँ माँ... मनकू को जैसे पंख लग गए, उसने दालान में तख्त पे साफ सुथरा बिस्तर लगा कर दो तकिये और एक गोल तकिया भी रख दिया...

थोड़ी देर बाद सभी दालान में बैठे थे, रंगबिरंगी रजाई ओढ़े रामकली शान से तकियों वे टेक लगाए चाय पी रही थी, सुरमई ने चाय के साथ आलू और प्याज़ के पकोड़े भी तल दिए थे, के तभी गौरी ने दालान में कदम रखते ही कहा...
अरे वाह.. पकोड़े तो मैं भी खाऊँगी सुरमई..
हाँ.. हाँ आओ ना, ये लो, मैं चाय भी बना लाती हूँ और..
मैं चाय नही पीती सुरमई.. बस ये पकोड़े ही बहुत हैं, फिर वो रामकली की और मुड़ी..
तो मौसी... बड़ी सेवा हो रही है, वो ज़ोर से हँसी..
हाँ बेटा.. कब तक होती है ये देखना है..
ऐसा मत कहो माँ.. मैं मुन्ना की कसम खाती हूँ अब कोई गलती नहीं करूंगी..
तो सुन बहु...ये जो वकील और हवलदार आये थे ना वो सब नाटक था, तुम दोनों को सबक देने के लिए, और इसका आयोजन गौरी ने किया था, पुष्पा और धीरज के साथ मिलके, वो वकील जो था वो वकील ही है धीरज का सहयोगी, और जो हवलदार बना था वो गौरी था का होने वाला पति है रमेश, गौरी चाहती थी के उसकी शादी से पहले सब ठीक हो जाये और हम सब उसकी शादी में शामिल हों, पुष्पा तो उसके बचपन की सहेली है, मगर जो घर के हालात थे उसमे शादी में शामिल होना मुश्किल था...
ओह.. ये बात थी, पर आप एक महीना रही कहाँ.. सुरमई ने चोंक के पूछा..
मैं पुष्पा की सास के साथ यात्रा पे गई थी.. और भी कई औरते थीं हमारी उम्र की, धीरज ने ही बन्दोबस्त करवा दिया था, यहां से सुबह चार बजे निकल मैं सड़क तक गई बस पांच बजे आई थी, हम सीधे चार धाम की यात्रा पे निकल गए...
अब समझीं..पुष्पा ने हंसते हुए सुरमई से पूछा..
हाँ जीजी... सुरमई ने शर्मिंदगी से सर झुका लिया ..
अब मैं इसकी कोई बात नहीं सुनूँगा माँ.. जो तुम कहोगी वही होगा..
और यही होना भी चाहिए.. वरना ये नाटक कभी भी हक़ीक़त का रूप ले सकता है माणिकलाल... धीरज जो इतनी देर से चुप था सख्त जुबान में बोला...
नहीं नहीं.. अब कोई गलती नहीं होगी धीरज बाबू, मनकू ने हाथ जोड़े..
और माँ घर का कोई काम नहीं करेगी.. वही करेगी जो उसका मन चाहेगा...
वही होगा जीजी... सुरमई बोली..
बढ़िया जी बहुत बढ़िया पकोड़े हैं...अचानक गौरी बोल पड़ी तो सब हँस दिए...
हाँ याद रहे सबको.. बारह दिन बाद मेरी शादी है, सबको आना है, कोई बहाना नहीं, याद रहेगा ना ...
हाँ याद है...सब एक साथ बोल उठे... गौरी हंसती हुए निकल गई, पुष्पा और सुरमई रसोई में खाने की तैयारी में लग गईं, मनकू माँ के पैर दबा रहा था और धीरज मुन्ना के साथ तोतली जबान में बतिया रहा था, अब सब कुछ ठीक था, रामकली के चेहरे पे मुस्कान जो थी...!!

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