आज फ़िर से नीलिमा का पूरा बदन किसी फ़ोड़े की भांति ही दुःख रहा था। जबसे वह जोधपुर से आयी थी, जाने कैसा बुख़ार आ रहा था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। घर में पति और तीन तीन बेटों के होते हुए भी एक बेटी की कमी उसे सदा अखरती ही रही। शायद बेटी ही माँ का दर्द भली भांति समझ और जान सकती है।
दो तीन बार उसने अनुराग से भी बात करने का प्रयत्न किया और बेटों से भी, किन्तु किसी के पास भी कहाँ समय था उसकी बात सुनने या दर्द बाँटने का? ऐसे में कई बार अकेले में उसे बहुत रोना आता। आज भी जब वह एक क्रोसिन खा कर लेटी ही थी कि काम वाली बाई प्रेमा और उसकी बेटी ज्योति आ गईं।
प्रेमा तो रसोई में बर्तन साफ करने में व्यस्त हो गयी किन्तु उस 10-11 साल की बच्ची ज्योति से उसकी भीगी आँखें न छिप सकीं। नीलिमा के पास आ कर जब उसे छूकर बड़े प्यार से उसने पूछा," आंटी, क्या हुआ? आपकी तबियत तो ठीक है न?"
ये सुनकर तो उसका रोना ही निकल गया। इस समय उसे शायद प्रेम के दो बोल और थोड़े से समय की ही बेहद ज़रूरत थी। जब उसने देखा कि उसे तो तेज़ बुखार है, तब पूरे अधिकार से डाँट कर उसने नीलिमा को बिस्तर पर लिटा दिया और बोली, "आज आप कोई भी काम नहीं करोगे।" फिर बाकी के तीन घरों में फ़ोन करके कह दिया कि," आज मैं नहीं आऊंगी , मुझे कोई काम है।"
उसके बाद सारा खाना बनाकर, नीलिमा को तुलसी और अदरक डालकर चाय बनाकर पिलाई। फिर बोली, " आंटी जी, आप सो जाओ। मैं शाम तक आपके पास ही रुकूँगी जब तक अंकलजी और भैया लोग नहीं आ जाते।" उसके बाद उसका सिर दबाने लगी और पता नहीं कब वह नींद के आगोश में चली गयी।
तीन घण्टे बाद नींद खुली तो देखा, वो भी नीचे पलंग के पास ही ज़मीन पर उसके सिर पर हाथ रखे सोई पड़ी है। सच इतना प्यार और ममता उमड़ आयी उस नन्हीं सी बच्ची पर कि कोखजाये बेटे भी जो न कर पाए वो सेवा और प्यार उस बच्ची ने दिया जिस से खून का रिश्ता भी नहीं था।
नीलिमा से ये सारी बात सुनकर मेरे मन में आया, जाने क्यों लोग बेटियों को मार देते हैं या उनसे नफ़रत करते हैं ,जबकि वो तो ईश्वर के वरदान स्वरूप किसी बेहद भाग्यशाली घर में ही पैदा होती हैं।

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