महाभारत कथा-१

महाभारत
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एक महाकाव्य....एक कथा जिसमें सार है-
हम सबके जीवन का...
पर..
निश्चित रूप से ये सारी कहानियाँ हम सबने पहले कभी भी न सुनी होंगी।
तो आइए, "नारायण नमस्कृत्वा" आरम्भ करते हैं...

म हा भा र त

भारतीय सनातन संस्कृति का महान ग्रन्थ जय, विजय, भारत और महाभारत इन सब नामों से प्रचलित है।
इसमें अमूल्य रत्नों के अपार भंडार छुपे हैं।
इस महान महाकाव्य की तुलना विश्व की किसी भी रचना से करना सूर्य के प्रकाश में दीप जलाने के तुल्य है।

भगवान वेदव्यास ने इसमें वेदों के गूढ़ रहस्य, उपनिषदों के सार, पुराण, इतिहास, व्याकरण, संस्कृति, दर्शन, भूगोल, नक्षत्रज्ञान, तीर्थों की महिमा, धर्म, भक्ति, प्रेम, अध्यात्म, कर्मयोग और ज्ञान-विज्ञान-व्यवहार इन सब के गूढ़ अर्थ भर दिए हैं।

एक लाख से अधिक श्लोकों वाला ऐसा महाकाव्य न कभी पहले लिखा गया और न भविष्य में लिखा जा सकता है।
'न भूतो न भविष्यसि'।

ऐसा कहा जाता है कि जो कुछ भी इस अनंत और नश्वर विश्व मे कभी घटा या कभी घट सकता है, तो वह सब इस महाकाव्य में है।

कई स्थानों पर ऐसी भ्रांति है कि महाभारत को घर में रखना या पढ़ना अशुभकारी होता है पर यह सही नहीं है।
इस ग्रंथ में ही विस्तार से इसे पढ़ने के लाभ दिए गए है।
कुछ विद्वतजनों ने अपनी विद्या पर पकड़ बनाए रखने के लिए सम्भवतः ऐसा कहा होगा जिससे कि अपात्र के पास यह ज्ञान पहुँच न सके।

वास्तव में नकारात्मकता और अधर्म मनुष्य के हृदय में भले ही स्थान नहीं बना पाते पर वह मस्तिष्क पर शीघ्र ही अधिकार कर लेते है।

दो पीढ़ियों पहले तक इसकी कहानियाँ घर-घर में सुनाई जाती थीं, लोग इस महान ग्रंथ काव्य के बारे में बातें करते थे पर आज कुछ लोग ही इनके पात्रों के नाम भर जानते हैं।

सनातन परंपराओं के लगातार क्षरण के साथ ही अगली पीढ़ी सम्भवतः इससे पूर्णतया अनभिज्ञ ही रहेगी।
महाभारत पर बने टीवी के धारावाहिकों से जनसाधारण में कुछ अच्छी जानकारी अवश्य प्राप्त हुई पर यह कुछ मूल पात्रों तक सीमित रह गई।

यह महाकाव्य इतना छोटा नहीं जितना दिखाया गया।
यह कुल कथाओं का दो-पाँच प्रतिशत से अधिक न था।
वैसे भी समयाभाव से इस पूरे ग्रँथ के छह-सात सहस्त्र पृष्ठों का अध्ययन करना और इसे समझ पाना इतना भी सरल नहीं है और इससे भी बड़ी बात यह कि बिना भगवतकृपा के कदापि सम्भव नहीं है।

वैसे तो इसकी सैकड़ों टीकाएँ और हजारों अनुदित संस्करण विभिन्न भाषाओं में पहले से ही उपलब्ध हैं पर इसकी कहानियाँ अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक तरीका यह भी था कि इसे बोलचाल की सरल भाषा में लिखा जाए और सोशल मीडिया के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए।

यह तय है कि जब तक भगवान की कृपा न हो तब तक आप एक इंच भी आगे बढ़ नहीं सकतें।
इसे पुस्तक के रूप में अभी तक प्रकाशित करने की स्थिति नहीं है पर इसे छोटे कथानक अंश रूप में अपने ब्लॉग आदि पर लेखन का आरंभ कर दिया जाना चाहिए ऐसा मानस बनाया है।

इस ईश्वरीय रचना को न तो कहीं से कॉपी किया गया है और न ही इसमें अपनी ओर से कथानक को बदलने जा प्रयास किया गया है।

ईश्वरेच्छा से एकाध स्थानों पर कुछ अलग तथ्य आए हैं जो हमारी सनातन संस्कृति के सर्वथा अनुकूल ही हैं।

मौलिकता तो मात्र भगवान व्यासजी का अधिकार रहा है पर उनके असीम विस्तृत महाकाव्य से कुछ घटनाओं को अपनी आज की भाषा मे संकलन का या प्रयास वैसा ही है जैसे समुद्र से कोई अपने कार्य के लायक कुछ लोटे जल भर ले। यह पूर्ण रूप से स्वलिखित है, अब तक अप्रकाशित भी है। टंकण आदि भी स्वयं ही किया गया है अतः भाषाई त्रुटियों हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ।
कोई भी त्रुटियाँ पाठकों को मिले तो अवश्य ध्यान दिलाएँ जिसे सुधार कर प्रसन्नता होगी।
आगे हरि इच्छा..।

कथा प्रवेश
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ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

--पौलोम पर्व-- 1

वर्षों से समाधिस्थ भगवान शिव ने आज जैसे ही अपने नेत्र खोले, चहुँ ओर का वातावरण ही जैसे जीवंत हो उठा।
वृक्ष पुष्पदलोंसे लद गए, उनपर भौरें गुंजन करने लगे और मानो वसंत छा गया।
कुमार कार्तिकेय और श्रीगणेश ने नंदी महाराज और गणों समेत शिव के सम्मुख साष्टांग दंडवत प्रणाम किया।
माता पहले ही अपने देव को नमन कर सुरम्य वातावरण का अवलोकन कर रहीं थीं।
इतनी लंबी समाधि से चकित कुमार कार्तिकेय ने कौतूहलवश अपनी असीम जिज्ञासा से देवाधिदेव शिव से प्रश्न किया-
"आप जिस भगवान श्रीरामजी की पूजा करते हैं, वह सच्चिदानंद कहाँ पर निवास करते हैं।"
शिव मुस्कुराए...इससे शीतल सुगंधित वायु बहना प्रारंभ हो गई।
महाशिव ने पुनः आँखें बंद कर लीं, अपने प्रभु का ध्यान कर नमस्कार किया और उत्तर दिया -
"सुनो वत्स ! तीनों लोगों का पालन करने वाले मेंरे प्रभु भगवान श्रीराम के नारायण स्वरूप का निवास स्थान बद्रीकाश्रम में था जहाँ नर तथा नारायण त्रेतायुग के पूर्व अर्थात सतयुग में सभी के दर्शन हेतु उपलब्ध थे।
वहाँ जाने और भगवान के दर्शन मात्र से सभी को धर्म का ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती थी।
सतयुग के पश्चात त्रेतायुग में नारायण के दर्शन मात्र देवताओं और ऋषियों को ही हो पाते थे। इसके बाद जब अनाचार बढ़ने लगा, देवताओं और ऋषियों में भी अहंकार जागृत हो गया, पाखंड बढ़ने लगा तो नारायण बद्रिकाश्रम को छोड़कर क्षीरसागर में चले गए।
देवताओं और प्राणीमात्र ने जब बद्रिकाश्रम में विष्णु को नहीं पाया तो अत्यंत व्याकुल हो गए।
ऐसे में सभी देवता और ऋषिगण ब्रह्मा जी के पास गए और भगवान नारायण के बारे में पूछा।
ब्रह्मा जी भी निरुत्तर हो गए और नारायण को खोजते हुए क्षीरसागर पहुँच गए।
वहाँ भी नारायण के दर्शन ब्रह्माजी के अतिरिक्त और किसी को नहीं हुए और विष्णु भगवान ने पुनः बद्रिकाश्रम जाने से मना कर दिया।"
इतना कहकर शिव ने कार्तिकेय की तरफ देखा-
कार्तिकेय बड़े ध्यान से पिता की बातें सुन रहे थे।
फिर क्या हुआ पिताश्री?
क्या स्वयं नारायण अभी भी क्षीरसागर में ही विराजमान हैं?
हाँ पुत्र !
द्वापर के बाद क्षीरसागर ही विष्णु का स्थाई निवास है जहां वे माता लक्ष्मी के साथ निवास कर रहे हैं।
आज भी नारदतीर्थ से बद्रिकाश्रम तक की यात्रा तथा वहाँ का प्रसाद ग्रहण करने वाला प्राणी परम मोक्ष को प्राप्त करता है तथा विष्णुलोक बैकुंठ में उसे स्थान मिल जाता है।
कार्तिकेय के मुख पर अब परम सन्तुष्टि के भाव थे ।
उन्होंने शिव को साष्टांग दंडवत किया और अपने मार्ग को प्रस्थान किया।


क्रमशः

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