अरुणिमा,जिसे प्यार से सब अरु ही कहते थे।भोलेपन से सराबोर ये लड़की पहली बार में ही सबको भा जाती।शायद ही कोई हो जो उससे नाराज हुआ हो।क्योंकि लड़ना उसके स्वभाव या उसके शब्दकोश में ही नहीं था।अरु जिम्मेदार तो थी ही क्योंकि पिता को बचपन मे खो दिया था,बस माँ का ही सहारा था।अपनी स्कूली शिक्षा में वह हमेशा अव्वल रही।

कालेज में जाते ही सादगीपूर्ण अरु की मोहिनी सब पर चल गई, वो लंबी चोटी और सादे सलवार सूट में भी गजब ढाती,जो लड़कियाँ अत्याधुनिक पोशाकों में ना कर पाती,ऊपर से मेधावी तो थी ही।नीलाभ जो कि अरु के कालेज में ही था,रसिको का रसिक था,बस लड़कियों के दिलों से खेलता,पर वह उसके रंग रुप,कदकाठी का वह ऐसा ही लाभ उठाता,जैसे बगुला हंस का स्वांग करता है।किसी को कुछ पता ही ना चलने देता।ऐसे ही स्वांग करके अरु से मित्रता की,और अरु के दिल में भी जगह बना ली।वही अरु जिसके लिए;प्रेम एक दिव्य अनूभूति और आत्मीय बंधन था।

प्रेम एक पवित्र बंधन सात जन्मों का,बस एक बार किसी के हो गए तो कोई और नहीं।उसके जीवनमूल्यों में यह भी शामिल था,कि जीवन में एकबार ही प्रेम करेगी।

अरु अक्सर कहती,नीलाभ हमारे प्रेम तराजू पर संतुलन हमेशा बनाए रखना, पर नीलाभ को इन सबसे क्या सरोकार.. वह तो बस इस फूल की सारी महक लेकर उड़ जाना चाहता था।वह धीरे धीरे अरु पर प्रेम का बंधन कसकर उसको अपने प्रेमभंँवर में फंसा रहा था,जिसमें अरु अपनी ही मान्यताओं के कारण फंसती जा रही थी।

अपना बंधन अरु पर कसने के लिए उसने अपने और अरु के बारें में कालेज में गलत बातें फैलानी शुरु कर दी,कि वो और अरु लिव इन में रहने लगे है।इधर ये बाते फैली,उधर अरु पूरी तरह टूट गई, उसे बाद में पता चला ये बाते नीलाभ फैला रहा है।बड़े ही तनावपूर्ण दौर में उसने ये रिश्ता खत्म किया।उसके लिए ये बहुत दुखद दौर था।इस साल इतने तनाव में बड़ी मुश्किल से परीक्षा पास की,उसके लिए चरित्र ही सबसे बड़ी पूंजी थी,जो लोगों की नजर मे उजड़ चुकी थी।

इधर उसके पड़ोस में एक नया परिवार आया हुआ था,नयन नाम का लड़का जो अरु का ही हम उम्र था,पर नेत्रहीन था।अरु की उससे मित्रता हो गई थी,उसके आते ही पड़ोस के सुप्तावस्था में पड़े बगीचे में जान आ गई थी,हरसिंगार बिखरने लगे थे,और मौलसिरी महकने लगी थी,पेड़पौधों से बड़ा प्रेम था,उसे।गायन में रुचि थी और प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लेता था।बड़ा ही बुद्धिमान था और नेत्रहीन होते हुए भी सारा काम खुद करता,किसी पर निर्भर नहीं था,अरु को याद है,कि जब पहलीबार उसके घर गई थी,वह कैसे चाय बना कर ले आया था,और जब नीलाभ के घर गई तो कैसे वह सब पर हुक्म चला रहा था,तब भी ना समझ पाई।।कैसे बहन को डांट रहा था।

नयन को अरु का साथ बहुत भाता था,शायद जीवनसाथी के रुप में वह अरु जैसी लड़की की कल्पना करता,पर अपने नेत्रहीन होने को याद कर चुप हो जाता।धीरे धीरे अरु अपने दुःख से उबरी और फिर उसने इस साल कालेज में प्रथम आई और नृत्य में भी बड़ी प्रतिस्पर्धा में अव्वल आई।

उसकी जो बदनामी नीलाभ ने की थी,वह लोगों ने बहुत बढ़ाचढ़ा कर पेश की थी।खैर अरु के लिए तो प्यार का अध्याय हमेशा के लिए खत्म हो चुका था,पर इन दिनो वह कुछ अलग अनुभूत कर रही थी,कि वह नयन को देखे बिना नहीं रह पाती,उसके गायन में क्या मोहिनी थी,जो चिंता मुक्त कर देती थी।नयन भी मन ही मन अरु को पसंद करता था,पर कह नहीं पा रहा था।खैर अरु ने महसूस किया,कि वो नयन से बिना डोर के बंधी जा रही है,फिर उसे याद आते वो बीते लम्हे जो नीलाभ के साथ बिताए थे,वो क्या सिर्फ आकर्षण ही था,जो मैं प्यार समझ बैठी।नयन के साथ उसे इतना लगाव क्यों है,इसी प्रश्न में उलझी थी,कि उसकी माँ ने उसे कुछ परेशान देख सब बातें पूछी और सब संदेह दूर किए और नयन से अपनी बात करने को कहा,और कहा जो नीलाभ ने तुम्हारे साथ किया,उसमें तुम्हारी क्या गलती,तुम तो निश्छल थी,मन पर बोझ ना रखो।

माँ के समझाने पर अरु ने अपनी बात नयन को कही,और नयन वह तो फूला नहीं समा रहा था,अरु उसे खुद प्रपोज कर रही है,अरु जैसी लड़की भी प्रेम प्रस्ताव रख सकती है,अपने दायरों को तोड़कर, हाँ क्यों नहीं।उसे हक है।नयन मुस्कुराया और बोला मगर अरु मेरी आँखें नहीं है,तुम जीवनभर कैसे मेरा साथ निभाओगी।

कुछ मत कहो,नयन तुम संपूर्ण हो,और तुमसे गुण और लड़को में विरले ही मिलते है,क्या तुम्हें मेरा प्रस्ताव स्वीकार है,अरु बोली।

नयन बोला,मेरी खुशनसीबी है,अरु तुम मेरी जीवनसंगिनी बनो।इसके बाद दोनों की शादी हो गई।बसंत की ऋतु जो प्रकृति में परिवर्तन लाती है,वैसा परिवर्तन अरु में विवाह पश्चात हुआ,वह और भी खिल गई और प्रख्यात नृत्यांगना भी बनी।उधर नयन भी अपने अभ्यास के बल पर एक प्रोफेशनल सिंगर बन चुके थे।

आज दस वषों पश्चात एक नृत्य नाटिका का समारोह था।पर आज एक विशेष बात थी,अरु का नृत्य नयन अपनी आंँखों से देखने वाला था,(नयन की आँखे एक हादसे में गई थी,और उसका इलाज भी चल रहा था,अरु के साथ आते ही उसका इलाज भी लगातार चला और उसे नयी आँखे मिली)

अरु का नृत्य देखने के पश्चात नयन बहुत खुश था,वह बोला देखा अरु हमारे प्रेमतराजू पर संतुलन अब बराबर है ना।

नहीं नयन मैं खुश हूंँ, तुम देख सकते हो पर हमारा तालमेल तो शुरू से ही बराबर है,तुम शब्द हो,तो मैं भाव हूंँ, तुम लय हो मैं ताल हूंँ।हमेशा एकदूसरे के बिना अपूर्ण।हमारा प्रेम का तराजू हमेंशा संतुलन में है।

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