यह एक काल्पनिक एवं मौलिक रचना है। मैं नहीं जानती मेरी इस रचना को पढ़ कर सब की क्या प्रतिक्रिया होगी। मुझे लगा कि ऐसी एक पहल की जानी चाहिए और समाज द्वारा ऐसे विवाह को मान्यता दी जानी चाहिए।

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स्थान: वृद्ध आश्रम

दृश्य: हलकी गुनगुनी ठण्ड, सुबह का वक़्त, बादलों से आँख मिचौनी खेलता सूरज

दिनः वेलेंटाइन डे

सभी कमरों के बाहर कागज़ से बनाई कुछ रंगीन झंडियां लगी थी। अंदर के दालान के बीचोंबीच विवाह का मंडप लगा था। लग रहा था, सुबह ही सब तरफ झाड़ू से बुहार कर सफाई कर दी गयी है और किसी कार्यक्रम की तैयारी है। कुछ वृद्धजन जो काम करने में समर्थ थे, वे इधर उधर सामान ला या ले जा रहे थे। कुछ लोग सामान को मंडप के समीप भी ला कर रख रहे थे। लग रहा था किसी का विवाह होने वाला है। तैयारी पूरी हो जाने के बाद सब अपने कमरों में तैयार होने चले गये।

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आभा अपने पति के साथ अक्सर इस वृद्ध आश्रम में आती- जाती थी। जब से उसके सास- ससुर स्वर्ग सिधारे थे, तब से दोनों पति पत्नी ने सोच लिया था कि अब से हर माह वृद्धाश्रम का एक चक्कर जरूर लगाया करेंगे। अब सास ससुर तो रहे नहीं। पहले उनकी सेवा करते थे, अब यहाँ रहने वाले वृद्धजनों की सेवा कर लिया करेंगे। इसलिए दोनों ने साल की शुरुआत से ही हर माह में एक बार का खाने का खर्च वहन करने का निर्णय लिया था। दोनों इसको बखूबी निभा भी रहे थे। इसके अतिरिक्त दोनों अपना जन्मदिवस, विवाह की वर्षगाँठ भी यहीं, वृद्धाश्रम आ कर मनाने लगे थे।

इस बार वृद्धाश्रम से उन्हें वैलेंटाइन्स डे पर विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था और दोपहर का समय दिया गया था। दोनों को लगा कि हो सकता है कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा जिसे देखने के लिए आमंत्रित किया गया होगा।

वृद्धाश्रम पहुँच कर दोनों ने देखा वहां करीब २० लोग और भी आमंत्रित थे। शायद वे भी वहां नियमित आने वाले लोगों में से थे या वहीं की कार्यसमिति के सदस्य रहे होंगे। सभी को बाहर अहाते में बेंच पर बैठाया गया था। कुछ आगन्तुक अहाते के पास के बगीचे में घूम रहे थे। करीब ११ बजे सबको अंदर के दालान में बुलाया गया। अंदर के दालान के बीच में एक मंडप लगा था और उस के चारों ओर कुर्सियाँ लगी थीं। हमें वहाँ ज्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ा। जल्दी ही व्यवस्थापक आ गए और सबके स्थानग्रहण करने के बाद कार्यक्रम के संचालन के लिये वहीं आश्रम की व्यवस्थापिका ने जो बताया वो सच में एक प्रशंसनीय कदम था। जिसे सुन कर सब को बहुत अच्छा लगा और सबने तालियां बजा कर उनके द्वारा लिये गए इस कदम कि सराहना की।

कार्यक्रम की व्यवस्थापिका महोदया ने कहना शुरु किया- "हमारे आश्रम में रहने वाले श्री जुगलकिशोर जी की पत्नी उन्हें उन दिनों छोड़ गयी थी, जिन दिनों उनका इकलौता बेटा सिर्फ ११वीं में पढता था। वे एक प्राइवेट कंपनी में बही खाता लिखने का काम करते थे। बहुत मेहनत से उन्होंने उसे पढ़ा- लिखा कर बड़ा किया था। आज से ६ बरस पहले उनके बेटे को कनाडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिली थी। श्री जुगलकिशोर जी वृद्ध हो गए थे, और घर पर उनकी देखभाल करने वाला भी और कोई नहीं था। तो उनका बेटा उन्हें इस आश्रम में इसलिये छोड़ गया था कि अकेले रहने से किसी के संरक्षण में रहना अच्छा है। शुरू में अक्सर उन्हें, उनके बेटे का फ़ोन आता था और हर महीने वो उनके खर्च के लिए अलग से पैसे भी भेजता था। फिर धीरे- धीरे फ़ोन और पैसे आना बंद हो गए।"

"इसी प्रकार हमारे आश्रम में रहने वाली श्रीमती यशोदा, जो कि भरी जवानी से एक परित्यक्ता का जीवन जी रही थीं। उनका बचपन एक अनाथाश्रम में बीता था। बमुश्किल उनकी पढ़ाई पूरी होने के बाद उनका विवाह एक योग्य वर देख, कर दिया गया था। लड़के ने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर ये शादी की थी अन्यथा घर वाले अंत तक मना करते रहे। लड़के के घर वालों ने वर्षों तक उन्हें अपनी बहू नहीं माना। अंत में लड़के ने भी घर वालों के कहने पर उन्हें तलाक दे दिया। जब तक वे सक्षम थीं, उन्होंने कॉल सेंटर में नौकरी करके अपना जीवनयापन किया। ढलती उम्र के पड़ाव पर उन्होंने नौकरी छोड़ कर हमारे आश्रम में सहारा लिया। दो और जोड़े जो आज विवाहसूत्र में बंधने जा रहे हैं, लगभग उनकी भी ऐसी ही कहानी है।"

इसके बाद उन महोदया ने और दो जोड़ों के बारे में भी इसी प्रकार की जानकारी सबके सामने प्रस्तुत की। वहाँ उपस्थित सभी लोग चुपचाप सब सुन रहे थे।

वे आगे कहने लगीं - "एक लम्बे अरसे से हमारे आश्रम में रहने वाले सभी वृद्धजन एक दूसरे का दुख बाँटना, सांत्वना देना और भावनात्मक सहारा देते आये हैं। पिछले कुछ वर्षों से हमने इंतज़ार किया कि शायद किसी को उनका बिछड़ा परिचित भूले से मिलने आ जाये, पर अफ़सोस इन लोगों के साथ ऐसा नहीं हुआ।"

"इस वर्ष हमारी संस्था ने बहुत सोचने के बाद ये निर्णय लिया है कि जिन महिला पुरुषों की आपसी समझ, भावनात्मक विचार और बातचीत का नजरिया एक है, तो क्यों ना उनका विवाह कर दिया जाये। वो लोग जो एक लम्बे समय से एकांत जीवन जीने को मजबूर हैं, उन्हें एक ऐसा सम्बल सहारा मिल जायेगा। जिनके साथ न सिर्फ ये अपने सुख- दुख साझे कर सकेंगे अपितु एक दूसरे की बीमारी और दुःख तकलीफ में मदद भी कर सकेंगे। इस उम्र के लोगों के पास कहने- सुनने को तो बहुत कुछ होता है पर इन्हें सुनने वाले कम ही होते हैं। इस उम्र में उनकी शारीरिक जरूरतें पूरी होने से ज्यादा आवश्यक है, उनकी भावनात्मक जरूरतें पूरी होना। इसी को मद्दे नज़र रखते हुए हमने कुछ जोड़ों के विवाह करवाने का विचार किया है। और हमने इस शुभ कार्य के लिए वैलेंटाइन डे का चुनाव किया है। आज के शुभ दिन सेे इनके पास भी प्यार के इज़हार के लिये साथी होगा।"

"विवाह के बाद भी ये यहीं रहेंगें। फर्क सिर्फ इतना होगा कि अब से ये एक कमरे में रहेंगें। इन्हें एक दूसरे का भावनात्मक सहारा मिलेगा और कोई भी तकलीफ होने पर दूसरा व्यक्ति उन्हें सहारा देगा तथा ज्यादा तकलीफ होने पर जल्दी से हमें सूचित कर सकेगा। पहले यह काम उन्हें स्वंय करना पड़ता था।"

इसके बाद श्री जुगलकिशोर जी और श्रीमती यशोदा जी और उनके जैसे दो और जोड़े विधि विधानपूर्वक, बड़े ही साधारण तरीके से विवाह सूत्र में बंध गये। ना कोई दिखावा, ना दान- दहेज, ना ही कोई शारीरिक भूख। बस एक निस्वार्थ प्यार और भावनात्मक समझ। नये विवाहित जोड़ों ने शर्माते हुए एक दूसरे को एक खूबसूरत सुर्ख गुलाब देकर अपने प्यार का इज़हार किया और एक दूसरे को आलिंगनबद्व किया।

विवाह कार्यक्रम के पश्चात सभी भोजनकक्ष में चले गये। भोजनावकाश के बाद सभी आश्रमवासियों का आराम करने का समय निश्चित रहता है। हम भी कार्यक्रम के पश्चात घर की ओर रवाना हो गये। रास्ते में आभा सोच रही थी कि इस आश्रम में आने और जाने के रास्ते तो हमेशा खुले होते हैं। पर न जाने क्यों बाहर जानेे के रास्तों पर चाह कर भी किसी को जाने की कोई राह नज़र नहीं आती।

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