कहते हैं कि समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं है। मेरी पत्नी जो कभी मेरी मित्र और फिर प्रेमिका रहा चुकी हैं, उसके साथ मेरा प्यार समय के साथ और अधिक मजबूत होता गया है। आज हम दोनों एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।अब मैं आपको अपनी वो कहानी सुनाने जा रहा हूं जिसने मेरे जीवन को एक नया आयाम दिया है। बात उस समय की है जब मैं रोजगार के लिए पहली बार मुम्बई जैसे बहुत बड़े शहर में गया। मैं वहां एक मल्टीनेशनल कंपनी में टीम लीडर के रूप में चुना गया था। एक छोटे से कस्बे का रहने वाला लड़का जब किसी बड़े शहर में जाता है तो, उसके मन हर घड़ी एक उत्सुकता बनी रहती है उस शहर और वहां की सारी बातें जानने की। यही मेरे साथ भी हुआ। मेरे आफिस का समय सुबह के १० बजे से शाम के ७ बजे तक का था। गर्मी के मौसम में दिन वैसे भी बड़ा लगता है। और वहां मेरा कोई साथी दोस्त भी नहीं था,जिसके साथ हंस बोल कर कुछ समय काटा जा सके। आफिस में नया था तो वहां भी अभी किसी से ज्यादा मेलजोल नहीं था। लेकिन एक बात अच्छी थी वो ये कि मेरा जो घर था वहां से समुंद्र देव बहुत दूर नहीं थे।तो मैं अक्सर आफिस से घर आने के बाद टहलते हुए समुंद्र की तरफ चला जाता था। चुकीं हफ्ते के शनिवार और रविवार को आफिस बंद रहता था तो उस दिन कुछ ज्यादा देर तक वहीं समय बिताया करता था।शाम को समुंद्र की रेत ठंडी हो जाती थी तो नंगे पैर बहुत देर तक ऐसे ही रेत पर चलता रहता था। कभी थक जाता था तो वहीं रेत पर ही बैठ जाता था। वहां बैठकर समुंद्र के उतार चढ़ाव और लोगों को देखते हुए मेरा अच्छा समय व्यतीत हो जाता चौपाटी पर घुमते हुए शाम कैसे निकल जाती थी पता ही नहीं चलता था। मैं लगभग रोज ही यहां आने लगा था। अब तो समुंद्र किनारे की एक एक चीज को जानने लगा था। लोगों के शोरगुल को सुनकर कब शाम रात में बदल जाती थी पता ही नहीं चलता रहता। इधर कुछ दिनों से मैं एक बात पर गौर कर रहा था, एक लड़की मुझे किनारे की रेत पर बैठी हुई दिखाई देती थी। ऐसे तो बहुत सी लड़कियां वहां होती थी जो खुबसूरत और आकर्षक भी थीं। लेकिन इस लड़की में कुछ ऐसा था जो मेरा ध्यान बार बार उसकी तरफ चला जाता था। वो लड़की रेत पर बैठी हुई लगातार समुंद्र को देखती रहती थी, ऐसा लगता था कि समुंद्र से कुछ पुछना चाहती हो। उसकी आंखों में एक उदासी भरी खामोशी नज़र आती थी। मुझे अब उस लड़की में दिलचस्पी बढ़ रही थी। मैं उसे छुप छुप के बस देखता ही था। लेकिन अब इसे मेरे संस्कार कहीए या मेरे मन का डर मैं उसे दूर से ही देखने के लिए बाध्य था, उसकी उदासी का कारण अब तक नहीं जान पाया था। एक दिन मेरा आफिस कुछ जल्दी बंद हो गया तो मैं घर के लिए चल पड़ा। कुछ देर बाद मैं अपने पसंदीदा स्थल की तरफ चल दिया। वहां पहुंच कर देखा कि खुब चहल-पहल थी। समझ नहीं आ रहा था ऐसा क्या है जो हमेशा से ज्यादा भीड़ है आज। दिमाग पर जोर दिया तो पता चला कि आज तो “वैलेन्टाइन्स डे”, प्रेमियों का दिन। वहां बहुत से लड़के और लड़कियां जो शायद प्रेमी-प्रेमिका होंगे एक दूसरे का हाथ थामे किनारे पर टहल रहे थे। मेरे मन में हंसी आ गई। थोड़ी दूर नज़र गई तो देखा कि वो हमेशा मुझे दिखने वाली लड़की वहां पहले से थी। आज तो वो पहले से भी ज्यादा परेशान लग रही थी। आज मैंने ठान लिया था कि उससे बात करके रहुंगा। मैं धीरे धीरे चलता हुआ उसके पास गया और वहीं रेत पर ही बैठ गया। अब साफ पता चल रहा था कि वो रो रही थी। मैंने आज ध्यान से उसको देखा, वो बहुत खूबसूरत थी। तीखे नैन-नक्श और हल्का सांवला रंग बहुत ही मनमोहक था। बहुत ही साधारण से कपड़े पहने हुए थे उसने लेकिन फिर भी बहुत अच्छी लग रही थी। साफ सीधे शब्दों में कहें तो ऐसी थी कि कोई भी उसपर मोहित हो जाए। लेकिन अब मैं उसके रोने की वजह जानना चाहता था। बहुत हिम्मत जुटा कर बोला, क्या बात है आप क्यों रो रही है? वो डर गई और जल्दी से अपने बहते आंसुओ को पोंछ लिया। और सहज होने का दीखावा करने लगी। मैं फिर से बोला, प्लीज़ मुझे गलत नहीं समझिएगा मैं आपको कई दिनों से देख रहा था आप बहुत परेशान हैं, और आज आपको रोते हुए देखा तो खुद को रोक नहीं पाया। वो मेरी तरफ अचरज से देख रही थी। पता नहीं क्या हुआ वो उठकर जाने लगी, लेकिन फिर कुछ सोचकर वापस पलटी और मेरे से थोड़ी दूरी पर आकर बैठ गई। रोने की वजह से उसकी आंखें लाल हो गई थीं। धीरे धीरे उसने मुझे बताना शुरू किया; 'मेरा नाम अनन्या शर्मा है, मैं कानपुर की रहने वाली हुं। यहां मैं रोजगार के लिए आई हूं। मेरे पिताजी का कपड़ों का बिजनेस था। सबकुछ बहुत ही अच्छा था जीवन में। फिर पता नहीं नियति को क्या सूझा कि सबकुछ बदल गया। पिताजी का एक रोड ऐक्सिडेंट में देहांत हो गया। और हमारे बिजनेस पर, हमारे पिताजी के ही एक मित्र ने कब्ज़ा करके हमें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर दिया। मेरी मां और मेरा छोटा भाई जो अभी पंद्रह साल का है, मेरे पिताजी की बनवाई कोठी में रहते हैं। लेकिन पिताजी जब तक थे सब कुछ अच्छा था। उनके दुनिया से जाते ही सभी सगे संबंधियों का व्यवहार हमारे प्रति बदल गया। जायदाद के नाम पर पिताजी की कोठी ही है बस हमारे पास। मां हम दोनों भाई बहन के लिए सब सहते हुए जी रहीं हैं अपनी जिंदगी। लेकिन मुझे अपनी मां की बेबसी बहुत तकलीफ़ देती थी। आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा था, इसीलिए जैसे ही मैंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। रोजगार के लिए आवेदन करने लगी। मैं जल्द से जल्द अपने परिवार की तकलीफों को दूर करना चाहती थी। और फिर उसी समय मुझे मुम्बई की इस कंपनी का आफर मिला, मैंने तुरंत ही कंपनी के आफर को स्वीकार कर लिया और यहां आ गई। मुझे मां और भाई की बहुत याद आती है। मैं हर महीने मां और भाई के लिए पैसे भेजती थी। लेकिन पिछले महीने से मेरी कंपनी ने किसी को भी तनख्वाह नहीं दिया है। शायद कुछ फाइनेंशियल दिक्कत हो गई है। मै दो महीने से घर में पैसा नहीं भेजी हुं। वैसे तो मां कुछ नहीं कहती है लेकिन मुझे पता है वो बहुत परेशान होंगी। आज दोपहर में मां से फोन पर बात हो रही थी तो मुझे बता रही थी कि भाई के पढ़ाई के लिए बहुत पैसा चाहिए इस बार। और मां की बातों से लग रहा था कि उनकी तबियत भी ठीक नहीं है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं। यहां मेरी कोई सहेली या दोस्त भी नहीं है जिससे मदद लें सकूं। बस यही सब सोचते हुए आज खुद पर काबू नहीं रख पाई और रो पड़ी। पता नहीं किस भावना से वशीभूत हो कर मैंने आपको अपने बारे में सब कुछ बता दिया ', इतना सब बता कर वो चुप हो गई। उसकी बातें सुनकर मैंने महसूस किया कि मेरी आंखें नम हो गई थीं। मैंने उससे पूछा कि तुम्हें कितने पैसों की जरूरत है!, वो हिचक रही थी और बोली नहीं-नहीं मैं आपसे कैसे ले सकती हूं। लेकिन मेरे दृढ़ निश्चय के सामने वो झुक गई और संकोच से भरी धीरे से बोली की लगभग बीस हजार की जरूरत है। मैं बोला चलो मेरे साथ,वो फिर कुछ सोचकर रूक गई। तब मैंने कहा कि देखो इंसान का विश्वास बहुत बड़ी चीज होती है। तुम्हें मेरे पर विश्वास न हो तो रहने दो साथ में चलने की जरूरत नहीं है। लेकिन फिर वो पता नहीं क्या सोच कर मेरे साथ चल दी थी। हम दोनों मेरे घर आए। अब संकोच करने की बारी मेरी थी क्योंकि मेरा घर व्यवस्थित नहीं था। मेरा सारा सामान बिखरा पड़ा था। अनन्या मेरे एक कमरे और किचन वाले घर को उत्सुकता से देख रही थी। वो मेरी झेंप को समझ नहीं थी शायद तभी बोल पड़ी, देखिए ना आपने मेरी पूरी कहानी सुन ली और मैं हूं कि अभी तक आपका नाम भी नहीं जान सकी। मैंने हंसते हुए बताया कि मेरा नाम अतुल दि्वेदी है और मैं वाराणसी का रहने वाला हूं। मेरे परिवार में मां, पिताजी एक छोटी बहन और मेरे दादाजी जी हैं। मैं भी शहर में रोजगार के लिए ही आया हूं। मुझे ध्यान आया कि मुझे उसको चाय पिलाना चाहिए। एक तो वो पहली बार मेरे घर में आई थी उसपर सर्दी की शाम चाय तो पीनी ही चाहिए। मैं किचन में चला गया और चुल्हे पर चाय के लिए पानी रख दिया। तभी पिछे मुडकर देखा तो वो मेरे पास ही खड़ी थी। फिर मेरे से बोली आप रहने दीजिए मैं चाय बनाती हुं। और मैं ये सोच रहा था कि क्या है ये। कभी मैं इस लड़की को छुप छुप के देखता था और आज ये मेरे घर में मेरे लिए चाय बना रही है। मैं कमरे में तख्त पर बैठ गया। थोड़ी देर के बाद वो चाय लेकर आई और हम बिना कुछ कहे चुपचाप चाय पीने लगे। चाय खत्म करने के बाद मैं अपने बैग से अपना चेकबुक निकाल कर अपने हस्ताक्षर करने के बाद उसको दे दिया और बोला कि ये रखो और जब तुम्हारे पास हों तो लौटा देना। मेरा दिया हुआ चेक लेते हुए उसकी आंखों में आसूं थे। उसने कुछ नहीं कहा बस अपने दोनों हाथों को जोड़कर सिर झुकाए हुए धीरे धीरे घर से बाहर निकल गई। उस समय ये रकम बहुत बड़ी चीज थी। लेकिन मुझे पता नहीं क्यों उसकी मदद करके अच्छा लगा। अगले दिन मैं फिर से समुंद्र किनारे गया लेकिन आज अनन्या मुझे कहीं नहीं दिखाई दी। मैं उससे मिलने के लिए परेशान हो गया था। उस दिन मैंने उसको बहुत ढूंढा लेकिन वो मुझे कहीं नहीं मिली। मैं बहुत देर तक उसकी राह देखता रहा लेकिन वो नहीं आई। अंधेरा होने लगा था तो मैं अपना उदास मन लिए घर आ गया। उसके बाद से बहुत दिनों तक मैं रोज ही समुंद्र किनारे जाता था और उसको ढूंढता रहता था। लेकिन उस दिन के बाद से वो कहीं नहीं दिखाई दी। मैं थककर अब उम्मीद छोड़ दिया कि लगता है अब वो नहीं मिलेगी। पता नहीं क्या था उसके चेहरे में कि एक बार देखने के बाद से अब और कुछ देखने का दिल नहीं करता था। एक कशिश सी थी उस चेहरे में कि मैं बंध सा गया था। मुझे और कोई चेहरा अच्छा ही नहीं लगता था। मैं अभी भी शाम होते ही उस जगह पर चला जाता था जहां मैं पहली बार अनन्या से मिला था। वो फिर मुझे कहीं नहीं मिली। मैं समुंद्र की रेत पर उसका नाम लिखता था और फिर थोड़ी देर में कोई लहर आती और उस नाम को लेकर चली जाती थी। मैं अब मायूस हो गया था और उससे मिलने की उम्मीद खोने लगा था। मेरा मन किसी अनजानी आशंका से घिर गया था। मुझे लगता था कि अनन्या के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया। आखिर क्यों नहीं वो मुझसे मिलने आती है। मेरा मन अब वहां नहीं लग रहा था। घर पर बात होती थी तो मां ने शायद मेरी उदासी को महसूस किया और मुझे घर बुलाने लगी। फिर छोटी बहन से बात हुई तो पता चला कि मां ने मेरी शादी के लिए लड़की पसंद कर लीं हैं। मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं था। मैं बहाने बनाने लगा कि मुझे घर न जाना पड़े। लेकिन अब तक मैं मां को मना करता, एक न एक दिन तो मुझे शादी करनी ही पड़ेगी ये सोच कर मैं घर जाने की तैयारी करने लगा। घर जाने के एक दिन पहले मैं उदास मन से फिर किनारे बैठा हुआ समुंद्र की लहरों को देख रहा था। उस दिन मेरा मन बिल्कुल भी खुश नहीं था। फिर धीरे-धीरे सूरज समुंद्र में समाता जा रहा था और अंधेरा घिरने लगा था तभी लगा कि कोई मेरा नाम लेकर मुझे पुकार रहा है। मैं पिछे मुडकर देखा तो खुशी से उछल पड़ा। मेरे सामने अनन्या खड़ी थी। वही अनन्या जिसके लिए मैं पागल हो रहा था। पता नहीं मुझे क्या हुआ कि मैं दौड़कर उसको गले से लगा लिया। कुछ देर बाद मुझे वास्तविकता का एहसास हुआ और मैं झेंप सा गया। वो भी थोड़ी असहज हो गई थी। मैंने एक सांस में उससे कई सवाल पुछ लिया कि,अब तक कहां थी,मिली क्यों नहीं इतने दिनों से, और इतनी कमजोर क्यों लग रही हो आदि। वो पहले तो कुछ नहीं बोली फिर अपने पर्स में से एक लिफाफा निकाल कर मुझे देते हुए बोली', अतुल जी ये आपके पैसे जो आपने मुझे उस समय दिया था जब मुझे इसकी बहुत ज्यादा जरूरत थी। उस दिन आपके घर से जब गई तो मां कि फोन आया था कि बेटा तुम घर आ जाओ। असल में मां मेरी शादी के लिए कोई लड़का देखीं थीं और चाहतीं थीं कि मैं भी उसको देख कर पसंद कर लूं। मैं मां के पास घर चली गई थी। मेरे जाने के अगले ही दिन लड़के वाले मुझे देखने आए थे। सब कुछ तो ठीक था लेकिन मुझे ऐसा लगा कि उनकी नज़र मेरे पिताजी की कोठी पर थी। फिर उन लोगों ने मेरी मां से कहा कि एक ही बेटी है तो आप उसकी खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार होंगी। मां उनका इशारा समझ गई और बोली कि हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं है। हां बस ये ही है मेरे कलेजे का टुकड़ा जो आपको दे सकतीं हुं। फिर वो बोले कि बहन जी ये घर तो है न! मैं उनका आशय समझ गई थी। और उसी समय फैसला कर लिया कि मैं इन लालची लोगों के घर शादी करके कभी नहीं जाउंगी। अगले दिन मैं यहां आने के लिए तैयार हो रही थी तो मुझे जोर से चक्कर आया और मैं गिर गई। सब मुझे अस्पताल ले गए तो जांच के बाद पता चला कि मुझे पिलीया हो गया था। फिर मैं करीब एक महीने अस्पताल में ही रही। और जब घर आई तो इतनी कमजोर हो गई थी कि मां ने आने नहीं दिया। अब थोड़ा स्वास्थ्य सही हुआ तो खुद को रोक नहीं पाई और आ गई। मुझे अच्छे से याद था की आपका पैसा आपको लौटाना है। अतुल जी आपने मेरी मदद ही नहीं की बल्कि मुझपर बिश्वास भी किया। और मैं इतने अच्छे इंसान का विश्वास नहीं तोड़ सकती थी। तभी तो सबसे पहले मैं आपको मिलने आई। मैं उस स्वाभिमानी लड़की के स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था तो मैंने पैसे ले लिए। अब अच्छी खासी रात हो चुकी थी और फिर वो भी थकी हारी कितने दूर से आई थी। मेरे कहने पर हम एक ढाबे पर खाना खाने गए। खाते हुए उसने मुझे बताया कि बिमारी की वजह से उसकी नौकरी चली गई थी। अब वो फिर से प्रयास करने के लिए आई थी इस शहर में। मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था। अगले दिन की मेरी टिकट थी वाराणसी जाने की। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहुं। शायद मुझे अनन्या से प्यार हो गया था। और मैं उसे लेकर सपने देखने लगा था। बहुत हिम्मत करके बोला कि आप इतने दिनों से आप नहीं दिखाई दी तो मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बहुत ढूंढा आपको मैंने लेकिन जब आप नहीं मिलीं तो मैं बिल्कुल निराश हो गया था। और आज आपको अचानक अपने सामने देखकर मुझे बहुत खुशी महसूस हो रही है। पता नहीं क्यों लेकिन मैं बहुत शिद्दत से आपका इंतजार कर रहा था। मुझे गलत नहीं समझना लेकिन शायद मैं आपको चाहने लगा हूं। इतने दिनों से मैं आपको पागलों की तरह ढूंढ रहा था। मुझे अपने पैसों का नहीं बल्कि आपका इंतजार था। वो बिना कुछ कहे सिर झुकाए मेरी बात सुन रही थी। कुछ रूककर मैं उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया और बोला प्लीज़ अनु कोई दबाव नहीं डाल सकता हूं आपके उपर। आप अपना र्निणय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। शायद वो असमंजस की स्थिति में पड़ गई थी। तभी तो कुछ भी नहीं कह पा रही थी। मैं उसकी मनोदशा समझ रहा था। मैंने उसको बताया कि कल शाम को मैं अपने घर वाराणसी जा रहा हूं। शायद घर वाले मुझे किसी लड़की से मिलने के लिए बुला रहे । लेकिन….! मैं अब क्या कहूं, कुछ कह नहीं सकता हूं कि मैं क्या और कैसा महसूस कर रहा हूं। काफी देर तक हम दोनों ने एक दूसरे से कुछ बात नहीं की। एक खामोशी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। रात अब बढ़ रही थी तो मैंने कहा कि चलो आपको आपके हास्टल तक छोड़ दे रहा हूं। उसने कुछ नहीं कहा बस उठकर मेरे साथ चल दी। हास्टल में पहुंच कर भी हम दोनों ने एक दूसरे से कुछ बात नहीं की। मैं पलट कर जाने लगा तो उसने धीरे से बस इतना ही पुछा कि अब कब मिलेंगे। मैं उसके ये पुछने पर मुस्कुरा दिया और बोला कि चार दिन बाद हम फिर वहीं मिलेंगे। मैं अगले दिन घर चला गया। वहां पहुंच के पता चला कि घर में मेरी शादी के लिए सच में मुहीम चलाई जा रही है। लेकिन मैं मां को इस बात को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मुझे कुछ समय चाहिए इसके लिए। मैं इसके लिए दिमागी रूप से तैयार नहीं था। मां ने मेरी खुशी के लिए मेरी बात मान ली। और मैं वापस मुंबई आ गया। ठीक चौथे दिन मैं नियम समय पर पहुंच गया जहां मैंने अनन्या से मिलने कि वादा किया था। वहां पहुंच कर देखा कि वो आज पहले ही वहां पहुंच कर रेत पर बैठी थी। मैं कुछ दूरी से उसको देखने के लिए खड़ा हो गया। वो चुपचाप बैठी हुई समुंद्र की आती जाती लहरों को शुन्य भाव से देख रही थी। इस समय वो बहुत प्यारी लग रही थी। उसने नीली जींस पर सफेद रंग की कुर्ती पहनी हुई थी। बाल कंधे से नीचे खुले हुए थे। आंखों में एक अजीब सा सुनापन था। अब मैं बहुत देर तक उससे दूर नहीं रह सकता था। पास में जा के धीरे से बैठ गया। उसने अपनी जल्दी से अपनी नज़र घुमाई और फिर मुझे देख कर उसकी आंखों में एक चमक सी आ गई। धीरे से मुस्कुराई और बोली, अतुल जी मुझे पूरा यकीन था कि आप जरुर आयेंगे ! मुझे एक दूसरी कंपनी में काम मिल गया है और यहां सब कुछ ठीक है। मेरे भाई को भी उसके मनचाहे कालेज में एडमिशन मिल गया है और मां की तबीयत भी अब पहले से अच्छी हो गई है। वो बिना रुके सब कहती जा रही थी। फिर कुछ सोचकर कर एकदम से चुप हो गई और अपने हाथ को जोड़कर बोली माफ़ करिएगा मैं ही बोले जा रही हूं आपको बोलने का मौका ही नहीं दे रही हूं। मैंने कहा कि अच्छा किया क्योंकि मैं भी बस आपको ही सुनना चाहता था। फिर उसको कुछ याद आया तो बोली कि आप तो लड़की देखने के लिए गए थे। कुछ बात बनी क्या !! मैं बोला नहीं कुछ नहीं हुआ मुझे अभी शादी नहीं करनी थी तो बात वहीं खत्म हो गई। अब हम रोज़ ही मिलने लगे। किसी दिन जो नहीं मिल पाते तो मन बेचैन हो जाता था। ऐसे ही खुशनुमा रंग में रंगी हुई जिंदगी चल रही थी। धीरे धीरे एक साल बीत गए और नया साल आ गया। और मेरा उसके लिए प्यार और भी ज्यादा बढ़ता जा के रहा था। अब तो लगता था कि वो भी मेरे बिना नहीं रह पाती थी। उस दिन भी तारिख चौदह फरवरी ही थी। मैं अपने हमेशा वाले समय पर पहुंच गया था किनारे। थोड़ी देर बाद वो भी आ गई थी। आज तो वो बला की खूबसूरत लग रही थी। लाल रंग का पटियाला सलवार पहने हुए थी और बालों की चोटी बना रखी थी। मेरे सामने आई तो मैं एक पल के लिए जी उसको देखता ही रह गया। वो हंसने लगी तो मैं चौंक पड़ा और मुझे याद आया कि मुझे उसको कुछ देना था। मैं अपने साथ लाए पैकेट में से एक लाल गुलाब का फूल निकाल कर उसके सामने करके बोला अनु मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं और अगर तुम्हें भी मेरा प्यार स्वीकार है तो इस फुल को लेना नहीं तो मैं इसको यहीं रेत पर फेंक देना। उसकी आंखों में आसूं भरे हुए थे। उसने धीरे से फुल मेरे हाथ से लेकर उसको अपने माथे से लगा लिया और बोली कि अतुल जी मुझे आपका प्यार मंजूर है। अब मैंने खुशी से उसको अपने गले से लगा लिया और फिर जो सोने की अंगूठी उसके लिए लाया था उसकी उंगली में डाल दिया, वो शरमा गई। फिर हमने एक दूसरे का थामें हुए वो पुरी शाम बिताई। ये वही दिन था जब हम पहली बार एक दूसरे से मिले थे “वैलेन्टाईन डे” प्यार के इजहार का दिन। दोनों ने अपने घर वालों को सब कुछ बता दिया। चुकीं हम दोनों ही ब्राह्मण थे इसलिए दोनों के घर वाले हमारी शादी के लिए तैयार हो गए। कुछ दिन के बाद हम परिणय सूत्र में बंध गए। अब हम साथ थे हमेशा के लिए। मैं जब शादी के बाद पहली बार उससे मिला तो बोला कि अनु आज का दिन कितना शुभ है हम आखिर में आज एक हो ही गये। वो धीरे से बोली नहीं शुभ तो हमारे लिए चौदह फरवरी का दिन था जब हम दोनों ने एक दूसरे के प्रति अपने प्यार का इजहार किया था। मैंने भी सहमति से सिर हिला दिया और बोला सच में वैलेंटाइन डे हमारे लिए शुभ हो गया। आज हमारी शादी को आठ साल हो गए हैं और हमारे प्यार की बगिया में में एक फुल भी आ गया है हमारा बेटा। आज हम अपने छोटे से परिवार के साथ खुशी खुशी रह रहे हैं और हमारा प्यार और भी घनिष्ठ हो चुका है। कौन कहता है कि समय के साथ प्यार कम हो जाता है। हमारा प्यार तो बढ़ता ही गया है समय के साथ।

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