इस दुनिया में ऐसा क्यों होता है कि किसी-किसी से जब पहली बार मिलते हैं,तब एक करंट-सा लगता है।ऐसा महसूस होता है कि इस व्यक्ति को हम बरसों से जानते हैं।दोपहर के सूरज में बनने वाली छाया की तरह आरंभ में ये परिचय छोटा होता है।बाद में,दोपहर बाद की छाया जैसे धीरे-धीरे लम्बी होती जाती है,वैसे ही यह परिचय भी प्रगाढ़ होता जाता है।किसी समान-लिंगी से हुआ तो दोस्ती,विपरीत-लिंगी से हुआ तो प्यार। हम रोज अनेक लोगों से मिलते हैं,क्या सभी उतने ही अपने लगते हैं?नहीं,कुछ लोग ही हमें आकर्षित करते हैं।उनके साथ हमारा पूर्व-जन्म का कोई संबंध होता है।

'प्यार'-कितना सरल-सहज शब्द।प्रकृति के उपादानों में इसके उदाहरण भरे पड़े हैं।भँवरों को फूलों से प्यार,पौधों को सूरज की रश्मियों से प्यार,आसमान को धरती से प्यार,तितलियों को रंगों से प्यार,जीवों को जीवन से प्यार आदि-आदि।पक्षीगण जब कलरव का संगीत सुनाते हैं,झरने जब कल-कल-छ्ल-छ्ल का शोर मचाते हैं,प्रेमी-हृदय गाय के बछड़े की तरह खूँटा तुड़ाकर प्रेमी-जन के क्रोड़ में बस जाने को मचल उठता है।दो दिलों की धड़कनें प्रिय के प्रगाढ़ अालिंगन में ,एक-दूजे में विलीन हो जाना चाहती हैं।

ऐसे ही,एक दिन मैं अपने लॉन में कुर्सी पर बैठकर कुछ पढ़ रहा था।मेरी बीए अंतिम वर्ष की परीक्षा थी,जिसकी तैयारी के लिए शहर से दूर,प्रकृति की गोद में बसे उस प्रखंड में आया था,जहाँ मेरे पिताजी नौकरी करते थे।प्रखंड के सरकारी आवास एक-दूसरे से सटे हुए थे।सब के बाहर एक लॉन था।वहाँ बैठकर दूर तक देखा जा सकता था-धान के हरे-भरे खेत,एक बड़ा-सा पोखर और एक मंदिर।मंदिर में किसी भक्त ने घंटा बजाया था।उस ध्वनि से भंग हुए ध्यान के कारण मैंने जब नज़र उठाई तो एक षोडशी को अपने घर आते हुए पाया।उसके होठों पर स्मित और नज़रों में प्यार था।दो उसकी,दो मेरी चार हुईं।मुझे दिल ने कहा-मिल गई,मिल गई।यही है,जिसकी तलाश थी।नज़रों ने अपना काम कर दिया था,अब ज़ुबान को अपना काम करना था।

मैं हाथ में किताब लिये हुए था ,लेकिन,ध्यान कहीं और था।उस लड़की के गुज़रने से जो लैवेंडर की खुशबू उठी थी,वो नथुनों के रास्ते दिल में उतर गई थी।मैं पश्चिम की ओर मुँह करके बैठा था,पर,गर्दन बार-बार पूरब की ओर मुड़ जाती थी।तभी कुछ आहट हुई।इस बार मैं सामने ही देखता रहा।पता चल गया कि वही थी।मेरी कुर्सी के ठीक बगल से वो गुजरी।उसका दुपट्टा कुर्सी के हत्थे पर से सरसराता हुआ गुज़र रहा था।पता नहीं मुझे क्या सूझा मैंने उंगलियों से उसका दुपट्टा पकड़ लिया।वो दो कदम आगे बढ़ी।फिर,तुरंत दो कदम पीछे घूम गई।मेरी आँखों में झांकती हुई बोली,"लगता है कुर्सी में दुपट्टा उलझ गया था।सॉरी।"

"दुपट्टा नहीं।दिल था।",मैं बोला।

"क्या बोले?"

"दिल...आँ.....कुछ नहीं",मैं सकपका गया था।इतने करीब से कोई लड़की नहीं देखी थी मैंने।माँ-बाप का भी इकलौता ही था।

वो हँस पड़ी,"बुद्धू!"

"कुछ कहा क्या?",मैं संभल चुका था।

"जब से आप आए हैं,दिनभर पढ़ते रहते हैं।क्या पढ़ते हैं?"

"बीए की फाइनल परीक्षा है ना।इसीलिए पढ़ता हूँ।तुम नहीं पढ़ती क्या?"

"पढ़ती हूँ।पर ,आप जितना नहीं।वैसे भी,लड़कियों को सौ काम रहते हैं।पढ़ाई बाद में,पहले घर का काम।"

"वैसे,तुम किस क्लास में हो?"

"इंटर फर्स्ट इयर में।हाल ही में मैट्रिक किया है।"

"कैसा हुआ था-रिजल्ट?"

"स्कूल में टॉप आई थी।एट्टी परसेंट।"

"वाह!ये तो बहुत बढ़िया है।बाहर पढ़ने नहीं गई।मेरा मतलब है,शहर।"

"लड़का थोड़े-ना हूँ!यहीं पास ही लड़कियों का इंटर कॉलेज है।"

"क्या लिया?साइंस या आर्टस्?"

"लेने का मन तो साइंस था,लिया आर्टस्।यहाँ साइंस के अच्छे टीचर नहीं हैं।"

"ओह!लड़कियों को कितने समझौते करने पड़ते हैं।"

"मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं।"

"क्यों?"

"क्योंकि आप सिर्फ पढ़ते रहते हैं,इसीलिए।पढ़नेवाले लड़के मुझे बहुत पसंद हैं।"

"कितनों को पसंद किया अब तक?"

"धत्!छेड़िये मत मुझे।....अच्छा सुनिये,हिन्दी पढ़ाइएगा मुझे?"

"क्या पढ़ना है?"

"ध्रुवस्वामिनी।हमारे कोर्स में है।"

"तुम्हारी मम्मी परमिशन देंगी,तो ज़रूर पढ़ा दूँगा।"

"आप भी अपने पापा से पूछ लीजिएगा।कहीं गुस्सा न होने लगें-बेटा आया है तैयारी करने,ये लगी उसका समय बर्बाद करने।"

"डर पापा का नहीं है।ख़तरा दूसरा है।"

"क्या?"

"पढ़ते-पढ़ाते कुछ हो गया तो?"

"क्या हो जाएगा?"

"प्यार..."

"धत्!" अपने मुँह में दुपट्टा दबाते हुए वो भाग चली।

"अरे...रे..नाम तो बताती जाओ।"

उसने मुस्कुराती हुई आँखों से पीछे मुड़कर देखा और बोली,"मीरा"।मैं उसे तब तक देखता रहा जब तक कि वो मुझसे चार क्वार्टर बाद के घर में नहीं चली गई।फिर,एक लंबी सांस छोड़ता उठ खड़ा हुआ।आज की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी।

मुझसे ध्रुवस्वामिनी पढ़ते-पढ़ते कब वो मेरी हृदय-स्वामिनी बन बैठी,पता भी नहीं चला।समय पंख लगाकर उड़ चला।हम दोनों को प्रतीक्षा रहती थी कि कब पढ़ाने का समय हो और लॉन के एक कोने में,अगल-बगल रखी दो कुर्सियों पर बैठे दो युवा-दिलों की धड़कन एक-दूसरे को सुनाई पड़े।इस समय कोई दूर से देखता तो सोचता कितनी तल्लीनता से पढ़ रहे हैं दोनों।लेकिन,सच्चाई यह थी कि जितनी देर हम वहाँ बैठते,आँखें किताब पर रहतीं और किताब के नीचे दो हथेलियों की ऊंगलियां एक पर एक चढ़ी रहतीं।हमारे होठ सूख रहे होते।जब लगता कि अति हो रही है,हम दोनों उठ खड़े होते-अब कल पढ़ेंगे।

मुझे जब अपनी पढ़ाई करनी होती,मैं आंवले के पेड़ पर चढ़ जाता।वहीं किसी डाली पर बैठा पढ़ता रहता और वह घर से खाने की वस्तुएं ला-लाकर मेरे मुँह में खिलाती रहती।उस समय मैं अपने को महाराज समझता।इसके अलावे भी हम किसी-न-किसी बहाने एक-दूसरे से मिलते रहते।एक दिन उसे अपना ड्रेस ख़रीदने पास के शहर जाना था।मैं भी किसी बहाने साथ लग गया।वहाँ पहले एक पिक्चर देखी हमने।फिर साथ-साथ एक ही प्लेट में खाया और एक ही गिलास से पानी पीकर हम दोनों मानो दो जिस्म,एक जान हो गए।फिर,मैंने उसके लिए ड्रेस पसंद की,ठीक वैसी ही जैसी दिल की हिरोइन माधुरी ने पहनी थी-लंबी बाँह वाली लाल कुर्ती और पीला पाजामा।चार-पाँच घंटे साथ बिताने के बाद वो मुझे आमिर और मैं उसे माधुरी समझने लगा था।शाम तक हम लौट आये थे-खुशियों के रथ पर सवार।

हमारा प्रेम प्रगाढ़ हो रहा था-गुलाबजामुन के रस-सा गाढ़ा और मीठा।लेकिन कहते हैं ना ज्यादा मीठा होने से चींटे लग जाते हैं-वही हुआ।मेरे पापा ने उसे पढ़ाने से मुझे मना कर दिया।उनके हिसाब से मेरी पढ़ाई बाधित हो रही थी।एक बहाना गया।हम आपस में ठीक से बात भी नहीं कर पाते थे।लेकिन,मिलना मना था न,आँखों पर रोक थोड़े न थी।मैं लॉन से और वो अपने बरामदे से।दोनों एक-दूसरे को वैसे ही देखते रहते जैसे चातक चकोर को। वो जब कभी मेरी पसंदीदा पोशाक पहनती,मैं दाहिने हाथ के अंगूठे और तर्जनी को मिलाकर गोल करता और शेष तीनों ऊंगलियां खड़ी कर उसकी ओर तीन बार हिलाकर प्रशंसा करता।वो भी अपनी दाहिनी हथेली मुँह के पास लाकर फूंक मारती।मैं उस हवा को दायें हाथ की मुठ्ठी में बंदकर अपने कलेजे से लगा लेता।ओह!क्या दिन थे।लगता था स्वर्ग में हूँ।काश!उस ज़माने में स्मार्टफोन होता!

इसी बीच परीक्षा का प्रोग्राम आ गया।मैं शहर चला गया।प्यार का गुलशन वीरान हो चला था।मैं उसकी हँसी सुनने के लिए बेचैन हो उठता।खैर,राहतवाली एक बात थी।वो मुझे पत्र लिखा करती।मुझे प्रतिदिन डाकघर जाने की आदत लग गई थी कि उसका पत्र आए तो तुरंत मिले।उसका लिफाफ फाड़कर ज्योंहि संबोधन पढ़ता-'मेरे मन मंदिर के देवता',जी चाहता पंख लग जाएं और तुरंत उड़कर पहुँच जाऊँ उसके पास।मैं भी उसे पत्र लिखता और अपने पास ही रख लेता कि जाऊँगा तो हाथ में ही दे दूँगा।पर,परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि मैं बहुत दिनों तक वहाँ जा नहीं पाया।मैं एम ए करने लगा था,वो बीए-पास वाले शहर के कॉलेज में।दूरियां प्रेम की आग को और भड़का देती हैं।एम ए फाइनल परीक्षा समाप्त होते ही मैं भागा-दौड़ा वहाँ पहुँचा।वहाँ जाकर ज्ञात हुआ उसकी शादी तय हो गई थी,किसी और के साथ।मुझे तगड़ा झटका लगा।माँ ने मुझे बताया नहीं!माँ गाँव गई हुई थी।पिताजी भी जानेवाले थे।मुझे भी जाना ही पड़ता।तभी पिताजी को ऑफिस के काम से बाहर जाना पड़ा।वे दो दिन बाद लौटनेवाले थे।आवास पर मैं अकेला रह गया था। उसने मुझे इशारा किया कि रात को मैं किवाड़ बंद न करूं,वो आएगी।कुछ ज़रूरी बात करनी थी।

कहे अनुसार वो आई।उसका इंतज़ार करते-करते मुझे नींद आ गई थी।उसने पैर में चिकोटी काटकर मुझे जगाया।कमरे में अंधेरा था।आँख खुलते ही कमरे में लाल वस्त्र पहने युवती पर नज़र पड़ी।मेरी चीख निकल गई।उसने अपनी हथेली से मेरा मुँह दबा दिया।

"क्या सोचा था आपने, कौन था।"

"मुझे लगा चुड़ैल थी।...इतनी देर से क्यों आई?"

"घर में सब सो जाते तभी तो आती।"

"आ ही गई हो तो बैठो।...क्या बात करनी है?"

"पता है न,सारे अरमान धूल में मिल गए।"

"हाँ,तुम्हारी शादी तय हो गई है।"

"कैसे जीऊंगी आपबिन ?मेरी माँ ने आंटी से बात की थी।उन्होंने मना कर दिया।"

"तुम्हारे पिता ने शादी तय की है।उनके निर्णय का सम्मान करो।"

"मुझे नहीं जीना।नहीं करनी शादी।आपको पति माना है।आपके साथ रहूंगी।मैं तीज भी करती हूँ आपके लिये।" ऐसा कहते हुए उसने मुझे कसकर जकड़ लिया।

"क्या कर रही हो,छोड़ो मुझे।होश में आओ मीरा।"

"नहीं,आज मैं आपको सर्वस्व सौंपने आई हूँ।होने वाले पति से नफरत है मुझे।मिलूंगी भी उसे तो ननवर्जिन।"

"पागल मत बनो।मैं चाहूँ तो स्त्री-संसर्ग की मन की मुराद मिनट-भर में पूरी कर सकता हूँ।लेकिन ये अनुचित होगा।" मैंने अपने आप को उससे छुड़ाते हुए कहा," यदि मेरी बहन होती तो तुम्हारी उम्र की ही होती।क्या मैं उसे ऐसी स्थिति में बर्दाश्त करता? क्या एक-दूसरे को तन सौंप देना ही प्यार है?मुझे तुमसे हमेशा प्यार रहेगा। अब जाओ यहाँ से।"

मैंने उसके आँसू पोछे।उसके माथे पर चुंबन लिया और विदा कर दिया।

कहानियाँ बनती ही हैं,बचे रहने के लिए।उस दिन के बाद एक दिन वहाँ और रुका था।हमारी कोई बात हुई नहीं।सिर्फ एक बार देखा था उसे।चेहरा सूजा था।आँखें लाल थीं।लगता है रातभर रोती रही थी।मैं भी सुखी कहाँ था,विवश था।पहले सोचा था माँ को बता ही दिया है।हमारी शादी हो जाएगी।उन्होंने वादा किया था,पता नहीं क्यों पलट गईं!अब उन दोनों परिवारों की मान-प्रतिष्ठा का प्रश्न था।कलेजे पर पत्थर रखकर मैं वापस चला आया।आते समय उसने देखा भी नहीं।शायद बहुत नाराज़ थी।

एम ए करने के बाद मैं नेट की तैयारियों में लग गया था।इसी बीच वह ससुराल चली गई थी।मुझे भी बुलावा आया था।पर,अपनी जलती हुई चिता कौन देखना चाहेगा।उसे भूलना कठिन था।पर,दुनिया की रीत है-कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो,लोग उसे भूल ही जाते हैं।यदि ईश्वर ने भूलने की शक्ति न दी होती तो?

दो साल बीत चुके थे।गंगा में ढेर-सारा पानी बह चुका था।मेरे पिता गुजर चुके थे।वह क्वार्टर छूट चुका था,कस्बा भी।मेरी नौकरी लग गई थी।मैं पास के ही एक विश्वविद्यालय में लेक्चरर नियुक्त हुआ था।मेरी नौकरी के तुरंत बाद पिता गुज़रे थे।फेमिली पेंशन संबंधी कुछ काम से मुझे वहाँ जाना पड़ा था।वहाँ ठहरने के लिए उसका क्वार्टर था ही।रास्ते भर मैं सोचता गया था,उस जगह की यादों से कैसे निपटूँगा।वहाँ आते ही वो दिख गई थी।

.गोद में एक प्यारा बच्चा भी था।लपककर पैर छू लिये उसने।

"अरे!रे!पैर क्यों छूती हो।"

"मना मत कीजिए।आपकी पूजा करती हूँ।एहसानमंद हूँ।उस दिन यदि गिरने से नहीं बचाया होता आपने तो मैं किसे मुँह दिखाती?आप भाई से बढ़कर हैं,एक सच्चा दोस्त।"

"बहुत हुआ।चलो पानी-वानी लाओ। बच्चा मैं पकड़ता हूँ।"

चेहरे पर मुस्कान लाते हुए उसने बच्चा मेरी गोद में दे दिया।छः महीने का था-लड़का।

"ये आपका ही होता।यदि नसीब ने चाहा होता।मैं बहुत चाहती थी,मेरा पुत्र आप जैसा तेजस्वी हो,चरित्रवान हो।"

"होगा,ज़रूर होगा।मेरा मानस-पुत्र है।इसे अच्छे से पढ़ाना।माँ हो।इसे अच्छे संस्कार देना।पता नहीं तुमसे आगे मुलाकात हो न हो।पर,जीवन के किसी मोड़ पर मेरा ये पुत्र मुझसे ज़रूर मिलेगा।"

आज लगभग 20 साल बाद सुबह-सुबह उसका फोन आया।

"सुनते हैं? फोन आया है।आकर ले लीजिए।"

"देखती नहीं पेपर पढ़ रहा हूँ,तुम्हीं ला दो न।नाम पूछ लो।"

"पूछ लिया।कोई लड़की है।मीरा नाम बताया।"

मुझे करंट लगा जैसे।दौड़ते हुए किचेन में पहुँचा और मोबाइल लेकर उसी रफ्तार में बालकनी लौटा।

"हैलो"

"पहचाने?"

"तुमको कैसे भूल जाऊँ?कैसी हो?"

"ठीक हूँ।गाँव में हूँ।दो बेटे हैं।"

"मेरा मानस-पुत्र कैसा है?अब तो बड़ा हो गया होगा।"

"लंबा हुआ है।आपसे मुठ्ठी भर ऊपर ही होगा।उसी के लिए फोन किए।"

"नंबर कहाँ मिला?"

"आप कोई छिपे हुए आदमी हैं क्या? वही लाया ,नेट से निकालकर।"

"काम बोलो।"

"ये आपकी यूनिवर्सिटी में बीए में नाम लिखा रहा है।टेस्ट पास कर चुका है।थोड़ी सिफारिश कर दीजिएगा तो हॉस्टल मिल जाएगा।"

"निश्चिंत रहो।हॉस्टल-इंचार्ज मैं ही हूँ।"

"कल जाएगा आपसे मिलने।पहचान लीजिएगा।"

"कैसी बात करती हो? और सुनो, फिर फोन करना।"

"काहे,दीदी से बात करके मन नहीं भरता है?अब रखती हूँ।बाय।"

"बाय"

श्रीमतीजी चाय लेकर आईं।

"किससे प्रेमालाप हो रहा था,घंटे-भर से?"

"घंटे भर से कहाँ?10 मिनट से।"

"कौन थी?"

"थी पापा के कलीग की बेटी। पुराना परिचय है।"

"जिस अंदाज़ में बात हो रही थी,वो परिचय नहीं था,कुछ और था।"

"तुम औरतें भी ना!बाल की खाल निकालने लगती हो।तुम बैठकर सोचती रहो,परिचय था या कुछ और था।मैं चला वाक पर।"

सब्जी का थैला उठाकर मैं बाहर निकल गया।

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