सुहाग सेज पर बैठी सिया अपने पति धीरज का इंतज़ार कर रही है , उसके दिल की धड़कन तेज़ है तभी धीरज कमरे में आता है और उसे एक गुलाब का फूल देकर कहता है “हैप्पी वैलेण्टाइन डे” इस फूल की तरह हमेशा मुस्कुराती रहना । वो फूल लेकर मुस्करा कर उसे देखती है तो वो कहता है ,यस !बिल्कुल इसी तरह रियली योर स्माइल इस वैरी ब्यूटीफ़ुल और फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ उसके बाद पता न चला वो कब सोये । सुबह के ०३ बजे फोन की घंटी से धीरज की आँख खुली उसने हड़बड़ा कर फोन उठाया , हैलो ..और फिर यस सर कह कर कुछ सेकेंड में फोन रख दिया । सिया ने पूछा , क्या हुआ ? तो धीरज ने उसे वाहों में लेकर बोला , मुझे जाना होगा, मेरी छुट्टियाँ कैन्सिल हो गई हैं ।
मुझे भी साथ ले चलो !
नहीं तुम्हे नहीं ले जा सकता, बार्डर पर जाना है , तुम यहीं रहो अगर यहाँ अच्छा न लगे तो अपने मायके चली जाना । ये सुन सिया की आँखों से आँसू वहने लगे जिन्हें देख धीरज का धीरज डगमगाया मगर फिर वो सर झटक वाशरूम में चला गया शायद वो शाबर की आवाज़ से अपनी आवाज़ को छुपा रहा था । धीरज के जाने के बाद सिया ने अपनी सुहाग सेज की चादर को गुलाब की पंखुड़ियाँ सहित समेट कर अपनी अलमारी में रखा , मानो उसने अपनी यादों की एक रात को अपने दिल में समेट लिया हो । समय की गति को रोकने का साहस किस में है ? वो अपनी रफ़्तार से ही चला दिन ,हफ़्ता , महिनों में समय गुज़रने लगा सिया का सहारा था तो मात्र फोन जिस पर वो धीरज से बात करती थी । खूबसूरत सिया दिन प्रतिदिन मुरझाने लगी क्यों कि पिछले ०२ महिनें से धीरज का न तो कोई पत्र आया और न ही फोन । अब तो आस पड़ोस की औरतें , अपशकुनी , भारी गृह , घर के लिए ठीक नहीं और भी बहुत कुछ उसके बारे में तरह तरह की बातें करने लगीं । सिया ये सब सुन कर भी अनजान बनने का दिखाबा करती क्योंकि उसे यक़ीन था धीरज के उन शब्दों पर जो उसने चलने से पहले सिया का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा था , “ मुझे तुम्हारे पहले स्पर्श की क़सम है अपनी इस सालगिरह पर हम हमेशा साथ होंगे बस तुम मेरा इंतज़ार करना मैं लौटूँगा ज़रूर ।”
आज सिया ने शादी का जोड़ा पहना तो लोगों को समझ न आया क्या हुआ इसको ? किसी ने पूछ भी लिया , “ सब ठीक है ?”
जबाव में वो मुस्करा दी शायद लोग भूल गये आज उसकी शादी की सालगिरह है । दिन भर सिया की नज़रें फोन व दरवाज़े पर रहीं पर फोन नहीं आया और न ही ...सिया का दिल बैठा जा रहा था पर धीरज की क़सम उसे संभाले हुए थी किसी तरह से दिन कटा पर रात वो तो शायद खा जाने को ही तैयार थी पर सिया ने अपनी सुहाग सेज की चादर निकाली उसे बेड पर उन्हीं सूखी पंखुड़ियाँ के साथ बिछाया , वो पंखुड़ियाँ व चादर की सिलवटें जोकि गवाह थीं धीरज व उसके एक रात के प्रेम की जिन्हें वो आहिस्ता आहिस्ता सहलाते हुए इंतज़ार करते हुए ज़मीन पर बैठे बैठे न जाने कब सो गई। रात को दरबाजे की खट खट से वो जागी उसने उठ कर दरवाज़ा खोला तो देखा धीरज खड़ा था अपनी क़सम , अपने यक़ीन व अपनें शब्दों के साथ ।

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