जो तुम न मिलते

" दोनों बहुओं के लिए ये अंगूठियां ठीक रहेंगी।"उसने सोचा।
पचास वर्ष की संध्या।दो इंजीनियर बेटों की माँ।एक कुशल मध्यमवर्गीय गृहणी की तरह अपनी भावी बहुओं के लिए गहनों की खरीदारी कर रही थी।लौकिक दृष्टि से उसका जीवन खुशहाली का प्रतीक था।अपना घर,नौकरीपेशा पति और कामयाब बच्चे।उसे याद है कि जीवन का प्रारम्भ संघर्षपूर्ण रहा।माता पिता की सबसे बड़ी पुत्री घर के अभावों की सदा साक्षी रही।विवाह पश्चात सुधीर की सारी जिम्मेदारियो में उसने स्वयं को भागीदार बना लिया।छोटे ननद देवरों की शादी,बाबूजी की बीमारी,किस्तों में घर का मकान खरीदना ,बच्चों की पढाई,इन सबमें उलझती कब जीवन के पचासवें दशक में प्रवेश कर गयी ,पता ही नहीं चला।
"ऑन्टीजी, ये वाली अँगूठी देखो।"दुकानदार की आवाज़ उसे यथार्थ में ले आयी।
"वाह बड़ी सुन्दर अँगूठी है।"
उसका मन था ऐसी अँगूठी पहनने का पर कभी बजट ही नहीं हुआ।पर अब,नहीं नहीं...अपना क्या देखना।आगे बच्चों का भी देखना है।
"अजी मन है तो खरीद लो अँगूठी।"पीछे से नितांत अपरिचित आवाज सुनाई दी।
उसने पलटकर देखा।एक अजनबी चेहरा धृष्टतापूर्वक हँसता हुआ।उसे अच्छा नहीं लगा। मुँहफट कही का,उसने सोचा।
"जो मन आये कर लेना चाहिए।"वह हँसते हुए बोला।
"मुझे लेना होगा तो ले लूँगी, भाईसाहब।"वह चिढ़ गयी।फटाफट दुकान से निकली।उस अनजान अस्तित्व को झेलना उसके लिए भारी हो गया था।
घर आकर उसने सुधीर को उस बद्तमीज इंसान के बारे में बताया।"बताओ उसे क्या मतलब था?
बिना वजह बोले जा रहा था।तमीज नहीं होती कुछ लोगो को।"
शाम को रोजाना की तरह पार्क में चली गयी।इन दिनों घुटनों का दर्द बड़ा परेशान कर रहा है।डॉक्टर ने घूमने के लिए कहा है।पार्क में लोगों से मिलकर मन भी खुश हो जाता है।
"इधर से जाओ बच्चों...."आवाज़ कुछ सुनी सुनी लगी।
पीछे मुड़कर देखा।"अरे यह तो वही है सुबह वाला।"उसने मुँह फेर लिया।मन में चिड़चिड़ाहट घर कर गयी।
" हेलो मैड़म!"वह उसके पास ही चला आया।
"आई ऍम शलभ।डॉ शलभ।"वह मुस्कुराते हुए बोला।
"डॉ साहब आपसे अपने कमरदर्द के बारे में कुछ पूछना है।"किसी तीसरे व्यक्ति ने बीच में दखल दिया।
"सर ,क्लीनिक आकर पूछना"।। उत्तर तैयार था।
" तुरंत ना बोल दिया ।शर्म तो है ही नहीं।"संध्या ने सोचा।
" आप क्या सोचने लगी?"वह हँसा।"किसी को ना कहना हमेशा बुरा नहीं होता।"उसने आँखों में आँखें डालकर कहा।संध्या झिझक गयी।
"कैसा बेशर्म है ।उम्र में मुझसे 5-6 साल छोटा होगा पर लिहाज नहीं है।"
घर आकर उसने फिर सुधीर के सामने उस पागल की बुराई की।
पर पता नहीं क्यों उस रात,अगली सुबह,अगली शाम वह संध्या के दिमाग़ में घूमता रहा।पार्क में जाकर वह उस आवाज़ की प्रतीक्षा करती रही।
तीन दिन बाद वह पार्क में फिर से टकरा गया।
"हेलो मैडम!"
इस बार संध्या के होंठो पर अनायास ही मुस्कुराहट तैर गयी।बातों की शुरुआत हुई।शलभ और उसकी बातें सारी दुनिया से अलग थी।मनमर्जी से जीने वाला बेफिक्र इंसान।डॉक्टर पर कविताओं का बेहद शौक़ीन।हद दर्जे का भावुक पर हद दर्जे का
व्यवहारिक।संध्या और सुधीर की दुनिया के लोगों से बिल्कुल अलग।
पता ही नहीं चला कब शलभ का व्यक्तित्व संध्या को सम्मोहित करने लगा।वह बदलने लगी।घुटनों का दर्द गायब होने लगा।शीशे के सामने खड़े होकर गालों और आँखों के आसपास की झुर्रियो को मेकअप से छिपाने का प्रयास करने लगी।जीवन में पहली बार सिल्क की साड़ी पहनी।उसे स्वयं से प्यार करना आने लगा।सुधीर,रिश्तेदार और जान पहचान के लोग उसके इस परिवर्तन से आश्चर्यचकित हुए।सबसे अच्छा तो तब लगा जब छोटे बेटे ने गले लगाकर कहा ,स्मार्ट माँ।..और हाँ बातो-बातों में शलभ ने भी हँसते-हँसते हुए कहा",क्या बात मैडम, बड़ी बदल रही हो।"वह हँस दी थी।
उसे खुद पर आश्चर्य होता।उम्र के इस पड़ाव पर यह क्या?शेक्सपियर के किसी नाटक में पढ़ा था कि कैसे जादुई रस आँखों में डालने से कोई भी इंसान किसी के प्यार में पड़ रहा था।वह सोचती कि शायद किसी ने उसकी आँखों में वही जादुई रस डाल दिया था।वरना जो न कभी चाहा, जो न कभी सोचा,वह क्यों हो रहा था?
उम्र के साथ साथ सोच भी बदलती है।किसी नव तरुणी की भाँति वह चंचल नहीं थी।देह का आकर्षण भी नहीं था।उसने शलभ के सामने अपने मन की कोई परत नहीं खोली।अपने मन के एक एक भाव को ह्रदय की संदूकची में बंद करती गयी।उसकी भावनाएँ निः शब्द थी।उसके प्रेम में जो था,सिर्फ उसके मन के दरवाजों में बन्द था।वह शलभ के सामने निर्विकार रहती।गाम्भीर्य का आवरण पहनने की कोशिश करती।...पर कई बार शलभ की आँखों की चमक उसे भयभीत कर देती,"कही उसने मेरे मन को पढ़ न लिया हो।"
आज संध्या के बड़े बेटे के रिश्ते वाले आने वाले है।सुबह से तैयारी चल रही है।पर घर की सफाई वाली आशा गायब है।सुधीर सामने वाले फ्लैट में पूछने गए।वापस आये तो मुँह बिगड़ा था।
" क्या हुआ?"
"आशा नहीं आएगी।"
"क्यों?"
"चक्कर चल रहा था किसी के साथ। भाग गई।छी, लोग अपनी उम्र भी नहीं देखते।"
वह हतप्रभ सुधीर को देखने लगी।मन का चोर चेहरे पर आ गया।सही तो कह रहे है सुधीर।जो हरकते सामाजिक वर्जनाओं को तोड़े वह अपराध ही है।
तो क्या वह भी आशा ही मानी जायेगी?वह विचारो के सागर में डूब गयी।कौन मानेगा कि उसका मन शलभ की देह नहीं आत्मा से बाते करता है?कौन मानेगा कि शलभ के होने भर का अहसास उसके मन को बांध देता है?कौन मानेगा कि कुछ अनकहे सम्बन्ध लेंन-देंन की कसौटी से परे होते है?उसने मन ही मन कड़ा फैसला ले लिया।
अगली शाम वह बड़ी बैचैनी से पार्क में शलभ का इन्तजार कर रही थी।एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी।
"हेलो मैडम!"
संध्या की उदास हँसी चारो और बिखर गयी।
"क्या हुआ?बड़ी उदास हो।"
"हाँ, तुमसे अंतिम बार जो मिल रही हूँ।"
वह हक्का बक्का रह गया।
"बैठो, तुमसे कुछ बात करनी है"।उसे लगा जैसे उसकी आवाज़ बहुत दूर से आ रही है।
"मेरा जीवन बीत रहा था।जो तुम न मिलते तो बस बीत जाता।तुम्हारा आना बिलकुल भी बुरा नहीं था।तुम आये तो पता चला कि कभी कभी ना कह देना भी सही है।कभी कभी मुँहफट हो जाना भी अच्छा होता है।तुम न आते तो कैसे पता चलता कि पचास की उम्र में भी अपनी मनपसंद साड़ी पहनकर शीशे के सामने खड़े होकर देखने से षोडशी सा अनुभव होता है?तुम न मिलते तो मैं अपना जीवन अपने लिए जीना न सीख पाती।"
शलभ के चेहरे के रंग बदल रहे थे।
"परिवार और समाज नियमों से चलते है ,भावनाओं से नहीं।जो अच्छा लगे वही करे,ये हमेशा नहीं हो सकता।सो....आज हम अंतिम बार मिल रहे है।"उसने अंतिम वाक्य पर जोर देते हुए कहा।
"तुम मुझे याद करोगी।"शलभ की आँखों में नमकीन पानी उतार आया।
"इस लोक से उस लोक में जाते समय जो चन्द चेहरे याद आयेंगे, उनमे से तुम भी एक होंगे।"संध्या का गला रुंधने लगा।उसने खुद पर नियंत्रण किया।आज उसे कमजोर नहीं पड़ना था।
"काश हम कभी न मिलते।"शलभ ने धीरे से कहा।
"नहीं...जो तुम न मिलते तो मैं खुद से कैसे मिलती?"
वह उठ खड़ी हुई।अंतिम विदा के लिए......

डॉ अर्चना शर्मा
04/07/2016

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