और नहीं! बस और नहीं
अब और ना मैं सह पाऊंगी
जो तूने मुझको धरा कहा
मैं मिट्टी ना हो जाऊंगी
देवी सा तूने मुझको मान दिया
पर मैं पत्थर ना हो पाऊंगी
क्यों समझा है बेजान मुझे
जीवित हूं मैं तुझ जैसा ही
मन आत्मा रखती हूं भीतर अपने
हाँ सच है ये जननी हूं मैं
संतती पर अपना सर्वस्व भी
अर्पण कर जाऊंगी
पर क्या इसके बदले में तुझसे
सम्मान के दो बोल भी मैं ना चाहूंगी
हाँ कलियुग है यह! इस कलियुग में
हर द्रौपदी की लाज बचाने को
यहां कृष्ण तो ना पाएंगे
पर अपनी रक्षा की खातिर
अब मैं खुद अपना कृष्ण हो जाऊंगी
ना छेड़ मुझे! मैं काली हूं
ना छेड़ मुझे! मैं काली हूं
हे रक्तबीज! तेरे तन से
रक्त की हर बूंद को मैं पी जाऊंगी
सोचो! ज़रा विचार करो
फिर तुम मुझसे व्यवहार करो
जो प्रलय बन मैं तुम पर बरस पड़ी
तो शांत मुझको करने को
चरणों में मेरे लोट सके
वो शिव कहां तुम पाओगे


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