एक स्री बुनती रहती
रिश्तो के ताने बाने
जीवन पर्यन्त
संजोती रहती उनको
बचपन में अपने हिस्से से
माखन ,घी भाई को खिलाती
पिता की बात का मान निभाती
ब्याह कर जब जाती घर दूजे
अनगिनत रिश्तो को अपनाती
पति ,बच्चो के इर्द गिर्द ही
अपनी सारी दुनिया बसाती
उसकी बुनावट के साए में
रिश्ते नए नए रूप विन्यास से
सजते रहते ,कसते रहते
अपनी जगह पर टिके रहते
जब जीवन डोर टूट जाती
उसकी बुनावट के फंदे ढीले
पड़ जाते,कुछ निकल जाते
जो उसने बमुश्किल फंदों को
एक से एक को मिलाया था
तभी डिजायन उभर आया था
रिश्तो को प्रेम से सजाया था
निकल जाते धागे फंदों से
बुनावट खुल खुल जाती
और रह जाता क्या शेष
सदृश्य सिर्फ धागे
लंबे ,छोटे ,टूटे ,उलझे
सिर्फ एक स्त्री के अवसान से ।

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