सुबह सुबह

घर के सेहन में रखे

उन गमलों के पौधों को

पानी पिलाते हुए,

नज़र पड़ी थी रास्ते पर

अपने कद से भी बड़ी

दो बालतिओं को

एक एक हाथ से खींचते,

दौड़ती हुई,

मुरझाये से किसी पौधे सी

एक आकृति पर।

वैसे तो बच्चा कहा जाना चाहिए था उसे।

लेकिन बच्चे तो

हमारे बच्चों जैसे होते हैं ना!

एक लम्हे के लिए

उसकी आँखोंने

मेरी ओर देखा था,

और पूछा था मुझ से,

"क्या मैं भी आकर

एक गमले में खड़ा हो जाऊँ?"

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