आ गयी है घड़ियाँ विदाई की .…...

थम गई है गूंज शहनाई की ,

आँखों में तैरने लगी है बीती बातें .....

सूने अंगना में पुरवाई सी ,

मान रहे हैं खुद को ही दोषी ....

एक कोने में मौन खड़े पिता भी ,

बरबस ही याद आ गयी है यादें...

लगती है बात कल ही की ....

वो तुतलाना , नखरे दिखाना ,पल भर में रूठना फिर खुद ही मान जाना भी !

माँ ! भी है रस्मो रिवाजों की बेड़ियों में जकड़ी सी ......

जाने क्यों सोच रही है , मैंने इतनी क्यों जल्दी की !

अभी तो कुछ औऱ साल ठहर सकती थी ...... ये घड़ियाँ विदाई की ,

भाई भी सोचे ..अब उससे मिलने की भी लेनी होगी आज्ञा ,

जिसके साथ खाये , खेले औऱ पूरा बचपन बिता दिया ...

औऱ उसका दर्द तो क्या हो बयां ...जिसे जाना है यहां से , और बसना है वहाँ ...

जहां कोई नही है उसका अपना , सगा न संबंधी , लगता है उसे ये सब एक सपना ,

कैसे उन गैरो को अपना कह पाऊंगी , जिन्हें जानती भी नही कैसे उनके संग रह पाऊंगी ..!

खुशियां इस आंगन बसी रहे यूँ ही , इसी उम्मीद से दाने खील के बिखेरे जा रही ....

बिटिया इस आंगन से जा , बस जाए वहाँ खुशी खुशी , माँ इस आस में है , अपना दामन फैलाये खड़ी !

हे ईश्वर ! कह दे इन तारों से , एक रात और दें दें अपनी छांव की ....

बस किसी तरह कुछ और देर थम जायें , ये घड़ियाँ विदाई की ।।

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