नोट- कविता पढ़ने से पहले
पेड़ पर टंगे इस पोस्टर पर भी गौर फरमाइगा
थोड़ी नहीं,
बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा चिंता जताइएगा
पोस्टर देखने के बाद शिकायत होगी
कविता पढ़ने के बाद, और ज़्यादा शिकायत होगी
दोनों शिकायतों में फर्क भी होगा
पहले पोस्टर दिखानेवाली से शिकायत होगी
बाद में पोस्टर लगानेवाले से शिकायत होगी





पोस्टर

मैंने सड़क के कोने में
पेड़ पर टंगा, एक पोस्टर देखा
उस पर कुछ लिखा देखा
मन को आहत होते देखा।

सोचा पोस्टर को हटा दूँ
उसे फाड़ दूँ
पर पोस्टर ज़्यादा ऊँचाई पर था
मेरी पहुँच से ऊपर था

सोचा किसी आदमी से कह दूँ
पर लगा कि कहीं वह
पीले दांत न दिखाने लगे
पुलिस से कहना भी मुनासिब न समझा
क्योंकि लगा कि कहीं वह मुसकियाने न लगे!

क़ॉलेज जाने की जल्दी थी
मुझे बस पकड़नी थी
बस देरी से आए, तो चलता है
खुद देर हो जाएँ, तो नहीं चलता!

सोचा कॉलेज से आकर
इसका कुछ करती हूँ
किसी चिंतित से
बात करती हूँ।

पर जब कॉलेज से वापस आई
तो देखा, पोस्टर हट गया था

मैं पोस्टर हटाना चाहती थी
पोस्टर हट भी गया था
पर क्या मुझे संतुष्ट होना चाहिए था!

मैं सोचने लगी, कि पोस्टर क्यों हट गया था?
क्या किसी ने मुझे फोटो खींचते देख लिया था?
क्या उनके मन का मैल धुल गया था?
क्या उन्हें शर्म आ गई थी?

हां! आ गई होगी उन्हें शर्म
इस बात पर आ गई होगी
कि कहीं उनका भेद न खुल जाए!
बहन की लाज दांव पर लगाने के बदले
कहीं उनकी ही लाज न चली जाए!

ज़रूर उसी ने यह पोस्टर हटा दिया होगा
पर फ़ाड़ा नहीं होगा
बड़े एहतियात से रख लिया होगा
और किसी और कोने में लगा दिया होगा।

शायद! मन के कोने में भी एक ऐसा पोस्टर लगा होगा
मन के कोने में ऐसा पोस्टर न होता
तो वह पोस्टर पेड़ पर क्यों टंगा होता।

अफ़सोस है!
क्योंकि महज़ एक पोस्टर नहीं है
कईयों के पास ऐसे पोस्टर हैं
जो किसी कोने में छिपाकर रखे हैं

पर छिपते छिपाते
गौर से देखने पर
ये पोस्टर दिख ही जाते हैं
उन पर ऐसे ही अल्फ़ाज़
नज़र आते हैँ।

इन पोस्टरों की लिखावट भिन्न हो सकती है
साज-सज्जा अलग-अलग हो सकती है
अंदाज़ अलग हो सकता है
उनका रूप अलग हो सकता है
बात अलग हो सकती है

पर बात अलग होते हिए भी
बात एक ही है
क्योंकि शब्द अलग हैं
पर मानसिकता एक है।

कुछ लोग होंगे
जो पोस्टर को देखेंगे नहीं
घूरेंगे, फ़िक्र जताएंगे
गरियाएंगे
पर पोस्टर लगाने वाले को नहीं
पोस्टर दिखाने वाली को गरियाएंगे।

क्योंकि उन्हें ऐसे पोस्टरों में
आदमियों की सताई
हताशा से सिर झुकाई
औरतों को देखने की आदत होगी
पोस्टर में उनकी अपनी ही नग्नता दिख जाए
तो उनके लिए आफ़त न होगी!

वे पोस्टर के हर एक कोने को घूरेंगे
किसी की झलक चाहेंगे
जब न मिलेगी
तो शिकायत करेंगे
कि बात बहन की है
तो पोस्टर में बहन क्यों नहीं है!

अच्छा है पोस्टर में बहन नहीं है!
नंगा मस्तिष्क है
नंगी आवाज़ें हैं
और उसके शोर में
चीखती खामोशी है!

मैं आहत हूँ
क्रोधित हूँ
मैं तमाम ऐसे पोस्टरों को फ़ाड़ देना चाहती हूँ
पर क्या करूँ!
ये पोस्टर कागज़ के नहीं हैं
ज़िंदा मस्तिष्क हैं!
मस्तिष्क उनका है
उस पर मेरा बस नहीं है!

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