तुम रहकर अपने घर में डरते हो पथ पर खो जाने से,
बैठ शीतल छाया में डरते हो धूप में जल जाने से ,
पर बात समझो तुम इतनी की..
राह बनी है मंजिल तक पहुंचानेको ,
और धूप बनी है जीवन पथ पर उज्ज्वलता फैलाने को ,
देखो इस थमे और उदास जल पर भी ,
तनिक छू देने से ही,कितनी मुस्कानें छा जाती है .

कितने वन और पर्वत पारकर
नदी अंततः अपनी मंजिल पा जाती है ,
जब आती है बयार पवन की
जंगल की आग बुझाने को
उस बयार से अग्नि और वेगवान हो जाती है ,

तुम भी तो अग्नि हो जो हर निराशा दहा सकती है
तुम भी वायु हो जो अडिग पर्वतों को हिला सकती है
नदी हो तुम जो हर दुर्गमता में अपना पथ बना सकती है आकाश हो तुम जिसका कोई अंत नहीं
साथी भूमि हो तुम ,है अनंत रत्न तुम में ही
तुम क्यों इतना डरते हो।।

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