रात का सफऱ

"चाय, गरमा गरम चाय.. चाय लोगे साहब..?"


रात के 12:30 बजे है, हल्की सर्दी ने दस्तक दे दी है.. राजस्थान के एक छोटे से जंक्शन सादलपुर(राजगढ़) पर बैठे ललित का ध्यान उस चाय वाले पर जाता है, जो केतली और मिट्टी के बरवे(कुल्हड़) लेकर उसी की तरफ देख रहा है... शायद उसके पास और ग्राहक भी नही...

"हाँ, दे दो, वैसे भी सर्दी लग रही है.. अच्छा सुनो हनुमानगढ़ के लिए गाड़ी कब मिलेगी..?"

"साहब साढ़े 5 बजे से पहले कोई गाड़ी नही.. केवल एक गाड़ी सुजानगढ़ वाली डेढ़ बजे आएगी... जो रींगस जाती है.." चाय वाले ने चाय पकड़ाते हुए कहा..!

स्टेशन लगभग सुनसान है, मीटर गेज ट्रेन का छोटा सा जंक्शन है, शायद इसलिए भी भीड़ कम रहती है.. हल्की हल्की बारिश और मीठी ठंड के साथ रेतीली मिट्टी की खुसबू भी है...

सामने वाले प्लेटफॉर्म पर 2 ट्यूब लाइट जल रही थी, और जहां वो बैठा था वहां घुप्प अंधेरे से लड़ने की कोशिश करता एक अदना सा बल्ब..

वो चाय पीता है, की ऊपर की छत से एक बूंद छपाक से उस कुल्हड़ में आ गिरती है औऱ फिर उसी में ठहर भी जाती है...

हनुमानगढ़ में उसके मामा रहते है, बहुत दिनों बाद वो जा रहा था.. लेकिन उसकी किश्मत जरा खराब थी सादलपुर से जो ट्रेन उसे 11:30 बजे मिलनी थी, वो उसकी लापरवाही से छूट गई...

हाथ पर बंधी Hmt घड़ी की तरफ देखता है, समय सवा 1 हो गया... एक चाय की दुकान के अलावा कुछ भी खुला नही है... सामने वाले प्लेटफॉर्म पर एक परिवार और उनसे दूर एक अधेड़ के अलावा एक साधु सो रहा है...

कुछ ही देर में ट्रेन का एक लंबा हॉर्न सुनाई देता है... और छुकछुक करती हुई एक ट्रेन आ रुकती है... दूसरी तरफ से "चाय वाला.. चाय.. चाय.." की आवाज आती है.. 2 मिनट बाद गाड़ी फिर से हॉर्न देती है.. गाड़ी के जाने के बाद वहां केवल एक परछाई है... एक लड़की...

"लड़की"... इस रात में ..? ललित को अजीब सा लगता है... लड़की अकेले..?

कुछ देर तक वो उसे देखता है... हल्की हल्की रोशनी में शॉल लपेटे हुए उस लड़की ने खुद को साधु के साथ वाली बेंच पर खुद को समेट लिया है..

"भैय्या... सुनो... एक चाय देना..?" लड़की ने धीरे धीरे कहा... पर सन्नाटा इतना था कि सामने वाले प्लेटफॉर्म पर बैठे ललित को ये सुंदर आवाज सुनने में कोई दिक्कत नही हुई...

ना जाने क्या सोच कर ललित ने कदम बढ़ाए और पटरियों को फलांगता हुआ उस लड़की की तरफ बढ़ा... लड़की ने एक बार ललित को देखा और फिर चाय पीने में मग्न हो गई...

"सुनिए... " ललित ने थोड़ा हिम्मत करके पुकारा..
लड़की ने बस नजरें उठा कर देखा जैसे जानना चाहती हो कि "क्या है?"
"जी मैं ललित रेवाड़ी हरियाणा से... हनुमानगढ़ जा रहा हूँ मामा के यहां... ट्रेन छूट गई.."
लड़की ने एक बार और देखा और फिर अपनी चाय खत्म की...

कुछ देर तक सब शांत रहा..

"आप इस समय..?" ललित ने बात बढ़ाना चाही

"घर से भागी थी... " लड़की ने बिना ललित को देखे कहा..

"क्या..? पर क्यों..?"

चुप रही वो कुछ नही बोली..

"देखिए अगर आपको बुरा लग रहा है तो मत बताइए" ललित को लगा जैसे उसने बहुत गलत पूंछ लिया..

"इश्क़ था किसी से, वो नही आया.. किस मुँह से घर जाते.."

"और घर कहाँ है आपका..?"

"हनुमानगढ़"

"तब अब कहाँ जाएंगी आप..?"

कोई उत्तर नही था उसके पास...

"देखिए.. मेरी बात मानिए घर लौट जाइये.. घर वालों से मार भी खानी पड़ी तो कोई बात नही.. पर बाहर लड़की को ऐसे अकेले रहना सही नही.." ललित ने समझाने की कोशिश की...

चुप्पी दम तोड़ने का नाम नही ले रही थी..
सुबह के 5 बजने वाले थे, हनुमानगढ़ के लिए ट्रेन आने में कुछ ही देर थी... साधु बाबा ने खड़े होकर महादेव का जाप किया और अपनी राह ली...

ललित ने बगल में बैठी लड़की को देखा, वो कब की सो चुकी थी..बाल चेहरे पे बिखरे थे.. रँग बिल्कुल उजला.. पलकें आंखों की बड़ी सी पहरेदार.. सूरज की लालिमा से होंठ... ललित उसे अपलक देखे ही जा रहा था कि गाड़ी ने सीटी दी.. पर वो वैसे ही सोयी हुई थी...
ललित ने उसके हाथ को हल्के से छुआ और कहा कि ,"चलिए.."
ना कहने को कुछ नही था उसके पास.. एक छोटा सा बैग उसने उठाया और लगभग खाली पड़ी उस ट्रेन में ललित के सामने वाली सीट पर जा बैठी..

गाड़ी अपनी धीमी रफ्तार में आगे बढ़ी.. ललित नींद के आगोश में था.. सुबह के 9 बजे ट्रेन हनुमानगढ़ स्टेशन पर पहुंच चुकी थी... जब उसने आँखे खोल कर देखा तो लड़की वहां नही थी... ललित ने जल्दी से उठते हुए प्लेटफॉर्म पर उसे ढूंढा... पर वो कहीं नही थी.. हार कर उसने अपने मामा के घर की राह ली..

आज 2 दिन हो चुके थे उसे यहां आए हुए .. शाम को घर से बाहर निकल कर सामने वाले पार्क में जाकर बैठ गया..अंधेरा फैलने लगा था लेकिन हल्का सा प्रकाश चाँद का फैल गया था.. एकाएक झूले के पीछे सामने वाली बेंच पे वही लड़की दिखी... ललित एक दम उछल पड़ा... बिना देर किए वो उसके सामने जा खड़ा हुआ.. दोनों ने एक दूसरे को देखा, और फिर उस लड़की ने कहा,"मैं तुम्हे और परेशान नही करना चाहती थी,उस दिन घर तो चली गई पर..."

"क्या.. हुआ उस दिन.?"

"कुछ नही परिवार को यही बोल कर घर से निकली थी के आज रितु के चाचा की लड़की की शादी थी.."

"आपने नाम नही बताया अपना.?"

"कोमल"

"हो भी बिल्कुल वैसी ही.."

एक मुस्कुराहट तैर गई हवा में.. "अब मैं चलती हूँ" बोलते हुए वो उठ खड़ी हुई..

"अरे,इतनी जल्दी.? सुनो... फिर कब मुलाकात होगी.?"

"जब अंधेरा थोड़ी सी रोशनी करेगा..."

अब हर रोज शाम को ललित पार्क में कोमल से मिलता.. उसे प्यार हो गया था उससे.. और इतना कि उससे मिले बिना उसे चैन नही आता था... अपनी बेकरारी का आलम वो किस को कहता... लेकिन मामा के परिवार को शक होने लगा था...

एक दिन शाम को जब कोमल ललित से मिलकर जानेे लगी तो , ललित ने दबे पाँव उसका पीछा किया... पार्क से बाहर आकर उसने कॉटन मील की राह ली, लगातार वो चलती रही, और शहर से बाहर इंदिरा नहर के पास आई और एक छलांग नहर में लगा दी...

"नही..." बोलते हुए ललित ने छलाँग लगा दी.. उसे कोमल कहीं नही दिखी, और वो खुद भी डूबने लगा, लेकिन उसी ललित के मामा के लड़के ने उसे बाहर निकाल लिया जो रोज उसे पार्क में अकेले बैठे बात करते देखता था... और आज देखा की शहर के बाहर आकर नहर में कूद गया था...

पूछने पे पता चला कोमल को मरे 6 साल हो चुके, प्यार में धोखा मिला था उसे, घर छोड़ के गई थी किसी के लिए.. जब वो नही आया तो वापस घर आई, लेकिन जब परिवार ने भी दुत्कार दिया तो उसने नहर में कूद कर जान दे दी...
ललित स्तब्ध था...!

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