जुलाहे की सलाह ( बाल-कहानी )

राजा विवेकसेन राज दरबार में अपना आसन ग्रहण कर चुके थे| दरअसल आज मंत्रिमंडल की विशेष बैठक राज्य के खाद्यमंत्री के अनुरोध पर विशेष रूप से आहूत की गयी थी, जिसकी अध्यक्षता स्वयं राजा साहब को करनी थी| इस बैठक में राजा साहब ने अपने विशेष परामर्शी के रूप में ‘फक्कड़’ जुलाहे को आमंत्रित किया था|


पिता की मृत्यु के पश्चात राजा विचित्रसेन को राजगद्दी संभाले अभी केवल तीन माह ही बीते थे| उनमे एक खास गुण यह था, कि वे आम जनता का दुःख-दर्द समझने और उनकी समस्याओं को जानने हेतु भेष बदलकर अपने राज्य में घूमते थे, लोगों से मिलते थे और इस दौरान अगर उन्हें किसी साधारण व्यक्ति के अन्दर भी विद्वता, समझदारी या अन्य कोई विशेष गुण नज़र आता तो राजदरबार की विशेष बैठकों में अहम् फैसले लेते समय उसे विशेष परामर्शी के रूप में आदरपूर्वक बुलाते और उसके परामर्श को भी ध्यान में रखकर कोई निर्णय लेते| सो आज ‘फक्कड़’ जुलाहा विशेष परामर्शी के रूप में उपस्थित था|


राजा साहब के इशारे पर कारवाई प्रारम्भ हुई| खाद्य मंत्री ने कहना शुरू किया – “महाराज, माँ अन्नपूर्णा और महालक्ष्मी की कृपा से इस बार भी पिछले सालों की तरह अच्छी फसल हुई है| पुराने गोदाम तो पिछले वर्षों की फसलों से ही भरे पड़े हैं| जो नए गोदाम बनाए गए थे, वे भी पूरी तरह भर गए हैं| अब समस्या यह पैदा हो गयी है कि अनाज रखें तो कहाँ? यदि नए गोदाम बनवाने पर विचार करें तो इसमे समय लगेगा, और बरसात का मौसम निकट है| वर्षा शुरू होते ही अनाज की बरबादी निश्चित है| पिछले साल भी बहुत सारा अनाज सड़ गया और बहुत सारा चूहे खा गए|”


राजा साहब मंत्रिमंडल की ओर मुखातिब हुए और उनकी सलाह मांगी| न्यायमंत्री सत्यसेन बोल पड़े – “महाराज यह सत्य है कि पिछले कई सालों से भरपूर फसल हो रही है और अनाज के भण्डार भरे पड़ें हैं, पर यह भी सत्य है कि राज्य की लगभग पैंसठ प्रतिशत जनता बेहद गरीब है, जिन्हें एक वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं होती इसलिए मेरी राय यह है कि इन गरीबों को अनाज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराया जाए|”


यह बात सुनकर मंत्री वैभवसेन बोले – “महाराज न्यायमंत्री सत्यसेन जी की सलाह अतार्किक, अव्यावहारिक, असंगत व राज्य व्यवस्था के खिलाफ़ है| सस्ता अनाज देने से हमारे करदाता नाराज़ हो जायेंगे और देश की आर्थिक हालत भी बिगड़ जायेगी| केवल यही नहीं सस्ता अनाज खाकर कृषक, मजदूर, मेहनतकश आदि मोटे, कामचोर और निकम्मे हो जाएंगे और फिर वह दिन भी दूर नहीं कि अनाज से भरे हमारे भण्डार खाली हो जायेंगे और हमारा राज्य आर्थिक रूप से बदहाल हो जाएगा|”


राजा ने धैर्यपूर्वक सभी मंत्रियों के तर्कों को सुना, ज़्यादातर कि यह राय थी कि सस्ते में अनाज गरीबों में बांटने से आर्थिक बदहाली आएगी और अभिजात्य वर्ग इसका विरोध करेंगे| अब राजा फक्कड़ जुलाहे की ओर मुखातिब हुए और उसकी राय जाननी चाही|


फक्कड़ बोला – “महाराज क्षमा करें, परन्तु मेरी राय यह है कि गरीबों को अनाज मुफ्त में बाँट देना चाहिए भले ही इसके वितरण की व्यवस्था करने में अतिरिक्त धन व्यय करना पड़े| अनाज को गोदामों में सड़ने देना गरीब जनता का ही नहीं माँ अन्नपूर्ण का भी अपमान है| पेट भर जाने से कोई मेहनतकश कामचोर नहीं हो जाता बल्कि स्वस्थ और बलशाली होकर और काम करता है, और अधिक उत्पादन करता है| कृषक, मजदूर और मेहनतकश ही वास्तव में अन्नदाता हैं| एक राजा का यह कर्तव्य है कि वह संपूर्ण प्रजा का ख़याल रखे, उसे कम से कम मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराये| राजा को अभिजात्य वर्ग या करदाताओं के अनावश्यक दबावों से नहीं डरना चाहिए| उसे याद रखना चाहिये कि राजा का पद केवल सोने का ताज नहीं, वरन काँटों की सेज भी है, यह केवल वैभव नहीं वरन एक जिम्मेदारी भी है| आप राज्य के मुखिया हैं और गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है -:


“मुखिया मुख सो चाहिए, खानपान तहिं एक

पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक|”


राजा विवेकसेन फक्कड़ जुलाहे की बात ध्यानपूर्वक सुनते रहे और बात समाप्त होने पर बोले – “आपकी निर्भीकता और बेबाक राय सुनकर मैं प्रसन्न हूँ, आपका मार्गदर्शन और सुझाव हमें मान्य है| हम प्रधान आमात्य और खाद्य मंत्री को निर्देश देते हैं कि आपके सुझाव पर तुरंत अमल किया जाए| हमारे भंडारों में जब तक अनाज का एक भी दाना शेष है तब तक कोई भी व्यक्ति भूख से नहीं मरना चाहिए| कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोना चाहिए|”





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