वो कौन थी ?

वो कौन थी ?


आज सुबह से बरसात हो रही है, मन में बार बार ऑफिस न जाकर फिल्म देखने का ख़याल आ रहा है, सब कुछ गीला गीला सा लग रहा है और आसमान में छाये काले बादल रुक-रुक कर बरस रहे हैं, मेरी खिड़की के बाहर जो सेब का पेड़ है वह भी ठण्ड में कंपकपा रहा है, पूरी तरह से गीले हो चुके पत्ते और फल से टपकती हुई बारिश की बूंदें ऐसी ख्वाहिश पैदा कर रही है की, अपने कमरे में चादर ओढ़ कर लेट जाऊं और कड़क चाय पीते हुए अपने लैपटॉप में कोई फिल्म देखूं, मगर गले में निजी ऑफिस का पट्टा बंधा हुआ है, और बॉस को भी उसी वक्त मेरी याद आई – “सूफियान ,, आज थोडा जल्दी ऑफिस पहुँचो, तुम्हे घाटी में जाकर बी बी सी वालों की मदद करनी है और साथ में अपने लिए भी बाईट लेनी है, मैंने सिर्फ यस सर कहकर फोन रख दिया, और कोई चारा भी तो नहीं था,

“हाँ मै एक कैमरामैन हूँ, एक स्थानीय समाचार चैनल के लिए काम करता हूँ, इंशाल्लाह एक दिन मै भी किसी नैशनल चैनल में बतौर कैमरामैन काम करूँगा, आज सुबह सुबह ही मेरे बॉस ने भौंकने का हुक्म जारी कर दिया, मन में किसी बेगैरत की तरह सो जाने का ख़याल आया पर कमबख्त इमानदारी है की चिपक सी गई है .


मै भी दुखी मन से बिना नहाए तैयार हो गया, वैसे भी मै सिर्फ जुम्मे के दिन ही नहाता हूँ, और वो दिन कल था, मैंने तुरंत अपनी कार निकाली और अम्मी को सलाम करके निकल पडा दफ्तर की ओर, सड़कें भी गीली है और मौसम का मिजाज़ सुभानाल्लाह, मुझे सीधे जाना था और शाह बाज़ार से होते हुए मेरे ऑफिस पहुंचना था, लेकिन किस मुंह से उस सड़क से गुजरूँ, वहीँ पर मस्जिद है और मै कल की नमाज़ नहीं पढ़ पाया था, इसलिए मैंने रास्ता बदल दिया,

ऑफिस पहुंचा तो पता चला की कुछ अंग्रेज पत्रकार मेरा ही इन्तेजार कर रहे हैं, मैंने तुरंत अपने कैमरे का बैग सम्हाला और उनके साथ निकल पड़ा, भला इस बरसात के मौसम में भी कोई घाटी में पर्यावरण प्रेमी कैसे विडियोग्राफी कर सकता है ? दुखी मन से मै चल पडा, दो गाड़ियों में कुल सात लोग वहां से निकले, दो अंग्रेज मेरे ही कार में बैठे हैं और मेरा जिनीयर मेरे साथ सामने की सीट पर पीछे बैठे अंग्रेजों की अंगरेजी में अटर पटर मेरे पल्ले न पड़ रही है, भला हो इकबाल का जो अंगरेजी बोल सकता है और मेरे साथ है.


घाटी में कई जगह पर सड़कें जाम है कहीं कहीं पर सड़क की मरम्मत भी हो रही है, ऐसे में इन विदेशी पत्रकारों के साथ देर तक हम लोग विडियोग्राफी करते रहे, इस बेहूदा गीले मौसम में काम करते हुए अंग्रेजों के साथ दिन कैसे कट गया पता ही नहीं चला, और मै शाम तक ऑफिस वापस लौट आया, तभी मेरे बॉस से मुझे दूसरा हुक्म मिला की सामने की खुर्सी पर जो शख्स बैठा है उसके साथ कार में जाओ और वे कुछ फाइलें और पेमेंट करेंगे वो लेते आना है, अच्छे खासे दिन का कबाड़ा हो चुका था, मै उस खडूस इंसान को अपनी कार में बिठा कर उनके बताये रास्ते पर चलने लगा,


दो घंटे तक मै गाड़ी चलाता रहा, इस बीच मै सोच रहा था की “हूँ तो मै कैमरामैन, लेकिन मेरा नाम कभी नहीं आया टेलीविजन पर ना ही संवाददाता का, ऑफिस में बैठे हुए बॉस का नाम बड़े प्यार से लिया जाता था – श्रीनगर से जुनैद अंसारी की ख़ास रिपोर्ट. छः महीने से मै यहाँ काम कर रहा हूँ , मगर पता नहीं और कितने दिन इन्तेजार करना पड़ेगा मेरा नाम टी. वी. पर आने में, इसीलिए मै बहुत लोगों को ये नहीं बताता की मै समाचार के लिए काम करता हूँ, और मेरी बगल वाली सीट में बैठा इंसान अभी तक मुझसे बात नहीं कर रहा,


गुलमर्ग पहुँचने के बाद शहर के कोने में उसने आदेश दिया की गाडी आगे से दायें ले लो फिर बाएं, ऐसा करके थोड़े से वीरान जगह पर एकलौता दुमंजिला घर नजर आया , जिसके चारों ओर लकड़ियों की दीवार है, गाड़ी यहीं अन्दर घुस गई, उसके बाद हम यहाँ दाखिल हुए, गीली जमीन पर घास और फूल पत्तियों का भंडार है, घर के बाजू में विशाल अखरोट का पेड़ मौजूद, यहाँ उस काले कोट पहने हुए खडूस ने मुंह खोला और कहा “अन्दर आओ, मैं कार साइड में लगाकर पत्थर से बने पगडंडी से होते हुए अन्दर दाखिल हुआ, अच्छी तरह से सजा हुआ हॉल, मुझे सामने के सोफे पर बैठने के लिए कहा गया, पूरे रास्ते पहाड़ों और घाटियों से होते हुए जो सूनापन महसूस हुआ था, वही सूनापन यहाँ भी है, वह अन्दर की ओर गया और मै उसी की तरफ निहारता रहा, कुछ देर बाद वह बाहर निकला अब उसने घर के लिबास पहन लिए थे और शाल ओढ़े मेरे सामने बैठा, मैंने देर होने के डर से कहा की “जनाब थोड़ा जल्दी मुझे सामान दे दीजिये बड़ी मेहरबानी होगी,


अब वह मुस्कुराया और बोला “बेशक लेकिन चाय तो पी लो. इस अलफ़ाज़ पर मुझे भरोसा नहीं हुआ, की वह शख्स ऐसा भी बोल सकता है, कुछ देर बाद एक बला की खूबसूरत लड़की हाथों में तश्तरी लेकर सामने आई, जिसमे दो प्याले चाय रखे हुए हैं, वह शकल से बिलकुल भी कश्मीरी नहीं लग रही है, और उसकी काली आँखे बिलकुल ही किसी मिस्त्र निवासी की तरह हैं, बेहद खुबसूरत, मै तो उसे देखता ही रह गया, और उसने बड़े प्यार से कहा “ लीजिये चाय पीजिये, मैंने उसे बेशर्मी से घूरते हुए शुक्रिया कहा, और चाय की प्याली उठा ली, वैसे मै बड़ा ही शरीफ लड़का हूँ, मगर आज इस लड़की को देखकर मै अपनी तमीज भूल गया,


चाय देकर वह लडकी वापिस चली गई, मै और खडूस अंकल चाय पीने लगे, और चाय ख़तम होते ही, वे बोले अब मै तुम्हारी चीज़ें लाता हूँ, थोडा इन्तेजार करें, और वे अन्दर चले गए, मै सोच रहा था चलो आज का दिन ठीक बीता, और एक हसीना के दीदार भी हुए, और उसी वक़्त बारिश तेज़ होने लगी, मुझे इस बात की ख़ुशी है की मै एक सेकंड हैण्ड कार का मालिक बन चूका हूँ, ये मेरे दादू जान का तोहफा है, नहीं तो पता नहीं मै कब एक कार खरीद पाता, अगले पल खडूस अंकल हाथ में कुछ फाइलें लेकर लौटे और अपनी जेब में हाथ डाला,


तभी तेज़ हवाएं चलने लगी, और खिड्खियाँ खडखडाने लगी, अचानक तेज बर्फ़बारी शुरू हो गई, मैंने कुछ देर इन्तेजार करने का फैसला किया, मगर दो घंटे बाद भी मौसम साफ़ नहीं हुआ, ऊपर से ठण्ड बढ़ने लगी, उस खडूस को इस बात से बेहद दुःख हुआ, और मज़बूरी में मुझे रुकने के लिए कहना पडा, ये पहाड़ी रिवायत है की किसी मेहमान को तूफानी मौसम में शाम ढलने के बाद जाने नहीं दिया जाता, खैर मुझे भी रुकने का मन नहीं था मगर मजबूरी थी, रात को आठ बजे मुझे खाने के लिए बुलाया गया, तब तक मै उसी सोफे पर तशरीफ़ टिकाये बैठा था, खाना उसी हसीना ने बनाया होगा जो मुझे बेहद लज़ीज़ लगा, भरपेट खाना खिलाकर मुझे ऊपर के एक कमरे में सोने के लिए भेजा गया,


उसी लडकी ने कमरा और अतिरिक्त कम्बल की जगह बताई, इस मध्यम आकार के कमरे में कुछ ख़ास नहीं था जो बताया जाए, लेकिन बिस्तर के सामने की खिड़की बड़ी ही डरावनी लग रही थी, बिजली कड़कने पर वहां से ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों का नज़ारा दिख रहा था, वो हसीना जा चुकी थी, यहाँ सिर्फ मै और मेरी तन्हाई थी, मै मोटे कम्बलों के आगोश में समाकर लेट गया, मगर ध्यान उसी खिड़की की तरफ था. मानो कोई जिन्नात या बुरी रूह टपक पड़ेगी, मै मन में दुआ कर रहा था की ऐ मालिक तेरे नेक बन्दे की हिफाज़त करना, या मेरे मौला या परवर दिगार, ऐसा करके मुझे हिम्मत मिली और अब मै थोडा सुकून महसूस कर रहा हूँ,


उसी वक्त मेरे कमरे का दरवाजा खुला, जिससे मै फिर से डर गया, लेकिन हलकी रोशनी में भी सब कुछ साफ़ दिख रहा है, एक लड़की कमरे में आई उसने बत्ती जलाई और मेरे करीब आई, मगर यह तो कोई और है, मुझे लगा नीचे जो लडकी मिली थी ये उसकी बहन होगी, ये तो उससे से भी ज्यादा खूबसूरत है, ऐसी ख़ूबसूरती देखकर मेरे रूह का सुकून चला गया,


उसके हाथ में एक थर्मस है जिसमे पीने का पानी रखा है, उसने वह थर्मस मेरे बिस्तर के नीचे रखा, और बड़े अदब से बोली “आपको कुछ और चाहिए ? मैंने भी अदब से जवाब दिया “जी नहीं शुक्रिया, एक पल के लिए वह मुझे घूरने लगी, मुझे लगा की कहीं ये मुझपे रीझ तो नहीं गई ? मेरे मन में भी अजीब से हलचल होने लगी, ऐसा लगा की उसे खींच कर गले से लगा लूं और अपनी आगोश में समा लूं, अचानक से मेरे अन्दर का शैतान बाहर आने को मचलने लगा मगर मै भी दिल का साफ़ हूँ, इसलिए अपनी नज़रें मैंने उससे हटा ली और अगले ही पल वो भी चली गई, उसके जाते ही मैंने चैन की सांस ली और सोच में पड़ गया की “मै भी उल्लू का पट्ठा हूँ,

इस भयंकर ठण्ड में भी रात चैन से गुज़री, सुबह मै तरोताजा होकर नीचे उतरा, मुझे चाय और नाश्ते के लिए पूछा गया, मगर वह लडकी नहीं दिखी जिसने कल रात को मुझे पानी का थर्मस दिया था, मै भी संकोच के कारण पूछ नहीं पा रहा था की, दुसरी लडकी कहाँ है, खैर चाय ख़तम करके मै जाने को तैयार खड़ा हुआ,


खडूस इंसान ने कुछ फाइलें दी साथ में ढाई हजार रूपये दिए जो मेरे बॉस को देना है, इसके बाद मै जब जाने लगा तो मेरा मन नहीं माना, और आखिरकार मै पूछ ही बैठा “सर आपकी दूसरी बेटी नहीं दिख रही ? इस बात ने उसका रक्त संचार घटा दिया, सामने खड़ी लड़की भी सदमे में आ गई, उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा की “यहाँ हम दो लोग ही रहते हैं बस. इतना बोलकर उसने नजरें फेर ली, मै समझ गया की वे इस बात से खफा हुए हैं, मैंने भी बात टालना मुनासिब समझा, मुझे लगा लड़कियों ने मिलकर शरारत की होगी. मै बाहर निकला और अपनी कार के पास पहुंचा पीछे पलटकर देखा तो अंकल और उसकी बेटी अन्दर जा चुके हैं, तभी मुझे लगा कोई मानव आकृति ऊपर छत पर खडी है, और, मेरी नजर छत की तरफ गई,

ऊपर का नजारा देखकर मेरी सांस अटक गई, जो सुन्दर लड़की कल रात मेरे कमरे में आई थी, वही लडकी वहां खडी, मुस्कुराते हुए मुझे अपने दायें हाथ से अलविदा कर रही है, लेकिन उसका चेहरा बहुत ही भयानक दिख रहा है , उसके बाल बिखरे हुए है मैले से जिनमे लगी धुल साफ़ साफ़ दिख रही है, उसके दोनों हाथ के पंजे कटे हुए हैं, कपड़े गंदे और फटे हुए , उसके आँख की एक पुतली ही गायब थी, उसकी ये मुस्कान एकदम खौफनाक थी.


ऐसा खौफनाक मंज़र देखकर मै अपने होशो हवास खो चूका था, मगर मुझे मेरे रब की याद आई और उसी को दिल से अपना निगेहबान मानकर मैंने दुआ की, अचानक मेरे शरीर में हलचल हुई और मै वहां से जान बचाकर भागा,

पुरे रास्ते मै तेजी से गाडी भगाता रहा, और घाटियों से भरे रास्ते को एक घंटे में ही पूरा करके, जब ऑफिस पहुंचा तब चैन की सांस ली, जब मैंने यह बात अपने साथी कर्मियों से कही तो कुछ लोगों ने कहा की हम जब भी वहां जाते हैं तो बड़ा बुरा महसूस होता है, और अगर काम के सिलसिले में वहां रुकना पड़ जाए तो रात भर उस ऊपर के कमरे में उठा पटक की आवाजें आती रहती हैं,

यह सब सुनकर मेरे होश फाक्ता होने लगे मैंने तुरंत छुट्टी ली और घर की ओर भागा, इस भयानक वाकये की वजह से मै कई दिन बीमार रहा, बिस्तर पर ही पड़ा रहा और उस घटना को याद करके मेरी धड़कन तेज़ सी हो जाती थी, उसके बाद धीरे धीरे मै ठीक हुआ, और फिर मैंने दुबारा काम में जाना शुरू किया, इस घटना को बीते कई साल हो चुके हैं मगर आज भी इस घटना को याद करके मेरी रूह काँप जाती है ..



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