दूसरी शादी

सहेलियों से घिरी संजना बड़ी सज धज के बैठी हुई है। गपशप करती लड़कियों के बीच वो एकदम शांत बैठी हुई है, जैसे तेज हवा में डोलते बादलों के बीच चांद बैठा हो। एक पल के लिए खुद को शीशे में निहारती हुई कहीं खोई हुई है।आज उसकी शादी है।दूसरी शादी। अब आप उसकी अभी चल रही शादी को छोड़कर उसकी पहली शादी के बारे में जानने को उत्सुक होंगे।वो भी बताएंगे पर थोड़ा धीरज रखिए। संजना के चेहरे पर दूसरी शादी का अफसोस नहीं दिख रहा था। उसके चेहरे पर संतुष्टि थी।
कुछ साल पहले

संजना, एक साधारण सी लड़की। ना पहनावे से मॉडर्न लगती थी ना व्यवहार से। किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करती थी।अकेली खुश रहती थी अपनी धुन में।उसके आसपास क्या  हो रहा है इस से उसे कोई मतलब नहीं होता था।उसकी अपनी ही दुनिया थी जिसमे वो खोई रहती थी।अपने परिवार के साथ एक छोटे से कस्बे में रहती थी।कस्बा छोटा था लेकिन लोगों के दिल बड़े थे। शहरों की तरह एक मकान में भी अजनबियों की तरह नहीं रहते थे बल्कि एक दूसरे से घुल मिलकर रहते थे।खैर, कहानी पर आगे बढ़ते हैं।
सबकुछ सामान्य चल रहा था ।तेजी से बदलते समय के साथ लोगों की सोच भी बदल रही थी। संजना के पापा ने संजना को अच्छी शिक्षा के लिए उसकी बुआ के पास शहर भेज दिया।यहां सबकुछ बदला हुआ था। संजना के लिए खुद को इस माहौल में ढालना मुश्किल हो रहा था।लेकिन समय के साथ सब ठीक हो जाता है।

अब संजना शहरी जीवन जीना सीख चूकी थी।स्कूल की पढ़ाई भी पूरी हो गई।अब उसे कॉलेज में दाखिला लेना था।आज कॉलेज में  वो मेरिट लिस्ट देखने आई थी।

"कैसी हो संजना"? किसी ने आवाज दी
पीछे मुड़कर देखा एक लड़का खड़ा था।शक्ल कुछ जानी पहचानी लग रही थी लेकिन याद नहीं आ रहा था।दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद संजना बोली
"अरे मयंक! तुम यहां"?
मयंक, संजना के कस्बे में रहता था।जब संजना वहां रहती थी तो अच्छे दोस्त हुआ करते थे।दोनों के परिवारों में आना जाना रहता था।कस्बे के साथ बहुत कुछ छूट गया था।लेकिन अचानक चलते चलते कोई पुराना दोस्त मिल जाए तो दिल में जो अहसास होता है उसे बयां नहीं किया जा सकता है।

"हां, मै कॉलेज में एडमिशन लेने आया था।" मयंक बोला

"और घर पर सब कैसे है? अंकल-आंटी, दिव्या दीदी?
"सब अच्छे है, और दिव्या की शादी भी तय कर दी है" मयंक ने बताया
"और तुम"? संजना बोली
"मै भी ठीक हूं। स्कूल पूरा हो गया अभी यही शहर में कॉलेज में एडमिशन ले रहा हूं।

हालचाल जानने की ओपचारिकता के बाद दोनों कैंटीन चले गए।
"क्या खाओगी"?
"कुछ भी ले लो जो तुम्हे अच्छा लगे"
"भैया 2 आइसक्रीम देना, चॉकलेट फ्लेवर"
"तो तुम जानते हो मुझे कोन सा फ्लेवर पसंद है"
"हां वो,  नहीं बस ऐसे ही" कोई बात मयंक के होठों तक आते आते रह गई।
"अच्छा ! अब तो रोज मिलना रहेगा कॉलेज में। चलती हूं"
कहकर संजना चली गई

मयंक भी अपने किराए के कमरे पर चला गया।आज संजना से मिलकर उसे एक अलग खुशी हो रही थी। वैसे जब संजना कस्बे में थी तब काफी बार दोनों का एक दूसरे के घर आना जाना होता था, लेकिन आज की मुलाकात कुछ अलग थी मयंक के लिए।

अगले दिन मयंक कॉलेज पहुंचा तो पता चला क्लास का समय 10 बजे से है। वो 9 बजे ही आ गया  था। नया शहर, नय कॉलेज, यहां मयंक किसी को जनता पहचानता नहीं था। उसे एक वेटिंग बेंच खाली दिखी दी, वो उस पर बैठ गया। तभी अनजानों की भीड़ से एक जनी पहचानी आवाज आई

"हेल्लो मयंक"!
संजना थी।
"यहां क्यों बैठे हो"? वो बोली
"मै किसी को जनता नहीं, सो यहां  बैठ गया"
"मुझे तो जानते हो ना"? संजना ने हंसते हुए कहा
क्लास में अभी टाइम था तो दोनों कैंटीन पहुंच गए।क्लास ख़तम हुई तो दोनों पार्क में बैठकर गपशप मारने लगे
अब ये रोज का सिलसिला हो गया। दोनों क्लास से पहले कैंटीन में होते और क्लास के बाद पार्क में।
"मैं 1हफ़्ते के लिए घर जा रहा हु" मयंक बोला
"ओक, अगले हफ्ते मिलते है"
अगले दिन मयंक नहीं आया तो संजना को कुछ अधूरापन महसूस हुआ। उसे कब मयंक की आदत हो गई थी पता ही नही चला। किसी की कीमत हमें तब पता चलती है जब वो हमसे दूर चला जाता है।
इधर मयंक का हाल भी कुछ अलग नहीं था। उसे भी संजना की कमी खल रही थी। जैसे तैसे 1 हफ्ता पूरा हुआ।जब मयंक कॉलेज पहुंचा तो संजना पहले से ही उसका इंतजार कर रही थी। आज जब दोनों मिले तो उनकी मुलाकात पहले से अलग थी।दोनों के दिल को बेइंतेहा सुकून मिल रहा था।दोनों के दिल का हाल एक जैसा था पर एक दूसरे को कुछ बता नहीं पा रहे थे।दोनों की आंखे सबकुछ कह रही थी।आंखे वो सब कह देती है जो कहना शब्दों के बस में नहीं होता।जब नजर शर्माती हुई हल्की सी झुक जाती है वो एहसास शब्द बयां नहीं कर सकते।

"जानते हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी बहुत याद आई" संजना ने पहल करते हुए कहा
"मुझे भी बहुत याद आई " ये कहते हुए मयंक थोड़ा शरमा गया
एक हफ्ते की जुदाई उन्हें इतना करीब ला देगी किसी ने नहीं सोचा था।इसीलिए कहते है, जो होता है अच्छे के लिए होता है।
अब दोनों के एक दूसरे के लिए एहसास बदल गए थे। दोनों अब दोस्त से बढ़कर हो गए थे।
हर चीज बदल गई थी। सॉरी! चीज नहीं बस नजरिया बदल गया था। कैंटीन में पहले की तरह आइसक्रीम खाते थे पर अब एक ही आइसक्रीम को खाते।पहले की तरह  पार्क में बैठते पर अब पार्क की हर चीज उन्हें रोमांटिक लगती।कितना सब बदल जाता है प्यार करने वालों के लिए।पागल होते हैं ये प्यार करने वाले। इतना प्यार करते हैं की मेरे जैसे नौसिखिए लेखक के लिए इसे शब्दों में ढालना मुश्किल हो जाता है।

आज दिनों पार्क में बैठे थे। नरम घास पर हाथ फैला रखे थे। धीरे से मयंक का हाथ संजना के हाथ पर आ गया।संजना शर्मा गई। पहली बार प्यार से छुआ था मयंक ने उसे।उस स्पर्श से दोनों के दिल में भर भर के प्यार उमड़ रहा था।बिना कुछ बोले. चुपचाप।कुछ बोलने की जरूरत ही नही थी। या यूं कहें कि जो अहसास उनके हाथ बयां कर रहे थे उनके आगे जुबां से बोलना बेमानी लगता ।

उनके प्यार का सफर अच्छा चल रहा था।लेकिन हर सफर के नसीब में मंजिल नहीं होती।प्यार के सभी किस्से पूरे नहीं होते।कुछ कहानियों में अधूरी ही रह जाती है।
संजना का कॉलेज पूरा हो गया था। घरवालों ने अब उसकी शादी तय कर दी।मता पिता के लड़कियों की शादी में जल्दबाजी करते हैं जैसे कंवारी लड़कियां मां बाप के लिए एक अधूरा काम होती है जिसे उनकी शादी करके पूरा कर दिया जाता है।काम जितना जल्दी हो उतना अच्छा।खैर, मै समाज की  सोच तो नहीं बदल सकता पर आगे की कहानी पर बढ़ सकता हूं
उस दिन सूरज की रोशनी पर काले बादल छाए हुए थे।ठंडी हवा चल रही थी जो अपने साथ बहुत कुछ भिगोकर ले जाने को तैयार थी। उस दिन संजना ने मयंक को मिलने बुलाया था। आखिरी बार मिलने।
"हम दोनों ने काफी अच्छा समय साथ बिताया है। लेंकिन अब मुझे किसी और के साथ जीवन बिताना है।मेरी शादी हो रही है"

मयंक एकदम मूर्ति बनकर खड़ा था।सबकुछ उसके सामने था।उसके हाथ से सब जा रहा था लेकिन वो कुछ नहीं कर पा रहा था।उस समय वो दुनियां का सबसे लाचार शक्स था।

"मैं चाहती हूं तुम मुझसे कुछ वादे करो। करोगे ना? संजना बोली
मयंक के मौन को  स्वीकृति समझकर उसने बोलना चालू किया
"पहला वादा करो कि मुझे हंसते हुए विदा करोगे। मै तुम्हारी मुस्कान समेटकर ले जाना चाहती हू।
मयंक की आंख से गिरते आंसू ने वादे की हमी भर दी थी
"दूसरा वादा करो  कि कभी मेरे जाने का ग़म नही करोगे"
मयंक उसके एक एक शब्द को बिना कुछ बोले रोते हुए सुन रहा था।
"तीसरा वादा करो हमारी यादें सिर्फ मुस्कुराने के लिए होंगी, रोने के लिए नहीं"
"चौथा वादा करो कि हमारे रिश्ते को अपनी व्यतिगत जिंदगी से अलग रखोगे"
"पांचवां वादा करो की अपनी जीवन साथी को मेरी तरह ही प्यार करोगे। उसे कभी तुम दोनों के बीच में मै महसूस नहीं होनी चाहिए"
"छठा वादा करो की हमारे प्यार की निशानी के रूप में तुम एक पेड़ लगाओगे।उसकी छाव में तुम मुझे महसूस करोगे। मै जिस भी रूप में हो, तुम्हे सुकून देना चाहती हू।"
"सातवां वादा करो कि जब तुम्हारी जिंदगी अंतिम पड़ाव पर होगी तो तुम एक बार मुझे याद करोगे।जीवन के इस मोड़ पर हमारी यादें तुम्हे सुकून देंगी"

मयंक की जुबां बंद थी।बस बहती हुई आंखे सब बोल रही थी।
"शादी दो आत्माओं का मिलन होता है। हमने दिल से एक दूसरे को चाहा है।मेरी शादी तो हो चुकी है।तुम्हारे साथ।
ये सात वादे सात फेरे हैं जो हमारी शादी के साक्षी है। हां मुझे समाज के लिए एक ओर शादी करनी है।पर मैं दोनों शादियां निभाऊंगी"
कहते कहते संजना की आंखे छलछला गई ।उसने खुद को काफी  हद तक सम्हालने की कोशिश की थी।
मयंक ने जाने के लिए कदम बढ़ाया तो संजना बोली
"तमीज नहीं है क्या! दूसरी शादी की मुबारकबाद भी नहीं  दोगे?"

बस इतनी सी थी ये कहानी



नोट: ये कहानी पूर्णतः काल्पनिक है।किसी पात्र या घटना से समानता संयोग मात्र है।
by अनिल जांगड़ा
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