वो कौन थी ?

हम अपने ड्राइंग रूम में बैठे टी वी देख रहे थे। श्रीमतीजी ने कहा 'बहुत रात हो गयी है मैं सोने जा रही हूँ। चलो तुम लोग भी टी वी बंद करो और सोने चलो। ' इतना कह कर वो उठ के बैडरूम में चली गयी। मैंने एक निगाह घड़ी पर डाली , 12 बज कर 30 मिनट हो चुके थे, मैंने बेटे से बैडरूम में चलने को बोला और खुद टी वी ऑफ करके ड्राइंग रूम को थोड़ा व्यवस्थित करने लगा। मेरा बेटा बैडरूम के दरवाजे तक गया थोड़ा रुका फिर वापस आ गया। वो मेरे पास आ कर बोला , 'पापा आप भी चलो मैं अकेला नहीं जाऊंगा मुझे डर लग रहा है। ' मैंने उसे कहा 'बेटा डरने की क्या बात है, मम्मी तो रूम में ही हैं। ' पर वो जाने को तैयार नहीं हुआ तो मैं उसे लेकर कमरे में आया, कमरे में अँधेरा था और मेरी पत्नी बेड पर सिर झुका कर बैठी थी। मैंने उसे आवाज दी , 'क्या हुआ ऐसे क्यों बैठी हो और लाइट क्यों नहीं जलाई ?' जब उसकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो मैं बेटे को पीछे छोड़ कर उसके पास पहुँच गया और उसका चेहरा अपने हाथ में लिया तो चेहरा पूरी तरह गीला था ऐसा लगता था कि वो बहुत देर से रो रही हो और आंसुओं से चेहरा गीला हो गया हो। इससे पहले की मैं कुछ और बोलता पीछे से आवाज़ आयी , 'क्या बड़बड़ा रहे हो अँधेरे में, लाइट तो ऑन कर लेते ?' मैंने हड़बड़ा कर पीछे देखा तो श्रीमती जी अटैच्ड बाथरूम से निकल कर लाइट जला चुकी थीं। मैं आश्चर्य से उसे देख रहा था और मेरा बेटा डरा हुआ सा मुझे देख रहा था। मेरी पत्नी ने दोबारा जोर से पूछा , 'क्या हुआ, ऐसे क्या देख रहे हो और हाथ में क्या है ?' अब मुझे भी होश आया और मैंने अपने हाथों को देखा, हाथों को को देख कर ऐसा लगता था कि जैसे मैंने दोनों हाथों में कुछ उठा रखा हो पर हाथ खाली थे लेकिन हाथों में गीलापन अब भी था। 'कुछ.... कुछ नहीं ' मैंने किसी तरह बोला और बाथरूम की ओर चला गया। मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही थी और शरीर से जैसे सारी ताकत किसी ने निचोड़ ली थी। बाथरूम से हाथ धोकर बहार आया तो बेटा और पत्नी सोने के लिए लेट चुके थे मैंने तौलिये में हाथ पोछने की कोशिश की पर शायद वो तौलिया मेरे हाथ के गीलेपन को हटाने में असमर्थ था।मैं चुप चाप वैसे ही गीले हाथ लिए सो गया।

मैं आज तक ये समझ नहीं पाया कि वो कौन थी ? क्यों आयी थी और क्या मेरा बेटा भी उसे महसूस कर सकता था ? क्योंकि इससे पहले कभी वो अँधेरे कमरे में जाने से नहीं डरा।

क्या हुआ था उस रात ये अब भी राज है ....

ये इस कड़ी की पहली घटना थी और इसी कड़ी में अगली घटना ठीक दो दिन बाद हुई। हम गहरी नींद में सो रहे थे अचानक मेरे बेटे ने मुझे जोर से हिलाया , 'पापा ! पापा !' मैंने आँख खोली तो देखा कि बेटा बेड पर पालथी मार कर बैठा था और थोड़ा डरा हुआ सा था । मैंने उससे प्यार से पूछा , 'क्या हुआ बेबी ?' वो बोला , 'पापा ! वो आंटी रो क्यों रही थीं ?' मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने दोबारा पूछा , 'कौन सी आंटी रो रही थी ?' वो बड़े भोलेपन से बोला , 'मुझे तो पता नहीं कि कौन सी आंटी थी ? वो गेट के पास खड़ी थीं और रो रही थीं ?' मैंने पूछा , 'कब बेटा कब खड़ी थीं ?' उसने आँखें बड़ी करके कहा , 'अभी अभी तो खड़ी थीं जब मैंने आपको जगाया था लेकिन फिर चली गयीँ। ' मैं समझ गया इसने सपना देखा था और अचानक उसकी नींद खुल गयी इसीलिए उसे ऐसा लग रहा था कि वो सच है। मैंने उसे लिटाया और कहा , 'कोई बात नहीं हम सुबह चेक कर लेंगे अब सो जाओ ' और उसे थपकी देकर सुला दिया।

अगले दिन बेटा स्कूल चला गया , पत्नी को भी मैं उसके ऑफिस छोड़ आया और खुद ऑफिस के लिए तैयार होने लगा। अब भी मेरे दिमाग में रात की बात ही घूम रही थी , 'क्या मेरे बेटे ने सच में सपना देखा था या उसे भी वैसा ही एहसास हुआ था जैसा कुछ दिन पहले मुझे हुआ था ?' फिर मैंने अपने सिर को झटका और अपने आप से बोला ,'मुझे बेकार का वहम हो रहा है ऐसा कुछ नहीं होता। खैर मैं तैयार होकर ऑफिस लिए निकल पड़ा। रास्ते में आज कार फिर दिक्कत करने लगी , 'जब भी लेट होता हूँ ये भी नखरे दिखने लगती है' मन ही मन गलियां निकालता हुआ उतरा और चेक करने लगा पर कुछ समझ नहीं आया। इधर उधर देखा तो कुछ दूर पे एक गुमटी दिखी, गाड़ी लॉक करके वहां पहुंचा तो देखा की आज मेरी किस्मत अच्छी थी। वो एक मैकेनिक की ही दुकान थी पर अभी उसने दुकान पूरी तरह खोली नहीं थी। मैं उससे निवेदन भरे अंदाज़ में बोला , 'भाई मदद कर दो, ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ और कार ने ऐन मौके पर रस्ते में धोखा दे दिया। ' उसने घूर कर मुझे देखा जैसे मैं उसकी जायदाद में हिस्सा मांग रहा हूँ, फिर बोला , 'चलिए देखते हैं। ' मेरी जान में जान आयी। वो कार के पास आ गया और खोल कर चेक करने लगा। देखने से लगता था की वो अनुभवी मैकेनिक था। सब कुछ देखने के बाद मेरी और घूम कर बोला , 'भाई साहब क्यों गाडी की बैंड बजा रखी है। मैंने अनजान बनते हुए पुछा , 'क्यों क्या हो गया ?' वो हँसते हुए बोला , 'आप अमीर लोग गाडी खरीद लेते हैं और उसको रगड़ते रहते हैं, उसकी सर्विस मेंटेनेंस समय पर करते नहीं और फिर गाडी को गाली देते हैं कि धोखा दे दिया , आपकी गाडी को जबरदस्त मेंटेनेंस की जरूरत है। मैं अभी तो इसको चलने लायक बना देता हूँ पर जल्द से जल्द इसको सर्विस स्टेशन पर दे दीजिये वरना किसी दिन बहुत बड़ी मुसीबत ना खड़ी हो जाये। ' उसने गाडी में कुछ किया और स्टार्ट कर दिया। मैंने उसे धन्यवाद कहकर उसे मेहनताना दिया और ऑफिस चल पड़ा। रस्ते में मन ही मन सोच रहा था , 'अगर इतनी ही प्रॉब्लम थी तो स्टार्ट कैसे हो गयी , यूँ ही डराते हैं ये लोग। कहाँ से कराऊँ सर्विस, ना समय है, ना ही पैसा। चलो फिलहाल काम चल गया बाद में देखते हैं। शाम को ऑफिस से लौट कर घर आया , पत्नी के साथ बैठ कर चाय पी रहा था , बेटे को देखा वो खिलौनों से खेल रहा था और सामान्य था। मन को तसल्ली हो गयी कि सबकुछ ठीक है। दो तीन दिन बीत गए सब कुछ सामान्य चल रहा था लेकिन एक बहुत हल्का सा एहसास बना हुआ था जैसे कोई बराबर मेरे आस पास था और वही आंसुओं का गीलापन। मगर ना तो कुछ दिखता ना कोई प्रत्यक्ष अहसास था इसीलिए मुझे यही लगता कि शायद मेरा वहम था ।

एक दिन मैं पत्नी को उसके ऑफिस छोड़ कर आया और तैयार होने लगा मैं नहा कर बाथरूम से बाहर निकला तो अचानक देखा की एक साया मेरे बेड पर बैठा है, कमरे में रौशनी कम ही थी इसलिए साफ़ नहीं दिख रहा था लेकिन सुबकने आवाज़ मेरे कानों में साफ़ सुनाई दे रही थी। मैंने गौर से उसे देखने कोशिश की और मुझे ऐसा लगा जैसे उसके माथे पर कुछ चमकीला सा है। मैंने हिम्मत करके पूछा , 'आप कौन हैं और क्या चाहती हैं ?' उसने अब भी सिर नीचे ही किया हुआ था पर एक गूंजती हुई आवाज मेरे कानों में पड़ी , 'मदद !' मैंने बोला , 'मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ? मैं तो आपको जानता तक नहीं ' इतना सुनते ही जैसे वो गुस्से से कांपने लगी और जो चमकदार चीज़ उसके माथे पर थी वो चिंगारी में बदल गयी। देखते ही देखते पूरा चेहरा आग-आग हो गया और उसने चेहरा ऊपर उठाया। मैंने जिंदगी में इससे भयानक मंजर नहीं देखा था। उसके चेहरे से आग की लपटें निकल रही थीं, दो बड़ी बड़ी भयानक आँखें मेरी और देख रही थीं उनमे से आग टपक कर नीचे गिर रही थी, 'मुझे नहीं पहचानते , मुझे नहीं पहचानते !' वो चिल्लाई और उसके मुंह से एक काला धुआँ निकल कर सब तरफ फैल गया। मेरा दम घुट रहा था , ऐसा लगा मेरे प्राण बस निकल रहे हैं मुझे दिखाई देना बंद हो गया और मैं अचेत होकर गिर गया। जब होश आया तो मैं वहीँ जमीन पर गिरा हुआ था, सिर दर्द से फट रहा था। मैंने अब तक वही गाउन पहना हुआ था जो मैं पहन कर बाथरूम से बाहर आया था। मैं उसी हालत में बिस्तर पर लेट गया और सो गया। कुछ समय बाद ऐसा लगा कि किसी ने मेरे सिर पर जोर से हथौड़ा मारा और मैं उठ कर बैठ गया और तभी डोर बेल बजी, मैं बिस्तर से उठा और चारों तरफ देखा, कमरे में अब भी धुआं सा लग रहा था। मैंने दरवाजा खोला तो देखा सामने मेरी पत्नी बेटे को लिए हुए खड़ी थी, वो ऑफिस से लौट कर आ गयी थी। उसने ऊपर से नीचे तक देखा और बोली , 'क्या हुआ इतना पसीना क्यों आ रहा है ? ऑफिस क्यों नहीं गए ? सब ठीक है ना ?' जल्दी में कोई बहाना समझ में नहीं आया सो बोल दिया , 'कुछ नहीं, गाडी में कुछ दिक्कत आ रही थी, स्टार्ट नहीं हो रही थी और तबियत भी ठीक नहीं लग रही थी इसलिए सो गया। ' पत्नी अंदर आते हुए बोली, ' मुझे फ़ोन कर देते मैं जल्दी आ जाती, खैर चलो रेस्ट करो मैं चाय बनाती हूँ। ' मैंने मन ही मन सोचा , 'बच गए ' , तभी मेरा बेटा बेड रूम से चिल्लाया , 'पापा ! यहाँ धुआं क्यों है ?' अचानक मुझे सब कुछ फिर याद आ गया और मेरी रूह काँप गयी मेरी कमरे में जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मेरी पत्नी भागते हुए कमरे में गयी और बोली , 'कहाँ है धुआं ? बेकार में डरा देते हो, चलो कपडे बदलो। ' मैं कमरे में आया तो देखा दोनों उसी जगह खड़े हैं जहाँ वो बैठी थी। बेटा बोला , ' मुझे लगा इसलिए बोल दिया , आपलोग तो डांटते रहते हो। ' और कपडे बदलने लगा।

अगला दिन छुट्टी का था और हमने घूमने का प्लान बनाया हुआ था। सुबह उठते ही बेटे ने कहा , 'पापा कार तो ख़राब है, हम घूमने कैसे जायेंगे ?' मैं अपनी ही बात मैं फँस गया लेकिन मैं बात सँभालते हुए बोले , 'वो मैंने कल शाम में चेक कर लिया था एक तार निकल गया था वो लगा दिया है अब ठीक है। ' पत्नी बोली , 'देख लो कहीं कुछ दिक्कत ना हो , आज चाहे कार ही दिखा लो घूमने फिर कभी चल लेंगे। ' मैंने कहा 'नहीं ऐसा कुछ नहीं है। सब ठीक है, चलो तैयार हो।' और फिर हम तैयार होकर निकल पड़े। लगभग दस मिनट चलने के बाद कार में अजीब सी आवाज़ आने लगी और वो बंद हो गई। मैंने पत्नी की ओर देखा वो गुस्से से मेरी तरफ देख रही थी। मैं बिना कुछ कहे चुप-चाप उतर कर आगे गया और बोनट खोला, एक धुंए का भभका सा मेरी ओर आया, ऐसा लगा मेरा दम घुट रहा हो। तभी वही आवाज़ मेरे कान में दोबारा गूंजी , 'अब पहचाना मुझे ?' मैंने हड़बड़ा कर इधर-उधर देखा तो सामने वही मैकेनिक जिसने पिछली बार कार ठीक की थी दिखाई दिया और बोला ,' भाई साहब मैंने आपको बोला था कि किसी दिन आप मुसीबत में आ जाओगे मगर आपने मेरी नहीं सुनी ' मैं आश्चर्य से उसको देख रहा था, फिर मैंने पूछा , 'तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?' वो बोला 'मैं तो यहीं आगे गाँव में रहता हूँ, आज दुकान नहीं खोली इसलिए घर पर ही था कुछ सामान लेने गया था, लौट रहा था तो देखा की आपकी कार रुकी है सो आ गया।' मैंने देखा थोड़ी दूर उसकी साइकिल खड़ी थी और उस पर थैला रखा था । मैंने उसको बोला , ' अगर हो सके तो देख लो, बस इतना कर दो कि घर तक पहुँच जाये, मैं इन लोगों को घर छोड़ कर सर्विस स्टेशन पहुँच जाऊं। ' वो मुस्कुराते हुए बोनट के अंदर झुक गया पाँच मिनट के बाद कार स्टार्ट करने को कहा मैंने कार स्टार्ट करी और बाहर देखा तो न तो वो मैकेनिक था ना उसकी साइकिल।

मैंने पत्नी और बेटे को घर छोड़ा और कार को सर्विस स्टेशन में दे आया। पत्नी और बेटे का मूड ख़राब हो गया था पर मैं एक तसल्ली का सा अनुभव कर रहा था। शाम को सर्विस स्टेशन जाके कार ले आया। मेरी कार नयी नवेली दुल्हन जैसी चमक रही थी और जैसे ही अंदर बैठा एक मीठी सी आवाज़ कानों में आयी , 'धन्यवाद !'

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