यह क्या किया सितमगर

आज सुबह से ही सुधा का मन उचाट था। खाली बैठे उल-जलूल बातें सोच कर उसका दिमाग भन्ना गया था। माँ से बात करने की उसकी इच्छा नहीं हो रही थी और आस-पास कोई ऐसा था नहीं जिसके साथ कुछ देर बैठ कर वह बातें कर सकती।

बी.ए. बी.एड. की डिग्री ले कर वह घर बैठ गई थी। नौकरी के लिए उसने कई जगह आवेदन भी किए थे, मगर कोई बुलाता ही न था। उसके अपने कस्बे में एक-दो प्राइवेट स्कूल थे। किन्तु वे दो-तीन सौ रूपये महीना से ज्यादा देने को तैयार न थे। घर पर ट्यूशन पढा कर सौ रूपये भी मिल पाना मुश्किल था। इस से तो सरकारी बेरोजगार भत्ता ही अधिक मिल जाता है। वैसे उसके दो-चार सौ रूपये की उसके माता-पिता ने कभी आशा भी नहीं की थी।वे तो इतना चाहते थे कि लडकी पढ-लिख जाये तो उसके लिए घर-वर सुविधा से मिल जायेगा। लेकिन अभी तक उन्हें उसके लिए योग्य वर भी नहीं मिला था।

तेइस-चौबीस साल की कुँवारी लडकी माता-पिता के सीने पर पहाड जैसी प्रतीत होती है। फिर सुधा तो रंग-रूप,कद-काठी से भी आकर्षक थी। उसके लम्बे घने बाल और मोटी-मोटी काली स्याह आँखें बरबस ही आकर्षित कर लेती थीँ। वह स्वयं घुटनों तक बादलों से छाए अपने बालों को देखकर इठलाने लगती थी। उसकी इच्छा होती कि वह अपनी विपुल केश राशि से किसी को आच्छादित कर दे। उसे रेशमी झरने की फुहारों से शिक्त कर दे। किन्तु वह अपने माता-पिता की विवशता से सिकुड कर रह जाती। उसे दुख होता कि क्यों न उसे भी उसकी अन्य बहनों की तरह छोटी उम्र ही परायी कर दिया गया। उसे इतना क्यों पढाया गया। लेकिन फिर वह स्वयं सोचती कि पिछले बीस सालों में जमाना कितना बदल गया है। आज लडकी का पढ-लिख कर आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है।

सुधा उठ कर बाहर आँगन में आ गई ।तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के लिये पंक्तिबद्ध बनाए गये क्वार्टरस इस समय विरान जान पडते थे। क्वार्टरों के आँगन को मेहंदी अथवा कनेर की झाडियों से घेरने का प्रयास किया गया था। कहीं-कहीं एक-दो नीम अथवा शीशम के पेड भी नजर आ जाते थे। मगर नियमित देख भाल के अभाव में आँगन की घास जल गई थी और झाडियां छितराई सी जान पडती थी। सुधा ने एक उचटती सी नजर क्वार्टरों पर डाली और अन्दर जाने को मुडी तो उसे धूप में पडी कुर्सी दिखाई दी। कुर्सी के एक पैर में अखबार का टुकडा फडफडा रहा था। सुधा ने लापरवाही से अखबार को खींचना चाहा।लेकिन कागज चिकना होने की वजह से सरसराता हुआ उसके हाथ में आ गया। कागज पर एक

आकर्षक चित्र छपा था और उसके ऊपर कहानी का शीर्षक तथा लेखक का नाम छपा था। ब्लाक में कहानी का विशेष अंश मोटे अक्षरों में छपा था। सुधा ने खडे-खडे ही मोटे अक्षरों को पढा तो उसकी कहानी पढने की इच्छा हुई। वह कुर्सी उठा कर अन्दर आ गई और पलंग पर लेटकर कहानी पढने लगी ।

जैसे-जैसे कहानी आगे बढती जाती थी, सुधा की जिज्ञासा भी बढती जाती थी। उसकी कल्पनाएं,उसके सपने उसे कागज पर मूर्त प्रतीत हो रहे थे । नायक-नायिका का अथाह प्रेम,मन को लुभाते रस भरे उनके संवाद, दिल गुदगुगाते नायिका के नखरे और पत्थर को मोम करती नायक की मनुहारें । जीवन में रस ही रस।कहीं कोई चिन्ता फिक्र की बात ही नहीं।सुधा सोचने लगी- काश! उसके जीवन में भी इतनी मिठास होती । वह भी किसी के प्यार में स्वयं को समर्पित कर पाती । लेखक ने क्या सोच कर यह कहानी लिखी होगी ? क्या उसके जीवन में भी इतना ही रस है या वह भी कल्पना में ऐसा ही सुख चाहता है? क्यों न लेखक से पूछा जाये ? एकाएक सुधा के मन में यह विचार आया तो उसके दिल के किसी कोने में क्षण भर को एक झुरझुरी सी उठी और उसके चेहरे पर पसीना झलक आया। वह कुछ देर बैठी-बैठी सोचती रही कि वह क्या करे?

सोचते-सोचते उसके मन में फिर एक हिलोर उठी और वह कागज-पैन लेकर कुछ लिखने लगी। उसे ध्यान आया कि नये साल का अभी पहला सप्ताह ही बीता है। क्यों न लेखक महोदय को नव वर्ष की शुभ कामनाएं भेजी जाय़ें। कल ही तो उसकी एक सहेली का कार्ड आया है। कार्ड भी सुन्दर है। सलाखों के पीछे दो दिल और दूर गुलाब का अधखिला फूल। उसने कार्ड के अन्दर चिपका कागज निकाला और उसी के आकार का कागज काट कर पत्र लिखने लगी।

“ निर्मोही जी,

आपकी कहानी ‘ सुख का सागर’ पढी।बहुत अच्छी लगी। आपने कितने ही दिलों की धडकनों को अपनी कहानी में सजीव कर दिया है। पाठक को ऐसा लगता है कि आपने उसी के सपने को कागज पर उतार दिया है। इतनी अच्छी कहानी के लिए आपको बधाई। मैं आपकी और कहानियां भी पढना चाहती हूँ। कृपया भेजने का कष्ट करें । यदि संभव हो तो उपने बारे में भी लिखें। मैं बी.ए. बी.एड हूँ और शादी से पहले नौकरी की तलाश में हूँ।


सूरज निकलता है पूर्व की ओर से

नया वर्ष मुबारक हो सुधा की ओर से।

पत्र के इंतजार में

कु. सुधा रानी

एच- 2/7 सिंचाई कालोनी,हसरतपुर “

पत्र पूरा करके सुधा ने कार्ड में रखा और लिफाफा देखने लगी। जिस लिफाफे में कार्ड आया था उसका टिकट बिल्कुल सुरक्षित था। डाक घर की मोहर टिकट से काफी दूर लगी थी।सुधा की सारी समस्या हल हो गई। उसने लिफाफे पर अपने नाम पते के ऊपर प्रेषक और लिफाफे के दूसरी ओर सेवा में, के नीचे श्रीमान नरेन्द्र निर्मोही का नाम पता लिख दिया। उसके दिल में खुशी का न जाने कौन सा खजाना खुल गया था। वह भागी-भागी डाकघर गई और लिफाफा डाल आई। सुबह से मुरझाया उसका मन महकते चमन सा खिल गया था।

एक सप्ताह में ही सुधा के नाम एक पोस्टकार्ड आ गया। लेखक ने कागज पर जैसे मोती जड दिए थे। पत्र का एक-एक अक्षर सुन्दर और सरस था। लिखा था “ माननीय सुधा जी, सादर अभिवादन। नव वर्ष आपको भी मंगलमय हो। आपको मेरी कहानी “ सुख का सागर’ पसंद आई, उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ । सभी पत्रों में मेरी कहानियां जब-तब छपती रहती हैं। किसी वाचनालय में रविवारीय अंक देख लिया करें। भविष्य में मैं भी आपको सूचित करता रहूंगा। मेरी कुछ पुस्तकें संसारचन्द एंड कंपनी,तिलक रोड,नयी दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। आप चाहें तो उनसे मंगवा लें। आप द्वारा प्रेषित कार्ड का मुख पृष्ठ एक सवाल उभारता है। उसी पर दो पंक्तियां आपकी नजर हैं:

दिलों को करके कैद ,इक फूल रख दिया।

यह क्या किया सितमगर,यह क्या कर दिया ।


सुभेच्छा

नरेन्द्र निर्मोही।

पत्र पढ कर सुधा का मन मचल उठा। उसकी इच्छा हुई कि किसी को अपनी बाहों में भर कर छाती से कस कर लगा ले। वह कुछ ऐसा करे कि उसका तन-मन झनझना उठे। मगर क्या ? उसके होंठों में कंपन्न होने लगी और उसके गालों पर एक सरसराहट सी दौड गई। उसने कार्ड को एक बार फिर पढा और इधर-उधर देख कर होंठों से लगा लिया। फिर पलंग पर लेट कर आँखें बंद करली। उसकी आँखों में एक सपना उभर आया था। उसे लगा जैसे कोई नदी के उस पार बांहें पसारे उसे बुला रहा है और वह नदी के इस ओर खडी उसके पास जाने का सहारा खोज रही है। वह सोच रही है कि नदी के उस पार कैसे जाए ? वह एकाएक पलंग से उठी और पत्र लिखने लगी ।

श्रीमान निर्मोही जी,

सादर नमस्कार,

आपने मेरे पत्र का उत्तर दिया, मेरे लिए यह गौरव की बात है। लेकिन आपका खुला पत्र पा कर मुझे दुख भी बहुत हुआ। दो लाइनों में आपने जाने क्या कुछ लिख दिया कि मैं बेचैन हूँ। मैने सुना था कि लेखक आधे पागल होते हैं। मगर आप तो उनके भी हैडमास्टर हैं। यदि आपने खुला पत्र न लिखा होता, तो यह बात मुझ तक ही रहती । लेकिन अब न जाने किस-किस ने इसे पढा होग ? आप जानते हैं मैं एक शरीफ घर की लडकी हूँ। भविष्य में कृपया बंद पत्र लिखें जिससे मुझे न कोई परेशानी होगी और न कोई नाराजगी। आप पत्र पर मेरे पापा का नाम पता लिखें जिससे किसी को पता न चल पाये कि पत्र मेरे लिये है।वैसे मैं मेरी मम्मी से कोई भी बात नहीं छिपाती क्योंकि वे मेरी बेस्ट फ्रैंड भी हैं। आप अपने बारे में जरूर लिखें। पत्र की इंतजार में सुधा रानी हसरतपुर।

अगले सप्ताह सुधा को एक भारी भरकम पत्र प्राप्त हुआ। निर्मोही ने हाल ही में प्रकाशित अपनी कुछ कहानियों की फोटो प्रतियों के साथ पत्र भेजा था। उसने पत्र में लिखा था ”सुधा जी, गालियों से भरा आपका पत्र मिला ।बहुत-बहुत धन्यवाद। लेखक होने के नाते पाठकों के पत्रों का उत्तर देना मैं मेरा धर्म मानता हूँ और पाठकों की प्रतिक्रिया को मेरे लेखन के लिए दिशानिर्देश मान कर चलता हूँ। आपके पत्र में एक भय और संकोच का वातावरण दिखाई पडता है। शायद आपकी कोई मजबूरी हो, किन्तु मैने दो पंक्तियां आपके कार्ड पर लिखी थीं और वह भी यह सोच कर कि शायद आपको शेर-ओ शायरी की भाषा अधिक पसंद है। फिर भी यदि मेरे कारण आपको दुख हुआ है तो मैं अपराधी हूँ। कुछ कहानियों की प्रतियां संलग्न हैं।अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजेँ.धन्यवाद। शुभेच्छु, निर्मोही ।

पत्र पढ कर सुधा की आँखें छलछला आई। इतना सीधा, इतना सच्चा इंसान ! जरा सी बात पर ही स्वयं को अपराधी मान लिया । अरे निर्मोही, कौन कहेगा तुझे निर्मोही । तेरी तो हर बात में मोह है। तू निर्मोही नहीं, मन मोही है। काश ! तू कहीं मिल जाए, तो मैं तुझे मेरा मनमोहन बना लूँ। सुधा के दिल में प्यार का सागर उमड रहा था जो उसकी आँखों के मार्ग से अविरल बह रहा था। न जाने कितनी देर वह एक सुन्दर-सलोनी छवि से लिपटी रोती रही। उसकी हालत उस बच्चे जैसी थी जो पैसे के अभाव में दुकान में सामने रखे खिलौने को ललचाई नजरों से देख रहा हो।

दूसरे दिन सुधा को एक पत्र और मिला। उसे सरकारी नौकरी के साक्षात्कार के लिए भोपाल बुलाया गया था। एकाएक उसके मस्तिष्क में सैंकडों विचार कौंध गए। दिल बल्लियों उछलने लगा। तीन दिन जैसे-तैसे काटे और अपने पिता के साथ भोपाल आ गई। रात को वे एक परिचित के घर रूके। किन्तु सुधा एक पल को भी सो न सकी।एक मीठा सपना उसे लगातार गुदगुदाता रहा। कभी उसका दिल जोर-जोर से धडकने लगता और कभी मन में खुशी की चकाचौंध रोशनी भर जाती।

सुबह साक्षात्कार के लिए जाते समय सुधा ने अपने पिता से कहा “ पापा ! मुझे वहाँ न जाने कितनी देर लगे, आप वहाँ बेकार में परेशान होंगे। मैं दो साल भोपाल में पढी हूँ। सब जगह मेरी देखी हुई हैं ।मैं इन्टरव्यू दे आऊँगी। आप यहाँ आराम करो।“

“ मैं यहाँ पडा-पडा क्या करूँगा बेटा। वहाँ भी आराम से एक तरफ बैठा रहूँगा। हो सकता है किसी चीज की जरूरत ही पड जाये।“ उसके पिता ने उत्तर दिया।

“ वहाँ किस चीज की जरूरत पडेगी। आपको बेकार धूप-गर्मी में बैठना पडेगा।मेरा नंबर न जाने कब आये ।“

“ तो भी बेटा, एक से भले दो या मेरे साथ जाने में तुझे कोई एतराज है ?”

“ मुझे क्यों एतराज होने लगा। लेकिन यहाँ आ कर भी आपने क्या कर लिया? अंकल जी का घर मैं भी जानती थी। हसरतपुर से बस में बैठ कर सीधी य़हाँ आती और इंटरव्यू दे कर घर चली जाती। पहले भी तो कितनी बार मैं अकेली आई-गई हूँ। मगर जब आप परेशान ही होना चाहते हैं तो आपकी इच्छा ।“ सुधा ने निराश स्वर में कहा और सडक से आटो लेकर अपने पिता के साथ बोर्डआफिस पहुँच गई।

इधर-उधर पता करके सुधा ने संबंधित अधिकारी के पास अपनी उपस्थिति सूचना दी और अपने पिता के पास बाहर आ कर लान में बैठ गई। दस मिनट बाद वह फिर अंदर गई, उसका नम्बर आ गया था। पाँच मिनट में ही एक-दो सवाल पूछ कर उसके मूल प्रमाण पत्रों की जाँच करके उसे घर जाने की अनुमति दे दी गई। साक्षात्कार मात्र एक औपचारिकता भर के लिए था। सफल अभ्यार्थियों की सूची तो पहले ही बन चुकी थी।

सुधा बाहर आई तो अपने पिता को गहरी नींद में सोया देख कर उसका दिल धडक उठा। वह स्वचालित यंत्र सी अपने प्रमाण पत्रों का लिफाफा छाती से लगाए सडक पर आई औरआटो में बैठ कर चालक को शिवाजी नगर का पता बता दिया। सुधा के मन-मस्तिष्क में भयंकर तूफान आया हुआ था। मोही-निर्मोही, भय और खुशी ने उसकी सुध-बुध हर ली थी। वह सोच रही थी निर्मोही से क्या बात करेगी? कैसे बात करेगी? क्या कहेगी ? कैसे कहेगी? कैसे कहेगी कि तू निर्मोही नहीं, मेरा मनमोही है। तू तेरी कहानियों जैसा भोला और प्यारा है। क्या सचमुच ही वह ऐसा ही होगा? हे ईश्वर ! वह ऐसा ही हो। मैं जिन्दगी में तुमसे फिर कभी कुछ नहीं मांगूगी।

आटो रूका तो सुधा की चेतना लौटी। वह आटो का बिल चुका कर सामने के घर की ओर गई।दरवाजे पर नरेन्द्र निर्मोही के नाम की तख्ती लगी थी।कुछ देर सोचने के बाद उसने साहस करके दरवाजा खटखटाया और धडकते दिल से उसके खुलने की प्रतीक्षा करने लगी।दरवाजा खोलने वाली वृद्ध महिला थी।सामने खडी युवति को क्षण भर देखने के पश्चात वृद्धा वापिस मुडी और अन्दर रखे सोफे पर बैठ कर उसकी प्रतीक्षा करने लगी। खुले दरवाजे को सुधा ने अन्दर आने का संकेत समझा और वह उसके पास चली गई।

ड्राइंग रूम बहुत सुरूचि पूर्ण ढंग से सजा था। रंगीन टी. वी., फ्रिज,कूलर बडी तरतीब से रखे थे। पूरे कमरे में ढेर सारी ट्राफी और समृति चिन्ह सजे थे।एक रैक में सैकडों पुस्तकें थीं और उनके ऊपर दीवार के साथ एक स्वस्थ सुन्दर,आकर्षक युवक का फ्रेम में लगा बडा सा रंगीन चित्र टंगा था।युवक खिलखिला कर हंस रहा था जिससे उसके मोती जैसे दाँत भी नजर आ रहे थे।शायद यही निर्मोही है। सुधा ने सोचा

“ कहाँ से आई हो बेटा ? “वृद्धा ने पूछा

“ जी....मैं...मैं यहीं से, निर्मोही जी.....?” सुधा ने अचकचाते हुए उत्तर दिया

“ नरेन्द्र......उसका क्या ठीक है बेटा। आये तो अभी आ जाये और न आये तो दिन-रात का भी पता नहीं। कोई लिखाई-पढाई का काम है ? “

“ जी “

“अगर कुछ लेकर आई है,तो छोड जा, जब वह आएगा तो मैं उसे बता दूँगी। क्या नाम है तेरा ? “

“ जी सुधा....लेकिन वे खुद मिल जाते तो.......

“फिर इंतजार कर ले, शायद आ ही जाये। चाय बना दूँ तेरे लिए ? “ उसने उठते हुए कहा ।

“जी, चाय की जरूरत नहीं है..... वैसे वे कब तक आ जाते हैं? “ जानते हुए भी सुधा ने पूछा।

“ उसका कुछ ठीक नहीं है। हो सकता है वह शाम को रमा को ले कर ही आए।“

सुधा वहीं बैठी रहना चाहती थी। उसकी आँखें नरेन्द्र निर्मोही की तस्वीर पर टिकी थी। उसके मन में एक अजीब सी छटपटाहट हो रही थी। उसे अपने पिता की भी चिन्ता थी और निर्मोही का मोह भी खींच रहा था। वृद्धा उसके लिए पानी ले कर आई तो सुधा ने कहा

“ माँ जी मैं पाँच बजे फिर आऊँगी। आप नरेन्द्र जी से कहना कि वे मेरा घर पर ही इंतजार करें, कहीं जायें नहीं।“

“ कहने को तो मैं कह दूँगी बेटा, मगर तू लिख कर छोड जा, मैं उसे दिखा दूँगी।“ वृद्दा ने कहा और अन्दर के कमरे में से एक फट्टा और पैन उठा कर लाई। फट्टे पर कागज क्लीप से दबे थे।सुधा ने फट्टा लिया तो सबसे ऊपर उसी के नाम लिखा एक पत्र था और नीचे अखबार की फोटो कापी। पत्र पढ कर उसकी आँखें भर आई। लेकिन किसी तरह उसने स्वयं पर नियंत्रण करके एक अन्य कागज पर लिखा “निर्मोही जी, मैं भोपाल आई हूँ,एक बार आपके दर्शन करना चाहती हूँ। कृपया आप घर मेरा इँतजार करें। मैं पाँच बजे फिर आऊँगी। सुधारानी, हसरतपुर ।“

सुधा ने फट्टा मेज पर रखा और वृद्धा को प्रणाम करके सडक पर आ गई।गला भरा होने कारण वह कुछ भी बोल न सकी थी। किन्तु घर से बाहर आते ही उसकी डबडबाई आँखें छलक ही पडी। वह जितना ही खुद को काबू करने की कोशिश करती थी, उसका हृदय उतने ही वेग से उमडा आता था। वह आटो लेकर बोर्डआफिस पहुँची तो उसने देखा कि उसके पिता जी लान से आफिस के अन्दर जा रहे थे। वह उनके पीछे लपकी और मुख्य द्वार के साथ वाले कमरे में घुस गई।जब वे उसे देख कर अन्तिम कमरे का चक्कर लगा कर लौट रहे थे, वह उनके सामने आ गई और फिर उनके साथ बाहर आ कर बोली ” पिताजी आपने बेकार ही तकलीफ की। मेरा नम्बर न जाने कब आएगा। दो तो बज गये। आपको भूख भी लगी होगी? आप अंकल के घर चले जाएं और खाना खा कर आराम करें। मैं अपने आप आ जाऊँगी।“

“ बेटा,अगर मुझे भूख लगी होगी तो क्या तुझे न लगी होगी ? “ उन्होने उत्तर दिया।

“ एक दिन में मुझे क्या फर्क पडेगा ? “

“ तो मुझे ही क्या फर्क पड जाएगा ? बेटी भूखी रहे और बाप पेट भर कर आराम से सोये, ऐसा तो कभी नहीं हुआ।“

“ आप बहुत जिद्दी हैं। मैं कोई बच्ची हूँ, जो कहीं गुम हो जाऊँगी। अब बैठे रहिए यहाँ धूप में।“ सुधा ने झल्लाए स्वर में कहा और पेड के नीचे आ गई।

सुधा पाँच मिनट अपने पिता के पास बाहर बैठती तो पन्द्रह मिनट बोर्डआफिस की सीढियां चढती-उतरती । आफिस के लोग उसे बार-बार ऊपर- नीचे जाती देखकर शंका करने लगे थे। बाहर लान में आते-जाते लोग भी उसे संदेह की नजरों ले देख रहे थे। किन्तु सुधा उनकी आँखों की चुभन झेल कर भी पाँच बजाना चाहती थी। उसकी बार-बार इच्छा होती कि वह निर्मोही के घर जाए, किन्तु निर्मोही के घर पहुँचने या न पहुँचने की आशंका से वहीं पाँच बजाकर जाना चाहती थी। वह बार-बार बेचैनी से घडी देखती, किन्तु घडी की सुइंयां जैसे एक जगह ही चिपक गई थीं। उसके चेहरे पर परेशानी और दिल में तूफान आया हुआ था।जैसे-तैसे पाँच बजे। वह साक्षात्कार का बहाना करके आफिस में गई और फिर सवा पाँच बजे निकली। उसके पिताजी उसकी प्रतीक्षा में इधर- उधर टहल रहे थे।

बाहर आते ही सुधा ने कहा “ पापा शिवाजी नगर में मेरी कालेज की एक फ्रैंड रहती है। हम उधर से हो कर निकलें ? “ सुधा ने धडकते दिल से पूछा।

“ तेरी इच्छा बेटा ।“ उसके पिताजी ने कहा।

सडक पर आ कर सुधा ने आटो लिया और पाँच ही मिनट में निर्मोही के घर पहुँच गई। उसने आटो पचास कदम आगे रूकवाया और अपने पिता को उसमें बैठे रहने के लिए कह कर वह दरवाजे के पास आ गई। उसने दरवाजा खटखटाया तो वृद्दा अलसायी सी बाहर आई।

“ माँ जी, नरेन्द्र जी आये ? “ सुधा ने घबराए से स्वर में पूछा।

“ एक बार भागा-भागा आया था। फिर पाँच बजे आने की कह कर चला गया।“

“ आपने मेरा पत्र उन्हें दिया था ? “

“ हाँ, तेरे जाते ही तो आ गया था वह। अगर तू पाँच मिनट बैठ जाती तो तभी मिल लेती। टाइम क्या हुआ है ? “

“जी,सवा पाँच बज रहे हैं।

“ फिर तो आने ही वाला होगा। थोडी देर इंतजार कर ले। “ वह अन्दर जाने को मुडी। सुधा का मन चीत्कार कर उठा। उसकी इच्छा हुई कि वह अन्दर जा कर आराम से बैठ जाए और निर्मोही के आने तक बैठी रहे,मगर पचास कदम पर आटो में बैठे अपने पिताजी का वह क्या करे? वे उस समय उसे क्रूर जल्लाद प्रतीत हो रहे थे।उसने कमरे में टंगी निर्मोही की तस्वीर को हसरत भरी नजरों से देखा और बिना कुछ बोले वापिस मुड गई। वह टूटे कदमों से आटो की तरफ बढ रही थी।मगर उसके पैर पीछे पड रहे थे। एक-एक क्षण उसके लिए मूल्यवान हो गया था।वह आटो में बैठ कर भी निर्मोही के दरवाजे की ओर देख रही थी। आटो चला तो उसकी आँखों में सावन उतर आया और उसे सब कुछ धुँधला दिखने लगा।

तभी दरवाजे के सामने एक स्कूटर आ कर रूका और एक युवक, युवति के साथ दरवाजे के अन्दर चला गया। हाय रे किस्मत, यह क्या किया ? सुधा का दिल हाहाकार कर उठा। निर्मोही.....निर्मोही.......मनमोही......मनमोहन ! !! सडक बांयी ओर मुड गई ।***


-प्रभु मंढइय़ा “विकल”

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