जीवन मृत्यु

जीवन मृत्यु
सुशील शर्मा


मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो ।
मैं विरह वेदना गाता हूँ।
तुम मिलने के गीत रचो।

नहीं साँस का रुक जाना मर जाना है।
जीवन का अवसान नहीं मर जाना है।
तन और प्राण का अवलंबन ये सांसे हैं।
प्राण मुक्त तन होना क्या मर जाना है।
मैं मृत्यु अवगीत लिखूंगा।
तुम जीवन की प्रीत लिखो।
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो।

ममत्व रूप ,बुद्धि योग का स्वयं प्रकाश हो।
पुण्य ,पाप और कर्म का समूल नाश हो।
मन का रूप साक्षी हो और विरक्त चित्त हो।
काम क्रोध लोभ मोह का पूर्ण विनाश हो।
मैं मृत्यु से प्रणय लिखूंगा।
तुम जीवन अनुगीत लिखो।
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो ।

मोह मुक्त बन इन्द्रियों पर विजय करो।
ईश तत्व ,ज्ञान नित्य बुद्धि को अजय करो।
स्थितप्रज्ञ ,स्पृहारहित पूर्ण ब्रम्हज्ञान हो।
अनासक्त कर्म रहित ज्ञान यज्ञ सुजय करो।
मैं मृत्यु अनुग्रहीत लिखूंगा
तुम जीवन जनगीत लिखो।
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो।

भोग मृत्यु योग जीवन ,जीव परम अंश है।
तन माध्यम भोग का ,भोग मृत्यु दंश है।
मृत्यु यात्रा अनंत की ,जीवन विश्राम है।
तन वस्त्र आत्म का ,जीव परम हंस हैं।
मैं मृत्यु की हार लिखूंगा।
तुम जीवन की जीत लिखो।
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो।

जीवन धरा का रूप ,मृत्यु आकाश है।
मृत्यु से गुजरना ही जीवन प्रकाश है।
मृत्यु से डरो नहीं मृत्यु विशेष है।
कर्म बंधनों से विमुक्त मृत्यु आभाष है।
मैं मृत्यु का उत्सव लिखता ।
तुम जीवन का शोक लिखो।
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो।

मृत्यु एक प्रश्न चिन्ह उत्तर अनुत्तरित।
जीवन की डोर से बंधा स्वप्न विस्तरित।
मृत्यु है अगाध सिंधु जीवन एक नाव है।
मृत्यु गोद में ऊगा एक जीव अंकुरित।
मैं मृत्यु परिभाषित करता
तुम जीवन की रीत लिखो
मैं रचता हूँ मृत्यु स्वयंबर ।
तुम जीवन का गीत लिखो

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