ट्राली से स्कूल जाने वाली दो बच्चियाँ सोना मोना क्रमश: पाँच और सात वर्ष की थी ।छुट्टी टाईम पैदल बच्चो को ट्राली के पीछे पीछे दौड़ता देखकर मोना पैदल सड़क पर दौड़ने के लिये बेचैन हो उठती ।एक दिन मोना ट्राली वाले से अपनी जिद मनवाने मे सफल हो ही गई।

ट्राली वाले ने बच्चो को उनकी जिद पर सड़क पर ही उतार दिया। बच्चियो को घर का रास्ता तो याद था लेकिन दूरी का अंदाजा नही था ।खैर बच्चियाँ सड़क गलियो से होते हुऐ हसते ,गाते दौड़ते अपने घर की ओर चली जा रही थी।

काफी दूर बस्ता लादे पैदल चलते जब दोनो थक गई तो सोना बोली "दीदी ,मेरा बस्ता कहाँ है ?सोना की बात सुनकर मोना परेशान हो उठी जिसे पापा ने ट्यूशन के पैसे से पंद्रह दिन पहले ही लाकर दिया था। बार बार पूछने पर छोटी रोती हुई बोली " दीदी बस्ता बहुत भारी था तो हमने सोचा इसे फेंक दे और हमने उसे बड़े नाले के पास सड़क पर फेक दिया।

बस्ते का ढ़ूढ़ना मोना के लिये एक जटिल समस्या बन गई और वह शीघ्र ही नाले के पास बस्ता ढ़ूढ़ने पहुची लेकिन बस्ता गायब था।निराश, घर लौटते हुऐ उसे सुरेश का घर दिखा जो पापाजी के स्कूल के टीचर थे लेकिन मोना ने घर मे केवल उनका नाम ही सुना था उसे यह भी नही मालूम था कि सुरेश बूढ़े है या बच्चे जहाँ वह अपनी माँ के साथ होली मिलने गई थी।

वहाँ पहँचकर मोना सूरेश सूरेश कहकर पुकारने लगी । एक लड़के द्वारा मालूम चलने पर कि वह गाँव गये है दोनो निराश ,घर की ओर चल दी।सामने से ढ़ूढ़ने निकले पिताजी को आता देखकर बच्चियाँ फूली न समाई और घर पहुँचकर माँ के सीने से चिपक गई। बेचैन माँ बच्चो को चिपकाते हुऐ बोली "बेटा वह सुरेश नही तुम्हारे सुरेश अँकल।


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