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चौड़ी सड़क पर जगह-जगह नियोन लाइट के गुच्छे लटक रहे थे। उन्हीं में से एक गुच्छे के नीचे, वो बदनाम जिप्सी खड़ी थी, और उससे कहीं ज़्यादा बदनाम वो गुंडियां थीं, जो उस जिप्सी पर और उसके चारों ओर थीं।


अभय काँप उठा, खुद को कोसने लगा, कि उसका ध्यान कहाँ गुम था, जो उसने सामने खड़ी इतनी बड़ी मुसीबत नहीं देखी। एक ही क्षण में पिताजी के सारे बोल दिमाग़ में गूँज उठे .... शाम को मत निकला करो..... कहीं अकेले मत जाया करो... दुनिया बहुत खराब है... अपनी इज़्ज़त अपने हाथ में है.... थोड़ी सतर्कता बरतोगे तो बचे रहोगे वरना यह दुनिया नोंच खाएगी। बेटा, दुनिया बहुत बेरहम है, खासकर हम मर्दों के लिए। कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो परिस्थितियाँ कोई नहीं देखेगा। सब आदमी पर ही उंगली उठाएंगे। और इस वक्त दिल्ली शहर की हालत बहुत खराब है। वहाँ गली-गली में गुंडीराज है। अकेला आदमी देखकर नोच खाती हैं, सब।

इतना कुछ समझाकर बाबूजी ने मुझे शहर पढ़ने के लिए भेजा था। पर मैं एहतियात क्यूँ नहीं रख पाया। क्यूँ हास्टेल की चहारदीवारी से बाहर निकला। ऐसी भी क्या खास तलब घर के खाने की और वो भी सुनील के डैडी के हाथ के खाने की। इसी लालच की वजह से आज उसका कीमा बनने के हालात नज़र आ रहे थे।


अभय ने एक नज़र फिर जिप्सी को देखा और याद आया कि सुनील ने कहा भी था कि उसकी बहन रमा बाइक से मुझे हॉस्टेल छोड़ देगी। मगर मैं न माना। मानता भी कैसे? कॉलेज की छात्रा नेत्री संघ की मुखिया इसकी खास दोस्त जो है। आते-जाते जाने कितने बार मुझे छेड़ा है। एक बार अजीत जब नहा रहा था तो उन्होंने उसका विडियो बनाकर वायरल कर दिया था। बेचारे के पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा। फिर भला रमा के साथ के लिए कैसे हाँ कह देता। ऐसा बदनाम होताकि कहीं का न रह जाता। मगर वो बदनामी भी भली होती। इस वक्त अगर इनके हाथ पड़ा तो हाल बुरा होगा।


अभय ने पीछे लौटने में भलाई समझी। वह पीछे मुड़ा तो दूर तक एकदम सुनसान सड़क। अभय यह भयंकर नज़ारा देखकर काँप उठा। दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं कि अगर कोई आस-पास होता तो कहता कि नगाड़े कहाँ बज रहे हैं ? एक तरफ कुँआ था तो दूसरी ओर खाईं। सुनसान सोमोन बोलिवर मार्ग पर खड़े होकर अभय का बेबस दिल किया कि आसमाँ की ओर सिर उठाकर चीख-चीख कर भगवान से पूछे कि क्यूँ हम आदमियों के साथ ही यह सब होता है ? क्यूँ हमीं को यह सब सहना पड़ता है ? हमें इतना कमज़ोर बनाया। फिर जैसे जवाब में ही बुदबुदाया “हाँ! शर्मा सर ने बताया तो था।”

अभय याद करने लगा उस दिन को जब वह पुनीत के साथ उसके जेंडर स्टडीज़ के सर, शर्मा सर, के पास गए थे। बहुत सारे सवाल थे मन में। शर्मा सर का कहना था कि चार दशक पहले हालात इतने खराब नहीं थे। जो स्थिति आज आदमियों की है वो औरतों की हुआ करती थी। हज़ारों साल तक तो औरतों ने कुछ नहीं कहा। मगर एक हादसा हुआ और फिर उसी हादसे ने एक क्रांति ला दी। जेंडर स्टडीज की काया ही पलट गई। उस हादसे के बाद निर्भया क्रांति हुई। जगह-जगह निर्भया नाम के एनजीओ खोले गए जो औरतों को सिखाते थे कि वो बहुत बलशाली हैं। अगर नहीं होतीं तो आदमियों से कहीं ज्यादा काम कैसे कर पाती ? घर का भी और बाहर का भी। कुछेक औरतें जो उस वक्त कुश्ती और पहलवानी तथा अन्य खेलों में नाम कर रही थीं वो इस बात का पुख्ता सबूत थीं। उनमें धीरे-धीरे आदमियों वाले गुण पैदा होने लगे। कुछेक की तो मूँछे सी निकल आई थीं।

अभय भौचक्का सा शर्मा सर को देख रहा था और अपना पिछला सवाल भूल गया। पिछला सवाल यानी कि कौन सा हादसा?” उल्टे नया सवाल दिमाग़ में आया जो उसने पूछा “क्या घर का सारा काम औरतें किया करती थीं और स्पोर्ट्स में आदमी ज्यादा औरतें कम होती थीं?”

शर्मा सर हंसे –“हाँ अभय मुझे याद है। हमारे घर पर भी कामवाली आया करती थी वाला नहीं। बर्तन धोने से लेकर कपड़े और झाडू पोंछा से लेकर खाना बनाने तक।”


अभय को यकीन नहीं हुआ कि यह सब काम औरतें किया करती थीं। मगर, उसे कामवाली से याद आया कि उसके घरवालों के बहुत ढूँढ़ने के बावजूद उन्हें माली न मिला तो मालिन रखनी पड़ी थी जो अकसर उसे देखकर सीटी बजाती और गाना गाया करती थी। जब उसने इसकी शिकायत अपनी चाची से की तो लेने के देने पड़ गए। चाची कड़क और परम्परागत विचारों वाली थीं। अभय का घर में और घर के आसपास शॉर्ट्स पहनना तो बंद हो ही गया। उसके कमरे से बाहर निकलने को भी सीमित कर दिया गया।

“फिर सर....” पुनीत ने पूछा “.....यह सूरत बदली कैसे? निर्भया क्रांति ने क्या कर दिया ऐसा?”

“जगह-जगह औरतों को सशक्त बनाया गया। उन्हें बताया गया कि कमज़ोर वो दिल से हैं शरीर से नहीं। उन्हें हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया गया। सारी सहूलियत दी गई उन एनजीओ द्वारा। अब देखो इसी बदौलत तुम्हें हर जगह सारी नेत्रियां, फिल्म निर्देशिकाएं, पुलिस कांस्टेबुल्स, बस कंडक्ट्रेस, सब औरतें ही तो तैनात नज़र आती हैं।”

पुनीत बोला –“और हमारा शोषण कर रही हैं।”

शर्मा सर ने जैसे सुना ही नहीं – “जिम खोले गए; उन्हें फौलाद की तरह ताकतवर बनाया गया और उनका सारा स्त्रीत्व जाता रहा। पंद्रह साल पहले, जब तुम लोग बच्चे रहे होगे; दंगे हुए थे।”


“दंगे।” दोनों एक साथ चीख पड़े।

“हाँ। छतरपुर पर बड़ी सी काली माता की मूर्ति देख रहे हो न।”

“जी सर” दोनों ने एक साथ जवाब दिया।

“वहाँ हनुमान जी की मूर्ति हुआ करती थी और बगल में मंदिर शिवजी का हुआ करता था। औरतों ने उन सबको ढहाकर गौरी माता का मंदिर और काली माता की मूर्ति बनवाई ताकि केवल देवियों की पूजा हो; देवताओं की नहीं। बहुत खून-खराबा हुआ था। आदमियों को सड़कों पर खदेड़-खदेड़ कर मौत के घाट उतारा गया था। मगर मारने से पहले उनका बुरी तरह से शारीरिक शोषण किया गया था। नालियों में पानी की जगह, खून...आदमियों का खून बहने लगा था। जो बच गए वो आदमी कहाने के लायक ही नहीं रहे। उनको शिखंडी या कहो खुसरा बना दिया गया। आदमियों ने अपनी कमज़ोर स्थिति को कबूल लिया। पहले औरतों की स्थिति अपने ही घर में युद्धबंदियों सी होती थी, अब आदमियों की।”

अभय शर्मा सर की वे बातें याद कर कांप गया। जब तक वो इतना लंबा रास्ता तय करेगा। इन गुंडियों की नज़र में आ ही जाएगा।


हुआ भी वही। अभी अभय दस कदम ही लौटा था कि जिप्सी घरघराती हुई उसके बगल में आकर लगभग चीखती हुई सी रुकी। जिप्सी के ऊपर बैठी दो गुंडियां नीचे कूदीं और दरवाजे खुले। दरवाज़ों से भी सात-आठ उछलकर सामने आ गईं। काले-काले लैदर जैकेट-पैंट वाली लड़कियों ने अभय को घेर लिया।


“चल गुलबदन.....चल तुझे घर छोड़ दें।”

अभय थरथराता हुआ बोला –“मैं चला जाऊँगा...मुझे छोड़ दो....मैं चला जाऊँगा।”

“तुम्हें छोड़ने के लिए ही तो आएं हैं राजा। मगर पहले पकड़ तो लें।”


फिर तो जो वो जिप्सी सारे शहर में घूमती हुई भोर में रूकी तो अगले दिन हर घर में टी.वी. पर न्यूज चैनल ऑन था। अभय की खबर आ रही थी। शाम होते होते जगह-जगह कैंडल मार्च हो रहे थे। न्यूज चैनल की रिपोर्टर चीख-चीख के कह रही थी –“कब बंद होगा यह हैवानियत का गंदा खेल। आखिर कब? आखिर कब तक इस देश के पुरुष अपने आपको असुरक्षित महसूस करते रहेंगे। कब तक? सरकार कब जागेगी।”

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