मीत अपनी ताई के पास रहती थी। उन दोनों मीत और उसकी छोटी बहन की माँ के जाने के बाद ताई ही उनका ध्यान रखती थी। दोनों लड़कियां ताई की बहुत इज्ज़त करती थी और छोटी तो प्यार भी बहुत करती थी। छोटी चंचल थी लेकिन मीत गंभीर थी। पढ़ाई मे भी अच्छी थी और घर के कामों मे ताई का पूरा हाथ बटाती थी। सारे रिश्तेदार, पड़ोस वाले मीत की तारीफ किया करते थे। ताई मीत के भरोसे घर छोड़कर अपनी दो महीने की छुट्टियां मायके जाकर बिता आया करतीं थी। जबसे आठवीं मे आई थीं तब से ही इतने बड़े घर का झाड़ू- पोंछा, बगीचे की साफ सफाई, खाना बनाना , कपड़ें धोने सभी काम कर लिया करती थी। घर भी साफ- सुथरा रखती थी। जो भी देखता था तारीफ किए बिना नही रहता था।

मीत के 9वीं की वार्षिक परीक्षाएं चल रही थी। अगले ही दिन रेखागणित का पेपर था। मीत सुबह का काम फटाफट निबटवाकर पढ़ना चाहती थी।ताई जी , जो भी काम है बता दो जल्दी- जल्दी निबटवाकर फिर पढ़ने बैठूंगी। ताई जी ने दलिया बनाया था। मीत से कहा, "ये गरम है जल्दी से दादा जी को दे आ।"दादा जी को बहुत गरम- गरम खाना पसंद था। ताई से प्लेट पकड़ी ही थी कि छोटा भाई ताई जी का बेटा खेलते- खेलते मीत के पैरों से लिपट गया। उसको बचाते हुए और दलिये को संभालते हुए थोड़ा दलिया मीत के हाथ पर गिर गया।

ताई ने डाटते हुए कहा , "जा क्यों नही रही है? कोई काम ठीक से नहीं कर सकते हो। दादा जी इंतज़ार कर रहे हैं। "रूआंसी आवाज़ मे मीत ने कहा, "जाती हूँ ताई जी।"मीत का हाथ जल रहा था फिर भी जल्दी से दादाजी को दलिया देने गई। "मैं हाथ धोकर आती हूँ दादा जी, ताई जी आवाज़ दे तो कह देना । बाहर आवाज़ नहीं आती। "मीत जल्दी से बाहर टंकी कि तरफ भागी, हाथ बहुत जल रहा था। इतनी देर से उबलता हुआ दलिया हाथ पर ही था। आगे वाली टंकी बंद कर उसके पीछे बगीचे वाली टंकी मे हाथ डाल दिया। अब थोड़ा आराम आ रहा था। मीत रोती ही जा रही थी। हाथ मे जलन थी और दिल तो रोज़ाना कितने ऐसे छोटे बड़े घाव झेलता था। पेड़ों के बीच रोना और अपनी बात कहना उसे बहुत सुरक्षित लगता था। क्योंकि पेड़ तो सिर्फ सुन सकते थे और उसकी बात इधर की उधर नहीं होती थी, उसके हमराज़ थे।

ताई जी ने एकबार नही कहा , जा हाथ धो अपना। उन्होंने तो देखा था, फिर भी ? मीत थोड़ी देर मे अंदर गई तो ताई आवाज़ें लगा रही थीं। "हाँ जी ", मीत ने कहा।"हद ही हो गई लापरवाही की , कब से आवाज़ें लगा रही हूँ। मतलब ही नही की जवाब दो।""बेटा जी, आपको कहा तो था कि हाथ धोने गई है। हाथ पर गरम दलिया गिर गया था। ",दादा जी ने कहा।"लापरवाही से काम करते हैं। ध्यान ही नहीं है।", ताई बोली।"ताई जी, चीनू को बचाते हुए गिरा था। आपके सामने ही तो गिरा था।""हाँ, अब मेरे आगे बोलोगे। मेरी ही गलती है सारी। ""ताई जी, मैंने ऐसा तो नही कहा।"फिर क्या ? मीत अपने कमरे मे चली गई पढ़ने। कुछ बात आगे बढ़े, उससे पहले ही खिसकना ठीक रहता है।मीत भी हार नहीं मानती थी। रोते हुए, आंसू बहाते हुए, दिल को समझाते हुए कि उसके भी दिन आएंगें, पढ़ने बैठ जाया करती थी।सपने तो बड़े-बड़े देखती थी , शायद यही कला थी जो सुकून देती थी, हिम्मत भरती थी।

मीत ने अगले दिन पेपर दिया। पेन पकडा नही जा रहा था, अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच की जगह मे रगड़ से हाथ छिल रहा था तो उसने दूसरे हाथ से पेन को सहारा दिया और पेपर पूरा किया। मुश्किल हुई लेकिन हार नहीं मानी। जिस बात से दिल दुखता था उसे रोकर बहा देती और पहले से ज्यादा मजबूत हो जाती थी। बस उसे अपने पापा पर तरस आता था कि कितना भरोसा और प्यार करते हैं इन सब से। जिस दिन पापा इनको जानेगें उस दिन टूट जायेंगे। दर्द की एक खासियत होती है - इसका नशा हो जाता है। थोड़ा मिले तो दर्द होता है और ज्यादा मिलने पर मजबूत बनाता है।

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