तीसरी गोली – एक अनकही कहानी


धॉय!!!!धॉय!!!!!धॉय!!!!! लगातार तीन गोलियों की आवाज़ से माँल गूंज उठा I दो आतंकी ढेर हो चुके थे, पर तीसरी गोली ने एक सच्चे प्यार को अधूरा कर दिया....हमेशा के लिए I होठों पे बस एक हीं नाम था ----“अनुजा !” माँल के कोने में तड़पता हुआ एक नौजवान ... सीना खून से लथपथ और हाँथ से टपकते अनगिन खून की बूँदें, पास हीं एक ‘टेड्डी’ रक्तरंजित जमीं पर औंधे मुँह पड़ा था I

शिवा एक हट्ठा-तगड़ा लड़का, अपने रोज़-मर्रा की ज़रूरतों में खोया हुआ माँ-पिता का इकलौता लाड़लाI

“ओये उठ जा ! दूध पहुंचाने कौन जायेगा ? शिवा....शिवा.....शिवा!” कान के पास जोर से आवाज़ लगाकर पिता ज़िवाजी ने उठाया I

“ओहो पापा! उठता हूँ न, सोने दो ना I वैसे भी रात को देर तक काम में लगा था I” शिवा ने प्यार से आग्रह कियाI

तब माँ बोली – “ मेरा बेटा सोता है तो परियां आती हैं और जागता है तो......तो मोहल्ले की सुन्दर लड़कियां .....और कुछ.... चुड़ैल....”

“ हा! हा! हा! माँSSS तुम भी ना! मुझे इतना हीरो मत बनाओ वर्ना ? परियां चुरा ले जाएँगी मुझेI” शिवा मुस्कुराया I

तभी दरवाजे पर हाँफते हुए शिवा का मित्र आया और चिल्लाया- “ओए चल! दूधवाला बर्तन लेकर खड़ा है और तुझे पागलों की तरह ढूंढ रहा हैI”

शिवा दौड़कर दूधवाले के बाड़े में पहुंचा, थोड़ी सी डांट मिली पर ये उसके लिए ये नया नहीं थाI वह कैन लेकर दूध पहुँचाने चल पड़ाI

चौराहा आते हीं वह तन्मय चाचा को दूध दियाI चाचा की चाय की दुकान थी और शिवा उनका खास दूधवाला थाI

चाचा ने उसे एक चाय देकर पैसे भी दिया I चाय पीते हुए शिवा की नज़र सामने वाले छोटे बंगले पर पड़ी, जो अचानक सूना पड़ा था I

“ चाचा! आज आपका पड़ोसी दया बाबा नज़र नहीं आ रहे ? क्या हुआ ? कहीं चले गये क्या ?” शिवा के आँखों में अचरज साफ़ नज़र आ रहा थाI

“ कुछ दिन से बाबा का धंधा मंदा हो गया था, इसलिए बंगला किसी कपड़ा व्यापारी के हाथो में सौंपकर अपना सबकुछ लेकर और सबके पैसे देकर अपने पुश्तैनी गाँव चला गया है, और हाँ! तुम्हारे २०० रूपये भी देकर गया हैI” चाचा भाव विभोर हो गयेI

“ओह चाचा ! ऐसी बात थी तो नहीं लेते ये पैसे, वैसे भी वो हमारे खास ग्राहक थे, इतना तो उपहार देना बनता थाI” शिवा ने कृतज्ञता जाहिर करते हुए कहाI

शिवा अपने राह चल पड़ाI

छ: दिवस पश्चात् वह पुनः उस रास्ते से गुजरा, पर इसबार बंगले में अलग हीं रौनक थीI दिवार गुलाबी रंग से पुते हुए, बगीचा साफ़-सुथरा, दरवाजे पर घोड़े की नाल टंगी, आसपास पंक्तिबद्ध सुन्दर फूल से सजे गमलेI कुछ दूर जाते हीं कदम ठिठक कर रुक गयेI

उसने सोचा –“ क्यों ना इस घर से संपर्क किया जाय और ग्राहक बनाया जाये?”

वह चल पड़ाI दरवाजा बंद था इसलिए खटखटाया और इंतज़ार किया I अन्दर से शालीनता से परिपूर्ण आवाज़ आई- “कौन है दरवाजे पर ?”

“ मै! शिवा दूधवाला I” शिवा ने उत्तर दिया I

दरवाजा खुला और एक सुन्दर सज्जन नज़र आये, जिनका नाम आदिनाथ था I शिवा को देखते हीं पुनः बोल पड़े –“ पर मैंने तो किसी से कहा भी नहीं कि मुझे दूध चाहिए, फिर ? खैर! क्या भाव ?”

“जी! मै पैंतीस लेता हूँ और दूध में आपको ज़रा भी मिलावट नहीं मिलेगीI सर! शिवा के टक्कर का एक भी दूधवाला यहाँ नही मिलेगाI” शिवा के आँखों में ईमानदारी की झलक साफ़ दिख्न रही थीI

“वैसे तो मेरे घर में कोई छोटा बच्चा भी नही है फिर भी घर में सभी दूध चाय पीते हैं इसलिए सुबह-शाम आधा लिटर दे दिया करना I” आदिनाथ जी ने शिवा के पीठ पर हाथ रखकर कहाI

शिवा अब प्रतिदिन आदिनाथ जी के यहाँ दूध पहुँचाता और उनसे ढेर साड़ी बातें किया करता I कभी उसे उनसे रामायण की शिक्षा मिलती तो कभी महाभारत की भव्यता से ओत-प्रोत होने का अवसर मिलता I उसने कभी उनके परिवार के बारे में पूछने की कोशिश नहीं की I

“पिता जी ! मैंने १२वीं की परीक्षा उतीर्ण कर लिया है और मैंने प्रथम श्रेणी प्राप्त किया हैI” शिवा ने अंकसूची पिताजी के हांथों में रखते हुए मुस्कुराकर बोला I हर तरफ मिठाई बांटी गयी और शुभकामना देने शिवा के दोस्त भी आने लगे I

दुसरे दिन तडके हीं शिवा अपने साथ मिठाई लेकर आदिनाथ के बंगले में पहुंचकर दरवाजा खटखटाया I इसबार एक सुन्दर लड़की ने दरवाजा खोला I

शिवा उसे देखते हीं मंत्रमुग्ध हो गया, पर खुद को सम्हालते हुए मिठाई का डब्बा देते हुए कहा- नमस्कार! मई शिवा! आपके यहाँ दूध पहुचने आता हूँI”

“हाँ! जानती हूँ, पापा रोज़ तुम्हारी हीं जिक्र किया करते हैंI तुम हीं उनके पहले मित्र हो इस शहर के I”

“वैसे? ये मिठाई किस ख़ुशी में ?”

“ओह! ये मिठाई मेरे १२वीं पास होने की ख़ुशी में है, घी के लड्डू, ख़ास आपके लिए I”

“मेरे पिता सूरत गए हैं और तीन दिन बाद आयेंगे, इसलिए तुम्हारे बाकी पैसे आकर देंगेI”

“ कोई बात नहीं जी, मै उन्ही से पैसे लूँगा, ये दूध भी रख लो I”

आज शिवा घर आकर बिस्तर पर आराम फरमा रहा था I आँखों में उसे सिर्फ उसी लड़की का चेहरा दिख रहा था I गुलाबी सलवार शूट में, काले नैन, लाल होंठ, काले घने बाल और मुस्कुराता एक चेहरा I ना चाहकर भी उसे याद आती रहीI

कॉलेज़ का पहला दिन था और शिवा आज जल्दी पहुँच गया था, इसलिए चुपचाप क्लास ढूंढकर वहीँ बीच के बेंच पर बैठ गयाI धीरे- धीरे समय पर सभी विद्यार्थी अन्दर आने लगे I तभी उसके कक्षा में वही लड़की नीले सलवार पहले नीली चुनर ओढ़े अन्दर आई और लड़कियों के तरफ बेंच पर बैठ गयी I वह स्तब्ध हो गया और कब सब कक्षा से बाहर निकल गये उसे पता हीं नहीं चलाI

उधर लड़की भी शिवा को देखते हीं प्यार कर बैठी थी और पहले दिन कॉलेज़ में उसे देखकर थोड़ी सकपका गयी थी, पर चुपचाप बेंच ढूंढकर बैठ गयी और पढने में व्यस्त हो गयी थी I

समय बीतने लगा और वो दोस्त बन गये कैसे ये वक़्त का तक़ाज़ा था I अनुजा भी उससे प्यार का इजहार करना चाहती थी, और शिवा में एक अजीब सी झिझक थीI

बहुत मुद्दतों बाद शिवा ने हिम्मत करके उसे उपहार देकर प्यार का इजहार करने का मन बनाया I शाम का वक़्त था और शिवा उपहार खरीदने माल की ओर चल पड़ा I

माँल में शांति छाई हुयी थीI ग्राहक बहुत कम थे, इसलिए भीड़ बहुत कम थी I वह अन्दर गया और एक गिफ्ट पसंद किया और काउंटर पर आकर बिल चुकाने के लिए खड़ा हो गया I

अचानक बाहर से दो बंदूकधारी माँल में घुसे और फायरिंग शुरू कर दिएI मगर वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मियों ने पूरी मुस्तैदी के साथ दो गोली में हीं दोनों को ढेर कर दियाI

इस घटना के दरम्यान वहाँ खड़े सभी चैन की सांस ले रहे थे, पर शिवा के सीने खून की धार निकल रही थी, वह अचेत होकर गिर पड़ाI उसे गोली लगी थी उन हमलावरों के बन्दूक से निकली गोली से, जो काउंटर के कांच को भेदती हुयी उसके सीने में जा घुसी थी I

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टिपण्णी-यह एक काल्पनिक कहानी है, फिर भी अगर किसी के जीवन से मेल खाती हो तो यह एक संयोग मात्र होगा I

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