शौचक्रीड़ा

बहुत सारे पाठकगण को यह अटपटा सा लगेगा पर मैं अपने आप को लिखने से नही रोक पा रहा हूँ। कृपया आगे पढ़ने से पहले ये जान लीजिए कि यह कहानी शौच के बारे में है।

यह कहानी गांव के बच्चों के एक समूह का है जिसका मुखिया था चिंटू। तो चलिए इस समूह के द्वारा किये गए शौचक्रीड़ा का संछिप्त वर्णन प्रस्तुत करता हूँ। बात
उस समय की है जब किसी के घर शौचालय नही हुआ करता था। बच्चे बूढ़े और जवान चाहे पुरुष हो या स्त्री सब को निपटारा करने बाहर खेतों में ही जाना होता था। पुरुष लोग तो उजाले मे जाने को स्वछंद थे पर स्त्रियां सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद ही जाने को मजबूर थीं। ज्यादा विश्लेषण उबाऊ हो जाएगा इसलिए कहानी को अब मुख्य धारा से जोड़ते हैं।

सब जाते थे तो चिंटू भी जाया करता था, अपने दोस्तों के साथ। पेट में रखने की चीज तो है नही? आपकी मजबूरी है, जाना ही पड़ेगा। घर से कितनी दूर जाना है, यह पेट की स्थिति पर निर्भर करता। उस समूह के अधिकतर बच्चे एक ही बार सिर्फ सुबह ही जाया करते थे। सब के हाथ मे एक एक लोटा हुआ करता था, उस समय तो पानी और कोल्ड ड्रिंक की बोतल भी नही हुआ करती थी। किसी का लोटा नया तो किसी का चिपटा, किसी किसी लोटे का पेंदा गोल भी हुआ करता, जो शौचनिवृति के बाद लट्टू जैसा नचाने के काम आता। खेल का खेल और दोस्तों के निपटारा करके आने तक का टाइम पास।

उस समूह का एक सिद्धान्त था, जिस खेत मे एक बार हो लिए तो महीनों तक उसमें नहीं जाएंगे, कोई नया खेत होना चाहिए। एकता इतनी थी उनमें कि बैठेंगे सब एक साथ ही, पर निवृत होने पर कोई पाबंदी न होती। हां, होड़ जरूर रहती जल्दी से करने की। आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि अंतिम वाले को बिना पानी छुए ही आना होता था क्योंकि उसके लोटे का पानी समूह के निशानची चिंटू और उसके कुछ साथी जो पहले निपट चुके होते, के अचूक निशाने का शिकार हो ही जाता। दरसल वो लोग कंकर और मिट्टी के धेले से लोटे पे निशाना लगाते।
चाहे लोटा लेकर जाओ या न ले जाओ इससे अंतिम व्यक्ति के स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता। जब किसी पोखर या तालाब के पास जाते थे तब लोटा नही जाता था पर निशाना पोखर के इर्द गिर्द के वे पानी होते थे जो निवृति के काम आ रहे होते थे। बस वो लोग इसी ताक में रहते की कब कोई बच्चा पैंट नीची किये तालाब के किनारे धोने बैठेगा, पहले से संग्रहित रोड़े गिट्टियां छप छप पानी को उछालने लग जातीं थीं। और निपटारा करने वाले के कपड़े व तन भिगोने लगतीं।

अगर किसी खेत में कोई बोरिंग का छेद मिल जाये तो वह तब तक इस्तेमाल में लाया जाता जब तक कि उसे लबालब भर न दिया जाता। बरसात का मौसम चुनौतीपूर्ण होता, क्योंकि खेत की मिट्टी गीली होती। पर उनलोगों के पास हर समस्या का समाधान होता। ऐसे वक्त में कोई पेड़ जो तालाब के किनारे हो और उसकी मोटी सी डाल पानी के ऊपर हो, उसका चुनाव किया जाता। थोड़ा समय लगता, कभी कभी तो बहुत भटकना पड़ता ढूंढने के लिए। बस दिक्कत यह होती कि उसपर दो या तीन लोग ही एकबार में जलेबी बना पाते। जलेबी? अरे जब डाल पे बैठकर कोई निपटारा करता, ऊंचाई से गिरने के कारण पहले वो सामग्री नीचे जाती फिर पानी के सतह पर आ जाती। यह काफी खुशी प्रदान करने वाला और रोमांचक क्षण होता और सब जलेबी बनाने को आतुर रहते। भाईचारा बहुत था उनलोगों में इसलिए पहले चुनाव किया जाता कि कौन पहले जाएगा उसके बाद कौन जाएगा।
आप सोच रहे होंगे कि इसमें अंतिम बच्चे को कोई परेशानी नही होती होगी वो आराम से अपना कार्य करता तो आप गलत हैं। क्योंकि उसकी प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले वो डाल को दो तीन बच्चे हिलाना शुरू कर देते और वह बेचारा कुछ अंश ही अपने से जुदा कर पाता। क्योंकि उसका सारा समय बैलेंस बनाने में ही निकल जाता और जो निकालने वो आया है वो निकाल भी न पाता।

गांव में जब किसी के घर मेहमान आते, उनके निवृति के लिए भी किसी छोटे बच्चे को उनके साथ लोटा लेकर जाना पड़ता। घर वाले जबरदस्ती जो भेज दिया करते। कि मेहमान है अकेले थोड़े न जाएंगे। इस चीज को लेकर सभी बच्चे आतंकित हुआ करते क्योंकि ये मेहमान जी की मर्जी थी कि वो कितना दूर जाएंगे और कितना वक्त लगाएंगे। पानी भी नहीं गिरा सकते....क्योकिं इसमें दो बातों का डर होता -एक कि घर वाले कूट सकते हैं अगर शिकायत हो गई तो, और दूसरा कि मेहमान जी अगर गुस्से वाले निकले तो कुटाई वहीं हो सकती है, इसलिए काफी बोरियत भरा पल होता वो, बच्चों के लिए।
सयाना चिंटू जल्दी पकड़ में न आता था पर एक बार उसे ये जिम्मेदारी सौंपी गई। मेहमान उसके घर के न थे, उसके एक दोस्त के घर के थे, इसलिए लोकम लिहाजम जाना पड़ा। होली में आये हुए थे। चिंटू उनके लिए अपने दोस्त के घर लोटा ढूंढा, पर नही मिला, या वह ढूंढना ही नहीं चाहा मन से- ये तो चिंटू ही जाने। उसने मेहमान जी से कहा -चलिए रास्ते में मैं अपने घर से लूंगा। गुस्सा तो उसके अंदर उमड़ घुमड़ ही रहा था इसलिए उसने लोटे में थोड़ी चासनी और थोड़ा पानी मिला कर उनके साथ हो लिया। मेहमान जी को इस बात का पता तब चला जब उनका पजामा चिपकने लगा एवम वहां मख्खियां भिनभिनाने लगीं। इस घटना से चिंटू जी का उसके समूह में जयजयकार तो हुआ पर मेहमान जी की कुपित आंखें चिंटू को ही ढूंढ रही थी। पर अब वह मिलने वाला कहां था उन्हें।

समय बिता। लोगों ने अपने घरों में शौचालय बनवाना शुरू कर दिया जिससे इस तरह का शौचक्रीड़ा लुप्त होता गया, बस कुछ यादें रह गईं।




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