घर झाड़ते मालती कोई फिल्मी गाना गुनगुना रही थी। सोफा पर बैठी शिप्रा सोच रही थी ये गाना तो कोई पुराने फिल्म का सुना सुना लग रहा था बहुत सोचने पर जब उसे याद नही आया तो उसने मालती को बोला अरे मालती कौन सा सिनेमा का गाना गुनगुना रही है।मालती घबड़ाकर बोली ‘गलती हो गया ममेमसाहब अब से नही गाऊँगी’।शिप्रा बोल उठी धत् पगली तुझे गाने को मना थोड़ी की हूँ मैं तो बस गाना का लाइन पूछी मालती ने थोड़ा शरमाते हुये बोली’उ का है मेमसाहब मेरा वो सीडी खरीदा है वही कल पुराना ई वाला गाना सुन रहा था’फिर गाने लगी ...लग जा गले से की फिर ये हसीन शाम हो ना हो...वह गाना गाती रही और शिप्रा धीरे धीरे अतीत में खोते चली गई।

सोलह साल की ही थी वो तब तक उसे घर चलाने में महारथ हासिल कर ली थी हो भी ना कैसे माँ हरदम बीमार रहती चूल्हा बर्तन,खाना बनाना,छोटे भाई बहन को तैयार करना फिर जैसे-तैसे स्कूल भागना। हर दिन देर आने से कान पकड़ कर कझा से बाहर खड़ा रहना पड़ता।वह बाहर से ही मास्टरनी जो पढ़ाती उसे ध्यान से देखती।स्कूल में सब जनता वह पढ़ने में बहुत तेज है।घर आते ही बस्ता रख बर्तन धोने बैठ जाती माँ बोलती ‘अरे बिटिया कुछ तो खा ले वह हांडी में थोड़े चावल देख बोल उठती माँ आज तो एक सहेली ने गुपचुप खिला दी है पेट भरा है’।भूख तो उसे तेज लगा है मगर थोड़े से भात में उसके छोटे भाई-बहन का ही पेट नही भरेगा।माँ बुदबुदाती ‘लखिया बेटी भगवान तोके कोनो कमी ना होवे दे’

शाम होते ही दरवाजे पर बाबूजी के आने का इंतजार करती।बाबूजी आवेंगे टैब ही तो आँच जलायेगी।बाबूजी के साइकिल की घण्टी बजती वह दौड़ कर आती बाबूजी का झोला ले लेती।तापी लगे झोला सब के लिए कुबेर का खजाना ही तो था।वह चाय के पतीली बैठा देती छोटे भाई-बहन पूछते आज बाबूजी क्या लाये हैझोला में आलू-प्याज और चावल देख वह झट से बोलती आज हमलोग आलू बिरयानी खायेंगे।’आलू बिरयानी’चिल्ला कर सब खुशी से ताली बजाने लगते कमरे में बैठे माँ बाबूजी के आँख झलक उठते।शिप्रा जल्दी से आलू भुन चावल डाल देती और गरमागरम सब को परोस देती।खाना खा कर वह पढ़ने बैठ जाती।यही तो उसकी जिंदगी थी उसकी कितना साढ़े पंद्रह साल की थी वो।वसंत उस समय भी उसके तन-मन से होकर गुजरा होगा मगर घर के जिम्मेदारी तले दबे गई।

मोहित यही तो नाम था उसका जो हर दिन विद्यालय के गेट पर छुट्टी के समय खड़ा मिलता।उसे देख वह कन्नी कटा कर तेजी से घर की ओर चल देती मगर उस दिन तेज बारिश में वह भींगती हुई घर जा रही थी तभी उसके सर पर कोई छाता लगा कर उसके साथ चलने लगा।वह घबरा कर इधर-उधर देख फुसफुसा कर बोली ‘तुम हर दिन मेरा पीछा क्यों करते हो।मोहित धीरे से बोला-तुम बहुत अच्छी हो।सादगी में तुम बहुत प्यारी लगती हो बस मुझसे दोस्ती कर लो’।वह मोहित के तरफ देखी करीब से किसी अनजान लड़का को बस देखती रह गई वाकई वह इंद्र देव के समान सुंदर था।उसने धीरे से सर हिला कर हा कह कर तेजी से घर की ओर चल दी।अभी भी उसका कलेजा धक-धक कर रहा था।माँ चिल्ला रही थी री बावली भींग कर क्योँ आई बीमार पड़ जाएगी।आज उसका किसी काम में मन नही लग रहा था।दूसरे फिन स्कूल जा का भी उसको बेसब्री से छुट्टी का इंतजार करने लगी।घण्टी बजट वह दौड़ कर गेट पर आई मोहित खड़ा उसका इंतजार कर रहा थी फिर दोनों बात करते घर की ओर चल दिया।उसने बताया वह इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा है शिप्रा बोली उसे भी माध्यमिक देना है बहुत मेहनत करना है।धीरे धीरे ये सिलसिला जारी रहा और फिर शिप्रा माध्यमिक परिझा की तैयारी करने लगी और मोहित इंजीनियरिंग का अब इधर मिलना नही होता।शिप्रा और मोहित का परिझा खत्म होने पर दोनों एक दूसरे से मिले और मीठे-मीठे सपने बुनने लगे।रिजल्ट निकला शिप्रा 90%लाई और मोहित का चयन आई आई टी में हो गया दोनो बहुत खुश थे।एक दूसरे से मिल कर बधाई दिये फिर मोहित ने धीरे से बोला वह पढ़ने कानपुर जा रहा है यह सुन शिप्रा अवाक हो गई।मोहित ने उसके आसूँ भरे चेहरा को अपने हाथों में ले लिया उसके आँख, होठ पर अपना अधर रख दिया शिप्रा काँप उठी वह चाह कर भी खुद को हटा नही पाई और तभी वसंती हवा उसके तन मन को छू कर निकल गया।मोहित बोला- कोई गाना सुनाओ शिप्रा और शिप्रा सर नीचे कर मोहित का हाथ को अपने हाथ मे लिये गुनगुनाने लगी ‘लग जा गले से की फिर ये हसीन रात हो ना हो शायद इस जन्म में मुलाकात हो ना हो’ आह कितना सुंदर तुम गाती हो मोहित ने शिप्रा को कहा।कुछ देर बात कर फोन शिप्रा के सहेली के पास करने का वादा कर मोहित चला गया।

शिप्रा घर की जिम्मेदारी संभाल अपने पढ़ाई में जुट जाती।जितनी लगन से वह पढ़ाई करती उतनी ही बेसब्री से मोहित का फोन का इंतजार करती।हर दिन अपनी सहेली मीतू से पूछती आज फोन आया वह दुखी हो कर बोलती नही शिप्रा नही आया।एक दिन वह स्कूल जा रही थी दमन से तेजी से एक बाईक गुजरा पीछे जीन्स,पहने एक लड़की बैठी थी लेकिन जो बाईक चला रहा था वह उसे मोहित लगा।उसने अपना सर झटक बुदबुदाई ऐसे कैसे हो सकता है।अपनी चिंता मीतू को बताई मीतू कुछ देर चुप रही फिर धीरे से बोली ‘शिप्रा तुमने ठीक देखा वह मोहित ही था और उसकी नई गर्ल फ्रेंड नंदिता है।शिप्रा का सार कजरा गया वह अवश सी हो गई किसी तरह अपने आंसुओं के बांध को टूटने से रोका।वह घर आकर सब काम निपटा कर पढ़ने बैठ गई ।माँ ने पूछा-क्या हुआ लाडो तेरा तबियत तो ठीक है और सर पर हाथ रख बोली अरे तुम्हे तो तेज बुखार है।वह पिताजी को बोली पिताजी घबरा गये गोद मे सर रख कर जल्दी जल्दी पानी की पट्टी ड़ालने लगे भाई-बहन सब घेर कर बैठ गये कोई पैर दबा रहा कोई हाथ।उसके आँसू झलक गये और धीरे धीरे सो गई।सुबह पहले से तबियत ठीक लग रही थी।माँ एक काम नही करने दी छोटी,और नन्हे भी माँ के काम मे हाथ बटाने लगा।वह लंबी सांस ली और जिंदगी बहुत खुशनुमा है उसे खुशी से जीना है।

शिप्रा लगन से पढ़ने लगी और ग्रेजुएट विथ डिस्टिंक्शन लाई।आज बाबूजी माँ, छोटी नन्हे सब बहुत खुश थे।बाबूजी लड्डू चढ़ा कर घर लाये माँ खीर पूरी और आलूदम बनाई घर में लगा कोई उत्सव है उसकी आंखें झलक गई।सुबह-शाम को चौदह बच्चे को वो ट्यूशन पढ़ाती अपना और दोनों भाई बहन का पढ़ाई का खर्च खुद उठती थी।वह फिर लगन से आई.ए. एस की तैयारी जम कर करने लगी और परिणाम आने पर वह पूरे जिले में द्वितीय स्थान मिला।

हर तरफ खुशी का लहर छा गया।

आज उसी जिला का डिप्टी कलक्टर बन गई।समय गुजरता गया माँ को बहुत महंगा इलाज अस्पताल में भर्ती करने पर भी बचा ना सकी। समय गुजरता गया छोटी भी बी.सी. ए कर जॉब करने लगी पिछले माह ही अपने ही ऑफिस के कर्मी को पसंद की जिसे धूमधाम से शिप्रा ने शादी कर दी और नन्हे मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है उसने भी अपने पसंद की लड़की से शादी शिप्रा और बाबूजी के इजाजत से किया।बाबूजी तीनो के यहाँ घूमते रहते है।उनको बस मलाल है शिप्रा ने शादी नही किया।

शिप्रा उस दिन आफिस का काम कर रही थी तभी उसने चपरासी गणपत को बुला कर दूसरे क्लाइंट को भेजने को कही।धीरे से दरवाजा खोल पुरुष स्वर सुनाई दिया मैं अंदर आ सकता हूँ।उसने सर पेपर में झुकाये बोली’यस प्लीज सीट’।उसने पेपर देखते हुये सर उठाते बोली’मिस्टर शर्मा आपका पेपर मैंने देखा सब सही है।योर वर्क इस वेरी गुड’।थैंक्यू मैम खुशी से मिस्टर शर्मा का आवाज निकला।शिप्रा स्थिर पुरुष को देख रही थी पुरुष की नजर शिप्रा पर पड़ा तो स्तब्ध रह गया बुदबुदाया ‘शिप्रा तुम’।शिप्रा बोली अब आप जा सकते है मिस्टर शर्मा आपका काम हो गया है।मोहित भारी कदम से बाहर निकल गया और शिप्रा लंबी सांस छोड़ी एक बसंती हवा हौले से गुजरी जो बिल्कुल उससे हो कर नही गुजरा।

मालती उठा रही थी मेम साहब अब मैं जाऊँ आप तो गाना सुनते सुनते सो गई और इधर मेरा पूरा काम भी हो गया कह कर हँसने लगी।अरे हाँ ठीक हैं तुम जाओ उठकर दरवाजा बंद कर धीरे धीरे गुनगुनाने लगी’लग जा गले से की फिर ये हसीन रात हो ना हो...उसके आँखों से आँसू बहने लगे जो सदियों से जमा था। वह बुदबुदाई ‘हाँ बसंती हवा हर कोई को एक बार जरूर छू कर निकलता है उसे भी तो छू कर निकला था’।

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